शादी के सात साल बीत चुके थे, लेकिन इन सात सालों में अंजलि ने कभी खुद को पहले स्थान पर नहीं रखा। वह उस मध्यमवर्गीय संस्कार की उपज थी जहाँ सिखाया जाता है कि ‘सबकी खुशी में ही तुम्हारी खुशी है’।
पिछले तीन सालों से वह अपने पिता के घर, यानी अपने मायके नहीं जा सकी थी। पहले साल बड़ी ननद की शादी थी, दूसरे साल ससुर जी का ऑपरेशन हुआ और पिछले साल बच्चों के स्कूल के दाखिले और घर के शिफ्टिंग में वक्त पंख लगाकर उड़ गया।
इस बार अंजलि ने मन बना लिया था। उसकी माँ ने फोन पर जब रुआँसी आवाज़ में पूछा, “अंजलि, इस बार भी गर्मियों में नहीं आएगी क्या?
तेरे पापा रोज़ तेरी पसंद के आम लाकर रख देते हैं कि शायद बिटिया आ जाए,” तो अंजलि का गला भर आया। उसने डबडबाई आँखों से जवाब दिया, “आऊँगी माँ, इस बार कोई बहाना नहीं चलेगा। मैंने पैकिंग की लिस्ट भी बना ली है।”
दिन बीत रहे थे और अंजलि का उत्साह बढ़ रहा था। वह मन ही मन योजना बना रही थी कि वह अपनी बचपन की सहेली मीता से मिलेगी, माँ के हाथ के बने कटहल की सब्जी खाएगी और नीम के पेड़ के नीचे बैठकर सुस्ताएगी। तभी एक शाम उसके पति समीर ऑफिस से लौटे।
उनके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कान थी। उन्होंने कहा, “अंजलि, एक खुशखबरी है! नीतू दीदी सपरिवार कल आ रही हैं। उन्होंने कहा है कि वे पूरा एक महीना हमारे साथ बिताएँगी। और तुम्हें तो पता ही है, उनके पीछे-पीहे छोटी बुआ और उनका बेटा भी आने की योजना बना रहे हैं।”
अंजलि के हाथ से चाय का कप छूटते-छूटते बचा। उसकी सारी योजनाएँ, सारे सपने ताश के पत्तों की तरह ढह गए। समीर ने आगे कहा, “देखो, अब दीदी इतने सालों बाद आ रही हैं,
तो तुम्हारा मायके जाना इस वक्त सही नहीं लगेगा। वे लोग क्या सोचेंगे कि बहु हमें देखकर भाग गई? तुम अगले साल चली जाना।”
अंजलि ने कुछ नहीं कहा। वह चुपचाप रसोई में चली गई। उसकी खामोशी समीर को महसूस तो हुई, लेकिन उन्होंने इसे अंजलि का ‘सहज स्वभाव’ मानकर नज़रअंदाज़ कर दिया। अगले ही दिन से घर मेहमानों से भर गया। नीतू दीदी, उनके दो शरारती बच्चे और फिर बुआ जी का आगमन।
घर में रौनक थी, ठहाके थे, लेकिन अंजलि उस रौनक के बीच भी एक अकेली परछाईं की तरह घूम रही थी। वह सबकी पसंद का खाना बनाती, बच्चों के पीछे भागती और मेहमानों की खातिरदारी में कोई कमी नहीं छोड़ती। लेकिन उसकी आँखें बुझी-बुझी सी थीं।
एक दिन दोपहर में जब सब सो रहे थे, अंजलि की माँ का फोन आया। माँ ने बड़े उत्साह से पूछा, “बेटा, टिकट कब की है? मैंने तेरे कमरे की चादरें बदल दी हैं।”
अंजलि ने सिसकी रोकते हुए कहा, “माँ, इस बार भी मुश्किल है। घर में मेहमान आए हुए हैं।” उधर से एक लंबी खामोश साँस सुनाई दी। माँ ने बस इतना कहा, “कोई बात नहीं बेटा, अपनी गृहस्थी संभाल, हम फिर कभी मिल लेंगे।”
अंजलि का जन्मदिन आने वाला था। उसे उम्मीद थी कि शायद समीर उसके जन्मदिन पर उसे मायके जाने का तोहफा दें, पर यहाँ तो घर मेहमानों से पटा पड़ा था।
जन्मदिन वाले दिन शाम को समीर बड़ा सा केक लेकर आए। सबने गाना गाया, अंजलि ने फीकी मुस्कान के साथ केक काटा। नीतू दीदी ने उसे एक सुंदर सी बनारसी साड़ी भेंट की। अंजलि ने धन्यवाद कहा और कमरे में जाकर साड़ी रखने लगी।
तभी नीतू दीदी पीछे से कमरे में आईं। उन्होंने अंजलि का हाथ पकड़ा और उसे बिस्तर पर बिठाया। दीदी ने कहा, “अंजलि, तुम बहुत अच्छी कलाकार हो, लेकिन अपनी उदासी छुपाने में कच्ची हो। हम जानते हैं कि तुम तीन साल से घर नहीं गई हो। समीर ने तो हमें मना किया था तुम्हें बताने से, लेकिन हमसे रहा नहीं गया।”
अंजलि ने हैरान होकर देखा। दीदी ने साड़ी के डिब्बे के नीचे से एक लिफाफा निकाला। उसमें अगले दिन की दोपहर की फ्लाइट के दो टिकट थे—अंजलि और उसके छोटे बेटे के लिए। दीदी मुस्कुराते हुए बोलीं, “समीर को लग रहा था कि वह अकेले सब नहीं संभाल पाएगा, इसलिए वह तुम्हें रोक रहा था।
लेकिन हमने तय किया है कि इस बार हम यहाँ सिर्फ मेहमान बनकर नहीं, बल्कि घर की बेटियाँ बनकर आए हैं। तुम अपने मायके जाओ, अपनी माँ के साथ समय बिताओ। इस घर की रसोई, सफाई और बच्चों की जिम्मेदारी अब मेरी और बुआ जी की है। हम यहाँ तुम्हारी छुट्टी करवाने आए हैं, तुम्हारी छुट्टी खराब करने नहीं।”
समीर भी दरवाजे पर खड़े यह सब सुन रहे थे। उन्होंने पास आकर अंजलि से माफी मांगी और कहा, “मुझे माफ कर दो अंजलि, मैं स्वार्थी हो गया था। मुझे लगा मेरे परिवार की खुशी में ही तुम्हारी खुशी है, पर मैं यह भूल गया कि तुम्हारा भी एक अपना संसार है जहाँ तुम्हारी जड़ें हैं।”
अंजलि की आँखों से खुशी के आंसू बह निकले। उसे लगा जैसे तपती दोपहर में अचानक ठंडी फुहारें पड़ गई हों। अगले दिन जब वह टैक्सी में बैठकर एयरपोर्ट के लिए निकल रही थी,
तो उसकी ननद और बुआ जी दरवाजे पर खड़ी होकर हाथ हिला रही थीं। समीर उसे छोड़ने जा रहे थे। अंजलि को महसूस हुआ कि रिश्ता सिर्फ सेवा से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की इच्छाओं के सम्मान से मजबूत होता है।
पाठकों के लिए संदेश:
क्या आपको भी लगता है कि अक्सर हम ‘बेटियों’ के आगमन के जश्न में घर की ‘बहू’ की इच्छाओं को भूल जाते हैं? परिवार वही है जो सबकी खुशियों का समान रूप से ध्यान रखे।
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मूल लेखिका : अनामिका मिश्रा