शशांक क्यों आ रहा है? क्या वह सुजाता से प्रेम करता है? नहीं। वह अपनी सफलता के अहंकार में डूबा हुआ है। वह यह साबित करने आ रहा है कि उसका जाना सही था। वह सुजाता को अपनी उपलब्धियों के माध्यम से ‘उपकृत’ करने आ रहा है। शशांक यह सोच रहा है कि सुजाता आज भी उसी दहलीज पर खड़ी उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। वह सोच रहा है कि उसकी दौलत और उसकी सफलता सुजाता के बारह सालों के आंसुओं को पोंछ देगी।
सुजाता ने आईने में खुद को देखा। उसके बालों में अब सफेदी झांकने लगी थी, उसकी आँखों के नीचे हल्के गड्ढे पड़ गए थे, लेकिन उन आँखों में जो स्वाभिमान की चमक थी, वह बारह साल पहले नहीं थी। उसने खुद को संभाला था, अपने बेटे को एक काबिल इंसान बनाया था। उसका अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व था, जो शशांक के बिना भी पूर्ण था। उसने शशांक से प्रेम किया था, लेकिन उसके प्रेम को अब शशांक की वापसी की मोहताज नहीं होना था। सुजाता का प्रेम उसकी स्मृतियों में, उसके संघर्षों में और उसके मातृत्व में जीवित था।
“उर्मिला… क्या तुम मुझे अपने कक्ष में आने की आज्ञा नहीं दोगी? वनवास के चौदह वर्ष पूर्ण हो चुके हैं, राम का राज्याभिषेक हो चुका है। अब तो मेरे लिए अपने द्वार खोल दो।” लक्ष्मण के स्वर में एक अजीब सा संकोच और अपराधबोध था।
“मेरे कक्ष के द्वार आपके लिए कभी बंद नहीं थे सौमित्र। परंतु जिन उर्मिला को आप चौदह वर्ष पूर्व इसी कक्ष में सोता हुआ छोड़ गए थे, वह तो उसी दिन प्रतीक्षा की अग्नि में जलकर भस्म हो चुकी है। अब यहाँ जो है, वह केवल स्मृतियों और कर्तव्यों के सांचे में ढली एक तपस्विनी है।”
पुस्तक के पन्ने पलटती हुई सुजाता की आँखें इन पंक्तियों पर आकर ठहर गईं। उसके हाथ में ‘उर्मिला का वनवास’ नाम की किताब थी, लेकिन उसका मन किसी और ही वनवास की स्मृतियों में उलझा हुआ था।
“दीदी, आपकी अदरक वाली चाय…” कामवाली सुशीला की आवाज़ ने सुजाता को त्रेता युग के उस राजमहल की उदासी से खींचकर वर्तमान के उसके छोटे से फ्लैट के छज्जे पर ला खड़ा किया। सुजाता ने एक गहरी सांस ली, किताब को मेज पर रखा और चाय का प्याला थाम लिया।
सुजाता शहर के एक नामी कॉलेज में इतिहास की प्रोफेसर थी। आज मंगलवार था, लेकिन उसने कॉलेज से छुट्टी ले रखी थी। ऐसा बहुत कम होता था कि सुजाता बिना किसी बीमारी या बहुत ज़रूरी काम के छुट्टी ले। लेकिन आज का दिन ही कुछ ऐसा था। उसका बेटा कबीर अब बड़ा हो गया था और पिछले तीन सालों से दूसरे शहर के इंजीनियरिंग कॉलेज के हॉस्टल में रह रहा था। इस बड़े से घर में सुजाता और उसकी दिनचर्या ही उसका पूरा संसार थे। लेकिन कल शाम आए एक फोन कॉल ने उसकी इस शांत दुनिया में एक पत्थर सा फेंक दिया था।
फोन उसके पति, शशांक का था।
