बेड़ियों की उड़ान

“ये आप क्या कह रहे हैं? अवनि अभी अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी करना चाहती है, उसका सपना एक सिविल सर्विस ऑफिसर बनने का है।”

“अरे तो मैं कहाँ मना कर रहा हूँ। शादी के बाद अपने ससुराल में बैठकर जितनी मर्जी किताबें पढ़ ले। तुम अपना ये फालतू का ज्ञान देना बंद करो और सगाई की तैयारियों में लग जाओ। अगले हफ्ते लड़के वाले आ रहे हैं और तीन महीने बाद की शादी की तारीख भी पक्की कर दी है मैंने।”

कमरे में गूंजती ये सख्त आवाज़ें और उन आवाज़ों में छिपा वो कठोर निर्णय, सब कुछ वैसा ही था जैसा पच्चीस साल पहले हुआ था। सुमित्रा के कानों में अपने पति रमेश के ये शब्द किसी पिघले हुए सीसे की तरह उतर रहे थे। वह बेबस सी अपनी जगह पर खड़ी रह गई। एक बार फिर इतिहास खुद को दोहराने की जिद पर अड़ा था।

अवनि के उतरे हुए चेहरे और उसकी डबडबाई आँखों में सुमित्रा को अपना ही अक्स नज़र आ रहा था। वह अनजाने ही अतीत के उन धुंधले गलियारों में भटक गई, जहाँ उसकी खुद की चीखें और सपने आज भी किसी कोने में दफ्न थे।

पच्चीस साल पहले की सुमित्रा भी अवनि की तरह ही तो थी। आँखों में आसमान छूने की चाहत और हाथों में किताबों का बंडल। वह अपने कॉलेज की सबसे होनहार छात्रा थी। उसका सपना एक प्रोफेसर बनकर समाज को शिक्षा देने का था। लेकिन एक शाम जब वह कॉलेज से लौटी, तो घर में मेहमानों की भीड़ थी।

उसके पिता ने बिना उससे पूछे, बिना उसकी मर्जी जाने, उसका रिश्ता रमेश के साथ तय कर दिया था। उस दिन भी सुमित्रा ने अपनी माँ के सामने रोते हुए कहा था कि उसे अभी पढ़ना है, अपने पैरों पर खड़ा होना है। तब उसकी माँ ने भी अपने आंसू पोंछते हुए यही कहा था कि लड़कियां पढ़-लिखकर भी तो आखिर घर ही संभालती हैं, ससुराल जाकर जो चाहे कर लेना।

लेकिन सुमित्रा जानती थी कि ‘ससुराल जाकर पढ़ लेना’ एक ऐसा सफेद झूठ है जो हर उस लड़की से बोला जाता है जिसकी किताबों को शादी के लाल जोड़े में बांधकर हमेशा के लिए विदा कर दिया जाता है। शादी के बाद घर, परिवार, रिश्तेदार और फिर बच्चों की जिम्मेदारी… सुमित्रा की वो किताबें दीमक का निवाला बन गईं, और उसका प्रोफेसर बनने का सपना रसोई के धुएं में कहीं घुट कर रह गया। आज जब रमेश ने वही पुराने शब्द दोहराए, तो सुमित्रा के सीने में बरसों से सोई हुई आग धधक उठी।

अचानक कमरे के बाहर से आती किसी चीज़ के गिरने की आवाज़ ने सुमित्रा को वर्तमान में ला खड़ा किया। उसने देखा अवनि अपने कमरे में ज़मीन पर बैठी सुबक रही थी। उसके सामने सिविल सर्विस की तैयारी की वो मोटी-मोटी किताबें बिखरी पड़ी थीं, जिन्हें वह रातों को जाग-जाग कर पढ़ती थी। सुमित्रा के कदम अपने आप बेटी के कमरे की तरफ बढ़ गए। अवनि ने अपनी माँ को देखते ही उसे कसकर गले लगा लिया और फूट-फूट कर रोने लगी।

“माँ, पापा ऐसा कैसे कर सकते हैं? मेरा एग्जाम अगले महीने है। मैंने कितनी मेहनत की है। क्या मेरे सपनों की कोई कीमत नहीं है? क्या मुझे भी आपकी तरह इस रसोई में ही अपनी पूरी ज़िंदगी गलानी होगी माँ?”

