मन का दर्पण

रात के करीब दस बज रहे थे। घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे सुमित्रा जी की तेज और गुस्से से कांपती हुई आवाज़ ने चीर दिया। “राघव! मेरे कमरे में आ अभी के अभी!” सुमित्रा जी का चेहरा गुस्से से तमतमाया हुआ था और उनकी सांसें तेज़ चल रही थीं। राघव, … Read more

खामोशी के पीछे का तूफान

पार्वती देवी की अनुभवी आँखें पिछले कई दिनों से एक अजीब सा बदलाव महसूस कर रही थीं। उनका बेटा, समीर, जो हमेशा पूरे घर में अपनी हंसी और चुलबुलेपन से रौनक बिखेरे रहता था, आजकल एक गहरी और अनजानी उदासी की चादर ओढ़े हुए था। यह बात पार्वती जी को अंदर ही अंदर बहुत बेचैन … Read more

**सिंदूरी वादे की अनकही दास्तान**

लड़के वाले तो सिर्फ लड़की देखने आए थे, लेकिन जब दोनों परिवारों के बुजुर्ग एक साथ बैठे, तो तय हुआ कि बार-बार आने-जाने का खर्च और समय क्यों बर्बाद किया जाए। शुभ मुहूर्त भी था और लड़का भी साथ ही आया था, तो क्यों न आज ही हाथ पीले कर दिए जाएं और दुल्हन को … Read more

ममता का अनमोल आँचल

सुधा की शादी को पूरे दस साल बीत चुके थे, लेकिन उसके आंगन में अब तक किसी बच्चे की किलकारी नहीं गूंजी थी। मायके से लेकर ससुराल तक, हर जगह उसकी सूनी गोद को लेकर तरह-तरह की बातें होती थीं। कोई ताने मारता, तो कोई हमदर्दी जताता, लेकिन सुधा के दिल का दर्द कोई नहीं … Read more

दर्द की इंतहा – लक्ष्मी कानोडिया ‘अनिका ‘

“माँ, मैं शादी नहीं करना चाहती।” नंदिनी ने इतना कहा और चुप हो गई। कमरे में कुछ पल के लिए ऐसी खामोशी छा गई, जैसे किसी ने अचानक चलते पंखे की आवाज भी बंद कर दी हो। माँ ने उसकी ओर देखा। “क्यों?” “क्योंकि मैं अभी पढ़ना चाहती हूँ। नौकरी करना चाहती हूँ। अपने पैरों … Read more

खामोश संघर्ष की गूँज

नीता अपने आलीशान बंगले के हरे-भरे लॉन में बैठी सुबह की चाय की चुस्कियाँ ले रही थी। सर्दियों की गुनगुनी धूप में वह अपने बेटे रोहन के भविष्य को लेकर गहरी चिंता में डूबी थी। रोहन शहर के सबसे महंगे और नामी स्कूल में पढ़ता था। उसकी हर छोटी-बड़ी फरमाइश पूरी करने के लिए नीता … Read more

खामोश समझौते: एक बेटी की अनकही चिट्ठी

आज आसमान में काले बादल घिरे हुए थे और हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। जब भी मौसम ऐसा होता है, काव्या के मन के किसी गहरे कोने में दबी हुई यादें ताज़ा हो जाती हैं। खिड़की के पास खड़ी काव्या के हाथ में एक पुरानी तस्वीर थी—उसके बाबूजी की। पच्चीस साल बीत गए थे बाबूजी … Read more

कांच के रिश्ते और सपनो की गुल्लक

मेरे बचपन की यादें मेरी माँ की साड़ी के पल्लू और उनके हाथों से बने गाजर के हलवे की खुशबू से जुड़ी थीं। जब तक माँ थीं, हमारा घर एक घर था। पिताजी दफ्तर से आते, तो पूरा घर उनकी हंसी से गूंज उठता था। लेकिन मेरे चौदहवें जन्मदिन से ठीक दो महीने पहले, एक … Read more

उम्मीदों के नए रंग

सुबह की पहली किरण के साथ ही घर में बर्तनों की खटपट शुरू हो गई थी। चौंतीस वर्षीय सुमन अपनी दाईं ओर हल्का सा झुककर चलती हुई रसोई की तरफ बढ़ रही थी। बचपन में पोलियो का शिकार होने के कारण उसके पैर में जो लचक आ गई थी, वह उम्र के साथ और भी … Read more

सपनों की राख और गृहस्थी की बेड़ियाँ

“मैंने तो तुझे पहले ही आगाह किया था विकास! यह लड़की सिर्फ तेरे पैसों पर ऐश करना जानती है। पढ़ाई-लिखाई तो बस एक बहाना है काम से बचने का। अगर सच में इसने किताबें खोली होतीं, तो आज इसका यह हाल न होता। तू ही अपनी पत्नी के मोह में अंधा हो गया था। अब … Read more

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