रोहन अपने कमरे से फोन पर बात करते हुए बाहर निकला। सामने माँ-बाप को देखकर उसके भी कदम रुक गए। उसने जल्दी से फोन काटा और आगे बढ़कर पिता के पैर छुए। फिर माँ के पैर छूते हुए थोड़ा झेंपते हुए बोला, “पापा, आप लोगों ने आने से पहले एक बार फोन तो किया होता! बताया भी नहीं कि आप आ रहे हैं।”
रोहन के इस सवाल में स्वागत से ज्यादा एक उलाहना था, जैसे उनके आने से उसका कोई बना-बनाया रूटीन खराब हो गया हो। सुमित्रा जी का गला भर आया था, लेकिन उन्होंने खुद को संभालते हुए अपराधी भाव से कहा, “बेटा, हमने सोचा तुम्हें सरप्राइज देंगे। तुम्हारी आवाज सुने बहुत दिन हो गए थे और परसों मायरा का जन्मदिन भी था… हमें क्या पता था कि तुम लोग इतने दूर जा रहे हो।” उनकी आवाज आखिर में थोड़ी कांप गई।
कमरे में एक अजीब सा असहज सन्नाटा छा गया। नेहा तुरंत किचन में गई और दो गिलास पानी ले आई। सुमित्रा जी ने चुपचाप गिलास उठाया और बिना प्यास के भी पानी पीने लगीं ताकि उनके आंसू किसी को नजर न आएं।
सर्दियों की गुनगुनी धूप आँगन में बिछी हुई थी, लेकिन सुमित्रा जी के मन में जैसे एक गहरा कोहरा छाया हुआ था। पिछले कई दिनों से उनकी नज़रें बार-बार उस लैंडलाइन फोन और अपने मोबाइल की स्क्रीन के बीच झूल रही थीं। उनका इकलौता बेटा रोहन, जो अब शहर की एक बड़ी मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था, पिछले तीन हफ़्तों से फोन करने का समय नहीं निकाल पाया था। जब भी सुमित्रा जी खुद फोन मिलातीं, तो या तो फोन कट जाता या फिर एक छोटा सा मैसेज आ जाता— “मीटिंग में हूँ माँ, बाद में बात करता हूँ।” वह ‘बाद’ कभी आता ही नहीं था। सुमित्रा जी ने अपनी बुनाई का स्वेटर एक तरफ रखा और एक ठंडी आह भरते हुए अपनी सूनी आँखों से बाहर के खाली रास्ते को देखने लगीं।
रमाकांत जी, जो पास ही आरामकुर्सी पर बैठकर अखबार पढ़ रहे थे, अपनी पत्नी की इस खामोशी को बहुत अच्छी तरह पढ़ सकते थे। पैंतीस साल का साथ था उनका। बिना कुछ कहे भी वे सुमित्रा के दिल की हर धड़कन का हिसाब रखते थे। उन्होंने अपना चश्मा नीचे किया और अखबार मोड़कर टेबल पर रखते हुए बोले, “सुम्मी, उदास क्यों बैठी हो? बच्चे आज-कल की इस दौड़-भाग वाली जिंदगी में उलझ जाते हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि वे हमें भूल गए हैं।”
सुमित्रा जी ने अपनी नम आँखें पोंछीं और रुंधे हुए गले से कहा, “मैं कहाँ कुछ कह रही हूँ। बस, रोहन की बहुत याद आ रही है। छोटी मायरा को देखे भी छः महीने से ऊपर हो गए हैं। घर का यह सन्नाटा अब काटने को दौड़ता है।”
उनकी इस बात ने रमाकांत जी के दिल को भी भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने कुछ पल सोचा और फिर चेहरे पर एक मुस्कान लाते हुए अचानक एक प्रस्ताव रखा, “तो फिर इंतज़ार किस बात का है? अगर बेटा काम में फंसा है, तो क्या हुआ? हम तो रिटायर हो चुके हैं। चलो, कल ही शहर चलते हैं। उसे और बहू को बिना बताए पहुँचेंगे। सोचो, हमें अचानक सामने देखकर छोटी मायरा कितनी खुश होगी!”
