ममता की डोर

 कुणाल पहले तो अपनी मां की तबीयत का हवाला देकर शादी की बात टाल रहा था, लेकिन जब सुमित्रा जी ने कसम दे दी, तो वह भी मिलने को तैयार हो गया। दोनों परिवार एक शांत मंदिर परिसर में मिले। अंजलि और कुणाल ने आपस में कुछ देर बातचीत की। कुणाल ने साफ-साफ बता दिया कि उसकी मां की तबीयत कैसी है और वह अपनी मां को कभी किसी तकलीफ में नहीं देख सकता। अंजलि ने मुस्कुराते हुए कहा कि जिस बेटे को अपनी मां की इतनी फिक्र है, वह अपनी जीवनसंगिनी का अनादर कभी नहीं कर सकता। अंजलि ने यह भी कहा कि वह घर संभालने के साथ-साथ मां जी की सेवा अपनी जिम्मेदारी समझकर करेगी।

सफेद चादरों की सिलवटों के बीच लेटी सुमित्रा देवी की सूनी आंखें कमरे की सीलिंग को ताक रही थीं। उनके गालों पर ढुलकते गर्म आंसू चुपचाप तकिये के रेशों में जज्ब हो रहे थे। मशीन की धीमी बीप-बीप की आवाज के सिवा वार्ड में गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। अपनी ढलती उम्र और इस कमजोर शरीर से कहीं ज्यादा उन्हें अपने पति और बेटे की बदहाली साल रही थी। उन्हें कभी अपनी देह की चिंता नहीं रही, लेकिन जब भी दरवाजा खुलता और सामने उनके पति कैलाश जी और बेटा कुणाल नजर आते, उनका कलेजा मुंह को आ जाता।

कैलाश जी के माथे पर खिंची चिंता की लकीरें, बिखरे हुए सफेद बाल और बिना प्रेस की हुई ढीली कमीज देखकर सुमित्रा जी के भीतर एक गहरी टीस उठती। कुणाल के चेहरे का तेज जैसे कहीं खो गया था। उसकी आंखों के नीचे काले घेरे साफ बता रहे थे कि वह कई रातों से ठीक से सोया नहीं था। जब सुमित्रा जी ठीक थीं, तब सुबह की चाय से लेकर रात के गर्म दूध तक का एक नियम था। वह डांटकर, दुलारकर और कभी-कभी जबर्दस्ती थाली सामने रखकर दोनों को तृप्त करती थीं। अब यह आलम था कि घर की रसोई कई दिनों से ठंडी पड़ी थी और दोनों किसी ढाबे या टिफिन के बेस्वाद खाने से पेट भर रहे थे। सबसे बड़ी विडंबना यह थी कि जिस औरत ने जिंदगी भर पूरे परिवार को अपनी उंगलियों पर नचाया, हर जरूरत का ख्याल रखा, आज वह खुद एक घूंट पानी के लिए दूसरों की मोहताज बनी बिस्तर पर पड़ी थी।

सुमित्रा देवी जयपुर के एक मध्यमवर्गीय परिवार की रीढ़ थीं। घर की चारदीवारी के भीतर उनकी हुकूमत चलती थी, जो किसी फरमान से नहीं बल्कि अथाह प्रेम और व्यवस्था से चलती थी। हर कमरे का कोना, अलमारी के कपड़े और रसोई के मसाले उनकी निगरानी में तराशे गए थे। बीपी और शुगर की तकलीफ तो उन्हें सालों से थी, पर उन्होंने कभी इसे काम के बीच आड़े नहीं आने दिया। कैलाश जी घर के नीचे ही स्टेशनरी और फोटोकॉपी की दुकान चलाते थे, जिससे गृहस्थी की गाड़ी ठीक-ठाक पटरी पर दौड़ती थी। बेटा कुणाल अपनी इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद शहर की एक निजी कंपनी में अच्छी तनख्वाह पर काम कर रहा था।

