शारदा जी की आँखों में नमी तैर गई। उन्होंने नव्या के हाथों को थामकर कहा, “बेटा, बाहर मेरी छोटी बहन विमला और मेरे मायके की भाभी बैठी हैं। शाम की गाड़ी से वे वापस अपने घर चली जाएँगी। तेरे ससुर जी ने सभी रिश्तेदारों की विदाई के लिफाफे बनाए हैं, पर मेरे मायके वालों के लिए उन्होंने सिर्फ़ एक-एक डिब्बा मिठाई रखने को कहा है। वो कहते हैं कि अनाथ लड़की के मायके वालों का क्या मान-सम्मान! पर बेटा, भाभी और बहन ने ही तो मुझे पाला है… खाली हाथ जाएँगी तो मेरा कलेजा फट जाएगा। तू जब उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेगी न, तो ये पैसे चुपचाप उनके चरणों में रख देना। बस… ये बात तेरे ससुर जी या सिद्धार्थ को मत बताना, वरना घर में क्लेश हो जाएगा।”
पूरे घर को गेंदे और गुलाब के फूलों की लड़ियों से दुल्हन की तरह सजाया गया था। आज घर के इकलौते चिराग, सिद्धार्थ की बारात निकलने वाली थी। आँगन में रिश्तेदारों का मेला लगा था, हलवाइयों की कड़ाहियों से उठती देसी घी की खुशबू पूरे मोहल्ले में फैल रही थी, और ढोलक की थाप पर औरतों के मंगल गीत गूंज रहे थे। इस पूरे शोर-शराबे और रौनक के बीच, पचपन साल की शारदा जी किसी बिन पेंदी के लोटे की तरह इधर से उधर भाग रही थीं। पैरों में दर्द होने के बावजूद उनके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी—आखिरकार आज उनके बेटे के सिर पर सेहरा जो सजने वाला था।
कभी रसोई में जाकर हलवाई को चीनी और मेवों का हिसाब समझातीं, तो कभी बैठक में जाकर समधी जी के स्वागत के लिए रखे गए तोहफों की पोटलियाँ गिनतीं। तभी आँगन के कोने से उनके पति, गजेंद्र बाबू की कड़कड़ाती हुई आवाज गूंजी, “अरे शारदा! कहाँ मर गई? यहाँ पंडित जी पूजा की थाली मांग रहे हैं और तुम्हें अपनी मटरगश्ती से फुर्सत नहीं है! एक काम ढंग से नहीं होता तुमसे, पता नहीं किस घड़ी में पल्ले बंध गई थीं!”
शारदा जी के कांपते हाथों से सुपारी की थैली छूटते-छूटते बची। उन्होंने झट से पल्लू सिर पर खींचा और घबराए हुए स्वर में बोलीं, “जी, बस अभी लाई। वो हलवाई को घी का कनस्तर दे रही थी…”
“हाँ-हाँ, सारा काम आज ही करोगी! दिमाग तो घुटनों में है तुम्हारा,” गजेंद्र बाबू ने मेहमानों के सामने ही उन्हें झिड़क दिया। शारदा जी ने बिना कोई जवाब दिए चुपचाप पूजा की थाली उठाई और सिर झुकाए वहां से चली गईं। रिश्तेदारों के बीच कुछ दबी हुई हँसी गूंजी, तो कुछ औरतों ने तरस भरी नजरों से देखा, लेकिन इस घर के लिए यह कोई नई बात नहीं थी।
धूमधाम से बारात गई और अगले दिन सुबह की पहली किरण के साथ नव्या दुल्हन बनकर उस घर की दहलीज़ पर खड़ी थी। लाल जोड़े में सजी, बड़ी-बड़ी आँखों वाली नव्या ने एम.बी.ए. किया था, लेकिन उसके चेहरे पर जितनी आधुनिकता की चमक थी, उतनी ही संस्कारों की शालीनता भी थी। शारदा जी ने जब कांपते हाथों से आरती की थाली घुमाकर अपनी बहू की नज़र उतारी और कलश को पैर से छूकर गृहप्रवेश करवाया, तो नव्या ने झुककर अपनी सास के पैर छुए। शारदा जी ने उसे तुरंत सीने से लगा लिया। नव्या को अपनी सास की हथेली का स्पर्श बहुत कोमल, पर थोड़ा रूखा लगा—जैसे उन हाथों ने ज़िंदगी भर सिर्फ़ दूसरों की सेवा की हो।
