चारु एक सम्पन्न परिवार की लड़की थी इसलिए जिद्दी स्वभाव की थी । परिवार में माता रत्ना पिता राजन दो भाई सुनील और अनिल और भाभियां नीता और प्रिया थे ।सारा दिन चारु भाभियों को भी परेशान करती उनकी झूठी सच्ची लगा मां और भाईयों से डॉट पड़ती तो उसे बड़ा मजा आता।समय बीता चारु के लिए उससे भी संभ्रांत परिवार देखा गया परिवार में राजीव जी उनका बेटा मयंक मां कौशल्या और बेटी काजल थे।
काजल का विवाह पिछले वर्ष ही सेठ कैलाश के बेटे विवेक से हुआ था जिनका ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में जाना माना नाम था। चारु को देखने पूरा परिवार आया ।चारु की मां ने पहले ही बता दिया चारु को घर के काम नहीं आते ।इस पर कौशल्या बोली बहन घर कामों के लिए नौकर है मुझे तो बेटी चाहिए जो मेरे साथ घर परिवार संभाले ।
दिन भर ये दोनों तो अपने बिज़नेस में बिजी रहते है मैं घर पर अकेली होती हूं इसलिए मुझे एक सहेली मिल जाएगी।चारु जिद्दी होने के साथ साथ सुंदर भी थी गोरी भी तो मयंक ने उसे एक नजर में ही पसंद कर लिया। चट मंगनी और पट शादी हो गई।शादी के बाद काजल कुछ दिन अपने मायके रुक गई।शुरू के दिन तो घूमने फिरने हनीमून इन सब में निकल गए।
20 दिन बाद आज मयंक को ऑफ़िस जाना था वो सुबह उठा तो चारु सो रही थी उसे उठाए बिना अपना सब समेट कर वो नीचे आ गया नाश्ता किया और ऑफिस चला गया।11:00 बजे तक चारु सोती रही तब काजल उसे उठाने आई प्यारी भाभी उठ जाओ 11 बज गए हैं।
चारु उठी और बोली मयंक कहा है काजल बोली भाई तो ऑफ़िस चले गए मुझसे बिना मिले ऐसे कैसे अरे भाभी आप सो रही थी इसलिए आपको नहीं उठाया चलिए चाय नाश्ता कर लीजिए।चारु बोली तुम जाओ मैं आती हूं काजल
के जाते ही चारु ने अपना बैग भरा नहाई और मायके के लिए निकल पड़ी। कौशल्या ने देखा बोली बेटा कहा जा रही है।अपने घर यहां किसी को मेरी फिक्र है मुझे बिना बताए चला गया मै जा रही हूं कौशल्या और काजल समझाती रही पर चारु नहीं रुकी नहीं ।घर आकर रोने लगी मयंक को मेरी कोई चिंता नहीं है मुझसे बिना मिले चला गया
अपनी मां बहन की सुनता है।काजल को देखो सारा दिन यही रहती है घर नहीं जाती मेरे कमरे में घुस जाती है। रत्ना बोली रो मत मेरी बच्ची मैं बात करूंगी ।नीता मेरी बच्ची के लिए पानी ला और चाय नाश्ता बना ।चारु अपने कमरे में चली गई।मयंक का तीन चार बार फोन आया उसने नहीं उठाया ।नीता और प्रिया बोली ये फिर आ गई सबका जीना हराम करने।
सोचा था मुसीबत टल गई।घर में सारा खाना बना था फिर भी चारु ने ऑर्डर दे कर पिज्जा मंगवाया।सब निबटा कर प्रिया और नीता बैठे थे कि रत्ना आ गई अरे तुम खाली बैठी हो जरा मेरी बेटी को देख लो।नीता बोली मां वो सो रही है और बच्चे आने वाले है इसलिए हम यहां बैठे हैं।
रत्ना वहां से चली गई शाम को चारु के ससुराल वाले आए बोले ऐसी क्या बात हुई जो चारु घर आ गई। रत्ना बोली जब आपका बेटा मां बहन को बीवी पर तरजीह देगा तो ऐसा होगा ना।कौशल्या बोली ये सुबह गया पर चारु को नहीं बताया आपको बता कर चल दिया।
अब शादी को इतने दिन हो गए आपकी बेटी अपने घर क्यों नहीं जाती हर समय यही क्यों रहती है।अरे बहनजी वो तो कुछ दिन चारु के साथ बिताने रुक गई थी वो तो अगले महीने कनाडा जा रही है 6 महीने के लिए। काजल शर्म से गढ़ गई कि उसे अपने मायके में रहने के ताने मिल रहे हैं।
फिर भी उसने कहा सॉरी चारु तुम्हे मेरी वजह से परेशानी हुई मै कल चली जाऊंगी तुम घर चलो वो तुम्हारा घर है। बहुत समझा बुझा कर चारु वापस आ गई पर ये उसका हर दूसरे दिन का काम हो गया।बैग उठा कर निकलना मयंक कौशल्या समझा बुझा कर उसे रोकते ।
