“कठोर शब्दों की पीड़ा ” – कमलेश आहूजा

“क्या इसी दिन के लिए तुम्हें इतना पढ़ाया लिखाया था,कि तुम अपने पिता को समझाओ क्या गलत है?क्या सही?मैं मर जाऊँ तो मेरा मुँह भी मत देखना।” पिता के मुँह से ऐसे कठोर वचन सुनकर नेहा बहुत रोई।उसकी गलती सिर्फ इतनी थी,कि वो अपने पापा को ये समझा रही थी..माँ को परेशान ना किया करें … Read more

मेरी यादों में दूर्गापूजा – डाॅ उर्मिला  सिन्हा

दशहरा ..शारदीय नवरात्रि के दशमी को नीलकंठ पक्षी का  दर्शन अत्यंत शुभ माना जाता है.. अतः आप सभी के समक्ष प्रस्तुत है  -नीलकंठ, हे भोलेनाथ आप सभी को सपरिवार विजयादशमी की हार्दिक  शुभकामनाएँ  बधाई.. मां भगवती की  कृपा बनी  रहे।बडों को चरणस्पर्श और छोटों को शुभाशीष..  मेरी यादों में—दुर्गापूजा डॉ उर्मिला सिन्हा    बरसात में निरन्तर … Read more

जीवन का मूल मन्त्र – एम पी सिंह

मि. और मिसिस गुप्ता कि शादी को 10 साल हो गए थे। इन 10 सालों मे शायद ही कोई दिन ऐसा होता हो कि दोनों झगड़ते न हो। झगड़े कि वजह कोई बड़ी नहीं होती थी, गुप्ता जी बस यही शिकायत करते कि चाय ठंडी है, चाय अब तक क्यों नहीं मिली, दाल में नमक … Read more

यह बात तो भगवान शिव ने पार्वती को भी समझाई थी – बीना शर्मा

कनिका को जब पता चला कि उसकी भतीजी पुरवा का रिश्ता पक्का हो गया और कुछ दिन बाद उसकी शादी होने वाली है तो उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा था। वह खुद ही अपनी भतीजी की शादी में जाने की तैयारी करने लगी थी। जब कनिका के पति सुजीत ने कनिका को पुरवा की … Read more

जेवर – प्रियंका पांडेय त्रिपाठी

प्रिया की शादी का दूसरा दिन था। सुबह का समय जेठानी जी फर्श पर बैठी हुई थी ननद रसोई में नाश्ता बना रही थी अचानक ननद प्रिया के पास आई ,उसे आंगन में ले गई और ऊंचे स्वर में प्रिया से कहने लगी कि….      “भाभी ने हमारे लिए बहुत किया है वो मां के समान … Read more

वो भी तो मेरा अंश था… – चंचल नरूला

काश कोई बड़ा भाई या बहन होती जो संभाल लेती मेरी लाडो को हम बुड्ढा बुढ़िया के बाद | जाने किस उधेड़ बुन मे फंसी थी चेतना जब डॉ. ने कहा माँ जी आपको अपने लिए नहीं अपनी इकलोती  बेटी के लिए जीना है | ” कितनी खुश थी न चेतना उन 2 लकीरों को … Read more

माता पिता भगवान का दूसरा रूप होते हैं – बीना शर्मा

उम्र 65 घुटनों में दर्द कहां तक वह भागदौड़ कर सकती थी अपने और अपने पति के लिए खाना बनाते बनाते सरला देवी मन ही मन यही सोच रही थी जिस उम्र में औरतें आराम से बैठकर खाना खाती हैं उस उम्र में वह अभी घर का सारा काम करती थी।        कितने चाव से उसने … Read more

चकल्लस – रवीन्द्र कान्त त्यागी

“अरे नामाकूलो, मेरा चश्मा कहाँ मर गया” मां जी पूरी ताकत से चिल्लाईं। “फिर ये शैतान की औलाद मेरा चश्मा उठाकर ले गए। मेरा तो इस घर में जीना मुहाल हो गया है। पता नहीं क्या खाकर पैदा किया है इन चुड़ैलों ने औलादों को। सारे दिन मेरे ही सामानों के पीछे पड़े रहते हैं। … Read more

“ये जीवन है…।” – रवीन्द्र कान्त त्यागी

आह… कितनी देर सोया। पता ही नहीं चला। सुबह होने वाली है शायद। मगर… मगर अभी तो अंधेरा सा है। ओह, कई दिन की थकान से पूरा शरीर दुख रहा है। तेरह दिन तक जमीन पर बैठे बैठे। और उसके बाद… उसके बाद मौत का उत्सव। मेरी बीवी की मौत का जश्न। ओह… मेरी परम्पराओं … Read more

शायद माँ हमें माफ कर दें – स्वाति जैन

“पापा, यह क्या? मेरी पत्नी मेरी — मेरी पत्नी लगा रखा है आपने! आपकी पत्नी कोई अनूठी फरिश्ता या परी नहीं है। जब से आए हैं, एक ही राग लगाए बैठे हैं — राखी बांध दी कि इस घर में हिस्सा नहीं देंगे, इन पैसों पर तुम्हारा कोई हक नहीं है, मैं तो मेरे घर … Read more

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