शादी के तीसरे दिन घर के बड़े आँगन में ‘मुंह दिखाई’ की रस्म रखी गई। मोहल्ले की औरतें और दूर-दराज की रिश्तेदार रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहने आँगन में बिछे गद्दों पर बैठी थीं। नव्या घूंघट की ओट में बैठी थी, लेकिन उसके कान आसपास हो रही फुसफुसाहट को साफ सुन रहे थे।
पड़ोस की चंदा चाची ने पान चबाते हुए पास बैठी एक महिला से धीरे से कहा, “अरी बहन, बहू तो चाँद का टुकड़ा है और ऊपर से इतनी ऊँची पढ़ाई की है। पर मुझे तो बेचारी शारदा की चिंता हो रही है। जब खुद के पति और बच्चों ने कभी इस भोली औरत की कद्र नहीं की, तो ये आज के ज़माने की पढ़ी-लिखी बहू क्या खाक इसका मान रखेगी? देख लेना, दो दिन में सास को कोने में बिठा देगी।”
दूसरी औरत ने भी हामी भरते हुए कहा, “सही कह रही हो। शारदा तो बचपन से ही अनाथ थी, मामा-मामी ने बोझ समझकर दसवीं पास करते ही गजेंद्र भाईसाहब के पल्ले बांध दिया। तब से इस घर की चक्की में पिस ही तो रही है। न जेब में एक फूटी कौड़ी रहती है, न घर में कोई पूछ है। अब बहू के आने के बाद तो इसकी रही-सही जगह भी छिन जाएगी।”
घूंघट के भीतर बैठी नव्या के माथे पर बल पड़ गए। उसे औरतों की बातें पूरी तरह समझ में तो नहीं आईं, लेकिन इतना ज़रूर समझ आ गया कि उसकी सासू माँ की स्थिति इस घर में कुछ अलग है। उसने घूंघट की झिरी से झाँककर देखा—शारदा जी पसीने से तरबतर साड़ी के पल्लू से चेहरा पोंछते हुए हर मेहमान को चाँदी की तश्तरी में मिठाई और शरबत परोस रही थीं। जो औरतें अभी उनके बारे में बातें बना रही थीं, उन्हीं के सामने शारदा जी हाथ जोड़कर मुस्कराते हुए कह रही थीं, “बहन जी, एक रसगुल्ला और लीजिए न, मेरे बेटे की शादी की मिठाई है।” उनकी उस निष्छल मुस्कान में कोई बनावट नहीं थी, बस अपनों की खुशी में खुश होने का एक गहरा संतोष था।
चौथा दिन था। रिश्तेदारों की विदाई का समय आ गया था। दोपहर के वक्त जब सब अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे थे, शारदा जी दबे पाँव नव्या के कमरे में आईं। उन्होंने धीरे से दरवाज़ा भेड़ लिया और झिझकते हुए नव्या के पास पलंग के कोने पर बैठ गईं। अपनी ही बहू से बात करने में उनके चेहरे पर एक अजीब सी घबराहट थी।
“बहू… एक बात कहूँ?” शारदा जी ने बहुत धीमी आवाज में पूछा।
नव्या ने तुरंत अपने हाथ में पकड़ी किताब साइड में रखी और आदर से बैठते हुए बोली, “जी माँ जी, कहिए न। आप इतना संकोच क्यों कर रही हैं?”
शारदा जी ने अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेटते हुए नज़रें झुका लीं और बोलीं, “बेटा, तुम्हारे पास… तुम्हारे पास कुछ खुले पैसे होंगे क्या? दो-तीन हज़ार रुपये?”