यह सुनते ही सुमित्रा जी के चेहरे पर जैसे किसी ने अचानक से रौशनी बिखेर दी हो। उनकी सारी उदासी छूमंतर हो गई। “सच कह रहे हैं आप? लेकिन ऐसे अचानक जाना ठीक रहेगा क्या? नेहा को बुरा तो नहीं लगेगा?” उन्होंने झिझकते हुए पूछा।
“अरे अपना ही घर है, इसमें कैसा बुरा लगना! मैं अभी स्टेशन जाकर कल सुबह की इंटरसिटी एक्सप्रेस के टिकट ले आता हूँ,” रमाकांत जी ने अपना कोट पहनते हुए उत्साह से कहा और घर से बाहर निकल गए।
रमाकांत जी के जाते ही सुमित्रा जी के भीतर जैसे एक नई ऊर्जा का संचार हो गया। वे तुरंत रसोई में गईं। बेटे की पसंद उन्हें आज भी मुँह जबानी याद थी। रोहन को उनके हाथ के गोंद के लड्डू और घर का बना आम का सूखा अचार बहुत पसंद था। उन्होंने तुरंत कड़ाही चढ़ाई, शुद्ध देसी घी डाला और गोंद भूनने लगीं। कुछ ही देर में पूरे घर में घी, इलायची और मेवों की वह सोंधी महक फैल गई जो किसी भी आम घर को त्योहार के घर में बदल देती है। रात के बारह बज गए थे पैकिंग और खाना बनाते-बनाते, लेकिन सुमित्रा जी के चेहरे पर थकान की एक भी लकीर नहीं थी। उनके मन में बस यही चल रहा था कि जब रोहन काम से लौटकर उनके हाथ के लड्डू खाएगा, तो कैसे उसकी सारी थकान मिट जाएगी।
अगली सुबह दोनों अपनी उम्र के बोझ को भूलकर एक अजीब सी फुर्ती के साथ स्टेशन पहुँचे। ट्रेन का सफर लगभग पाँच घंटे का था। पूरे रास्ते दोनों पति-पत्नी बस यही बातें करते रहे कि रोहन उन्हें देखकर कैसा रिएक्ट करेगा।
“मुझे तो लगता है वो मुझे देखकर दरवाजे पर ही गले लगा लेगा,” सुमित्रा जी ने बच्चों जैसी मासूमियत से कहा।
रमाकांत जी मुस्कुराए, “और मायरा तो मेरे कंधे से उतरेगी ही नहीं। मैंने उसके लिए वो लाल फ्रॉक ली है, देखना उस पर कितनी जंचेगी।”
खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ और खेत उनके उत्साह के आगे बहुत धीमे लग रहे थे। दोपहर के करीब दो बजे ट्रेन महानगर के बड़े और शोर-शराबे वाले स्टेशन पर रुकी। वहाँ से उन्होंने एक कैब बुक की। ऊँची-ऊँची गगनचुंबी इमारतों के बीच से होती हुई उनकी कैब एक पॉश सोसाइटी के बड़े से गेट पर आकर रुकी। सिक्योरिटी गार्ड से औपचारिकताएं पूरी करने के बाद दोनों लिफ्ट से पंद्रहवीं मंजिल पर पहुँचे।
सुमित्रा जी का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था। उन्होंने कांपते हाथों से डोरबेल बजाई। अंदर से किसी के कदमों की आहट आई। दरवाजा नेहा ने खोला। सामने अपने सास-ससुर को इस तरह अचानक खड़ा देखकर उसके चेहरे पर खुशी से ज्यादा एक अचानक आया हुआ अचरज और घबराहट थी।
“मम्मी जी? पापा जी? आप लोग… यहाँ इतनी अचानक? सब ठीक तो है?” नेहा ने दरवाजा पूरा खोलते हुए पूछा।
“हाँ-हाँ, सब बिल्कुल ठीक है बेटा। बस तुम लोगों की बहुत याद आ रही थी, तो सोचा एक सरप्राइज दे दें। और परसों हमारी मायरा का जन्मदिन भी तो है। उसे आशीर्वाद भी देना था,” सुमित्रा जी ने अंदर कदम रखते हुए बड़े प्यार से कहा और नेहा के सिर पर हाथ फेरा।
जैसे ही दोनों ने लिविंग रूम में कदम रखा, उनके कदम अचानक ठिठक गए। उस बड़े और शानदार ड्राइंग रूम के बीचों-बीच चार-पाँच बड़े-बड़े सूटकेस रखे हुए थे। सोफे पर कपड़ों के ढेर और कुछ ट्रैवेलिंग बैग्स खुले पड़े थे। घर में जैसे किसी बड़े सफर पर जाने की आपाधापी मची हुई थी।
तभी अंदर के कमरे से छोटी मायरा भागती हुई आई। दादा-दादी को देखकर वह उनके पैरों से लिपट गई। रमाकांत जी ने उसे गोद में उठा लिया। “अरे वाह, मेरी गुड़िया तो बहुत बड़ी हो गई है। लेकिन बेटा, यह सब घर में इतने बड़े-बड़े सूटकेस क्यों फैले हुए हैं? कहीं घूमने जा रहे हो क्या?” रमाकांत जी ने अनजान बनते हुए, पर मन में एक अजीब सी आशंका लिए हुए पूछा।
मायरा ने अपनी तोतली और चहकती हुई आवाज में जवाब दिया, “हाँ दादू! हम तो आज शाम को दुबई जा रहे हैं। पापा ने वहाँ एक महीने के लिए बहुत बड़ा घर लिया है। मेरी बर्थडे पार्टी भी तो वहीं होगी। रात की हमारी फ्लाइट है।”