सब कुछ ठीक चल रहा था, मगर सुमित्रा जी के मन में एक ही कसक बची थी। वह चाहती थीं कि कुणाल के सिर पर सेहरा सजे और घर में एक समझदार, संस्कारी बहू के कदम पड़ें। वह चाहती थीं कि गृहस्थी की जो चाबियां उन्होंने तीस साल तक अपनी साड़ी के पल्लू में बांधकर रखी थीं, वे किसी सुघड़ हाथ में सौंपकर खुद थोड़ा चैन की सांस लें। वह कई महीनों से अपनी सहेलियों, रिश्तेदारों और पड़ोसियों से रिश्ते तलाशने की मिन्नतें कर रही थीं। कई तस्वीरें आई थीं, कुछ बातचीत भी चल रही थी कि अचानक एक सुबह रसोई में चाय चढ़ाते वक्त उनके सीने में असहनीय दर्द उठा और वह बेसुध होकर गिर पड़ीं।

डॉक्टरों ने कहा कि यह बड़ा दिल का दौरा था। समय पर अस्पताल पहुंचने से जान तो बच गई, लेकिन दिल बहुत कमजोर हो चुका था। डॉक्टर की सख्त हिदायत थी कि उन्हें किसी भी तरह के तनाव, अत्यधिक काम या झटके से दूर रखा जाए, क्योंकि दोबारा ऐसा झटका जानलेवा साबित हो सकता था।

पिछले छह दिनों से सुमित्रा जी आईसीयू से निकलकर सामान्य वार्ड में आ चुकी थीं, मगर उनका ध्यान अपनी रिपोर्टों में कम और कुणाल के भविष्य में ज्यादा था। जब भी आंखें बंद करतीं, भगवान से बस यही गिड़गिड़ातीं कि हे प्रभु, मेरी सांसे भले ही थोड़ी कम कर दे, लेकिन मुझे इतनी मोहलत जरूर दे दे कि मैं अपने जीते-जी अपने बेटे का घर बसता देख सकूं। बिना किसी स्त्री के यह घर एक पल भी नहीं चल सकता, यह बात अब आईने की तरह साफ हो चुकी थी।

लगभग आठ दिन बाद जब डॉक्टर ने छुट्टी दी, तो एंबुलेंस से उतरकर जब सुमित्रा जी अपने घर की चौखट पर पहुंचीं, तो उनका दिल बैठ गया। चौखट पर धूल की परत जमी थी, जूते-चप्पल इधर-उधर बिखरे पड़े थे। बैठक का पर्दा एक तरफ से उखड़ा हुआ था और सेंटर टेबल पर गंदे कप और पानी के गिलास रखे थे। जिस घर को उन्होंने मंदिर की तरह चमका कर रखा था, वह अब एक वीरान धर्मशाला जैसा लग रहा था। कुणाल और कैलाश जी ने उन्हें सहारा देकर बेडरूम में लिटाया।

सुमित्रा जी को बिस्तर पर लेटे-लेटे सब कुछ दिखता था और यही उनकी सबसे बड़ी बेचैनी का कारण बन गया था। उन्हें काम करने की मनाही थी, लेकिन अपनी आंखों के सामने इस बिखराव को देखना उनके लिए किसी सजा से कम नहीं था। कैलाश जी उनके लिए दलिया बनाकर लाए, जिसमें नमक इतना ज्यादा था कि एक चम्मच भी निगलना भारी था। कुणाल ने मां के कपड़े धोए जरूर थे, लेकिन उन पर साबुन के सफेद दाग सूखे पड़े थे। सुमित्रा जी की आंखें फिर छलछला उठीं। उन्होंने कुछ नहीं कहा, चुपचाप दलिया खा लिया क्योंकि वह जानती थीं कि ये दोनों अपनी क्षमता से ज्यादा मेहनत कर रहे थे, मगर एक कुशल गृहिणी की बराबरी दो पुरुष कभी नहीं कर सकते थे।

