हरिशंकर जी ने आरव को अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने समझाया कि जिंदगी में अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है, लेकिन उस अकेलेपन को दूर करने के लिए गलत रास्ते चुनना अपने भविष्य को आग लगाने जैसा है। उन्होंने उसे बताया कि उसके माता-पिता दिन-रात उसी के उज्ज्वल भविष्य के लिए मेहनत करते हैं। अगर वह खुद को इन बुरी आदतों में धकेल देगा तो उसका शरीर और दिमाग दोनों बर्बाद हो जाएंगे। उन्होंने आरव को एक दोस्त की तरह समझाया कि गलती किसी से भी हो सकती है, पर समझदार वही है जो उस गलती को दोबारा न दोहराए।
चाय की केतली से उठती भाप के बीच अनुपम ने जब संकोच भरे लहजे में अपनी पत्नी से कहा कि अगले हफ्ते से बाबूजी कुछ दिनों के लिए उनके साथ रहने आ रहे हैं, तो रसोई का शांत माहौल अचानक बदल गया। वंदना के हाथ में पकड़ा हुआ चम्मच छूटते-छूटते बचा। उसने तीखी नजरों से अनुपम को देखा और स्पष्ट कह दिया कि उसे यह बिल्कुल मंजूर नहीं है। उसकी दिनचर्या, बच्चों की अपनी निजी जिंदगी और घर की आजादी किसी तीसरे इंसान के आने से प्रभावित होगी। अनुपम ने उसे समझाने की भरपूर कोशिश की कि बड़े भाई आलोक को मेडिकल टूर पर जाना पड़ रहा है और यह केवल कुछ ही हफ्तों का इंतज़ाम है, पर वंदना के चेहरे की नाराजगी जस की तस बनी रही। वह अपने शहरी ढर्रे में किसी पुराने खयालात के इंसान की मौजूदगी को एक बोझ की तरह देख रही थी।
अनुपम के पिता हरिशंकर जी डाक विभाग में एक ईमानदार और निष्ठावान कर्मचारी रहे थे। बहुत सीमित साधनों के बावजूद उन्होंने अपनी दोनों संतानों को कभी किसी सुख से वंचित नहीं रखा। उनकी जीवनसंगिनी सुमित्रा जी ने सदा घर के बजट को संभालते हुए बच्चों की पढ़ाई को प्राथमिकता दी। बड़े बेटे आलोक ने मेहनत से मेडिकल की पढ़ाई पूरी की और पुणे के एक बड़े सुपर स्पेशियलिटी अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट बन गया। आलोक ने अपनी ही सहपाठी अंकिता से विवाह किया। पिता ने बिना किसी शिकवे के बेटे की पसंद को स्वीकारा और आशीर्वाद दिया। उधर छोटे बेटे अनुपम ने कंप्यूटर साइंस में डिग्री हासिल की और नोएडा की एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर बन गया। अनुपम का विवाह वंदना से हुआ, जो खुले विचारों और आधुनिक जीवनशैली की शौकीन थी।
सेवाकाल समाप्त होने के बाद हरिशंकर जी अपनी पैतृक बचत से जयपुर में एक छोटे से मकान में पत्नी सुमित्रा के साथ सुकून भरी जिंदगी बिता रहे थे। बच्चे अपने-अपने शहरों में अपने करियर और परिवारों में इतने खोए रहते थे कि कभी-कभार ही उनका फोन आता था। हरिशंकर जी और सुमित्रा जी खुद ही कभी पुणे तो कभी नोएडा जाकर अपने बच्चों और नाती-पोतों से मिल आते थे। मगर धीरे-धीरे उन्हें यह महसूस होने लगा कि नई पीढ़ी के बच्चों को अपने दादा-दादी का ज्यादा दखल पसंद नहीं था। पोते अपने कमरों के दरवाजे बंद रखते और बातचीत सिर्फ औपचारिकता तक सीमित रहती।