अवनि के इन सवालों ने सुमित्रा की आत्मा को झकझोर कर रख दिया। ये सिर्फ अवनि के सवाल नहीं थे, ये सुमित्रा की वो दबी हुई आवाज़ थी जो पच्चीस साल पहले उसके गले में ही घोंट दी गई थी। सुमित्रा ने अवनि के सिर पर हाथ फेरते हुए उसके आंसू पोंछे। आज उसकी आँखों में वो हमेशा वाली बेबसी नहीं थी, बल्कि एक अजीब सी चमक थी। एक ऐसी चमक जो सदियों से दबी हुई राख के नीचे धधकती आग के अचानक हवा पाने पर उठती है। सुमित्रा ने अवनि का चेहरा अपने हाथों में लिया और एक गहरी सांस लेते हुए कहा, “नहीं बेटा, जो मेरे साथ हुआ, वो तेरे साथ नहीं होगा। मेरी खामोशी मेरी कमज़ोरी थी, लेकिन तेरी उड़ान को मैं किसी भी मंडप की बेड़ियों में नहीं बंधने दूंगी। तू रोना बंद कर और अपनी किताबें उठा।”

अवनि अपनी माँ को हैरानी से देख रही थी। उसने अपनी माँ को हमेशा पिता की हर हाँ में हाँ मिलाते, उनकी हर डांट को चुपचाप सिर झुकाकर सहते देखा था। आज ये कौन सी सुमित्रा थी जो उसके सामने खड़ी थी?

सुमित्रा सीधे रमेश के कमरे में गई। रमेश अपनी डायरी में सगाई के खर्चों का हिसाब लिख रहा था। सुमित्रा ने जाकर डायरी पर अपना हाथ रख दिया। रमेश ने झुंझलाते हुए ऊपर देखा और बोला कि उसे डिस्टर्ब न किया जाए क्योंकि वह बहुत ज़रूरी काम कर रहा है।

“ये शादी नहीं होगी रमेश,” सुमित्रा की आवाज़ में आज कोई कंपन नहीं था। बिल्कुल स्पष्ट, शांत लेकिन दृढ़।

रमेश एक पल के लिए सन्न रह गया। उसे अपने कानों पर यकीन नहीं हुआ। उसने अपनी आवाज़ ऊंची करते हुए कहा कि सुमित्रा का दिमाग खराब हो गया है। लड़का कितना अच्छा कमाता है, बड़ा घर है, इज़्ज़तदार परिवार है, और ऐसी किस्मत हर किसी की नहीं होती।

“किस्मत? क्या एक लड़की की किस्मत सिर्फ एक अमीर लड़के से शादी करने में ही लिखी है? अवनि की किस्मत उसकी वो किताबें हैं जो उस कमरे में बिखरी पड़ी हैं। उसका सपना एक काबिल अफसर बनने का है, किसी रईस घर की खामोश शोभा बनने का नहीं।” सुमित्रा ने रमेश की आँखों में आँखें डालते हुए जवाब दिया।

रमेश गुस्से से अपनी कुर्सी से खड़ा हो गया। उसने सुमित्रा को डांटते हुए कहा कि वह इस घर का मुखिया है और उसका फैसला आखिरी है। उसने ज़बान दे दी है और अब पीछे हटने का मतलब है समाज में उसकी इज़्ज़त का मिट्टी में मिल जाना। शादी होकर रहेगी, और अवनि को भी यही समझा देना चाहिए।

सुमित्रा अपनी जगह से एक इंच भी नहीं हिली। उसने रमेश को देखते हुए कहा कि पच्चीस साल पहले उसके पिता ने भी अपनी झूठी इज़्ज़त बचाने के लिए उसकी बलि चढ़ा दी थी। उस दिन वह चुप रही थी, क्योंकि उसे लगा था कि शायद शादी के बाद रमेश उसके सपनों को समझेंगे। लेकिन रमेश ने भी उससे वही कहा जो आज वो अपनी बेटी से कह रहे हैं—’शादी के बाद पढ़ लेना’। सुमित्रा ने कहा कि वे दोनों अच्छी तरह जानते हैं कि शादी के बाद एक औरत को पढ़ने की मोहलत कभी नहीं मिलती। रमेश ने उसकी ज़िंदगी तो घर की चारदीवारी में कैद कर दी, लेकिन वह अपनी अवनि की ज़िंदगी के साथ ऐसा नहीं होने देगी।