शाम को जब कैलाश जी दुकान बंद करके ऊपर आए और सुमित्रा जी के पैरों के पास बैठकर धीरे-धीरे दबाने लगे, तो सुमित्रा जी ने उनका हाथ अपने कमजोर हाथों में थाम लिया।

“सुनिए जी, मेरी एक बात मानेंगे?” सुमित्रा जी की आवाज में एक अजीब सी कातरता थी।

कैलाश जी ने मुस्कुराने की कोशिश करते हुए कहा, “बोलो सुमित्रा, तुम कहो तो चांद-तारे तोड़ लाऊं। बस तुम इस तरह मायूस मत हुआ करो।”

“चांद-तारे नहीं चाहिए। बस हमारे कुणाल के लिए कोई अच्छी लड़की देख लीजिए। अपनी सभी जान-पहचान वालों से कहिए कि बात आगे बढ़ाएं। मैं अब और देर नहीं करना चाहती।”

कैलाश जी ने एक गहरी सांस छोड़ी और बोले, “सुमित्रा, तुम बेवजह चिंता करती हो। पहले खुद तो संभल जाओ। डॉक्टर ने आराम करने को कहा है। कुणाल की शादी का जिम्मा इतना बड़ा है, उसमें भागदौड़ होगी, क्या तुम इस हालत में यह सब झेल पाओगी? थोड़ा वक्त दो, जब तुम अपने पैरों पर खड़ी हो जाओगी, तब धूमधाम से ब्याह रचाएंगे।”

“नहीं जी, मेरे पास वक्त कितना है, यह सिर्फ ऊपर वाला जानता है। मुझे कोई दिखावा या धूमधाम नहीं चाहिए। बस एक सीधी-सादी बच्ची आ जाए जो इस घर को अपना मान ले। मैं अपनी आंखों से कुणाल को खुश देखना चाहती हूं।” सुमित्रा जी की जिद के आगे कैलाश जी को झुकना पड़ा।

अगले कुछ हफ्तों में कैलाश जी ने अपनी पुरानी डायरी निकाली और अपने रिश्तेदारों से संपर्क साधना शुरू किया। सुमित्रा जी की तबीयत धीरे-धीरे कुछ संभल रही थी, लेकिन उनकी सारी ऊर्जा अब सिर्फ और सिर्फ रिश्तों की चर्चाओं में लगती थी। कई प्रस्ताव आए, लेकिन सुमित्रा जी किसी भी फैसले में जल्दबाजी नहीं करना चाहती थीं। उन्हें कोई ऐसी लड़की चाहिए थी जो सिर्फ पढ़ी-लिखी ही न हो, बल्कि रिश्तों की कद्र करना जानती हो, जो इस बीमार सास को बोझ न समझे।

एक दिन कैलाश जी के एक पुराने मित्र मुरारी लाल जी का फोन आया। उन्होंने अजमेर के एक प्रतिष्ठित और सादगी पसंद परिवार की बेटी अंजलि के बारे में बताया। अंजलि एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी, स्वभाव से बेहद शांत, समझदार और अपने परिवार में सबसे बड़ी थी, जिसने अपनी मां के गुजर जाने के बाद अपने छोटे भाई-बहनों को मां की तरह पाला था। जब सुमित्रा जी ने अंजलि की तस्वीर देखी, तो उनके चेहरे पर महीनों बाद एक सच्ची मुस्कान लौट आई। लड़की की आंखों में एक ठहराव और ममता की झलक थी।

कुणाल पहले तो अपनी मां की तबीयत का हवाला देकर शादी की बात टाल रहा था, लेकिन जब सुमित्रा जी ने कसम दे दी, तो वह भी मिलने को तैयार हो गया। दोनों परिवार एक शांत मंदिर परिसर में मिले। अंजलि और कुणाल ने आपस में कुछ देर बातचीत की। कुणाल ने साफ-साफ बता दिया कि उसकी मां की तबीयत कैसी है और वह अपनी मां को कभी किसी तकलीफ में नहीं देख सकता। अंजलि ने मुस्कुराते हुए कहा कि जिस बेटे को अपनी मां की इतनी फिक्र है, वह अपनी जीवनसंगिनी का अनादर कभी नहीं कर सकता। अंजलि ने यह भी कहा कि वह घर संभालने के साथ-साथ मां जी की सेवा अपनी जिम्मेदारी समझकर करेगी।