जिंदगी सामान्य ढर्रे पर चल ही रही थी कि सुमित्रा जी अचानक बीमार पड़ गईं। लंबे समय से चल रही दिल की बीमारी और ढलती उम्र ने उन्हें पूरी तरह कमजोर कर दिया। एक शांत रात उन्होंने हरिशंकर जी का हाथ थामे हुए ही इस नश्वर संसार को अलविदा कह दिया। अपनी जीवनसंगिनी के चले जाने के बाद हरिशंकर जी बिल्कुल अकेले पड़ गए। उस सूने मकान की दीवारें उन्हें काटने लगीं। तब आलोक और अनुपम ने तय किया कि बाबूजी बारी-बारी से दोनों भाइयों के पास रहेंगे ताकि उनका मन लगा रहे। आलोक के घर कुछ महीने रहने के बाद जब आलोक को एक अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा सम्मेलन के सिलसिले में विदेश जाना पड़ा, तो हरिशंकर जी को कुछ समय के लिए अनुपम के घर नोएडा भेजना तय हुआ।
वंदना ने भारी मन से गेस्ट रूम साफ करवाया। उसका सोलह वर्षीय बेटा आरव और चौदह वर्ष की बेटी श्रेया दोनों ही अपने कमरों में कैद रहकर इंटरनेट और दोस्तों की दुनिया में मस्त रहने वाले बच्चे थे। उनके लिए दादाजी का आगमन किसी अनचाही पाबंदी जैसा था। वे अपने दादाजी को पुराने जमाने का इंसान कहकर आपस में ताने कसते थे। घर में अजीब सी खामोशी छा गई थी। हरिशंकर जी सुबह सवेरे उठकर बालकनी में बैठ जाते और पक्षियों को दाना डालते। वंदना को उनका सुबह-सुबह खटर-पटर करना भी अखरता था। वह अपनी दोस्तों के साथ कैफे जाने या किटी पार्टी में वक्त बिताने की आदी थी, और उसे लगता था कि ससुर के रहते वह अपनी मनमर्जी से नहीं जी पा रही है। अनुपम शाम को थका-हारा ऑफिस से लौटता तो दोनों तरफ से सामंजस्य बिठाने की कोशिश करता, पर हरिशंकर जी बेटे की उलझन देखकर केवल मुस्कुरा देते और कहते कि बच्चों की अपनी उम्र है, उन्हें वक्त दो।
आरव पिछले कुछ महीनों से पढ़ाई से जी चुरा रहा था। उसके स्वभाव में चिड़चिड़ापन बढ़ गया था और वह अपने माता-पिता से आंखें चुराकर रहने लगा था। अनुपम और वंदना अपने दफ्तर और सामाजिक व्यस्तताओं में इतने उलझे थे कि उन्हें बेटे के इस बदलते मिजाज की भनक तक नहीं लगी। वे सोचते थे कि यह उम्र का सामान्य बदलाव है। आरव स्कूल के कुछ गलत संगति वाले लड़कों के चक्कर में पड़ गया था और चुपके-चुपके सिगरेट पीने लगा था।
एक दिन दोपहर बाद वंदना बाहर गई हुई थी और अनुपम ऑफिस में था। घर में केवल हरिशंकर जी और आरव थे। हरिशंकर जी सोसाइटी के पार्क से टहलकर वापस आए। जैसे ही वे मुख्य दरवाजे से अंदर घुसे, उन्हें आरव के कमरे से हल्की सी गंध और धुएं का अहसास हुआ। उन्होंने संकोच छोड़ सीधे आरव के कमरे का दरवाजा खोला। अंदर का नजारा देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। आरव खिड़की के पास खड़ा सिगरेट पी रहा था और उसका एक दोस्त भी वहीं मौजूद था। अचानक दादाजी को सामने पाकर आरव के हाथ से सिगरेट छूटकर फर्श पर गिर गई। उसका दोस्त चुपचाप कमरे से निकलकर बाहर भाग गया।
आरव बुरी तरह घबरा गया। उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसे लगा कि अब घर में बड़ा तूफान खड़ा होगा, पापा को पता चलेगा तो उसकी पिटाई होगी और मां पूरे खानदान में बात फैला देगी। वह रोते हुए हरिशंकर जी के चरणों में बैठ गया और गिड़गिड़ाने लगा कि प्लीज दादाजी, पापा को मत बताना, वे मुझे घर से निकाल देंगे।
हरिशंकर जी ने कोई गुस्सा नहीं दिखाया। न ही उन्होंने आवाज ऊंची की। वे धीरे से आगे बढ़े, फर्श पर गिरी सिगरेट को पैर से बुझाया और आरव का हाथ पकड़कर उसे बिस्तर पर बैठाया। उन्होंने आरव के सिर पर हाथ फेरा और बड़े ही अपनत्व से पूछा कि बेटा, इतनी छोटी उम्र में यह सब करने की क्या वजह हो सकती है?