नव्या एक पल के लिए चौंक गई। इतने बड़े और संपन्न घर की मालकिन अपनी नई बहू से पैसे मांग रही थी? लेकिन उसने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया। उसने तुरंत अपनी अलमारी खोली, पर्स से पाँच सौ के छह नोट निकाले और सास की हथेली पर रखते हुए कहा, “लीजिए माँ जी। और चाहिए तो बताइए, मेरे पास हैं।”
शारदा जी की आँखों में नमी तैर गई। उन्होंने नव्या के हाथों को थामकर कहा, “बेटा, बाहर मेरी छोटी बहन विमला और मेरे मायके की भाभी बैठी हैं। शाम की गाड़ी से वे वापस अपने घर चली जाएँगी। तेरे ससुर जी ने सभी रिश्तेदारों की विदाई के लिफाफे बनाए हैं, पर मेरे मायके वालों के लिए उन्होंने सिर्फ़ एक-एक डिब्बा मिठाई रखने को कहा है। वो कहते हैं कि अनाथ लड़की के मायके वालों का क्या मान-सम्मान! पर बेटा, भाभी और बहन ने ही तो मुझे पाला है… खाली हाथ जाएँगी तो मेरा कलेजा फट जाएगा। तू जब उनके पैर छूकर आशीर्वाद लेगी न, तो ये पैसे चुपचाप उनके चरणों में रख देना। बस… ये बात तेरे ससुर जी या सिद्धार्थ को मत बताना, वरना घर में क्लेश हो जाएगा।”
नव्या का दिल जैसे किसी ने मुट्ठी में भींच लिया। एक औरत ने पैंतीस साल इस घर को अपनी जवानी, अपना खून-पसीना दिया, और आज अपने ही मायके वालों को शगुन के दो पैसे देने के लिए उसे अपनी बहू के आगे हाथ फैलाना पड़ रहा है! नव्या ने आगे बढ़कर सास के आँसू पोंछे और कहा, “माँ जी, आप बिल्कुल चिंता मत कीजिए। ये बात हमारे बीच ही रहेगी।”
शाम को जब विदाई की बेला आई, तो नव्या ने ठीक वैसा ही किया। जब उसने मौसी सास और मामी सास के चरणों में झुककर प्रणाम किया और चुपके से नोटों की गड्डी उनके हाथों में थमा दी, तो दोनों औरतें दंग रह गईं। उन्होंने कनखियों से शारदा जी को देखा, जो खंभे की ओट में खड़ी आँचल से मुँह दबाए रो रही थीं। मौसी सास ने नव्या को उठाकर अपने गले से लगा लिया और उसके कान में फुसफुसाते हुए कहा, “बेटी, हम जानते हैं ये किसने भिजवाए हैं। हमारी शारदा बहुत भोली है, गाय जैसी सीधी। इस घर ने कभी इसके आँसू नहीं देखे। अब ये तेरे हवाले है, इसका ध्यान रखना बेटी।”
विदाई के वक्त शारदा जी अपनी बहन और भाभी के गले लगकर फूट-फूटकर रोईं। नव्या दूर खड़ी अपनी सास की सिसकियों में छिपे उस दशकों पुराने दर्द को महसूस कर रही थी।
पाँचवें दिन रसोई की रस्म थी। रिवाज के मुताबिक नई दुल्हन को पूरे परिवार के लिए कुछ मीठा और पकवान बनाना था। सुबह जब नव्या नहा-धोकर रसोई में पहुँची, तो उसने देखा कि शारदा जी पहले से ही वहां मौजूद थीं। उन्होंने बादाम-पिस्ता काटकर रखे थे, दूध कड़ाही में उबालकर गाढ़ा कर दिया था और पूड़ियों का आटा भी गूंथ लिया था।
