“मुझे माफ कर दीजिए अम्मा! मुझे बिल्कुल माफ कर दीजिए। मैं इतनी अंधी हो गई थी कि आपकी ममता को अपनी आजादी पर हमला समझ बैठी। मुझे लगता था कि आप मुझे बांधना चाहती हैं, लेकिन आज समझ आया कि आप तो मुझे संभालना चाहती थीं। मैं बहुत गलत थी अम्मा, बहुत गलत थी।” अवंतिका की हिचकियां थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
अम्मा की अपनी आंखें भी भर आईं। उन्होंने अपनी झुर्रीदार बांहों में अवंतिका को कसकर भींच लिया। उन्होंने अवंतिका के आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली! अपनी संतानों से भी कोई माफी मांगता है क्या? तू तो हमारे घर की लक्ष्मी है।
नवंबर की सुबह हवा में हल्की सिहरन घोल रही थी। अवंतिका हाथ में चाय का कप थामे खिड़की से बाहर देख रही थी, पर उसका मन कहीं और ही उलझा था। आज पूरे चार महीने हो गए थे उसकी शादी को। मुंबई की पली-बढ़ी अवंतिका ने कभी सोचा भी नहीं था कि जिंदगी इतनी जल्दी एक नए मोड़ पर आकर ठहर जाएगी।
अवंतिका और सिद्धार्थ दोनों ने बेंगलुरु के एक प्रसिद्ध संस्थान से डेटा एनालिटिक्स की पढ़ाई की थी। पढ़ाई के दौरान ही दोनों के बीच गहरी दोस्ती हुई, जो धीरे-धीरे एक अटूट विश्वास और प्रेम में बदल गई। पढ़ाई पूरी होते ही दोनों को पुणे की एक जानी-मानी टेक फर्म में बहुत अच्छे पैकेज पर नौकरी मिल गई। जब दोनों ने अपने-अपने घरों में एक-दूसरे के बारे में बताया, तो दोनों परिवारों ने बिना किसी हिचकिचाहट के रिश्ते को खुशी-खुशी स्वीकार कर लिया। शादी बड़ी धूमधाम से हुई और अवंतिका दुल्हन बनकर सिद्धार्थ के घर आ गई।
शादी के कुछ ही हफ्तों बाद सिद्धार्थ के माता-पिता यानी अवंतिका के सास-ससुर, अपने छोटे बेटे के पास लंदन चले गए, जो वहां उच्च शिक्षा पूरी कर रहा था। घर में अब केवल तीन लोग थे—सिद्धार्थ, अवंतिका और सिद्धार्थ की नानी जी, जिन्हें सब आदर से ‘अम्मा’ कहते थे।
दिवाली बीत चुकी थी और वीकेंड पर सिद्धार्थ और अवंतिका अपनी पहली लंबी छुट्टी में अवंतिका के मायके मुंबई आए हुए थे। जुहू स्थित अवंतिका के घर में माहौल बेहद खुशनुमा था। दोपहर के भोजन के बाद जब सिद्धार्थ अपने ससुर के साथ किसी पुरानी राजनीतिक चर्चा में मग्न था, तब रसोई में अपनी मां सुजाता के साथ हाथ बंटाते हुए अवंतिका का मन छलक पड़ा।
“मम्मी, सच कहूं तो मुझे कभी लगा ही नहीं कि ससुराल कोई पराया घर होता है। सिद्धार्थ की मम्मी और पापा तो इतने आधुनिक और खुले विचारों के हैं कि कभी कोई रोक-टोक नहीं की। जब से वे लंदन गए हैं, मुझे लगता है जैसे घर का सारा सुकून ही कहीं खो गया है। सिद्धार्थ तो मेरा पूरा ध्यान रखता ही है, लेकिन…” अवंतिका कहते-कहते अचानक रुक गई। उसके चेहरे पर खिंचाव आ गया।
सुजाता ने अपनी बेटी के चेहरे के भाव पढ़े और प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “लेकिन क्या, अवनी? कुछ बात है जो तुझे परेशान कर रही है? सिद्धार्थ से कोई अनबन हुई है क्या?”
