अंश – मंजू तिवारी

 मैं अपने बच्चों को रोज स्कूल छोड़ने लेने खुद जाती हूं।  कभी-कभी मेरे पति भी बच्चों को छोड़ने जाते हैं। यह मेरा रोज का काम होता है कभी समय से पहले बच्चों को लेने पहुंच जाते हैं।  रोज मिलते-जुलते रहने की वजह से हम अभिभावकों की एक दूसरे से अच्छी पहचान हो जाती है। ऐसे … Read more

औलाद – पुष्पा पाण्डेय

काशीनाथ जी के दिन का अधिकतम समय बरामदे के सामने लगे आम्र-वृक्ष के नीचे ही एक लकड़ी की चौकी पर बीतता था। जाड़े के दिन में तो  सूर्योदय के साथ ही चले आते थे और लगभग सारा दिन वहीं निकल जाता था। बीच-बीच में वृक्ष से छाया भी उपलब्ध हो जाती थी। नौकरी के शुरुआती … Read more

अंगूठी   –  गीता वाधवानी

एक दिन सुबह सुबह अचानक मन हुआ कि चलो आज बाग में सैर कर ली जाए और मैं सुबह 6:00 बजे पहुंच गई बाग में। आधे घंटे की सैर करने के बाद मैं थककर एक बैंच पर बैठ गई। तभी अचानक मैंने देखा की बगिया की हरी हरी घास में कुछ चमक रहा है। पहले … Read more

एहसास – डा. नरेंद्र शुक्ल

‘बहू तुझसे नीरज ने कुछ कहा ? रमा के कमरे में दाखिल होते हुये सास ने कहा ।‘ ‘ऩ.. . नहीं तो मां । सपनों की दुनिया में खोई रमा , पंलग से उतरकर, सिर पर चुन्नी लेते हुये बोली । ‘ ‘आइये , बैठिये न मम्मी । रमा ने पंलग पर बिछी चादर को … Read more

जी ले जरा – गुरविंदर टूटेजा

बस में गाना चल रहा है… आज फिर जीने की तमन्ना हैं… आज फिर मरने का इरादा हैं…  सखियों की टोली आज पिकनिक जा रही है… मैं लवली हमारा किट्टी ग्रुप आज अपनी पच्चीसवीं सालगिरह मना रहा है….मैं जब शादी होकर आई तो आते ही दोनों जेठानियों ने बताया कि हमारी किट्टी है तुम्हें भी … Read more

मां मुझे वापस कोटा नहीं जाना है। – सुषमा यादव

मेरी बेटी अभी बोर्डिंग स्कूल से दसवीं पास करके आई नहीं कि हम दोनों ने उसे कोटा कोचिंग के मेडिकल प्रवेश टेस्ट में बैठा दिया, वो मना करती रही कि अभी मुझे पढ़ने दीजिए, बारहवीं पास करने दीजिए। पर हम नहीं माने, और वो पास हो गई,। हमने सबको बड़ी खुशी से बताया, बेटी कोचिंग … Read more

औलाद की उपेक्षा का दंश – सुषमा यादव

जिएं तो जिएं कैसे बिन तुम्हारे,, **** ,,, कुछ दर्द बह जाते हैं, आंसू बनकर,, कुछ दर्द चिता तक जातें हैं,,,**** ,, कुछ स्मृतियां ऐसी होती हैं, जो कभी भी धूमिल नहीं होती हैं, जिंदगी में कुछ अपने बहुत ही अज़ीज़ होते हैं, जो हमसे बिछड़ जाते हैं,,हम उन्हें विस्मृत नहीं कर पाते,बस समय की … Read more

बहू का दर्द – किरन विश्वकर्मा

बहू रिया अस्पताल से जैसे ही अपनी बिटिया को लेकर घर के बाहर गाड़ी से उतर कर खड़ी हुई तो घर को फूलों से सजा देखकर बहुत खुश हुई और खुशी से मेरी ओर देखते हुए बोली की……मम्मी जी मैं बहुत खुश हूं मुझे पता है यह सब आप ही ने किया है। अरे पहली … Read more

ममता फर्क नहीं करती – किरन विश्वकर्मा

मैं अभी बाहर खड़ी सब्जी ले ही रही थी कि मुझे वैभवी अपनी बेटी के साथ दिखाई दी जो की ट्रॉली बैग लेकर कहीं बाहर जा रही थी मुझे देखते ही उन्होंने पूछा कि……बहुत दिनों बाद दिखाई दे रही हो क्या बात है मैंने भी जवाब दिया हां अब तबीयत सही नहीं रहती है शुगर … Read more

विरासत – स्नेह ज्योति

छुक-छुक करती ट्रेन चली दिल्ली से बिहार बढ़ी…प्रताप और राकेश अपने परिवार के साथ अपने गाँव जा रहे थे।पिता जी के देहांत के बाद दोनों का गाँव से नाता ही टूट गया था।शहर की दौड़ती-भागती ज़िंदगी में दूसरो के लिए तो छोड़ो अपनों के लिए भी वक़्त नहीं मिलता,तो गाँव का तो सवाल ही नहीं।सिया … Read more

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