वंदना ने कल्याणी जी को बड़े ही आदर से सोफे पर बैठाया और तुरंत उनके लिए अदरक वाली गरमा-गरम चाय और घर की बनी मट्ठियाँ ले आई। कल्याणी जी ने चाय का घूँट भरा तो उनका मन तृप्त हो गया। उन्होंने प्लेट से एक मट्ठी उठाई और प्यार से बोलीं कि बेटा, कल से मेरे मन में एक बात खटक रही थी। कल पार्टी में मैंने अचानक तुमसे तुम्हारी नौकरी के बारे में पूछ लिया। मुझे बाद में लगा कि कहीं तुम्हें ऐसा तो नहीं लगा कि मैंने तुम्हें कमतर आंका? आजकल की लड़कियाँ बाहर काम करने को ही सब कुछ मानती हैं, मुझे डर था कि कहीं मेरे सवाल से तुम्हें ठेस न पहुँची हो।
सोसाइटी के क्लब हाउस में नन्हीं पंखुड़ी के सातवें जन्मदिन का जश्न अपनी पूरी रवानगी पर था। रंग-बिरंगे गुब्बारों, परियों की झालरों और जगमगाती रोशनियों से सजे उस बड़े से हॉल में धीमी आवाज में बजता संगीत माहौल को खुशनुमा बना रहा था। महामारी के दौर की सावधानियों को ध्यान में रखते हुए पंखुड़ी की माँ मालती ने केवल गिने-चुने पारिवारिक मित्रों और पड़ोसियों को ही आमंत्रित किया था। माहौल में एक आत्मीयता थी, जहाँ सभी लोग बेफिक्र होकर एक-दूसरे से मिल रहे थे। हॉल के एक कोने में सजे बुफे काउंटर से अपनी-अपनी पसंद के कटलेट, पनीर टिक्का और सैंडविच की प्लेटें सजाकर मेहमान छोटे-छोटे समूहों में बँटे हुए बातों में डूबे थे।
पुरुष वर्ग एक तरफ सोफे पर बैठा हुआ रियल एस्टेट के उतार-चढ़ाव, शेयर बाजार की चाल और नई आर्थिक नीतियों पर गरमा-गरम चर्चा में व्यस्त था। दूसरी तरफ हॉल के एक खुले हिस्से में बच्चों की अपनी अलग ही दुनिया बसी हुई थी। जादूगर का शो खत्म होने के बाद बच्चे म्यूजिकल चेयर और छुआ-छुआई खेलने में ऐसे मग्न थे कि उनके कानों तक किसी की आवाज ही नहीं पहुँच रही थी। माएँ बार-बार प्लेटें हाथ में लिए अपने-अपने लाडलों को पुकार रही थीं, पर बच्चों का पेट मानो सिर्फ खेलकूद से ही भर चुका था। जब बार-बार बुलाने पर भी बच्चे नहीं आए, तो महिलाओं ने तय किया कि अगर वे खुद बैठकर खाना शुरू करेंगी, तो बच्चे खुशबू और भूख के अहसास से अपने आप दौड़े चले आएंगे। सो, सभी महिलाएँ गोल मेज के इर्द-गिर्द कुर्सियों पर बैठ गईं और प्लेटों के साथ उनकी गपशप का नया दौर शुरू हो गया।
मालती की सास कल्याणी जी भी एक कुर्सी पर बैठी मंद-मंद मुस्कुराते हुए सब देख रही थीं। बहत्तर की उम्र पार कर चुकीं कल्याणी जी का स्वभाव बेहद मिलनसार और सुलझा हुआ था। वे केवल अपने परिवार तक सीमित रहने वाली बुजुर्ग नहीं थीं, बल्कि मालती की हर सहेली उनके स्नेही स्वभाव से भलीभांति परिचित थी। तभी मालती एक नई मेहमान का हाथ थामे अपनी सास के पास आई। मालती के चेहरे पर एक खास उत्साह था। उसने प्यार से कल्याणी जी के कंधे पर हाथ रखा और कहा कि माँ जी, इनसे मिलिए, ये हैं वंदना जी। हाल ही में हमारे सामने वाले ब्लॉक के नए फ्लैट में शिफ्ट हुई हैं। इनकी बेटी भी पंखुड़ी की क्लास में ही पढ़ती है। कल्याणी जी ने स्नेह भरी नजरों से वंदना को देखा। साधारण सी कॉटन की साड़ी में लिपटी, चेहरे पर सादगी और आँखों में गजब की सौम्यता लिए वंदना ने झुककर कल्याणी जी के चरण स्पर्श किए। कल्याणी जी का दिल खुश हो गया और उन्होंने दिल से उसे ढेरों आशीर्वाद दिए।
