अहंकार एक पति का – डॉ पारुल अग्रवाल

कमरे के भीतर से कांच के टूटने की एक तेज और कर्कश आवाज़ आई, जिसके बाद सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटा जो शोर से भी ज्यादा डरावना होता है। बाहर बरामदे में बैठे रिटायर्ड प्रोफेसर दीनानाथ जी के हाथ से अखबार गिर गया। उनकी पत्नी, सुमति देवी, जो तुलसी में जल चढ़ा रही थीं, उनका … Read more

रिश्तों का रंग – करुणा मलिक

“पापा, कितनी बार कहा है आपसे कि जब मेरे घर में पार्टी चल रही हो, तो अपने इस गमछे और खादी के कुर्ते में बाहर मत आया कीजिए! मेरे क्लाइंट्स बैठे थे वहाँ। मिस्टर खुराना, जो खुद लंदन रिटर्न हैं, उनके सामने आप हाथ में वो स्टील का टिफिन लेकर आ गए? ‘बेटा लड्डू खा … Read more

सावित्री – गीतू महाजन

शमशान घाट की उस पथरीली ज़मीन पर घुटनों के बल बैठे आर्यन का विलाप वहां मौजूद हर शख्स का कलेजा चीर रहा था। चिता की लपटें आकाश को छूने की कोशिश कर रही थीं, लेकिन आर्यन की नज़रें सिर्फ़ उस लकड़ी के ढेर पर टिकी थीं, जहाँ उसकी माँ, सावित्री देवी, का नश्वर शरीर पंचतत्व … Read more

आदर्श बहू’ – गीतू महाजन

“सुन रही हो सुमन! देख आरव ने फिर से ड्राइंग रूम में दूध गिरा दिया है। अभी थोड़ी देर में किटी पार्टी की सहेलियाँ आने वाली हैं। अगर फर्श चिपचिपा रहा तो मेरी क्या नाक रह जाएगी? जल्दी आकर साफ कर दे!” सासू माँ कुसुम जी की तीखी आवाज़ बेडरूम के बंद दरवाजे को चीरती … Read more

सीख – सुनीता मुखर्जी “श्रुति “

आराधना की प्रथम पोस्टिंग महानगर में हुई। वह बड़ी-बड़ी इमारतें, मॉल, सिनेमा घर, और पार्क और भीड़ भाड़ देखकर अवाक थी । उसने यह सब टेलीविजन में देखे था। एक छोटे से गांव की बाला …कम उम्र में ही उसका विवाह हो गया।  विवाह के पश्चात उसने पढ़ाई करने की ठानी,और यह संकल्प लिया कि … Read more

स्टेशन से घर तक – एम. पी. सिंह

सन 2025, 26 दि. का दिन मैं शायद कभी भूल नहीं पाउगा. मैं दिल्ली द्वारका मैं रहता हूँ. काम के सिलसिले मैं सहारनपुर जाना हुआ. रात को वापस आने मैं देर होने की आशंका से बाइक को स्टेशन पर पार्क करके ट्रैन से जाना उचित समझा. रात लगभग 2 बजे वापस आकर नई दिल्ली स्टेशन … Read more

रेशम के धागे – रवीन्द्र कान्त त्यागी

“ग्रेवाल साहब से मिलना है” केबिन के बाहर से किसी नारी का स्वर सुनाई दिया। “ग्रेवाल साहब तो… अब यहाँ दीक्षित सर देखते हैं।“ रिसेप्सनिस्ट ने उत्तर दिया। एक दंपति ने मेरे केबिन में प्रवेश किया। कुछ पल तो एक फाइल में उलझा रहा। फिर गर्दन उठाई तो सामने हमारे कौलेज की सब से चर्चित … Read more

हम पंछी एक डाल के – रवीन्द्र कांत त्यागी

रोज की तरह सॉफ्टवेयर इंजीनियर अभय सिंह ने अपने घर आकर गैराज में गाड़ी पार्क की, हाथ मुँह धोये और आराम कुर्सी पर अधलेटे पिताजी के चरण स्पर्श करके उनके बराबर में पड़ी कुर्सी पर बैठ गए. “पापा, कंपनी मेरा प्रमोशन करके तीन साल के लिए ऑन डैप्युटेशन जर्मनी भेजना चाहती है. मैंने तो मना … Read more

माता-पिता को सिर्फ रोटी और छत नहीं, प्यार और सम्मान चाहिए… – अर्चना खंडेलवाल

रमा और गोविंद जी भीतर ही भीतर घुट रहे थे, लेकिन उनकी घुटन से नेहा बिल्कुल बेखबर थी। उसे बस यही भरोसा था कि अब सास-ससुर उसके खिलाफ कोई फैसला नहीं ले सकते, क्योंकि बैंक खाते और प्रॉपर्टी के कागज़ उसी की पकड़ में थे। उसके लिए पैसा ताकत था—और ताकत के आगे रिश्ते अक्सर … Read more

रिश्ते अधिकार से नहीं, करुणा से चलते – सिम्मी मल्होत्रा

सविता की तबीयत दिन-ब-दिन अधिक बिगड़ने लगी थी। वह कई दिनों से बस एक ही बात दोहराती रहती—“मेरी बिटिया को देखना है… एक बार उसे देख लूं… बस एक बार।” उस दिन दोपहर के वक्त फोन बजा। नंबर मायके का था। दिल धक से रह गया, लेकिन जैसे ही मैंने रिसीवर उठाया, उधर से भाई … Read more

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