“नहीं मम्मी, सिद्धार्थ तो बहुत अच्छा है। समस्या अम्मा हैं… सिद्धार्थ की नानी जी। मेरी उनसे एक पल भी नहीं बनती। मुझे समझ नहीं आता कि वो मुझसे चाहती क्या हैं। हर बात पर टोकना, हर कदम पर अपनी मर्जी थोपना! सच कहूं तो पिछले पंद्रह दिनों से मैंने उनसे सीधे मुंह बात करना भी छोड़ दिया है। बस जरूरत भर का बोलती हूं और अपने कमरे में चली जाती हूं।” अवंतिका के स्वर में गहरी खीज और असंतोष साफ झलक रहा था।
सुजाता ने गैस बंद की और अवंतिका को डाइनिंग टेबल पर लाकर बैठाया। उन्होंने गंभीर स्वर में पूछा, “अम्मा से तुम्हारी नहीं बनती? अवनी, जब सिद्धार्थ तेरा है, उसके माता-पिता तेरे अपने बन चुके हैं, तो फिर अम्मा तेरी अपनी क्यों नहीं हो सकतीं? और वे ऐसी कौन-सी बंदिशें लगाती हैं तुझ पर, जो तुझे इतना भारी पड़ रहा है? मुझे भी तो विस्तार से बताओ।”
अवंतिका अपनी भड़ास निकालने के लिए जैसे तैयार ही बैठी थी। उसने अपनी उंगलियों पर गिनाना शुरू किया, “मम्मी, आप खुद सोचिए। मैं एक कॉर्पोरेट कंपनी में सीनियर एनालिस्ट हूं। हफ्ते में पांच दिन देर रात तक मेरा काम चलता है। पर अम्मा चाहती हैं कि मैं रोज सुबह छह बजे उठ जाऊं। उठकर नहा-धोकर पूजा की थाली सजाऊं। घर में ढीले-ढाले कपड़े या शॉर्ट्स पहनना उन्हें बिल्कुल गवारा नहीं। उनका कहना है कि नई बहू को हमेशा करीने से कुर्ती या सलवार-सूट पहनना चाहिए, माथे पर बिंदी होनी चाहिए। सबसे बड़ी बात, उनका खान-पान का तरीका! हर दो घंटे में वो कुछ न कुछ खाने को कहती हैं। सुबह का नाश्ता गरम-गरम होना चाहिए, शाम को काढ़ा या मेवे वाला दूध पीना अनिवार्य है। जब मेरे अपने माता-पिता ने मुझे कभी किसी सांचे में नहीं ढाला, मुझे पूरी आजादी दी, तो फिर मैं किसी और के बनाए नियमों की गुलाम क्यों बनूं?”
सुजाता अपनी बेटी की बातें बहुत ध्यान से सुन रही थीं। उन्होंने न तो अवंतिका को बीच में टोका और न ही उस पर गुस्सा किया। जब अवंतिका पूरी तरह चुप हो गई, तब सुजाता ने मुस्कुराते हुए उसका हाथ अपने हाथों में ले लिया।
सुजाता ने बहुत नपे-तुले शब्दों में कहा, “अवनी, बात को जरा ठंडे दिमाग से समझने की कोशिश करो। तुम हमारी इकलौती संतान हो। मैं और तुम्हारे पापा, दोनों जीवन भर अपने-अपने करियर की दौड़ में व्यस्त रहे। हमारे पास पैसे की कमी कभी नहीं थी, इसलिए हमने तुम्हें हर भौतिक सुख-सुविधा दी, हर तरह की छूट दी। लेकिन हमने अनजाने में तुम्हें एक बहुत बड़ी चीज से वंचित कर दिया—बुजुर्गों की छांव से। तुम्हारे दादा-दादी और नाना-नानी तुम्हारे होश संभालने से पहले ही चले गए थे। तुमने कभी किसी बड़े-बुजुर्ग के साथ रहकर देखा ही नहीं कि उनका प्यार कैसा होता है। तुम्हें हमेशा एकांत में, अपनी शर्तों पर जीने की आदत रही है। इसलिए आज जब कोई बुजुर्ग तुम्हारे भले के लिए, तुम्हें स्वस्थ और खुशहाल देखने के लिए तुमसे कुछ कहता है, तो तुम्हें वो प्यार नहीं, बल्कि बंदिश दिखाई देती है।”
अवंतिका ने आंखें चुराते हुए कहा, “लेकिन मम्मी, हर बात पर टोकना प्यार कैसे हो सकता है?”