मालती दूसरे मेहमानों को देखने के लिए आगे बढ़ गई, लेकिन कल्याणी जी ने वंदना को अपने पास खाली कुर्सी पर बैठा लिया। मालती की सहेलियों ने फौरन वंदना के लिए भी स्नैक्स की प्लेट बढ़ा दी और उसे अपनी मंडली में शामिल कर लिया। माहौल बहुत सहज था। मालती की ये सभी सहेलियाँ कॉर्पोरेट जगत की जानी-मानी हस्तियाँ थीं। कोई किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी में सीनियर एचआर थी, तो कोई सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट। कल्याणी जी भी लंबे समय से अपनी बहू और उसकी दोस्तों को दिन-रात लैपटॉप पर उंगलियाँ चलाते, प्रेजेंटेशन देते और क्लाइंट्स से बातचीत करते देखती आई थीं। इसलिए उन्होंने बड़े ही अपनेपन और सहज भाव से वंदना से पूछ लिया कि बेटा, आप किस कंपनी में काम करती हैं? आपका ऑफिस किस सेक्टर में है?
कल्याणी जी के इस सीधे से सवाल पर मेज पर बैठे सभी लोगों की नजरें वंदना पर टिक गईं। सवाल सुनते ही कुछ पलों के लिए वंदना के चेहरे का रंग बदला, उसकी पलकें हल्की सी झुकीं और एक अजीब सी हिचकिचाहट उसके चेहरे पर तैर गई। मेज पर एक गहरी खामोशी छा गई, जैसे किसी ने कोई अनचाहा सवाल पूछ लिया हो। लेकिन वंदना ने खुद को फौरन संभाला। उसने अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया, चेहरे पर एक बेहद खूबसूरत और आत्मविश्वास से भरी मुस्कान बिखेरी और बहुत ही मधुर आवाज में बोली कि आंटी जी, मैं बाहर किसी दफ्तर या कंपनी में काम नहीं करती। मेरा घर ही मेरा सबसे बड़ा संस्थान है, मेरा प्रोजेक्ट है। मैं एक होममेकर हूँ, बस अपने परिवार और बच्चों की दुनिया संवारती हूँ।
वंदना का यह जवाब सुनते ही कल्याणी जी अंदर तक झेंप गईं। उन्हें लगा कि अनजाने में ही सही, उन्होंने इस प्यारी सी बच्ची को बाकी कामकाजी महिलाओं के सामने असहज कर दिया। उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ कि आज के जमाने में जहाँ हर महिला अपने करियर की बात करती है, वहाँ ऐसा सवाल पूछना किसी को छोटा महसूस करा सकता है। कल्याणी जी ने माहौल की झिझक मिटाने के लिए बात को हँसी में टालने की कोशिश की और खुद ही खिलखिलाते हुए बोलीं कि अरे वाह, यह तो बहुत अच्छी बात है। लेकिन वंदना की आँखों में उस पल जो एक ठहराव था, वह कल्याणी जी के अनुभवी मन ने भाँप लिया।