नव्या को देखते ही शारदा जी मुस्कराकर बोलीं, “आ गई मेरी बच्ची? चल, मैंने सारी तैयारी कर दी है। तू बस कड़ाही में हलवा भून दे और दो-चार पूड़ियाँ तल दे, ताकि रस्म भी पूरी हो जाए और तुझे इतनी गर्मी में पसीना भी न बहाना पड़े।”
नव्या ने स्नेह से अपनी सास को देखा और कहा, “माँ जी, अगर सारा काम आप ही कर लेंगी तो मुझे आपके हाथ के स्वाद का जादू कैसे पता चलेगा? चलिए, आज हम सास-बहू मिलकर रसोई संभालते हैं।”
उस दिन रसोई में काम करते हुए नव्या ने जाना कि शारदा जी न सिर्फ़ पाक-कला में निपुण हैं, बल्कि उनका दिल किसी छोटे बच्चे की तरह साफ और निश्छल है। वे छोटी-छोटी बातों पर खिलखिलाकर हँस पड़तीं और नव्या की हर पसंद-नापसंद का ऐसे ख्याल रख रहीं थीं जैसे कोई माँ अपनी कोख से जन्मी बेटी का रखती है। खाने की मेज पर जब गजेंद्र बाबू और ननद महक ने हलवे की तारीफ के पुल बांधे और कहा कि “आखिर एम.बी.ए. बहू के हाथ का जादू ही अलग है,” तब भी शारदा जी कोने में खड़ी मंद-मंद मुस्कराती रहीं। उन्होंने एक बार भी यह नहीं जताया कि उस हलवे की सारी मेहनत उनकी थी।
धीरे-धीरे शादी का शोर थम गया और ज़िंदगी अपनी रोज़मर्रा की पटरी पर लौट आई। एक महीना बीतते-बीतते नव्या के सामने उस घर की असली तस्वीर साफ होने लगी। उसने देखा कि इस घर में शारदा जी की हैसियत एक बिना तनख्वाह की नौकरानी से ज़्यादा कुछ नहीं थी। सुबह पांच बजे उठने से लेकर रात ग्यारह बजे रसोई का दरवाज़ा बंद करने तक, वे मशीन की तरह चलती रहतीं, लेकिन बदले में उन्हें मिलता था—सिर्फ़ तिरस्कार और ताने।
ससुर गजेंद्र बाबू रिटायर्ड बैंक मैनेजर थे। उन्हें अपनी पढ़ाई-लिखाई और रुतबे का बड़ा घमंड था। अगर चाय में अदरक थोड़ी कम हो जाती, तो वे कप मेज पर पटक देते। ननद महक, जो कॉलेज के आखिरी साल में थी, अपनी ही माँ को दोस्तों के सामने ‘अनपढ़’ और ‘गंवार’ कहने में ज़रा भी शर्म महसूस नहीं करती थी। और तो और, सिद्धार्थ—जिसे शारदा जी ने रात-रात भर जागकर पढ़ाया और काबिल बनाया—वह भी ऑफिस की झुंझलाहट अक्सर अपनी माँ पर ही उतार देता था।
शारदा जी सब कुछ चुपचाप सह लेतीं। कभी पलटकर जवाब नहीं देतीं, बस अपनी गलती न होने पर भी “मुझसे भूल हो गई” कहकर बात खत्म कर देतीं। नव्या का खून यह सब देखकर खौल उठता था। वह पढ़ी-लिखी, आत्मनिर्भर विचारों वाली लड़की थी। उसे यह बात कतई गवारा नहीं थी कि जिस औरत की वजह से यह घर स्वर्ग जैसा साफ-सुथरा और व्यवस्थित है, उसी औरत को इस घर में इंसान तक नहीं समझा जाता। उसने मन ही मन ठान लिया कि वह इस घर की दहलीज़ का इतिहास बदलेगी। वह अपनी सास के लिए कोई भीख नहीं मांगेगी, बल्कि उन्हें उनका वह हक और सम्मान दिलाएगी जिसकी वे हकदार हैं। बस, उसे सही मौके की तलाश थी।