सुजाता ने समझाया, “अवनी, अम्मा ने अपने जीवन के अस्सी साल देखे हैं। उन्होंने वह जमाना देखा है जहां परिवार एक साथ बैठकर खाता था, जहां अनुशासन ही स्वास्थ्य की कुंजी था। जब वो तुम्हें सुबह उठने को कहती हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि वे तुम्हारी नींद की दुश्मन हैं। वे चाहती हैं कि तुम ताजी हवा में सांस लो, तुम्हारा दिन व्यवस्थित हो। जब वे तुम्हें गर्म नाश्ता करने या मेवे वाला दूध पीने को कहती हैं, तो वे तुम्हारी थकावट और कमजोरी को भांप लेती हैं, जिसे तुम काम के तनाव के पीछे छिपा जाती हो। उनका तरीका शायद पुराना हो सकता है, उनकी भाषा थोड़ी सख्त हो सकती है, लेकिन उनकी नीयत में कोई खोट नहीं है। रिश्ता केवल अधिकारों से नहीं बनता बेटा, वो सामने वाले की भावनाओं को समझने से बनता है।”
उस दिन मां की बातों ने अवंतिका के दिल में एक हल्की सी हलचल पैदा कर दी, हालांकि उसका स्वाभिमान पूरी तरह झुकने को तैयार नहीं था। छुट्टी खत्म हुई और दोनों वापस पुणे लौट आए।
पुणे लौटते ही जिंदगी फिर से उसी भागदौड़ भरी रफ्तार पर चलने लगी। अवंतिका के ऑफिस में एक बड़े प्रोजेक्ट की डेडलाइन नजदीक थी। काम का दबाव इतना ज्यादा था कि वह कई-कई घंटे कंप्यूटर स्क्रीन के सामने बिना हिले-डुले बैठी रहती थी। खान-पान का समय पूरी तरह बिगड़ चुका था। कभी सिर्फ कॉफी पीकर लंच टाल देती, तो कभी देर रात जंक फूड मंगाकर खा लेती। अम्मा कई बार उसके कमरे के दरवाजे तक आतीं, प्लेट में फल या सूप लेकर खड़ी रहतीं, लेकिन अवंतिका अपने लैपटॉप में व्यस्त होने का बहाना बनाकर कह देती कि उसे भूख नहीं है। अम्मा चुपचाप थाली लेकर लौट जातीं। उनके चेहरे पर दुख की एक हल्की रेखा उभरती, पर वे कुछ कहती नहीं थीं।
एक गुरुवार की रात, पुणे में मूसलाधार बारिश हो रही थी। सिद्धार्थ को अचानक एक जरूरी क्लाइंट मीटिंग के सिलसिले में हैदराबाद जाना पड़ा। उसकी फ्लाइट देर शाम की थी और उसने जाते समय अवंतिका से कहा कि वह अपना ध्यान रखे और जरूरत पड़ने पर अम्मा को आवाज दे ले। अवंतिका ने मुस्कुराकर उसे विदा कर दिया और खुद दोबारा अपने कमरे में काम करने बैठ गई।
रात के करीब बारह बजे, अचानक अवंतिका के पेट में तेज दर्द उठा। कुछ ही पलों में दर्द इतना असहनीय हो गया कि उसकी आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा। साथ ही तेज ठंड लगकर बुखार चढ़ने लगा। उसने उठकर पानी पीने की कोशिश की, लेकिन उसके हाथ से कांच का ग्लास छूटकर फर्श पर गिर गया और छन से टूट गया। तेज दर्द और कमजोरी के कारण वह बिस्तर के पास ही घुटनों के बल बैठ गई। उसके मुंह से सिर्फ एक हल्की सी कराह निकली।
