सरिता रसोई में बड़े ही जतन से दही और चीनी मिला रही थी। बाहर हॉल में चहल-पहल थी। आज उनकी सबसे छोटी बेटी, ईशानी, अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि की ओर कदम बढ़ाने वाली थी। वह आज शहर के जिला अस्पताल में ‘चीफ मेडिकल ऑफिसर’ के रूप में अपनी ड्यूटी ज्वाइन करने वाली थी।
“माँ, कहाँ रह गई आप? जल्दी से मुंह मीठा कराइये न, वरना मुहूर्त निकल जाएगा और आपकी डॉक्टर बिटिया पहले ही दिन लेट हो जाएगी!” ईशानी ने चहकते हुए आवाज़ लगाई।
जैसे ही सरिता कटोरा लेकर बाहर आई, सफेद एप्रन पहने ईशानी ने झुककर अपनी माँ के पैर छुए और फिर पास ही बैठे अपने पिता, प्रकाश जी के चरणों में सिर झुका दिया।
प्रकाश जी ने भावुक होकर उसके सिर पर हाथ रखा और बोले, “अरे नहीं बिटिया… हमारे संस्कारों में बेटियां पैर नहीं छूतीं। वे तो देवी का रूप होती हैं, बस गले लगकर आशीर्वाद लेती हैं।”
ईशानी ने मुस्कुराते हुए अपने माँ-पापा दोनों को एक साथ गले लगा लिया और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ गई। वह बोली, “पापा, आप और माँ तो हमेशा कहते थे कि मैं आपका बेटा हूँ, फिर आज पराया क्यों कर रहे हो? सच तो यह है कि आप दोनों सिर्फ मेरे माता-पिता नहीं, मेरा भगवान हैं। मेरी रगों में जो खून दौड़ रहा है, वह आप दोनों के संघर्ष की देन है। मेरा वजूद आपसे ही है।”
सरिता की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उसने जल्दी से खुद को संभाला और कहा, “अच्छा, अब ज्यादा भावुक बातें मत करो, वरना पहले दिन ही अस्पताल पहुँचने में देर हो जाएगी। जल्दी निकलो।”
ईशानी ने अपनी कार की चाबी उठाई और एक आखिरी बार हाथ हिलाते हुए बाहर निकल गई। उसके जाते ही घर में एक सन्नाटा सा पसर गया, लेकिन वह सन्नाटा उदासी का नहीं, बल्कि एक गहरी तृप्ति का था। सरिता कमरे में सोफे पर आकर बैठी ही थी कि यादों का एक पुराना झोंका उसे करीब बाईस साल पीछे ले गया। यादों का वह चक्रव्यूह, जो आज भी उसे कभी-कभी सिहरा देता था।
वह साल बहुत मुश्किलों भरा था। प्रकाश जी का कपड़ों का छोटा सा कारोबार मंदी की चपेट में था। कर्ज बढ़ता जा रहा था और दो बड़ी बेटियों की पढ़ाई का खर्च भी भारी पड़ रहा था। उन दिनों समाज में आज की तरह जागरूकता नहीं थी। मुश्किल दौर में इंसान अक्सर अंधविश्वास का सहारा ढूंढता है। प्रकाश जी के एक दूर के परिचित ने उनके दिमाग में यह बात डाल दी कि “तुम्हारे भाग्य में ‘पुत्र योग’ है, अगर एक बेटा घर में आ जाए, तो तुम्हारी सारी दरिद्रता दूर हो जाएगी और कारोबार फिर से चमक उठेगा।”
प्रकाश जी, जो पहले दो बेटियों के होने पर बहुत खुश थे, व्यापारिक नुकसान के कारण मानसिक रूप से इतने टूट चुके थे कि वे उस व्यक्ति की बातों में आ गए। उन्होंने सरिता को इस बात के लिए मनाना शुरू किया कि वे एक ‘तीसरा चांस’ लेंगे। परिवार के बाकी सदस्य भी यही चाहते थे कि इस बार तो ‘कुल का दीपक’ आना ही चाहिए।
सरिता जब तीसरी बार गर्भवती हुई, तो पूरे कुनबे में सिर्फ एक ही चर्चा थी—”इस बार बेटा ही होगा।” यहाँ तक कि जब तनाव और बढ़ गया, तो एक संपन्न रिश्तेदार, जिनकी अपनी कोई संतान नहीं थी, उन्होंने एक प्रस्ताव रखा। उन्होंने कहा, “अगर इस बार भी लड़की हुई, तो वह बच्ची हमें गोद दे देना, हम उसे राजदुलारी बनाकर रखेंगे। और अगर लड़का हुआ, तो वह तुम रख लेना।”
प्रकाश जी और सरिता के सास-ससुर, गरीबी और भविष्य के डर से इस ‘सौदे’ के लिए मानसिक रूप से तैयार हो गए थे। लेकिन सरिता? उसका कलेजा यह सोचकर फटने लगता था कि क्या वह अपने जिगर के टुकड़े का सौदा कर रही है? रात-रात भर वह सो नहीं पाती थी। वह अपने पेट पर हाथ रखकर उस नन्ही जान से बातें करती थी। उसके मन में डर का एक सैलाब था कि अगर बेटी हुई, तो क्या उसे उसे अपनी झोली से निकालकर किसी और को देना पड़ेगा? क्या ममता की कोई कीमत लगाई जा सकती है?
