समाज का डर – नेहा पटेल

रघुनाथ जी के कदम आज इतने भारी लग रहे थे जैसे उनके पैरों में मन भर का सीसा बांध दिया गया हो। साठ साल की उम्र में उन्होंने अपने जीवन में कई उतार-चढ़ाव देखे थे। एक सरकारी स्कूल के रिटायर्ड हेडमास्टर होने के नाते पूरे मोहल्ले में उनकी एक अलग प्रतिष्ठा थी। लोग उनके आगे … Read more

कर्ज – निधि गुप्ता

देव वहीं आंगन की मिट्टी में माथा टेके फूट-फूट कर रो रहा था। आज उसके पास गाड़ी थी, बड़ा पद था, दौलत थी, लेकिन वो सब कुछ उस बीस हज़ार रुपये के कर्ज के सामने बहुत छोटा और बेमानी लग रहा था। सफलता का जश्न उस दिन मातम में बदल चुका था। सूरज ढलने को … Read more

अनपढ़ माँ – रमा शुक्ला

सुधीर बाबू की आंखों से एक आंसू छलक कर उनके गाल पर आ गया, “तेरी उस अनपढ़ और गँवार मां ने मेरे पढ़े-लिखे फैसले को फाड़ कर डस्टबिन में फेंक दिया। वह मुझसे और डॉक्टरों से लड़ पड़ी। उसने कहा, ‘मैं लंदन नहीं जानती, मैं करियर नहीं जानती, मैं बस इतना जानती हूं कि मेरे … Read more

अपनों की कीमत – गरिमा चौधरी 

सुधा बोलते-बोलते अपने बच्चों के बारे में बताने लगी। “और आप जानती हैं दीदी? लोग कहते हैं कि बच्चों को बीमारों से दूर रखना चाहिए। लेकिन मेरे दोनों बच्चे, आरव और मिष्टी, स्कूल से आते ही सबसे पहले अपनी दादी के कमरे में जाते हैं। सुबह-शाम उनके पास बैठकर अपनी तोतली ज़बान में उन्हें स्कूल … Read more

उम्मीदों का नया सबेरा – मंजू ओमर

सावित्री के घर जैसे आज एक नया सबेरा हुआ है। सभी के चेहरे खुशी से खिले हैं। आठ सालों के लंबे इंतजार के बाद सावित्री की बहू की खुशी की खबर आई है। अब घर मे किलकारियां गूंजेगी, मै भी उसे गोद मे लेकर अपने सारे अरमान पूरे करूगीं। कितना तरसी हूँ ऐसा समय देखने … Read more

प्यार और त्याग से बड़ी कोई चीज़ नहीं होती – हर्षिता सिंह

“नहीं भाभी, यह तो बिल्कुल भी नहीं हो सकता। आप चाहे कितना भी इमोशनल ड्रामा कर लें, लेकिन मुझे वह कमरा हर हाल में खाली चाहिए ही चाहिए।” सुमेधा ने अपनी बात को बिना किसी लाग-लपेट के बिल्कुल साफ-साफ शब्दों में अपनी जेठानी विशाखा से कह दिया। सुमेधा की आवाज़ में एक अजीब सी कठोरता … Read more

असली खुशी…अपनों के साथ… – मोहिनी मिश्रा

दोपहर के करीब दो बज रहे थे। डाइनिंग टेबल पर जूठे बर्तनों का ढेर लगा था और विशाखा जल्दी-जल्दी उन्हें समेट कर सिंक में डाल रही थी। अभी-अभी उसके पति सुमित और दोनों बच्चे खाना खाकर अपने-अपने कमरों में गए थे। विशाखा की नज़र बार-बार दीवार घड़ी पर जा रही थी। आज महीने का वो … Read more

निस्वार्थ

इस बार देवकीनंदन ने भी अपने जोड़े हुए आखिरी तीन हज़ार रुपये उस फंड में डाल दिए। उन्हें पता था कि 100 लोगों में से उनका नाम निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत होता है। उन्होंने रात भर अपनी आँखों में आंसू लिए भगवान विश्वनाथ से … Read more

मैं समाज के डर से तुझे मौत के मुंह में धकेलने जा रही थी। – शारदा सक्सेना 

ड्राइंग रूम में एक ऐसा भारी सन्नाटा पसरा था, जिसे वहां मौजूद हर शख्स की तेज सांसें और उलझनें और भी गहरा कर रही थीं। वीरेंद्र जी सोफे पर सिर थामे बैठे थे। उनके माथे पर पसीने की बूंदे चमक रही थीं और आंखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। उनके सामने उनकी पत्नी सुषमा, … Read more

सुमन ताई

“सुमन ताई, आज ये सूखी लाल मिर्च, लहसुन और राई का मसाला आप सिलबट्टे पर पीस देंगी क्या?” काव्या ने रसोई के दरवाज़े पर खड़ी अपनी कामवाली ताई से बेहद झिझकते हुए और धीमी आवाज़ में पूछा। सुमन ताई ने एक पल के लिए काव्या की तरफ देखा और फिर घबराकर अपने दोनों कान पकड़ … Read more

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