जन्मदिन का जश्न अपनी गति से आगे बढ़ता रहा। बच्चों ने केक काटा, तालियाँ बजीं, तस्वीरें खिंचीं और फिर धीरे-धीरे मेहमान अपने-अपने घरों को लौटने लगे। विदा होते समय वंदना ने एक बार फिर कल्याणी जी के पैर छुए और बहुत मीठे स्वर में कहा कि आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा माँ जी, कभी हमारे घर भी आइएगा, मुझे बहुत खुशी होगी। कल्याणी जी ने उसके सिर पर हाथ फेरा, पर उनके दिल के किसी कोने में एक हल्की सी चुभन बाकी रह गई थी।
अगले दिन सुबह की धूप जब बालकनी में खिली, तो कल्याणी जी अपनी चाय का कप लिए वहीं बैठी थीं। सामने वाले ब्लॉक की तीसरी मंजिल पर उन्हें वंदना दिखाई दी, जो बड़ी फुर्ती से बालकनी में कपड़े सुखा रही थी और साथ ही साथ अंदर से आ रही अपने बच्चे की आवाज पर उसे प्यार से कुछ निर्देश भी दे रही थी। कल्याणी जी को लगा कि उन्हें कल की उस बात को ऐसे ही अधूरा नहीं छोड़ना चाहिए। उन्होंने मालती से कहा कि बहू, आज दोपहर में मैं जरा वंदना के यहाँ होकर आती हूँ, कल बेचारी को मेरी बात से बुरा न लगा हो। मालती हँस पड़ी और बोली कि माँ जी, आप भी न छोटी-छोटी बातों को दिल से लगा लेती हैं। वंदना बहुत सुलझी हुई है, वह बुरा नहीं मानेगी। फिर भी अगर आपका मन है तो जरूर हो आइए, उसे अच्छा ही लगेगा।
दोपहर को जब घर के सब काम निबट गए, तो कल्याणी जी वंदना के फ्लैट की ओर चल पड़ीं। डोरबेल बजते ही दरवाजा खुला। सामने कल्याणी जी को देखकर वंदना की आँखें खुशी से चमक उठीं। उसने आदरपूर्वक उनका हाथ थामा और अंदर ले आई। फ्लैट बहुत बड़ा नहीं था, पर उसकी सादगी और व्यवस्था देखते ही बनती थी। घर का एक-एक कोना करीने से सजा था। बैठक के पर्दे, मेज पर रखी ताजे फूलों की कटोरी, किताबों की शेल्फ और दीवार पर लगी पारिवारिक तस्वीरें, सब कुछ एक अनूठे सुकून और संतुलन की गवाही दे रहे थे। घर में एक हल्की सी चंदन और धूप की खुशबू फैली हुई थी, जो मन को शांत कर देती थी।
वंदना ने कल्याणी जी को बड़े ही आदर से सोफे पर बैठाया और तुरंत उनके लिए अदरक वाली गरमा-गरम चाय और घर की बनी मट्ठियाँ ले आई। कल्याणी जी ने चाय का घूँट भरा तो उनका मन तृप्त हो गया। उन्होंने प्लेट से एक मट्ठी उठाई और प्यार से बोलीं कि बेटा, कल से मेरे मन में एक बात खटक रही थी। कल पार्टी में मैंने अचानक तुमसे तुम्हारी नौकरी के बारे में पूछ लिया। मुझे बाद में लगा कि कहीं तुम्हें ऐसा तो नहीं लगा कि मैंने तुम्हें कमतर आंका? आजकल की लड़कियाँ बाहर काम करने को ही सब कुछ मानती हैं, मुझे डर था कि कहीं मेरे सवाल से तुम्हें ठेस न पहुँची हो।
वंदना के चेहरे पर एक शांत और गंभीर मुस्कान फैल गई। उसने कल्याणी जी के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बहुत ही कोमल स्वर में कहा कि नहीं माँ जी, सच कहूँ तो मुझे आपकी बात का बिल्कुल बुरा नहीं लगा। पर हाँ, उस पल मेरे दिल में एक पुरानी टीस जरूर जाग उठी थी। यह टीस आपके सवाल से नहीं थी, बल्कि समाज के उस नजरिए से थी जो अक्सर हम जैसी औरतों को झेलना पड़ता है।
कल्याणी जी ने उत्सुकता से पूछा कि कैसी टीस बेटा?