दरवाजा धीरे से खुला। अम्मा, जो शायद ग्लास टूटने की आवाज सुनकर जाग गई थीं, तुरंत कमरे के भीतर आईं। अवंतिका को इस हालत में देखकर वे घबराई नहीं, बल्कि उनकी आंखों में एक असीम वात्सल्य और तत्परता तैर गई।
“मेरी बच्ची! क्या हुआ अवनी?” अम्मा ने अपनी लाठी एक तरफ रखी और घुटनों के दर्द के बावजूद तुरंत नीचे झुककर अवंतिका को सहारा दिया।
अस्सी साल की उस कमजोर वृद्धा के भीतर न जाने उस वक्त इतनी ताकत कहां से आ गई कि उन्होंने अवंतिका को सहारा देकर धीरे-धीरे बिस्तर पर लिटाया। अवंतिका का पूरा शरीर तप रहा था और वह दर्द से तड़प रही थी।
अम्मा ने बिना एक पल गंवाए उसके माथे पर हाथ रखा और बोलीं, “घबरा मत बेटा, मैं यहीं हूं।”
अम्मा तुरंत रसोई में गईं। कुछ ही मिनटों में वे एक कटोरी में गर्म अजवाइन का पानी, सिका हुआ हींग और एक गर्म पानी की थैली लेकर लौटीं। उन्होंने बहुत आहिस्ते से अवंतिका का सिर अपनी गोद में रखा और उसे एक-एक चम्मच करके वह गुनगुना पानी पिलाया। फिर गर्म पानी की थैली से उसके पेट की सिकाई करने लगीं।
अवंतिका दर्द में आंखें बंद किए पड़ी थी, लेकिन उसे महसूस हो रहा था कि अम्मा के कांपते हुए हाथ कितनी कोमलता से उसके माथे पर ठंडे पानी की पट्टियां रख रहे थे। अम्मा लगातार धीमी आवाज में कोई पुराना भजन गुनगुना रही थीं और उसके बालों में अपनी उंगलियां फेर रही थीं। उस स्पर्श में कोई दिखावा नहीं था, कोई औपचारिकता नहीं थी; उसमें सिर्फ और सिर्फ एक मां का निस्वार्थ दुलार था।
पूरी रात बीत गई। बाहर बारिश की बूंदें खिड़की के शीशों से टकराती रहीं और कमरे के भीतर अम्मा बिना पलक झपकाए अवंतिका के सिरहाने बैठी रहीं। वे हर आधे घंटे में पट्टी बदलतीं, उसकी चादर ठीक करतीं और उसके पैरों को सहलातीं।
सुबह के पांच बजे जब अवंतिका की आंख खुली, तो दर्द काफी कम हो चुका था और बुखार भी उतर गया था। उसने देखा कि अम्मा कुर्सी पर बैठे-बैठे ही सिर टिकाए हल्की झपकी ले रही थीं। उनके चेहरे पर रात भर के जागरण की थकान साफ नजर आ रही थी, लेकिन उनके हाथ अभी भी अवंतिका के पैरों के पास ही रखे हुए थे ताकि उसे कोई तकलीफ न हो।
उस पल अवंतिका के भीतर जैसे कुछ टूटकर बिखर गया। उसका सारा अहंकार, सारी आधुनिकता की अकड़ और उसकी कथित स्वतंत्रता का भ्रम एक ही झटके में बह गया। उसने अपनी मां सुजाता के शब्दों को याद किया: “जब बच्चे अकेले रहने के आदी हो जाते हैं, तो उन्हें बड़ों का प्यार भी बंदिश लगने लगता है।”
अवंतिका की आंखों से आंसुओं की अविरल धारा बह निकली। उसने धीरे से अम्मा का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और चूम लिया। अम्मा की नींद तुरंत खुल गई। उन्होंने हड़बड़ाकर पूछा, “क्या हुआ बेटा? दर्द फिर से बढ़ गया क्या? मैं डॉक्टर को फोन करूं?”