बच्ची की इस एक लाइन ने कमरे में जैसे सन्नाटा बिखेर दिया। सुमित्रा जी के हाथ में पकड़ा हुआ गोंद के लड्डुओं का थैला जैसे अचानक बहुत भारी हो गया। उनका दिल किसी गहरे कुएं में गिरता हुआ महसूस हुआ। रमाकांत जी की मुस्कान उनके होठों पर ही जम गई।
तभी रोहन अपने कमरे से फोन पर बात करते हुए बाहर निकला। सामने माँ-बाप को देखकर उसके भी कदम रुक गए। उसने जल्दी से फोन काटा और आगे बढ़कर पिता के पैर छुए। फिर माँ के पैर छूते हुए थोड़ा झेंपते हुए बोला, “पापा, आप लोगों ने आने से पहले एक बार फोन तो किया होता! बताया भी नहीं कि आप आ रहे हैं।”
रोहन के इस सवाल में स्वागत से ज्यादा एक उलाहना था, जैसे उनके आने से उसका कोई बना-बनाया रूटीन खराब हो गया हो। सुमित्रा जी का गला भर आया था, लेकिन उन्होंने खुद को संभालते हुए अपराधी भाव से कहा, “बेटा, हमने सोचा तुम्हें सरप्राइज देंगे। तुम्हारी आवाज सुने बहुत दिन हो गए थे और परसों मायरा का जन्मदिन भी था… हमें क्या पता था कि तुम लोग इतने दूर जा रहे हो।” उनकी आवाज आखिर में थोड़ी कांप गई।
कमरे में एक अजीब सा असहज सन्नाटा छा गया। नेहा तुरंत किचन में गई और दो गिलास पानी ले आई। सुमित्रा जी ने चुपचाप गिलास उठाया और बिना प्यास के भी पानी पीने लगीं ताकि उनके आंसू किसी को नजर न आएं।
रमाकांत जी, जो अब तक इस पूरे दृश्य को बहुत खामोशी से देख रहे थे, उन्होंने अपनी पत्नी के कांपते कंधों पर अपना मजबूत हाथ रखा। यह हाथ सिर्फ सहारा नहीं था, बल्कि उस आत्मसम्मान को बचाने की कोशिश थी जो अभी-अभी अपने ही बेटे के घर में दरक गया था।
उन्होंने बहुत ही शांत, लेकिन गंभीर आवाज में रोहन की तरफ देखते हुए कहा, “हमें तो सच में नहीं पता था कि तुम लोग दुबई जा रहे हो। लेकिन बेटा… तुमने भी तो एक बार यह बताना जरूरी नहीं समझा कि तुम परिवार के साथ इतने लंबे सफर पर जा रहे हो? अगर हम आज यहाँ नहीं आते, तो शायद हमें तुम्हारे जाने की खबर तुम्हारे पहुँचने के बाद किसी सोशल मीडिया की तस्वीर से मिलती।”
रोहन की नजरें झुक गईं। “वो पापा… दरअसल ऑफिस का काम, वीजा की टेंशन और पैकिंग… टाइम ही नहीं मिला कि आपको तसल्ली से फोन कर सकूं। सोचा था एयरपोर्ट पहुँच कर कॉल करूंगा।” यह एक रटा-रटाया बहाना था जो अब खोखला लग रहा था।
“कोई बात नहीं बेटा,” सुमित्रा जी ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “हम तुम्हारी तरक्की से बहुत खुश हैं। तुम लोग अपनी पैकिंग पूरी करो। हमारी वजह से देर न हो जाए।”
सुमित्रा जी ने चुपचाप वह थैला डाइनिंग टेबल पर रख दिया जिसमें उन्होंने अपने हाथों से प्यार और दुआओं के साथ लड्डू बांधे थे। उन्होंने मायरा को खूब प्यार किया और उसे वह लाल फ्रॉक दे दी। रोहन और नेहा ने बहुत औपचारिकता दिखाई कि वे दोनों कुछ दिन रुकें, चाबियां घर की उनके पास रहेंगी, वे आराम करें। लेकिन रमाकांत जी ने विनम्रता से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि उनके एक पुराने मित्र शहर में रहते हैं, वे वहीं रुकेंगे और कल सुबह की ट्रेन से वापस चले जाएंगे।
वापसी में लिफ्ट का सफर बहुत लंबा लग रहा था। जब वे नीचे उतरे, तो शहर की वही ऊंची इमारतें अब उन्हें बेगानी और डरावनी लगने लगी थीं। कैब में बैठते ही सुमित्रा जी फूट-फूट कर रो पड़ीं। रमाकांत जी ने उन्हें अपने सीने से लगा लिया।
शाम ढल रही थी। आसमान में एक हवाई जहाज उड़ान भर रहा था। शायद वो रोहन की ही फ्लाइट थी जो अपने माँ-बाप के अरमानों और उनकी उम्मीदों को जमीं पर छोड़कर, किसी नए और अजनबी आसमान की ओर जा रही थी। वे समझ चुके थे कि दूरी अब सिर्फ मीलों की नहीं, दिलों की हो चुकी थी।
दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि आज की इस भागती-दौड़ती जिंदगी में हम अपने ही रिश्तों को बहुत पीछे छोड़ते जा रहे हैं? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताएं।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
#रिश्तों के खाली पन्ने
लेखिका : विनीता सिंह