शादी को करीब डेढ़ महीना बीत चुका था। एक सुबह सिद्धार्थ को किसी ज़रूरी मीटिंग के लिए ऑफिस जाना था। वह नाश्ते की मेज पर बैठा अपनी फाइलें समेट रहा था। शारदा जी रसोई से गरमा-गरम पराठा लेकर आईं और उसकी प्लेट में रख दिया। सिद्धार्थ का ध्यान अपने फोन में था। उसने बिना देखे निवाला तोड़ा और मुँह में रखते ही बुरी तरह भड़क उठा।
“क्या माँ! आपको कितनी बार कहा है कि मुझे अजवाइन वाले पराठे पसंद नहीं हैं, फिर भी आपने इसमें अजवाइन डाल दी! आपका दिमाग कहाँ रहता है? एक छोटा सा काम आपसे ठीक से नहीं होता! सारा मूड खराब कर दिया सुबह-सुबह!” सिद्धार्थ ने प्लेट को जोर से आगे खिसकाते हुए चिल्लाकर कहा।
शारदा जी सहम गईं। वे कांपती आवाज में बोलीं, “बेटा, वो तेरे बाबूजी के लिए अजवाइन का बनाया था, गलती से तेरी प्लेट में आ गया… मैं अभी दूसरा सेक कर लाती हूँ…”
“रहने दीजिए! मुझे नहीं खाना कुछ भी! अनपढ़ों की तरह काम करती हैं बस!” सिद्धार्थ अपनी फाइल उठाकर उठने ही वाला था कि तभी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी नव्या एक झटके में बाहर आई।
उसकी आँखों में एक शांत पर बेहद सख्त चमक थी। उसने सीधे सिद्धार्थ की आँखों में देखते हुए सधे हुए लेकिन बुलंद स्वर में कहा, “रुकिए सिद्धार्थ! आप इस तरह माँ जी पर नहीं चिल्ला सकते।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। महक जो सोफे पर बैठकर नेल-पॉलिश लगा रही थी, उसके हाथ वहीं थम गए। शारदा जी ने घबराकर नव्या का हाथ पकड़ना चाहा, लेकिन नव्या ने आज कदम पीछे नहीं खींचे।
सिद्धार्थ ने अचरज और गुस्से से नव्या को देखा, “नव्या, तुम बीच में मत बोलो। तुम्हें नहीं पता माँ हमेशा ऐसे ही गड़बड़ करती हैं।”
“गड़बड़ माँ जी ने नहीं की है सिद्धार्थ, वह पराठा मैंने बेला था और मैंने ही माँ जी को प्लेट लगाकर दी थी,” नव्या ने बिना पलक झपकाए कहा। “अगर आपको गुस्सा करना है, चिल्लाना है, या किसी को ‘अनपढ़’ और ‘बेवकूफ’ कहना है, तो मुझसे कहिए। मुझ पर चिल्लाइए! लेकिन आप माँ जी से इस लहजे में बात करने का हक नहीं रखते। जिस माँ ने अपनी हड्डियाँ गलाकर आपको इस काबिल बनाया कि आज आप सूट-बूट पहनकर बड़ी कंपनी में मीटिंग करने जा रहे हैं, उन्हें एक पराठे के लिए आप इस तरह अपमानित करेंगे? क्या आपकी बड़ी डिग्रियों ने आपको यही तमीज सिखाई है?”