अवंतिका खुद को रोक नहीं पाई। वह उठकर बैठ गई और सीधे अम्मा के सीने से लिपट गई। वह बच्चों की तरह सुबक-सुबक कर रोने लगी।
“मुझे माफ कर दीजिए अम्मा! मुझे बिल्कुल माफ कर दीजिए। मैं इतनी अंधी हो गई थी कि आपकी ममता को अपनी आजादी पर हमला समझ बैठी। मुझे लगता था कि आप मुझे बांधना चाहती हैं, लेकिन आज समझ आया कि आप तो मुझे संभालना चाहती थीं। मैं बहुत गलत थी अम्मा, बहुत गलत थी।” अवंतिका की हिचकियां थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
अम्मा की अपनी आंखें भी भर आईं। उन्होंने अपनी झुर्रीदार बांहों में अवंतिका को कसकर भींच लिया। उन्होंने अवंतिका के आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली! अपनी संतानों से भी कोई माफी मांगता है क्या? तू तो हमारे घर की लक्ष्मी है। जब तू सुबह देर तक सोती थी या खाना नहीं खाती थी, तो मुझे लगता था कि मेरी बच्ची अपनी सेहत बिगाड़ रही है। हमारे जमाने के तौर-तरीके थोड़े अलग हैं बेटा, हम अपनी फिक्र जताना डांटकर या टोककर ही जानते हैं। अगर मेरी किसी बात से तेरा दिल दुखा हो, तो मुझे भूल समझकर माफ कर देना।”
“नहीं अम्मा, आप बिल्कुल सही थीं। अब से मैं वही करूंगी जो आप कहेंगी,” अवंतिका ने मुस्कुराते हुए कहा।
जब दोपहर को सिद्धार्थ घर लौटा, तो उसने घर का नजारा ही बदला हुआ पाया। डाइनिंग टेबल पर अम्मा और अवंतिका साथ बैठकर हंसी-मजाक कर रही थीं। अवंतिका बड़े चाव से अम्मा के हाथ का बना पौष्टिक दलिया खा रही थी और अम्मा उसे प्यार से अपने बचपन के किस्से सुना रही थीं। सिद्धार्थ दरवाजे पर ही खड़ा होकर मुस्कुरा दिया; उसे समझ आ गया था कि उसके घर की सबसे खूबसूरत कड़ी अब पूरी तरह जुड़ चुकी है।
उस दिन के बाद से उस घर की आबोहवा हमेशा के लिए बदल गई। अवंतिका ने समझा कि रिश्ते केवल अपनी शर्तों पर जीने का नाम नहीं हैं, बल्कि वे तो थोड़ा झुकने, अपनों की भावनाओं का सम्मान करने और बुजुर्गों के अनुभव को सिर-माथे लगाने से ही महकते हैं।
परिवार में बड़े-बुजुर्ग किसी पुरानी हवेली की उस मजबूत नींव की तरह होते हैं, जो हर आंधी-तूफान में पूरे घर को संभाले रखती है। हम अक्सर अपनी आधुनिक जीवनशैली की दौड़ में उनकी चिंताओं को दकियानूसी समझकर दरकिनार कर देते हैं, जबकि असल में उनकी हर टोक में हमारे लिए एक गहरा सुरक्षा-कवच छिपा होता है। क्या आपने भी कभी अपने घर के किसी बुजुर्ग की डांट या सलाह के पीछे छुपे उस निस्वार्थ प्यार को महसूस किया है? अपने विचार और अपने अनुभव नीचे साझा जरूर कीजिए।
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मूल लेखिका : सीमा गुप्ता