वंदना ने गहरी सांस ली और अपनी कहानी सुनाने लगी। उसने बताया कि माँ जी, मैंने भी बड़े कॉलेज से बायोटेक्नोलॉजी में मास्टर्स किया था। शादी से पहले मैं भी एक नामी रिसर्च लैब में बतौर सीनियर एनालिस्ट काम करती थी। मेरी भी अपनी महत्वाकांक्षाएँ थीं, अपनी उड़ान थी। मेरे पति एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट हैं, उनका काम बहुत जिम्मेदारी और तनाव भरा है। शादी के तीन साल बाद जब हमारी बेटी इस दुनिया में आई, तो उसने जन्म के समय कुछ स्वास्थ्य संबंधी जटिलताओं का सामना किया। उसे लगातार देखभाल, थेरेपी और माँ के साथ की जरूरत थी। उस वक्त हमारे सामने दो रास्ते थे। या तो मैं एक नैनी रखकर अपनी नौकरी जारी रखती, जहाँ मेरा आधा मन हमेशा घर पर अटका रहता, या फिर मैं पूरी तरह अपनी बच्ची की परवरिश और अपने घर की जिम्मेदारी अपने कंधों पर ले लूँ।
वंदना की आँखें थोड़ी नम हुईं, पर उसकी आवाज में कोई मलाल नहीं था। उसने आगे कहा कि माँ जी, मैंने और मेरे पति ने बैठकर बहुत सोचा। फिर मैंने अपनी मर्जी से यह फैसला किया कि मैं नौकरी छोड़ूँगी। यह कोई मजबूरी का सौदा नहीं था, यह मेरा सचेत फैसला था। मैंने तय किया कि मैं अपने परिवार की जड़ बनूँगी। पेड़ की शाखाएँ कितनी भी ऊँची उड़ें, फल-फूल कितने भी लगें, पर जब तक जड़ें जमीन को मजबूती से नहीं पकड़ेंगी, पेड़ खड़ा नहीं रह सकता। मेरे पति बाहर जाकर बिना किसी तनाव के काम कर पाते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि घर का मोर्चा पूरी तरह सुरक्षित है। मेरी बेटी आज बिल्कुल स्वस्थ है और अपनी पढ़ाई में अव्वल है क्योंकि मैं हर कदम पर उसके साथ खड़ी रही हूँ।
वंदना ने थोड़ा रुककर कल्याणी जी की तरफ देखा और बोली कि लेकिन माँ जी, दुख तब होता है जब किसी पार्टी में, किसी रिश्तेदारी में या किसी फॉर्म को भरते समय जब कोई पूछता है कि आप क्या करती हैं, और मेरे यह कहने पर कि मैं हाउसवाइफ हूँ, सामने वाले के चेहरे के भाव बदल जाते हैं। उनकी आँखों में एक अजीब सी दया या उपेक्षा का भाव आ जाता है, मानो मैं दिन भर बस खाली बैठकर वक्त काटती हूँ। लोग यह भूल जाते हैं कि एक घर को घर बनाए रखना, चौबीसों घंटे बिना किसी छुट्टी, बिना किसी वेतन और बिना किसी अप्रेजल के परिवार के हर सदस्य की खुशियों का ख्याल रखना, दुनिया का सबसे बड़ा मैनेजमेंट है। क्या प्यार से खाना बनाना, बच्चों को संस्कार देना, बुजुर्गों की सेवा करना और एक थके हुए इंसान को घर लौटने पर सुकून देना कोई छोटा काम है?
वंदना की बातें सुनकर कल्याणी जी की आँखें भर आईं। उन्हें अपने पुराने दिन याद आ गए। जब वे जवान थीं, उनके पति भी दिन-रात काम में जुटे रहते थे और उन्होंने अकेले दम पर अपने बच्चों को पाला-पोसा, उन्हें बड़ा किया, घर की एक-एक पाई का हिसाब रखा और परिवार को बिखरने से बचाया। उस दौर में किसी ने कभी उनसे यह नहीं पूछा था कि वे क्या करती हैं, क्योंकि तब घर संभालना ही सबसे बड़ा धर्म माना जाता था। पर आज के आधुनिक दौर में सफलता की परिभाषा सिर्फ बैंक बैलेंस और विजिटिंग कार्ड तक सिमट कर रह गई थी।
