“नहीं चाहिए भीख के पैसे!” – बालेश्वर गुप्ता 

राघव एक प्रतिभाशाली मूर्तिकार था। उसकी उंगलियों में वो जादू था जो गीली मिट्टी में भी प्राण फूँक देता था। लेकिन कला की कद्र और पेट की भूख के बीच का फासला अक्सर बहुत लंबा होता है। उसके पिता, दीनानाथ जी, पुराने ज़माने के कारीगर थे जिन्होंने पूरी ज़िंदगी अभावों में गुजारी थी, लेकिन अपनी … Read more

“मेरी कोई इज्जत नहीं है क्या??” – अमिता कुचया

सफेद रंग की ऑडी कार गैराज में आकर रुकी। अमित ने गाड़ी से उतरते ही जोर से दरवाजा बंद किया। उसके चेहरे पर तनाव साफ़ दिख रहा था। वह तेज कदमों से घर के अंदर दाखिल हुआ। ड्राइंग रूम में उसके पिता, रघुवीर जी, अपनी पुरानी आराम कुर्सी पर बैठे एक डायरी में कुछ हिसाब … Read more

पारस पत्थर – गरिमा चौधरी

विनय की आवाज़ में खीझ साफ़ झलक रही थी। उसने हाथ में पकड़ी हुई कलाई घड़ी को झुंझलाहट के साथ टेबल पर पटका। “सृष्टि! अब हद हो रही है। पिछले बीस मिनट से मैं मोज़े ढूंढ रहा हूँ और तुम हो कि उस ‘महारथी’ को दलिया खिलाने में व्यस्त हो। मेरी मीटिंग है आज, तुम्हें … Read more

एक सखी, जो देवरानी के रूप में आई थी – संगीता अग्रवाल 

कमरे में बिखरे हुए कपड़ों के ढेर के बीच मीरा हताश होकर बेड के किनारे बैठ गई। माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। अलमारी के सारे रैक खाली हो चुके थे, साड़ियाँ, सूट, शॉल—सब कुछ बेड पर एक पहाड़ की तरह जमा था, लेकिन वह … Read more

बड़ी बहन – निभा राजीव 

गुलाबी रंग की बनारसी साड़ी में लिपटी नीलम, घर के आँगन से लेकर रसोई तक किसी फिरकी की तरह घूम रही थी। पिछले तीन दिनों से घर में शादी की शहनाइयाँ गूँज रही थीं, और नीलम ने शायद कुल मिलाकर चार घंटे की नींद भी ठीक से नहीं ली होगी। फिर भी, उसके चेहरे पर … Read more

खोखले घर – रमा शुक्ला

“अरे ओ महारानी! अभी तक बिस्तर में ही है? सूरज सिर पर आ गया है और इसे देखो, कुंभकरण की औलाद अभी तक सो रही है।” बगल के कमरे से मामीजी की तीखी आवाज़ ने मीरा की नींद को एक झटके में तोड़ दिया। मीरा हड़बड़ा कर उठी। उसने जल्दी से अपनी पुरानी शॉल लपेटी … Read more

मैं आदर्श बहू नहीं बनना चाहती – शिल्पा अग्रवाल

कमरे में एसी की धीमी घड़घड़ाहट और बाहर सन्नाटा पसरा हुआ था। रात के ग्यारह बज रहे थे। बेडसाइड लैंप की मद्धम रोशनी में अनन्या अपनी फाइल बंद कर रही थी जब उसके पति, रोहन ने करवट बदली और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ वह बात कही जो शायद वह पिछले दो घंटों से कहने की … Read more

ये कैसे संस्कार दिए हैं बेटी को? – रमा शुक्ला

रविवार की दोपहर थी, लेकिन मिसेज कुसुम के घर का तापमान किसी ज्वालामुखी की तरह उबल रहा था। बाहर हल्की बारिश हो रही थी, जो खिड़कियों के कांच पर एक सुकून भरी थपकी दे रही थी, मगर घर के अंदर का माहौल इसके ठीक विपरीत था। ड्राइंग रूम में टीवी बंद पड़ा था, लेकिन कुसुम … Read more

भरोसा… अब नहीं – अंशुमान सक्सेना 

अमावस की काली रात थी और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, लेकिन दिवाकर के मन में जो तूफ़ान चल रहा था, वह बाहर के मौसम से कहीं ज़्यादा भयानक था। वह अपने कमरे में खिड़की के पास खड़ा था, उसके हाथ में एक नीला लिफाफा था जिसे उसने इतनी ज़ोर से भींच रखा था … Read more

ये औरतें भी न, छोटी-छोटी बातों को दिल पर लगा लेती हैं। – डॉ अनुपमा श्रीवास्तव

रात के ग्यारह बज चुके थे। मुंबई की उस गगनचुंबी इमारत के चौदहवें फ्लोर पर बने फ्लैट की बत्तियाँ बुझ चुकी थीं, सिवाय ड्राइंग रूम के एक कोने में जलते लैम्प के। सोफे पर पसरकर ३२ वर्षीय विहान अपने लैपटॉप में सिर गड़ाए हुए था। किचन से बर्तनों के खटकने की हल्की आवाज़ें आ रही … Read more

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