नव्या का एक-एक शब्द हथौड़े की तरह सिद्धार्थ के अहंकार पर चोट कर रहा था। उसने कभी सोचा भी नहीं था कि उसकी शांत रहने वाली पत्नी इस तरह अपनी सास की ढाल बनकर खड़ी हो जाएगी। उसने अपनी माँ की तरफ देखा—शारदा जी की आँखों से आँसू बह रहे थे और वे हाथ जोड़कर नव्या को चुप रहने का इशारा कर रही थीं। माँ की वह बेबसी देखकर सिद्धार्थ को पहली बार अपने किए पर गहरी शर्मिंदगी महसूस हुई। उसका सिर शर्म से झुक गया।
वह धीमे स्वर में बोला, “सॉरी माँ… मुझे ऐसे बात नहीं करनी चाहिए थी। ऑफिस के टेंशन में मैं भूल गया था कि मैं किससे बात कर रहा हूँ।” कहकर सिद्धार्थ ने चुपचाप वही अजवाइन वाला पराठा खाया और माँ के पैर छूकर ऑफिस चला गया।
उस घटना का असर सिर्फ़ सिद्धार्थ पर ही नहीं, बल्कि कोने में बैठी महक पर भी गहरा पड़ा। दोपहर को जब महक कॉलेज से लौटी, तो उसने अपनी आदत के मुताबिक बैग सोफे पर नहीं पटका, बल्कि खुद रसोई में जाकर पानी का गिलास लिया और अपनी माँ के गले में बाहें डालकर बोली, “माँ, आज खाने में क्या बना है? लाओ, सलाद मैं काट देती हूँ।” शारदा जी को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। उन्होंने मन ही मन भगवान को और अपनी बहू को हजार बार धन्यवाद दिया।
बेटे और बेटी को तो नव्या ने आइना दिखा दिया था, लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अभी बाकी थी—ससुर गजेंद्र बाबू। गजेंद्र बाबू का अहंकार हिमालय जैसा अडिग था। वे घर के मुखिया थे और उनका मानना था कि शारदा जैसी कम पढ़ी-लिखी औरत की राय लेने का मतलब अपनी तौहीन कराना है। नव्या जानती थी कि ससुर जी पर चिल्लाकर या बहस करके बात नहीं बनेगी, उन्हें तो उनकी ही समझदारी के तराजू में तौलकर एहसास दिलाना होगा।
कुछ ही दिनों बाद वह घड़ी भी आ गई। रविवार की दोपहर थी। नव्या रसोई में रात के खाने की तैयारी के लिए परात में आटा गूंथ रही थी और शारदा जी पास ही बैठकर मटर छील रही थीं। तभी बैठक से गजेंद्र बाबू की भारी आवाज गूंजी, “नव्या बहू! ज़रा बाहर बैठक में तो आना!”
नव्या ने अपने आटे से सने हाथों को देखा और पल्लू से माथा पोंछते हुए बाहर बैठक की दहलीज़ पर जा खड़ी हुई। बैठक में गजेंद्र बाबू अपने चश्मे को नाक पर टिकाए कुछ कागजात और तस्वीरें देख रहे थे, और पास वाले सोफे पर सिद्धार्थ भी बैठा था।
गजेंद्र बाबू ने बड़ी सौम्यता से नव्या की तरफ देखते हुए कहा, “आओ बहू, यहाँ बैठो। देखो, दिल्ली के एक बहुत बड़े खानदान से हमारी महक के लिए रिश्ता आया है। लड़का चार्टर्ड अकाउंटेंट है, खुद का बड़ा मकान है और देखने में भी राजकुमार जैसा है। मैंने और सिद्धार्थ ने तो बायोडाटा देख लिया है, अब तुम भी पढ़ी-लिखी और समझदार हो, ज़रा ये फोटो और कुंडली देखकर बताओ कि महक के लिए यह रिश्ता कैसा रहेगा?”
नव्या ने अपने दोनों हाथ सामने दिखाते हुए बड़ी विनम्रता से कहा, “बाबूजी, मेरे हाथों में अभी आटा लगा हुआ है। मैं बस पाँच मिनट में आटा समेटकर और हाथ धोकर आती हूँ, फिर देखती हूँ।”
गजेंद्र बाबू ने तुरंत हाथ हवा में लहराते हुए बड़ी बेपरवाही से कहा, “अरे छोड़ो भी बहू! तुम यहाँ आकर बैठो और अपनी राय दो, यह घर का बहुत बड़ा और ज़रूरी फैसला है। आटा तो शारदा गूंथ देगी, उसका और काम ही क्या है! शारदा! अरी ओ शारदा, आकर आटा संभाल ले रसोई में!”