जब यह बात सुमित्रा जी तक पहुंची, तो उनका आधा मर्ज तो वहीं खत्म हो गया। बिना किसी भारी दान-दहेज और तड़क-भड़क के, बेहद सादगी से एक माह के भीतर विवाह संपन्न हो गया।

जिस दिन अंजलि ने लाल जोड़े में अपने कदमों से कुमकुम की थाली छूकर घर में प्रवेश किया, सुमित्रा जी के आंसुओं का बांध टूट पड़ा, लेकिन ये आंसू बेबसी के नहीं, परम संतोष के थे। घर में चूड़ियों की खनक और पायल की झंकार गूंजते ही घर की नीरस दीवारों में फिर से जान आ गई।

अंजलि ने घर में आते ही किसी पराएपन का अहसास नहीं होने दिया। उसने सबसे पहले सुमित्रा जी की दवाइयों का पूरा चार्ट समझा। सुबह की पहली चाय के साथ सुमित्रा जी के सिर में तेल की मालिश करना, कैलाश जी के नाश्ते का डिब्बा तैयार करके दुकान भिजवाना और कुणाल को समय पर विदा करना, यह सब उसने कुछ ही दिनों में अपनी दिनचर्या बना लिया। उसने घर के हर बिखरे हुए कोने को इस तरह सहेज दिया जैसे वहां कभी कोई बिखराव था ही नहीं।

सुमित्रा जी कई बार बिस्तर से उठकर काम करने की कोशिश करतीं, लेकिन अंजलि प्यार से उनका हाथ पकड़कर उन्हें वापस बिठा देती। वह कहती, “मां जी, अब आपका काम सिर्फ हुक्म चलाना और मुस्कुराना है। इस घर को आपने सींचा है, अब इसकी छांव में आराम करने की बारी आपकी है। अगर मैं कुछ गलत करूं तो डांटने का पूरा हक आपका है, पर काम करने की जिद आप नहीं करेंगी।”

अंजलि के इस निस्वार्थ प्रेम और सेवा ने सुमित्रा जी के कमजोर दिल को नई ताकत दे दी। जो डॉक्टर कहते थे कि उनका संभलना मुश्किल है, वही डॉक्टर अगले महीने की जांच में हैरान रह गए। सुमित्रा जी का रक्तचाप सामान्य था, दिल की धड़कनें स्थिर थीं और उनके चेहरे पर एक अद्भुत चमक थी।

अब घर में शाम की चाय सब साथ बैठकर पीते थे। कैलाश जी की कमीजें फिर से सलीके से इस्त्री होकर खूंटियों पर टंगी थीं, कुणाल के चेहरे पर खोई हुई हंसी वापस आ चुकी थी और सुमित्रा जी अपनी बालकनी में बैठकर धूप सेकते हुए ईश्वर का आभार मानती थीं। उन्हें समझ आ गया था कि जिंदगी सिर्फ दवाइयों से नहीं, बल्कि अपनों के अपनत्व और सही समय पर आए सही रिश्तों के सहारे दोबारा खिल सकती है। घर अब केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं था, बल्कि एक ऐसा आशियाना बन चुका था जहां हर कोई एक-दूसरे की ढाल बनकर खड़ा था।

आपकी राय में क्या आज के आधुनिक दौर में भी एक समझदार बहू घर की बिखरती हुई डोर को बांधकर पूरे परिवार के लिए नई संजीवनी साबित हो सकती है? अपने विचार नीचे लिखकर जरूर बताएं।

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मूल लेखिका : सविता गोयल

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