“ममता की कोई कीमत नहीं – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

हम लोग दूसरे जगह शिफ्ट हो रहे थे l सारा सामान पैक हो चुका था….कुछ हो रहा था….गाड़ी दरवाजे पर लगी थी ताकि हमलोगों को जाने में देरी ना हो जाए l.   मैं बार -बार ताई को आवाज दे रहीं थी कि वो जल्दी से बिट्टू को दूध पीला दे…मुझसे वह ढंग से नहीं पी … Read more

जीना सीखे – कंचन श्रीवास्तव आरज़ू

आज ब्रेकरी की दुकान पर अचानक की मुलाकात ने रोमा का भ्रम दूर कर दिया ।रेखा की बातें सुनकर लगा कि इंसान की हिम्मत,साहस और धैर्य उसके जीवन को बदल सकता है ।उसका सोचना गलत था कि हम सफ़र के गुजरने के बाद उम्र बोझ लगने लगती है सब कुछ होने के बावजूद भी जिंदगी … Read more

पड़ाव – डॉ बीना कुण्डलिया

आँगन के पीछे बगीचे में बिछें फोल्डिंग बैड पर पड़े पड़े हरीश बाबू लम्बी लम्बी सांसें ले रहे। अब तो जोरों से खांसने भर की भी ताकत नहीं बची थी उनके शरीर में, शरीर सूखकर मात्र लकड़ी का ढांचा सा रह गया था । कुछ दर्द ऐसे भी होते हैं जो चीखते चिल्लाते नहीं बस … Read more

अमावस  का सच – एम. पी. सिंह

बाबूलाल कें खेत की मुंडेर पर एक बरगद का पेड़ था ओर उसकें पास एक झोपडी मैं एक ब्रम्चारी साघु बाबा रहता था. आसपास कें सब गाँव मैं मशहूर था कि पेड़ पर भूत रहता हैं. बाबा सुबह शाम पेड़ कें नीचे पूजा पाठ करता जिससे गावं कें लोग भूत कें प्रकोप से बचें रहते. … Read more

हम फिर मिलेंगे कभी – वीणा राज 

ठंड के मौसम में चाय की भाप मन को आत्मिक तुष्टि का एहसास करा रही थी. जगजीत सिंह की ग़ज़ल, कप से उठता भाप और पेड़ों से छनकर आती धूप ने बालकनी में बैठी तृषा को स्वर्गिक आनन्द दे रखा था . साथ में मूंगफली के गुलाबी दानों को एक एक कर मुंह में डालती … Read more

सबक – खुशी

चारु एक सम्पन्न परिवार की लड़की थी इसलिए जिद्दी स्वभाव की थी । परिवार में माता रत्ना पिता राजन दो भाई  सुनील और अनिल और भाभियां नीता और प्रिया थे ।सारा दिन चारु भाभियों को भी परेशान करती उनकी झूठी सच्ची लगा मां और भाईयों से डॉट  पड़ती तो उसे बड़ा मजा आता।समय बीता चारु … Read more

ज़ुबान की मर्यादा – महक दुआ

“सुनीता भाभी, कुछ तो मर्यादा रखिए अपनी जुबान की। मैं इस घर की बेटी हूँ, कोई बाहर से आई लालची औरत नहीं,” अंजलि ने अपने आंसुओं को पलकों पर ही रोकते हुए भारी गले से कहा। वह अभी-अभी अपनी बीमार माँ के कमरे से बाहर निकली थी और वापस अपने घर जाने के लिए अपना … Read more

माँ का अपमान – वर्षा मंडल

“मम्मी जी! कहां छुप कर बैठ गई हैं आप?” शिखा ने रसोई के दरवाजे से लगभग चीखते हुए अपनी सास रमा जी को आवाज लगाई। उसकी आवाज में इतना गुस्सा और कड़वाहट थी कि पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया। “क्या हुआ बहू? क्यों इतना चिल्ला रही हो?” रमा जी अपने हाथ … Read more

बहू मायके से दूरी बनाकर रखो – आरती देवी 

निर्मला देवी के ये शब्द शिखा के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। उसे लगा जैसे उसे किसी परिवार का हिस्सा नहीं बनाया गया है, बल्कि एक ऐसा कर्मचारी नियुक्त किया गया है जिसे सिर्फ नियम और शर्तें माननी हैं। शिखा ने हमेशा से एक ऐसे ससुराल का सपना देखा था … Read more

परिवार की नींव – सीमा श्रीवास्तव 

बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर था, लेकिन सत्तर वर्षीय सावित्री देवी के इस चार कमरों वाले आलीशान फ्लैट में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम घड़ी की टिक-टिक आज हथौड़े की तरह उनके कानों पर बज रही थी। आज उनके इकलौते पोते, रोहन की शादी थी। शादी … Read more

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