रसोई के दरवाज़े के पास मटर का कटोरा लिए खड़ी शारदा जी के कदम वहीं ठिठक गए। नव्या ने देखा कि यही वह पल है, जिस पर इस घर के भविष्य की नींव टिकी है। उसने आटा धोने के लिए कदम पीछे नहीं खींचे, बल्कि आटे से सने हाथों के साथ ही बैठक के बीचों-बीच आकर खड़ी हो गई।
उसने बेहद शांत, आदरपूर्ण लेकिन दृढ़ स्वर में कहा, “बाबूजी, आटा तो मैं बाद में भी गूंथ लूँगी, और महक के रिश्ते की बात वाकई इस घर का सबसे बड़ा फैसला है। लेकिन मुझे लगता है कि यह फोटो और बायोडाटा देखने का पहला हक मेरा नहीं, बल्कि माँ जी का है।”
गजेंद्र बाबू के चेहरे के भाव अचानक बदल गए। उन्होंने भौंहें सिकोड़ते हुए कहा, “क्या बात करती हो बहू! शारदा को इन सब चीज़ों की क्या समझ है? वह दसवीं पास औरत सी.ए. की डिग्री और बड़े शहरों के स्टेटस के बारे में क्या जानेगी? इसीलिए तो मैंने तुम्हें बुलाया है।”
सिद्धार्थ ने देखा कि पिताजी का पारा चढ़ने वाला है। उसने बात संभालने के लिए बीच में बोलना चाहा, “नव्या, बाबूजी ठीक कह रहे हैं, तुम…”
लेकिन नव्या ने अपनी बात जारी रखी, “बाबूजी, मुझे माफ़ कीजिएगा अगर मेरी बात आपको बुरी लगे। माना कि मैंने एम.बी.ए. किया है और माँ जी के पास कोई बड़ी डिग्री नहीं है। लेकिन डिग्रियाँ सिर्फ़ किताबें पढ़ना सिखाती हैं, इंसान को परखना नहीं। महक को मैंने नहीं, माँ जी ने अपनी कोख में नौ महीने पाला है। उसके बचपन के हर आँसू, हर ज़िद और हर ज़रूरत को माँ जी ने मुझसे और आपसे कहीं ज़्यादा करीब से समझा है। जिस माँ ने पैंतीस साल तक इस घर के हर सदस्य के बिना बोले उसके मन की बात जान ली, क्या वह अपनी ही बेटी के लिए एक सही जीवनसाथी की परख नहीं कर पाएँगी?”
नव्या ने एक गहरी साँस ली और आगे कहा, “बाबूजी, मैं तो अभी डेढ़ महीने पहले इस घर में आई हूँ, मेरी उम्र और तजुर्बा ही कितना है! अगर आज इस घर में बेटी के भविष्य का फैसला लेते वक्त उसकी सगी माँ को ही रसोई में आटा गूंथने भेज दिया जाएगा, तो कल को महक अपने ससुराल जाकर किस मुँह से अपने सम्मान की उम्मीद करेगी? अगर हम ही अपनी घर की लक्ष्मी का मान नहीं रखेंगे, तो दुनिया से क्या उम्मीद करेंगे? इसलिए बाबूजी, यह फोटो सबसे पहले माँ जी ही देखेंगी, उनका आशीर्वाद और उनकी राय ही सर्वोपरि होनी चाहिए।”
बैठक में ऐसी खामोशी पसर गई कि घड़ी की टिक-टिक भी साफ सुनाई दे रही थी। सिद्धार्थ की सांसें अटकी हुई थीं कि अब बाबूजी का ज्वालामुखी फटेगा। लेकिन गजेंद्र बाबू जड़वत बैठे रहे। वे एकटक नव्या के चेहरे को देख रहे थे। आज तक किसी ने उनके सामने इस तरह तर्कों और संस्कारों का ऐसा अद्भुत मेल रखकर बात नहीं की थी।
