गिरधर जी गहरी सोच में डूब गए। उनकी अंतरात्मा कांप उठी। वह जमीन उनके पुरखों की आखिरी निशानी थी। पर अपनी बेटी के सुखद भविष्य के सामने उन्हें अपनी हर चीज तुच्छ लगने लगी। उन्होंने भारी मन से कहा, हरिशंकर भाई, अगर सचमुच बात बन जाए, तो मैं जमीन गिरवी रखने को भी तैयार हूं। बस मेरी बच्ची को कोई दुख न पहुंचे। पर क्या वे लोग हमारे घर का रिश्ता स्वीकार करेंगे?
बिस्तर पर लेटी शारदा अभी-अभी प्रसव की असह्य पीड़ा से उबरी थी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और चेहरे पर एक थकी हुई बेबसी थी। पास ही कपड़े में लिपटी एक नन्हीं सी जान अपनी बंद मुट्ठियों को हिलाते हुए धीमी सांसें ले रही थी। तभी घुंघरुओं की हल्की छनछन और तालियों की जानी-पहचानी थाप के साथ चंपा किन्नर कमरे के दरवाजे पर आकर रुक गई। उसकी आंखों में एक अनोखी चमक और चेहरे पर चिर-परिचित मुस्कान थी।
चंपा ने आगे बढ़कर दोनों हाथ हवा में लहराए और बड़े अपनत्व से कहा, बधाई हो शारदा बहुरानी, बधाई हो। तुम्हारे आंगन में साक्षात जगदंबा पधारी हैं। ऐसा रूपवान मुखड़ा तो बरसों में देखने को मिलता है। लाओ, अब हमारी नेग की थाली सजाओ, आज तो खुशी का दिन है।
कमरे के कोने में रखी लोहे की कुर्सी पर बैठी शारदा की सास सुलोचना देवी का चेहरा फक पड़ गया। उन्होंने एक ठंडी सांस भरी और अपनी नजरें फर्श पर गड़ाते हुए बोलीं, चंपा, नेग किस बात का मांग रही है री? जब घर में औलाद के नाम पर सिर्फ भविष्य की चिंता पैदा हुई हो, तो बधाई कैसी? कहने को दुनिया कहती है कि बेटी देवी होती है, पर हकीकत तो यह है कि जब यही बेटियां सयानी होती हैं, तो बाप के सिर पर कर्ज की गठरी बांध देती हैं। हमारे जैसे मामूली घरानों में बेटी का आना खुशियों से ज्यादा चिंताओं की लंबी फेहरिस्त लेकर आता है।
शारदा ने सास की यह बात सुनी तो उसका दिल जैसे छलनी हो गया। उसने अपनी नवजात बच्ची की तरफ देखा, जिसकी पलकें अभी खुली भी नहीं थीं। शारदा की आंखों से दो बूंद आंसू टपक कर तकिए में जज्ब हो गए। समाज का यह कैसा दस्तूर है कि फूल जैसी बच्ची के जन्म लेते ही लोग उसकी विदाई के खर्चों का हिसाब लगाने लगते हैं।
चंपा का मुस्कुराता हुआ चेहरा एकाएक गंभीर हो गया। उसने अपनी ताली रोकी और सुलोचना देवी के पास जाकर बोली, अम्मा जी, नेग का सिक्का न देना हो तो मत दो, पर इस फूल जैसी बच्ची के माथे पर अपने कड़वे बोलों का बोझ मत लादो। ईश्वर जब किसी के घर बेटी भेजता है, तो उसके नसीब का अन्न-जल भी साथ बांधकर भेजता है। बेटियां कर्ज नहीं होतीं, वे तो खुद घर का मान होती हैं।
