आँगन का गुलमोहर

“बाबा, आप बिल्कुल मत घबराइए। मैं अभी के अभी वहाँ के लिए निकल रही हूँ। किसी की हिम्मत नहीं है जो हमारी नंदिनी को हाथ भी लगा सके। आप बस हौसला रखिए,” राधिका ने दृढ़ स्वर में कहा। उसने तुरंत ऑफिस से छुट्टी ली, अपनी कार निकाली और मुंबई-पुणे एक्सप्रेसवे होते हुए सातारा की ओर … Read more

खामोशियों का पुल

सिद्धार्थ और अनन्या की शादी को सात साल बीत चुके थे। जो भी उन्हें बाहर से देखता, यही कहता कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं। सिद्धार्थ एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट था और अनन्या एक स्वतंत्र लेखिका। उनका घर शहर के सबसे पॉश इलाके में था। घर में सुख-सुविधा की हर चीज़ … Read more

नियति का खेल और वो बंद दरवाज़ा

रमाकांत जी के घर में इन दिनों उत्सव का माहौल था। उनके इकलौते बेटे सुमित की शादी तय हो गई थी और पूरे घर में रौनक छाई हुई थी। रमाकांत जी की पत्नी, सरला देवी की तबीयत अक्सर खराब रहती थी, इसलिए घर और शादी की सारी ज़िम्मेदारी उनकी बेटी काव्या के कंधों पर आ … Read more

शीशे के रिश्ते और पत्थर का गुरूर

ट्रेन की खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ और बारिश की हल्की फुहारें एक अजीब सा सुकून दे रही थीं। मैं अपनी सीट पर बैठी एक पत्रिका के पन्ने पलट रही थी, जिसमें आधुनिक युग में टूटते पारिवारिक ढांचों पर एक गंभीर लेख छपा था। डब्बे में ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मेरे ठीक सामने वाली … Read more

रिश्तों की एकतरफ़ा पगडंडी और एक करारा जवाब

सुमित्रा स्वभाव से बहुत ही शांत, सुलझी हुई और दूसरों का खयाल रखने वाली महिला थी। उसके पति, सुधीर, एक सरकारी बैंक में मैनेजर थे। उनका परिवार एक बहुत ही सुंदर और शांत हाउसिंग सोसाइटी में रहता था। उसी सोसाइटी के एक दूसरे ब्लॉक में सुधीर के छोटे भाई का परिवार रहता था। सुधीर के … Read more

अल्हड़ गौरैया का नया घोंसला

“सुमित्रा! तुमने वो बेबी लोशन और थर्मामीटर रखा या नहीं? और वो जो छोटी-छोटी सूती की टोपियां मैंने कल बाज़ार से लाकर दी थीं, वो बैग में हैं या तुमने बाहर ही छोड़ दीं?” कमरे में चारों तरफ फैले सामान के बीच खड़े होकर रघुनाथ जी बड़ी बेचैनी से सूटकेस की चेन बंद करने की … Read more

अपनी पहचान का आसमान

सावित्री देवी के चेहरे पर एक व्यंग्यात्मक और कुटिल मुस्कान तैर गई थी। वह अपने आलीशान सोफे पर विराजमान थीं, हाथ में चाय का प्याला था और उनकी नज़रें अपनी बहू मेघा पर गड़ी थीं, जो अभी-अभी बाहर से आई थी। मेघा उनके इस खामोश कटाक्ष और उस कुटिल मुस्कराहट का राज बहुत अच्छी तरह … Read more

सिंदूरी रवायतें और एक नई सुबह

 लेकिन नंदिनी कहाँ मानने वाली थी। उसने दृढ़ निश्चय के साथ सुमित्रा देवी का हाथ कसकर पकड़ लिया और बोली, “रवायतें इंसानों के लिए होती हैं माँ, इंसान रवायतों के लिए नहीं। अगर कोई रिवाज एक माँ को उसके बेटे की खुशी से दूर करता है, तो मैं ऐसे किसी रिवाज को नहीं मानती। आप … Read more

मोहभंग: वो आखिरी कदम

 “जाओ काव्या, लौट जाओ अपने घर,” कबीर ने गाड़ी का दरवाजा खोलते हुए कहा। “यह तुम्हारे लिए एक सबक है। भगवान का शुक्र मनाओ कि मैं कोई बुरा इंसान नहीं था, वरना रात के इस अंधेरे में तुम्हारा क्या अंजाम होता, तुम सोच भी नहीं सकती। मैंने तुम्हें सिर्फ यह एहसास दिलाने के लिए यहाँ … Read more

अनकहे शब्दों की चुभन

मैंने आगे कहा, “नए रिश्तों की ज़मीन बहुत नाज़ुक होती है सुमित्रा। इसमें मज़ाक का भारी हल नहीं चलाया जाता, बल्कि प्यार और समझदारी का बीज बहुत नरमी से बोना पड़ता है। तुम्हारी और निशांत की जान-पहचान पुरानी हो सकती है, लेकिन श्रुति के लिए तुम अभी भी ‘सास’ हो, ‘मां’ नहीं बनी हो। मां … Read more

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