रमेश गुस्से से लाल हो गया और उसने चेतावनी दी कि अगर अवनि की शादी उस तयशुदा घर में नहीं हुई, तो इस घर में भी उसके लिए कोई जगह नहीं है।

“ठीक है,” सुमित्रा का जवाब इतना त्वरित और शांत था कि रमेश का सारा गुस्सा जैसे ठंडे पानी से बुझ गया। रमेश ने हकलाते हुए पूछा कि इस ‘ठीक है’ का क्या मतलब है।

सुमित्रा ने गहरी सांस ली और कहा कि अगर इस घर में अवनि के सपनों के लिए जगह नहीं है, तो उसके लिए भी कोई जगह नहीं है। पच्चीस साल उसने इस घर को एक आदर्श पत्नी और एक आदर्श बहू बनकर सींचा है। अपना वजूद, अपनी पहचान सब कुछ मिटा दिया। लेकिन आज बात उसकी बेटी के भविष्य की है। वह उसे वो सब सहने नहीं देगी जो उसने उम्र भर सहा है। सुमित्रा ने स्पष्ट कर दिया कि अगर रमेश कल उन लोगों को मना नहीं करते हैं, तो कल सुबह अवनि और वह यह घर हमेशा के लिए छोड़ देंगी। उसकी जो छोटी-मोटी जमा-पूंजी है और जो हिम्मत बची है, वह अवनि के सपनों को पूरा करने के लिए काफी है।

कमरे में एक खौफनाक सन्नाटा छा गया। रमेश अवाक खड़ा अपनी पत्नी को देख रहा था। यह वह सुमित्रा नहीं थी जिसे उसने हमेशा अपने इशारों पर चलाया था। यह एक ‘माँ’ थी, जो अपने बच्चे के भविष्य के लिए दुनिया के हर नियम और हर रिश्ते से टकराने को तैयार थी। रमेश ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि सुमित्रा ऐसा कोई सख्त कदम उठा सकती है। उसे अपनी इज़्ज़त, अपना घर, अपना रुतबा सब ताश के पत्तों की तरह बिखरता हुआ नज़र आ रहा था। वह गहराई से जानता था कि सुमित्रा जो कह रही है, वह अब करके ही मानेगी।

रमेश धीरे से अपनी कुर्सी पर बैठ गया। उसका सारा गुरूर, सारा पितृसत्तात्मक अहंकार जैसे टूट कर ज़मीन पर गिर पड़ा था। काफी देर की भारी खामोशी के बाद उसने बिना सुमित्रा की तरफ देखे दबी हुई आवाज़ में कहा कि कल सुबह वह लड़के वालों को फोन करके मना कर देगा और कह देगा कि लड़की अभी आगे पढ़ना चाहती है।

सुमित्रा ने कोई जवाब नहीं दिया। उसे रमेश के फैसले से जीत की खुशी तो मिली, लेकिन वह जानती थी कि यह लड़ाई उसे बहुत पहले लड़ लेनी चाहिए थी। वो पलटी और अवनि के कमरे की तरफ चल दी। आज उसके सीने से पच्चीस साल पुराना एक बहुत भारी बोझ उतर गया था। उसने अपनी हार का बदला अपनी बेटी की जीत से ले लिया था।

जब वह कमरे में पहुंची, तो अवनि दरवाज़े के पीछे खड़ी सब सुन रही थी। उसने दौड़कर अपनी माँ को कसकर गले लगा लिया। आज उन दोनों माँ-बेटी के आँसू दुख के नहीं, बल्कि एक नई आज़ादी, एक नई उम्मीद के थे। सुमित्रा जानती थी कि समाज के ताने सुनने पड़ेंगे और रास्ता अभी आसान नहीं है, लेकिन उसने अवनि के लिए आसमान का दरवाज़ा हमेशा के लिए खोल दिया था। अब इस पिंजरे की चिड़िया को अपनी पूरी ताकत से उड़ान भरने से कोई नहीं रोक सकता था। अतीत का वो मनहूस इतिहास आज सुमित्रा की हिम्मत के आगे हमेशा के लिए हार गया था।

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