शारदा ने कांपते हाथों से अपनी बच्ची को सीने से सटा लिया और रुंधे गले से बोली, चंपा मौसी, आप बुरा मत मानिए। सच तो यह है कि जब से डॉक्टर ने बताया कि लड़की हुई है, तब से ससुराल से लेकर मायके तक किसी ने इसे गोद में लेकर दुलार भी नहीं दिया। सब बस यही सोच रहे हैं कि आगे चलकर क्या होगा।
चंपा की आंखें भर आईं। उसने आगे बढ़कर अपने पल्लू से काजल की एक नन्हीं सी बिंदी बनाई और बच्ची के नन्हें से गोरे तलवे पर लगा दी। फिर उसने बच्ची के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, कोई कुछ भी कहे बिटिया, तू चिंता मत कर। यह लाडो अपनी किस्मत खुद लिखकर लाई है। यह तेरे घर को तारेगी, किसी का कर्ज नहीं बनेगी। इसका नाम अनन्या रखना, जिसका कोई सानी न हो। जुग-जुग जिए मेरी लाली।
शारदा ने अपनी कमजोर उंगली से शादी में मिली सोने की छोटी सी अंगूठी उतारकर चंपा की तरफ बढ़ाई, मौसी, आपका आशीष मेरे लिए सब कुछ है। मेरे पास देने को और कुछ नहीं, यह रख लीजिए।
चंपा ने शारदा का हाथ पीछे धकेल दिया और सिर हिलाते हुए बोली, नहीं बहुरानी, जब मौसी कह दिया तो नेग का मोल कैसा? एक बात गांठ बांध लेना, इस बच्ची को कभी खुद पर बोझ मत समझना। देखना, एक दिन यही बच्ची तुम्हारे पूरे परिवार का मस्तक गर्व से ऊंचा करेगी। इतना कहकर चंपा दरवाजे से बाहर निकल गई। उसके जाने के बाद कमरे में फिर वही खामोशी छा गई, पर शारदा के दिल में एक नई उम्मीद की किरण जगमगा उठी थी।
वक्त अपनी रफ्तार से बहता रहा। दिन हफ्तों में, हफ्ते महीनों में और महीने सालों में बदलते चले गए। देखते ही देखते बीस बरस बीत गए। अनन्या अब बीस साल की एक बेहद शालीन, विदुषी और संस्कारी युवती बन चुकी थी। उसने शहर के महाविद्यालय से अपनी पढ़ाई में हमेशा अव्वल स्थान हासिल किया था। घर के कामकाज से लेकर बड़ों के आदर-सत्कार तक, अनन्या में हर वह गुण था जो एक आदर्श बेटी में होना चाहिए।
पर शारदा और उसके पति गिरधर जी के दिलों पर वही पुरानी चिंता अब भारी पत्थर बनकर बैठ चुकी थी। गिरधर जी एक छोटी सी सरकारी नौकरी में लिपिक थे। सीमित वेतन था, जिसमें घर का खर्च, बूढ़ी मां की दवाइयां और दोनों बच्चों की पढ़ाई बमुश्किल पूरी हो पाती थी। गिरधर जी की जमीन के नाम पर पुरखों का एक छोटा सा बगीचा और पुश्तैनी मकान ही बचा था। वे दिन-रात इसी उधेड़बुन में रहते थे कि बेटी अब ब्याहने योग्य हो गई है, पर आज के दौर में जहां दहेज की मांगें आसमान छूती हैं, वे अपनी बेटी का हाथ पीले कैसे करेंगे।