घर की कलह के कारण राजीव बीमार रहने लगे।कुछ समय बाद चारु को बेटा हुआ अब तो चारु और फैल गई।उसी बीच काजल अपने भतीजे और भाभी से मिलने आई उसे इतना जलील किया फिर आ गई तू लूटने राखी भाई दूज पर तेरा भाई देता है ना और जो सेट कौशल्या ने काजल के लिए रखा था वो छीन लिया। काजल की शादी को 4 साल हो गए थे
उसे बच्चे नहीं थे।तो इसलिए चारु ने काजल को अपने बेटे श्रेयस को हाथ भी नहीं लगाने दिया।काजल के पति विवेक फोन भूलने के कारण वापस आए थे उन्होंने सब सुना और बोले मां अब काजल यहां नहीं आएगी उसके घर में उसका प्यार सम्मान है चलो काजल और वो गुस्से में चारु को देखता हुआ निकल गया।
चारु ने इस बात का भी बतंगड़ बनाया कि इनके दामाद ने मेरा अपमान किया बहुत समझाने बुझाने पर वो वापस आई।अब ये रोज का हो गया मयंक परेशान हो चुका था कभी कुछ कभी कुछ ।इधर चारु अपने सास ससुर की इज़्ज़त नहीं करती थी वैसे ही श्रेयस भी अपने दादी दादा को उल्टा बोलता।
एक दिन मयंक के कजिन विहान पेपर देने के लिए उनके शहर आया मयंक बोला अरे एक हफ्ते की बात है तू यही ठहरना ।चारु ने मयंक से झगड़ा किया मुझसे बिना पूछे तूने अपने भाई को यहां क्यों बुलाया ।मयंक बोला मेरी मौसी का बेटा है अच्छा लगता हैं वो होटल में रहे इतना बड़ा घर होते।
चारु गुस्से में अपने मायके चली गई जब तक विहान वहां रहा।अब चारु दो बेटों की मां थी ।मायके जाती तो भाभिया और उनके बच्चे परेशान होते यहां रहती तो सारा परिवार बच्चे भी उसके जैसे जिद्दी और हठधर्म थे।पढ़ने में जीरो मयंक ने अपने बच्चों के लिए जो सपने देखे थे वो धूमिल हो गए थे।
सास ससुर गुजर गए।मयंक भी अब बीमार रहता बिजनेस बच्चों को सौंपा पर व्यर्थ सब बर्बाद हो रहा था उनकी शादियां की चारु की बहुएं तो उससे भी दस हाथ आगे थी।वो कुछ बोलती तो दस जवाब पाती बेटे भी बहुओं का साथ देते ।चारु मायके जाती तो मां के ना रहने के कारण भाभियां भी मुंह नहीं लगाती थी।
भाई भी कहते अपना घर संभाल हर जगह से चारु को अपमान ही मिलता वो मयंक से कहती तो मयंक कहता जब बोया पेड़ बबूल का तो आम कहा से आयेगा।जो बोया है वही काटो दूसरों को प्यार देती मान देती तो वही पाती।अगले दिन सुबह घर में बड़ा क्लेश था।
मयंक ने पूछा क्या हुआ चारु बोली मैने बड़ी बहु राशि से कहा था कि वो हमारे लिए चाय नाश्ता बना दे पर राशि चिलाने लगी उधर से छोटी मिनी भी आ गई।मिनी का वो नकारा भाई निरंजन जो सारा दिन हमारे घर में पड़ा रहता है वो भी लड़ने आ गया और निरंजन ने मेरा हाथ मरोड़ दिया।
क्या मयंक बोला इतनी हिम्मत उसकी उतनी देर में तो केशव और निखिल मां से लड़ने पहुंच गए।चारु बोली अपने घर में चाय पानी मांगना भी गुनाह है।गुनाह तो है तुम दादा दादी को देती थी बुआ का तो आना ही बंद करवा दिया।बस अब बहुत हुआ अपना सामान बांधो और निकलो यहां से हम कहा जाएंगे तुम्हारी तरह नहीं है वृद्ध आश्रय में व्यवस्था की है वही रहो।निखिल मां बाप को वृद्ध आश्रय छोड़ आया।
चारु रो रही थी कहा वो सबको दबाती थी सबका दिल दुखती थी आज वो कहा पड़ी थी।अगले दिन मयंक के मां की बरसी थी पर उसके पास उतने पैसे भी नहीं थे कि वो उनके नाम का कुछ कर पाता। अगले दिन आश्रम में सबको नाश्ते के लिए बुलाया गया आज कोई सेठ सेठानी खाना बाट रहे थे।सब बैठ गए जब खाना बांटने वाले को देखा तो मयंक का सिर शर्म से झुक गया वो काजल और उसके पति विवेक थे ।
मयंक उठ कर जाने लगा सामने काजल आ गई बोली भैया आप भाभी आप दोनों यहां।मयंक ने सारी आप बीती कह सुनाई ।काजल बोली भाभी मै तुम्हारी जैसी निष्ठुर नहीं हूं तुम यही रहोगी ये मेरे ससुर जी के नाम पर है।पर मेरा भाई मेरे साथ जाएगा।काजल ने चारु की व्यवस्था अच्छे से लगवा दी और मयंक को ले कर चली गई क्योंकि इसे इलाज की जरूरत थी।चारु का घमंड द्वेष उसे ले डूबा।
स्वरचित कहानी
आपकी सखी
खुशी