घर की लक्ष्मी – मंजू ओमर

अरे उठ जा कलमुँही कबतक लेटी रहेगी, सुबह के आठ बजे रहे है चाय नाश्ता नहीं बनाएगी क्या, सर दर्द से फटा जा रहा है मेरा बिना चाय के। अरे अब उठ, इतना धीरे धीरे क्यों उठ रही है शरीर मे जान नहीं है क्या, कामचोर कहीं की। बस काम से जी चुराती रहती है। … Read more

अपमान – करुणा मलिक

 बहुत बधाई हो मंजू, नए प्यारे से घर की, बहुत सुंदर मकान बनाया है।  धन्यवाद जी, क्या करे ं …. मेरी पसंद तो थी ही अव्वल, मेरे तो बच्चों को भी कोई चीज आसानी से पसंद नहीं आती। तुम्हें पता है कुमुद, ठेकेदार ने छह- सात महीने का टाइम दिया था मकान पूरे करने का…..पर … Read more

स्वाभिमान की नई उड़ान – रमा देवी

पैंसठ वर्षीया सावित्री देवी के हाथों में चाय का कप हल्का-हल्का कांप रहा था। सुबह के सात बजे थे और रसोई से उनकी बहू तान्या की कर्कश आवाज़ पूरे घर में गूंज रही थी। “पता नहीं इस घर में दूध की नदियां बहती हैं क्या! सुबह उठते ही सबको दो-दो बार चाय चाहिए। बैठे-बैठे मुफ्त … Read more

मंज़िल की ओर कदम – नीतू चौहान

मीरा जब ब्याह कर इस घर में आई थी, तो उसकी आँखों में एक नई ज़िंदगी के साथ-साथ अपने करियर को लेकर भी कई सुनहरे सपने थे। शादी से पहले ही उसने बता दिया था कि वह राज्य लोक सेवा आयोग (PCS) की तैयारी कर रही है। शुरुआत में तो ससुराल वालों ने बड़ी-बड़ी बातें … Read more

खोया हुआ सम्मान – गरिमा चौधरी

“अम्मा, क्या बात है? आज फिर आप यहाँ सीढ़ियों पर बैठी हैं? धूप कितनी तेज़ है, अंदर क्यों नहीं जातीं?” मैंने अपने घर का दरवाज़ा खोलते हुए सामने वाली सीढ़ियों पर बैठी शांति अम्मा से पूछा। शांति अम्मा ने अपने मैले हो चुके पल्लू से अपनी डबडबाई आँखें पोंछीं और एक सूखी, बेजान सी मुस्कान … Read more

रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते – मुकेश पटेल

मैं अपनी एक महीने की छुट्टी बिताने के लिए अपने शहर आया हुआ था। बाजार में काफी रौनक थी और मैं अपनी माँ के लिए कुछ गरम कपड़े और दवाइयां खरीद कर वापस अपनी कार की तरफ लौट रहा था। अचानक मेरी नजर एक सेब वाले के ठेले के पास जमा हुई भीड़ पर पड़ी। … Read more

इज्जतदार – आरती शुक्ला

पूरे सात साल बीत चुके थे उस दिन को, जब शहर के जाने-माने रईस और उसूलों के पक्के सत्यप्रकाश जी ने अपनी इकलौती बेटी अंजलि को अपनी चौखट से धक्के मारकर निकाल दिया था। अंजलि का कसूर सिर्फ इतना था कि उसने अपने पिता के चुने हुए अमीर घराने के लड़के को छोड़कर, एक साधारण … Read more

स्कूल – एम. पी. सिंह

मेरा एक जानने वाले अनिल बाबू पढ़ाई करने के बाद नौकरी क़ी तलाश में कई महीने भटकते रहे, पर सफलता हाथ नहीं लगी. कारण था, न तो उसका कॉलेज अच्छा था और न ही मार्क्स अच्छे थे. फिर एक दिन पता चला क़ी शहर के बाहर गाँव में एक प्राइमरी स्कूल का मालिक अपना स्कूल … Read more

**भ्रम के साये: एक पिता का मौन और बेटी की नादानी** – विनीता सिंह 

 शिवानी , जो अपने पिता के निस्वार्थ प्यार को भूलकर रोहन के झूठे आंसुओं पर पिघल गई थी, उसने हामी भर दी। रोहन ने उसे हिदायत दी कि वह घर से निकलते वक्त अपनी माँ के गहने और कुछ नकदी जरूर साथ ले आए, ताकि शुरुआत के कुछ दिन वे आराम से काट सकें।  शहर … Read more

फासलों के पुल: जब एक सास ने निभाया माँ का धर्म – सविता गर्ग 

 “माँ जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझे पता है आज मैंने आपको बहुत तकलीफ दी है,” मीरा सुबकते हुए कह रही थी। “सिद्धार्थ मुझे आज एक कैफे में ले गया था। उसने मुझसे वही बात कही जो उसने अभी आपसे कही। लेकिन माँ जी… मैंने उसे मना कर दिया है। मैंने सिद्धार्थ से साफ कह … Read more

error: Content is protected !!