गिरधर जी जब भी शाम को थक-हारकर दफ्तर से लौटते, तो उनके चेहरे पर केवल एक ही सवाल लिखा होता था कि अनन्या का क्या होगा। शारदा अक्सर उनसे कहती, सुनिए जी, चाहे हमें अपना वह छोटा सा बगीचा ही क्यों न बेचना पड़े, या कर्ज लेना पड़े, पर हम अपनी लाडो का ब्याह किसी अच्छे, प्रतिष्ठित घराने में ही करेंगे। हमारी बेटी में कोई कमी नहीं है, बस हमारी जेब ही खाली है।
एक दिन दोपहर के समय गिरधर जी के दूर के परिचित और बिचौलिए का काम करने वाले हरिशंकर जी उनके दरवाजे पर पहुंचे। उनके चेहरे पर बड़ी तसल्ली और उत्साह था। हरिशंकर जी ने बाहर दालान में कदम रखते ही आवाज लगाई, गिरधर भाई, अरे ओ गिरधर भाई! जरा बाहर तो निकलो, आज तुम्हारे घर के लिए ऐसा रिश्ता लाया हूं कि सुनकर तुम्हारी सारी चिंताएं छूमंतर हो जाएंगी।
गिरधर जी चश्मा ठीक करते हुए कमरे से बाहर आए और उन्हें बैठने के लिए कुर्सी दी। शारदा भी परदे की ओट में आकर खड़ी हो गई। हरिशंकर जी ने अपनी जेब से एक तस्वीर निकाली और बड़े गर्व से मेज पर रख दी।
देख भाई गिरधर, यह लड़का देखो। शहर के जाने-माने वस्त्र उद्योगपति शिवप्रसाद जी का इकलौता बेटा है, नाम है सार्थक। विदेश से प्रबंधन की पढ़ाई करके लौटा है और अब अपने पिता का सारा कारोबार संभाल रहा है। स्वभाव का बड़ा सीधा, न कोई ऐब, न कोई घमंड।
तस्वीर देखते ही गिरधर जी की आंखें चौंधिया गईं। लड़का सचमुच बहुत प्रभावशाली व्यक्तित्व का था। पर अगले ही पल गिरधर जी का चेहरा पीला पड़ गया। वे सहमते हुए बोले, हरिशंकर भाई, लड़का तो सचमुच हीरा है, पर हम ठहरे साधारण नौकरीपेशा लोग। इतने बड़े उद्योगपति के सामने हमारी बिसात ही क्या है? वे लोग तो लाखों-करोड़ों की मांग रखेंगे। हम तो सपने में भी उनके बराबर खड़े होने की हिम्मत नहीं जुटा सकते।
हरिशंकर जी ने मुस्कुराते हुए उनकी पीठ थपथपाई और कहा, तुम व्यर्थ ही डर रहे हो गिरधर। अच्छे रिश्ते बार-बार दरवाजे पर दस्तक नहीं देते। जब बेटी के भाग्य का दरवाजा खुल रहा हो, तो पीछे नहीं हटते। अगर थोड़े-बहुत लेन-देन की बात आई भी, तो मैं खड़ा हूं ना। तुम्हारे पास जो शहर के बाहरी हिस्से वाली दो बीघे की जमीन है, उसे किसी साहूकार के पास कुछ समय के लिए गिरवी रख देना। शादी धूमधाम से हो जाएगी, बाद में धीरे-धीरे अपनी बचत से कर्ज चुकाते रहना। बेटी तो सुखी हो जाएगी।
गिरधर जी गहरी सोच में डूब गए। उनकी अंतरात्मा कांप उठी। वह जमीन उनके पुरखों की आखिरी निशानी थी। पर अपनी बेटी के सुखद भविष्य के सामने उन्हें अपनी हर चीज तुच्छ लगने लगी। उन्होंने भारी मन से कहा, हरिशंकर भाई, अगर सचमुच बात बन जाए, तो मैं जमीन गिरवी रखने को भी तैयार हूं। बस मेरी बच्ची को कोई दुख न पहुंचे। पर क्या वे लोग हमारे घर का रिश्ता स्वीकार करेंगे?