कल्याणी जी ने वंदना के सिर पर अपना हाथ रखा और बड़े गर्व से कहा कि बेटा, आज तुमने मेरी आँखें खोल दीं। तुम्हारी सोच जितनी ऊँची है, उतनी शायद किसी बड़ी कंपनी के सीईओ की भी नहीं होगी। तुमने अपने करियर की बलि नहीं दी, बल्कि तुमने अपने परिवार के लिए एक ऐसा निवेश किया है जिसका मुनाफा पीढ़ियों तक मिलेगा। जो औरत एक पूरे घर को अपने प्यार और अनुशासन से बाँधकर रखती है, वह किसी भी कंपनी की डायरेक्टर से कम नहीं होती। तुम हाउसवाइफ नहीं हो, तुम तो इस घर की गृहस्वामिनी हो, इस घर की धड़कन हो।
उस दिन दोनों के बीच घंटों बातें हुईं। कल्याणी जी ने महसूस किया कि वंदना के भीतर ज्ञान, कला और समझ का एक अथाह समंदर था। वह घर पर रहकर भी खाली नहीं थी; वह बच्चों को मुफ्त में विज्ञान पढ़ाती थी, सोसाइटी के बगीचे की देखभाल करती थी और ऑनलाइन माध्यम से जरूरतमंद महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने के गुर सिखाती थी। उसके काम का कोई बोर्ड नहीं लगा था, पर उसका प्रभाव हर जगह महसूस होता था।
कुछ दिनों बाद सोसाइटी में महिला दिवस का एक विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया। सोसाइटी के सभी लोग क्लब हाउस में जमा थे। मंच पर उन महिलाओं को सम्मानित किया जा रहा था जिन्होंने कॉर्पोरेट जगत, चिकित्सा और समाजसेवा के क्षेत्र में नाम कमाया था। मालती को भी उसकी कंपनी में शानदार प्रदर्शन के लिए मंच पर बुलाया गया। मालती ने पुरस्कार लेने के बाद माइक अपने हाथ में लिया।
मालती ने मुस्कुराते हुए कहा कि आज इस मंच से मुझे जो सम्मान मिला है, उसके लिए मैं आप सबकी आभारी हूँ। लेकिन आज मैं एक ऐसा सम्मान देना चाहती हूँ जो अब तक किसी मंच पर नहीं दिया गया। मेरी सास कल्याणी जी ने मुझे सिखाया है कि असली ताकत सिर्फ बाहर की दुनिया जीतने में नहीं होती, बल्कि उस घर को सँभालने में होती है जहाँ से निकलकर हम बाहर की दुनिया जीतने जाते हैं। आज मैं अपनी सहेली वंदना को इस मंच पर बुलाना चाहती हूँ।
हॉल में बैठे सभी लोग हैरान होकर देखने लगे। मालती ने वंदना को मंच पर बुलाया और भरे गले से कहा कि वंदना ने अपने सुनहरे करियर को पीछे छोड़कर अपने परिवार को चुना। आज उसकी बेटी स्वस्थ है, उसके पति अपने क्षेत्र में सफल हैं और उसका घर हम सबके लिए प्रेरणा है। हम कामकाजी महिलाएँ अक्सर यह भूल जाती हैं कि अगर हमारे पीछे कोई घर संभालने वाला न हो, तो हम बाहर एक कदम भी नहीं बढ़ा सकतीं। वंदना जैसी गृहिणियाँ ही हमारे समाज की असली नींव हैं।
पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा। कल्याणी जी की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले। वंदना की आँखों में भी आँसू थे, लेकिन आज उन आँसुओं में कोई हिचकिचाहट या झेंप नहीं थी, बल्कि अपने वजूद पर एक गहरा गर्व था। सोसाइटी की दूसरी कामकाजी महिलाएँ भी आगे बढ़कर वंदना से गले मिलीं और उन्होंने स्वीकारा कि घर संभालना दुनिया का सबसे कठिन और सम्मानजनक काम है। उस दिन उस हॉल में हर महिला का सिर गर्व से ऊँचा था, चाहे वह दफ्तर जाती हो या घर संभालती हो। दोनों ने एक-दूसरे के वजूद को समझा और सराहा था।
दोस्तों, अक्सर हमारे समाज में घर संभालने वाली महिलाओं के काम को अनदेखा कर दिया जाता है और उन्हें सिर्फ ‘हाउसवाइफ’ कहकर उनके योगदान को कम आंक लिया जाता है। क्या आपको भी लगता है कि एक गृहिणी का त्याग और मेहनत किसी भी बड़ी नौकरी से कहीं अधिक सम्मान की हकदार है? अपनी राय कमेंट बॉक्स में लिखकर हमारे साथ जरूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद
मूल लेखिका : उमा महाजन