अस्पताल जाने वाली सुबह से ठीक एक रात पहले, सरिता ने एक भयानक सपना देखा। उसने देखा कि उसकी नन्ही बच्ची उससे दूर जा रही है और उसे ‘माँ’ कहकर पुकार रही है। उस सपने ने सरिता के अंदर की ममता को विद्रोह में बदल दिया। सुबह होते ही, जब सब लोग अस्पताल जाने की तैयारी कर रहे थे, सरिता ने प्रकाश जी और पूरे परिवार को सामने बिठाया।
उसने भरी आवाज़ में लेकिन दृढ़ता के साथ कहा, “सुन लीजिए, चाहे बेटा हो या बेटी, वह मेरा बच्चा है। मैं अपने बच्चे को किसी और की झोली में नहीं डालूँगी। अगर मेरे भाग्य में गरीबी लिखी है, तो हम सब मिलकर उसे झेलेंगे, लेकिन मैं अपनी कोख का सौदा नहीं करूँगी।”
सरिता का यह रौद्र रूप देखकर पहले तो सब सन्न रह गए, लेकिन फिर प्रकाश जी को अपनी गलती का अहसास हुआ। उन्होंने सरिता का हाथ थामा और कहा, “तुम सही कह रही हो। हमें माफ कर दो।”
जब ईशानी का जन्म हुआ, तो किसी को दुख नहीं हुआ क्योंकि माँ की ममता ने पहले ही अपनी ढाल तैयार कर ली थी।
“अरे सरिता! कहाँ खो गई? आज कुछ खाने को मिलेगा या नहीं? हमारी बिटिया डॉक्टर साहिबा बन गई है, आज तो घर में कुछ विशेष पकवान बनना चाहिए।” प्रकाश जी की आवाज़ ने सरिता की तंद्रा तोड़ी।
“जी, अभी लाती हूँ,” कहते हुए सरिता मुस्कुराकर रसोई की ओर चल दी।
वह चलते-चलते सोच रही थी कि आज अगर वह ‘तीसरी बेटी’ ईशानी न होती, तो वे दोनों इस बुढ़ापे में कितने अकेले होते। बड़ी दोनों बेटियाँ शाहीन और गरिमा तो विदेश में बस चुकी थीं, अपनी शादियों और करियर में व्यस्त थीं। वे साल में एक बार फोन कर लेती थीं, वही बहुत था। लेकिन ईशानी? उसने तो साफ़ कह दिया था कि वह शादी भी उसी लड़के से करेगी, जो उसके माता-पिता के साथ इसी घर में रहने को तैयार होगा।
आज सरिता को अहसास हुआ कि बेटा या बेटी होना भाग्य नहीं होता, बल्कि संतान को दिए गए संस्कार और माँ-बाप का उनके प्रति अडिग प्रेम ही असली ‘पुत्र योग’ है। ईशानी आज वाकई उस घर का बेटा बनकर उनकी देखभाल कर रही थी।
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मूल लेखिका : रीता मक्कड़