हरिशंकर जी ने आश्वस्त करते हुए कहा, तुम फिक्र मत करो। मैंने शिवप्रसाद जी को तुम्हारी बेटी अनन्या की तस्वीर और उसकी शिक्षा का विवरण पहले ही दिखा दिया था। वे लोग बेहद सुलझे हुए हैं और लड़की को पसंद कर चुके हैं। वे परसों तुम्हारे घर खुद आ रहे हैं। तुम बस अपनी तैयारी रखो।
हरिशंकर जी चले गए, पर घर के भीतर एक अजीब सा तनाव गहरा गया। शारदा कमरे के अंदर बैठी दीवार पर टंगी अपनी दिवंगत सास की तस्वीर को देख रही थी। उसे बीस साल पहले कहे गए वे शब्द याद आने लगे कि बेटियां ब्याह के समय मां-बाप के लिए कर्ज बन जाती हैं। आज वही बात सच होती दिख रही थी। एक अच्छे घर में बेटी को विदा करने की कीमत पिता की जमीन और आत्मसम्मान से चुकाई जानी थी। शारदा की आंखों से लगातार आंसू बह रहे थे। अनन्या ने कमरे में आकर अपनी मां के कंधे पर हाथ रखा, मां, आप इतनी उदास क्यों हैं? अगर मेरी शादी आपके और पिताजी के स्वाभिमान की कीमत पर होनी है, तो मुझे ऐसा कोई रिश्ता नहीं चाहिए।
शारदा ने बेटी का सिर अपने सीने से लगा लिया और कहा, नहीं मेरी बच्ची, तू भाग्यवान है। तेरे पिता तेरी खुशी के लिए सब कुछ न्योछावर करने को तैयार हैं।
नियत दिन पर उद्योगपति शिवप्रसाद जी अपनी धर्मपत्नी कल्याणी देवी और बेटे सार्थक के साथ गिरधर जी के घर पहुंचे। घर साधारण था, पर साफ-सुथरा और संस्कारों से महक रहा था। गिरधर जी और शारदा ने हाथ जोड़कर उनका आदर-सत्कार किया। थोड़ी देर औपचारिक बातचीत के बाद कल्याणी देवी ने मधुर स्वर में कहा, समधन जी, अब हमारी होने वाली बहू को भी तो बुलाइए, हम उससे मिलना चाहते हैं।
शारदा अंदर गई और हल्के पीले रंग की सादगी भरी साड़ी में अनन्या को लेकर बाहर आई। अनन्या ने शालीनता से झुककर शिवप्रसाद जी और कल्याणी देवी के चरण स्पर्श किए। कल्याणी देवी ने जैसे ही उस सौम्य और शांत चेहरे को देखा, उनका दिल भर आया। उन्होंने तुरंत अनन्या को उठाकर अपने गले से लगा लिया और उसके सिर पर हाथ फेरते हुए बोलीं, साक्षात हमारे घर की लक्ष्मी आ गई। बेटी, तुम्हारे चेहरे की सादगी और आंखों की सच्चाई बता रही है कि तुमने अपने संस्कारों को कितने जतन से संजोया है।
तभी हरिशंकर जी ने बात को आगे बढ़ाते हुए धीमी आवाज में गिरधर जी को इशारा किया और शिवप्रसाद जी से कहा, साहब, रिश्ता तो पक्का ही समझिए। अब अगर आप आज्ञा दें, तो आगे के लेन-देन और रीति-रिवाजों के बारे में भी दो बातें साफ कर ली जाएं ताकि गिरधर भाई उसी हिसाब से अपनी जमीन गिरवी रखकर पैसों का प्रबंध कर सकें।
जमीन गिरवी रखने का नाम सुनते ही कमरे में सन्नाटा छा गया। गिरधर जी की धड़कनें तेज हो गईं। उनका गला सूखने लगा। उन्हें लगा कि अब वह क्षण आ गया है जब उनके आत्मसम्मान की बोली लगेगी।
शिवप्रसाद जी का चेहरा अचानक बहुत गंभीर हो गया। उन्होंने एक गहरी नजर हरिशंकर जी पर डाली और फिर उठकर सीधे गिरधर जी के सामने आकर खड़े हो गए। गिरधर जी डर के मारे अपनी नजरें झुकाए कांप रहे थे।
शिवप्रसाद जी ने आगे बढ़कर गिरधर जी के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए। उनका यह व्यवहार देखकर हर कोई हैरान रह गया। शिवप्रसाद जी ने बड़े ही भावुक और दृढ़ स्वर में कहा, गिरधर भाई, यह आप क्या कह रहे हैं? जमीन गिरवी रखने की बात? और वह भी अपनी बेटी के ब्याह के लिए? क्या हम आपको कोई व्यापारी नजर आते हैं जो अपनी औलाद के लिए सौदा करने आए हैं?