दादाजी का यह शांत और ममता भरा रूप देखकर आरव की आंखों से आंसू छलक पड़े। उसने सिसकते हुए कहा कि उसे घर में बहुत अकेलापन लगता है। मम्मी और पापा हमेशा अपने काम या पार्टियों में व्यस्त रहते हैं। किसी के पास उससे बात करने की फुर्सत नहीं है। स्कूल के दोस्तों ने उसे यह सब सिखा दिया ताकि वह उनके ग्रुप का हिस्सा बन सके।
हरिशंकर जी ने आरव को अपने सीने से लगा लिया। उन्होंने समझाया कि जिंदगी में अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है, लेकिन उस अकेलेपन को दूर करने के लिए गलत रास्ते चुनना अपने भविष्य को आग लगाने जैसा है। उन्होंने उसे बताया कि उसके माता-पिता दिन-रात उसी के उज्ज्वल भविष्य के लिए मेहनत करते हैं। अगर वह खुद को इन बुरी आदतों में धकेल देगा तो उसका शरीर और दिमाग दोनों बर्बाद हो जाएंगे। उन्होंने आरव को एक दोस्त की तरह समझाया कि गलती किसी से भी हो सकती है, पर समझदार वही है जो उस गलती को दोबारा न दोहराए।
हरिशंकर जी ने आरव से वादा लिया कि वह अब कभी इन चीजों को हाथ नहीं लगाएगा, और बदले में उन्होंने भी वादा किया कि यह बात उन दोनों के बीच ही रहेगी, वे किसी से इसका जिक्र नहीं करेंगे। इसके बाद हरिशंकर जी ने खुद आरव के साथ मिलकर रूम फ्रेशनर छिड़का, खिड़कियां खोलकर कमरा पूरी तरह साफ किया ताकि किसी को शक न हो।
शाम को जब अनुपम और वंदना घर लौटे तो उन्होंने एक अनोखा बदलाव देखा। रोज अपने कमरे का दरवाजा बंद रखने वाला आरव आज डाइनिंग टेबल पर बैठा दादाजी से पुरानी बातें सुन रहा था और खिलखिलाकर हंस रहा था। श्रेया भी अपनी पढ़ाई की किताबें छोड़कर दादाजी के पास बैठी उनसे गणित के कुछ कठिन सवालों पर मदद ले रही थी। हरिशंकर जी पुराने शिक्षक की तरह दोनों बच्चों को बड़े धैर्य से समझा रहे थे। वंदना और अनुपम दूर खड़े होकर यह सब देख रहे थे। घर का वह सन्नाटा, जो पिछले कई हफ्तों से भारी लग रहा था, अचानक बच्चों की हंसी और दादाजी की मीठी डांट-फटकार से जीवंत हो उठा था।
उस दिन के बाद से घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। आरव स्कूल से आते ही सीधे दादाजी के कमरे में जाता, अपनी पूरी दिनचर्या साझा करता और उनके साथ शाम को पार्क में बैडमिंटन खेलने जाता। गलत दोस्तों का साथ उसने खुद ही छोड़ दिया था क्योंकि अब उसके पास अपनी बातें साझा करने के लिए एक सच्चा साथी और मार्गदर्शक मौजूद था। श्रेया भी अपनी सहेलियों से ज्यादा वक्त दादाजी के साथ बिताने लगी थी।
कुछ हफ्तों बाद जब वंदना ने आरव की रिपोर्ट कार्ड देखी, तो उसके अंक पहले से कहीं बेहतर थे। शिक्षक ने भी फोन करके बताया कि आरव का ध्यान अब पढ़ाई और खेलकूद में बहुत अच्छा है। वंदना ने जब बेटे से इस बदलाव का राज पूछा, तो आरव ने मुस्कुराते हुए कहा कि यह सब दादाजी की वजह से है, जिन्होंने उसे सही और गलत का फर्क सिखाया और उस वक्त संभाला जब वह भटक रहा था।
यह सुनकर वंदना की आंखें भर आईं। उसे अपने पुराने बर्ताव पर गहरा पछतावा हुआ। जिस बुजुर्ग को वह घर का बोझ और अपनी आजादी में रुकावट समझ रही थी, उसी बुजुर्ग ने उसके बिखरते हुए बेटे को बचा लिया था और पूरे परिवार को एक सूत्र में बांध दिया था। उसे अहसास हुआ कि आधुनिक सुख-सुविधाएं, महंगे गैजेट्स और बंद कमरे कभी भी बुजुर्गों के अनुभव, संस्कार और उनकी छाँव का मुकाबला नहीं कर सकते।
रात के खाने के बाद जब हरिशंकर जी अपने कमरे में जाने लगे, तो वंदना ने आगे बढ़कर उनके चरण छुए और हाथ जोड़कर क्षमा मांगी। उसने कहा कि बाबूजी, आप अब कहीं नहीं जाएंगे, यह घर आपका है और आपकी छत्रछाया के बिना हमारा यह परिवार अधूरा है। हरिशंकर जी ने प्यार से अपनी बहू के सिर पर हाथ रख दिया। उस रात उस घर की हर दीवार में एक नई आत्मीयता और सुकून की महक तैर रही थी।
अगर यह कहानी आपको अच्छी लगी और आपके मन में बुजुर्गों के महत्व को लेकर कोई विचार आया हो, तो अपने विचार हमें जरूर बताएं। क्या आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारे बुजुर्ग ही हमारे बच्चों के सबसे बड़े रक्षक नहीं हैं?
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
मूल लेखिका : विभा गुप्ता