उनकी नज़र अचानक रसोई के दरवाज़े की ओट पर गई, जहाँ शारदा जी साड़ी का पल्लू मुँह पर रखे सिसक रही थीं। पैंतीस सालों में पहली बार गजेंद्र बाबू को अपनी पत्नी के सफेद होते बालों, झुर्रियों भरे चेहरे और उन थकी हुई आँखों के पीछे छिपा वह विशाल त्याग दिखाई दिया, जिसे उन्होंने अपनी झूठी शान के तले हमेशा रौंदा था। उन्हें एहसास हुआ कि जिस औरत को वे अनपढ़ समझते रहे, वास्तव में उसने ही अपने मौन और सहनशीलता से इस परिवार को टूटने से बचाए रखा था।
सिद्धार्थ ने घबराकर उठना चाहा, “बाबूजी, नव्या का मतलब वो नहीं था…”
गजेंद्र बाबू ने अपना हाथ उठाकर सिद्धार्थ को बीच में ही रोक दिया। उनका गला भर आया था। उन्होंने अपना चश्मा उतारा, कुर्ते के कोने से अपनी नम हो आई आँखों को पोंछा और भारी आवाज में बोले, “बैठ जा सिद्धार्थ। कुछ मत बोल… आज हमारी बहू ने मेरी आँखों पर बँधी पैंतीस साल पुरानी अहंकार की पट्टी उतार दी है। वह बिल्कुल ठीक कह रही है। जिस औरत ने इस घर को अपना सर्वस्व दे दिया, मैंने उसे कभी एक इंसान का दर्जा भी नहीं दिया।”
गजेंद्र बाबू ने दरवाज़े की तरफ देखा और जीवन में पहली बार बेहद नरम और आदर भरे स्वर में पुकारा, “शारदा… वहां दरवाज़े के पीछे क्यों खड़ी हो? अंदर आओ। यहाँ मेरे पास सोफे पर बैठो और देखो, हमारी बेटी के लिए यह लड़का कैसा रहेगा?”
शारदा जी को लगा जैसे उनके कानों में किसी ने अमृत घोल दिया हो। उनके पैर कांप रहे थे। जिस बैठक के सोफे पर बैठने की हिम्मत उन्होंने पिछले पैंतीस सालों में कभी नहीं की थी, आज खुद उनके पति उन्हें वहां सम्मान के साथ बुला रहे थे। नव्या ने आगे बढ़कर अपने आटे वाले हाथों को पल्लू से पोंछा, सास का कंधा थामकर उन्हें अंदर लाई और गजेंद्र बाबू के ठीक बगल में बैठा दिया।
गजेंद्र बाबू ने खुद अपने हाथों से लड़के की तस्वीर शारदा जी के हाथों में थमाई और कहा, “मुझसे बहुत बड़ी भूल हुई शारदा, जो मैंने आज तक तुम्हारी कद्र नहीं की। आज से इस घर का कोई भी फैसला तुम्हारी मर्जी के बिना नहीं होगा।”
शारदा जी की आँखों से गंगा-यमुना बह निकलीं। उन्होंने रोते हुए नव्या की तरफ देखा और हाथ जोड़ दिए, मानो कह रही हों कि ‘जो सम्मान मैं पूरी ज़िंदगी गुजार कर भी अपने लिए नहीं कमा पाई, वह तूने कुछ ही दिनों में मेरी झोली में डाल दिया।’ नव्या ने तुरंत आगे बढ़कर सास के जुड़े हुए हाथों को अपने हाथों में ले लिया और उन्हें अपने माथे से लगा लिया।
उस दिन प्रतापगढ़िया हवेली में सिर्फ़ एक रिश्ते की बात तय नहीं हुई थी, बल्कि उस घर की गुमनाम दहलीज़ को उसका खोया हुआ स्वाभिमान वापस मिल गया था। जिस घर में कभी तानों और चीख-पुकार की गूंज रहती थी, वहां अब शारदा जी की सलाह और उनकी खिलखिलाहट की रौनक रहने लगी थी।
क्या आपके परिवार या आस-पड़ोस में भी शारदा जी जैसी कोई महिला है, जिनका पूरा जीवन परिवार की सेवा में बीत गया लेकिन उन्हें कभी सही सम्मान नहीं मिला? इस कहानी में नव्या के कदम के बारे में आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपने विचार ज़रूर साझा करें!
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