गिरधर जी ने अचकचाते हुए कहा, नहीं समधी जी, हमारा वह मतलब नहीं था। आप बहुत बड़े घराने के हैं, हम तो बस आपकी प्रतिष्ठा के अनुरूप कुछ करने की…
शिवप्रसाद जी ने उन्हें बीच में ही रोकते हुए अत्यंत आत्मीयता से कहा, गिरधर जी, हमारी सबसे बड़ी प्रतिष्ठा तो यह है कि आज हमें आपके आंगन से एक ऐसी गुणी और सुशिक्षित बेटी मिल रही है जो हमारे पूरे कुल को रोशन करेगी। मुझे अपने बेटे के लिए जीवनसंगिनी चाहिए, कोई धन-दौलत का संदूक नहीं। आप जिस बेटी को हमारे घर विदा करने जा रहे हैं, वह हमारे लिए साक्षात भाग्यलक्ष्मी है। मैं अपने घर में लक्ष्मी का स्वागत करना चाहता हूं, आपके द्वारा गिरवी रखी गई जमीन से उपजी किसी कर्जलक्ष्मी का नहीं।
कल्याणी देवी ने भी आगे आकर शारदा के कंधे पर हाथ रखा और कहा, बहन जी, संकोच छोड़िए। बेटी तो दोनों कुलों की मर्यादा होती है। जिस घर से विदा होते वक्त पिता की रीढ़ झुक जाए और मां के आंसुओं में कर्ज का खौफ हो, उस घर की दहलीज पार करने वाली बहू कभी मन से खुश कैसे रह सकती है? हमें दहेज का एक तिनका भी नहीं चाहिए। हमारी मांग सिर्फ इतनी है कि आप अपनी इस लाडो को पूरे मान-सम्मान और आशीर्वाद के साथ हमारी झोली में डाल दीजिए।
शिवप्रसाद जी के इन शब्दों ने गिरधर जी के दिल से बीस वर्षों का भारी बोझ एक ही पल में उतार फेंका। गिरधर जी की आंखों से कृतज्ञता के आंसू बह निकले। वे शिवप्रसाद जी के गले लग गए। कमरे में मौजूद हर शख्स की आंखें इस निस्वार्थ और महान सोच को देखकर नम हो गई थीं।
शारदा ने पीछे मुड़कर देखा, अनन्या एक कोने में खड़ी चुपचाप अपनी मां को देख रही थी। उसकी आंखों में अपने माता-पिता के लिए असीम कृतज्ञता और अपने होने वाले ससुराल के प्रति गहरा आदर तैर रहा था। अनन्या कुछ नहीं बोली, पर उसकी मौन मुस्कान कह रही थी कि सच्चाई और संस्कारों की कभी हार नहीं होती।
शारदा अपने आंसुओं को पोंछते हुए धीरे से अंदर के कमरे में चली गई। वहां दीवार पर टंगी अपनी सास की पुरानी तस्वीर के सामने वह हाथ जोड़कर खड़ी हो गई। उसने मन ही मन कहा, मां जी, आज काश आप यहां होतीं तो देखतीं। आपने कहा था कि बेटियां मां-बाप के सिर पर कर्ज की गठरी बन जाती हैं। पर देखिए, मेरी अनन्या कर्ज लक्ष्मी नहीं बनी, वह तो हमारे पूरे कुल का मान बढ़ाने वाली भाग्यलक्ष्मी साबित हुई। उस दिन चंपा मौसी ने जो आशीष दिया था, वह सच हो गया। बेटियां कभी बोझ नहीं होतीं, बोझ तो केवल समाज की संकीर्ण सोच होती है।
बाहर दालान से ठहाकों, खुशियों और मंगल वचनों की आवाजें गूंज रही थीं। पूरा घर एक नए विश्वास और पवित्र रिश्ते की सुगंध से महक उठा था।
आज के इस आधुनिक दौर में भी क्या आपको लगता है कि समाज दहेज की इस कुप्रथा से पूरी तरह मुक्त हो पाया है? अगर हर माता-पिता और सास-ससुर शिवप्रसाद जी और कल्याणी देवी की तरह बेटियों को केवल संस्कारों के तराजू पर तौलें, तो क्या किसी पिता को अपनी जमीन या स्वाभिमान गिरवी रखना पड़ेगा? अपनी राय नीचे कमेंट में जरूर साझा करें।
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मूल लेखिका : रीमा महेंद्र ठाकुर