शशांक को घर छोड़े हुए बारह साल बीत चुके थे। बारह साल पहले, जब कबीर मुश्किल से सात साल का था, शशांक अपनी कला और ‘आंतरिक शांति’ की खोज में उन दोनों को पीछे छोड़कर पहाड़ों की तरफ निकल गया था। वह एक चित्रकार था और उसका मानना था कि गृहस्थी की ज़िम्मेदारियाँ और समाज की बंदिशें उसकी कला का गला घोंट रही हैं। उसे एक ऐसी आज़ादी चाहिए थी जहाँ वह अपनी तूलिका से अपने मन के रंगों को कैनवस पर उतार सके, बिना इस चिंता के कि घर का राशन कैसे आएगा या बच्चे की स्कूल की फीस कैसे भरी जाएगी।
सुजाता ने उसे रोकने की बहुत कोशिश की थी। उसने रोकर, गिड़गिड़ा कर कहा था कि वे लोग उसकी कला में बाधक नहीं बनेंगे, लेकिन शशांक पर तो जैसे किसी अदृश्य दुनिया को मुट्ठी में करने का जुनून सवार था। उसने कहा था, “सुजाता, मैं इस घुटन में मर जाऊंगा। मुझे जाने दो। जब मैं खुद को पा लूंगा, तब लौट आऊंगा।” और वह चला गया।
इन बारह सालों में सुजाता ने अकेले ही कबीर को पाला, समाज के ताने सहे, नौकरी में अपनी जगह बनाई और खुद को एक पिता और माता, दोनों के सांचे में ढाला। उसने अपने आंसुओं को कभी अपनी कमज़ोरी नहीं बनने दिया।
और कल अचानक शशांक का फोन आया। “सुजाता, मैं शहर में हूँ। मेरी कलाकृतियों की प्रदर्शनी लगी है यहाँ। मुझे वो मिल गया है जिसकी मुझे तलाश थी। मुझे नाम, पैसा और वो शांति मिल गई है जिसके लिए मैं गया था। मैं आज तुमसे और कबीर से मिलने घर आना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि अपनी इस सफलता की खुशियाँ तुम्हारे साथ बांटूं। अब मैं तुम्हारे जीवन के सारे खालीपन को भर सकता हूँ।”
इसी फोन कॉल की वजह से सुजाता ने आज कॉलेज से छुट्टी ली थी। सुबह से ही वह बेचैन थी। सुशीला ने भी आज घर को कुछ ज़्यादा ही चमका दिया था, मानो उसे भी अंदाज़ा हो गया था कि आज कोई खास आने वाला है।
सुजाता ने चाय का घूंट भरा और फिर से किताब उठा ली। उसकी नज़रें फिर उर्मिला के संवाद पर टिक गईं।
“मांगो उर्मिला,” लक्ष्मण कह रहे थे, “मेरे पास अब अयोध्या का सारा वैभव है। मैं तुम्हारे चौदह वर्षों के उस त्याग का मोल तो नहीं चुका सकता, परंतु अब अपना शेष जीवन तुम्हारे चरणों में अर्पित कर सकता हूँ। मैं तुम्हें वो सब दे सकता हूँ, जिससे तुम्हें सुख मिले।”
पुस्तक में उर्मिला मुस्कुराती है। एक ऐसी मुस्कान जिसमें कोई शिकायत नहीं, बस एक गहरी विरक्ति है। “सौमित्र, आपने अपने भ्रातृ-धर्म को चुना और वन में जाकर महान हो गए। मैंने अपने पत्नी-धर्म को चुना और इन महलों के एकांत में रहकर भी स्वयं को पूर्ण कर लिया। आप अपने धर्म के पालन में संतुष्ट रहें, मैं अपने एकाकी प्रेम में पूर्ण हूँ। आपने मुझे तब त्यागा था, जब मुझे आपके संबल की सबसे अधिक आवश्यकता थी। जब मेरे जीवन का वसंत था, तब आप चले गए। अब इस पतझड़ में मुझे आपके किसी वैभव या प्रतिदान की आवश्यकता नहीं है।”
“परंतु मैं तुम्हें तुम्हारी इस तपस्या का फल देना चाहता हूँ उर्मिला। मैं तुम्हारे प्रेम के प्रति कृतज्ञ हूँ,” लक्ष्मण ने अनुनय किया।
“प्रेम कोई व्यापार नहीं है सौमित्र, जिसमें प्रतिदान की आकांक्षा हो,” उर्मिला का स्वर शांत लेकिन दृढ़ था। “आप अपने महान जीवन के क्षेत्र में लौट जाएं और मुझे मेरे एकांत के क्षेत्र में स्वतंत्र छोड़ दें। क्योंकि प्रेम बंधनों में नहीं, बल्कि स्वतंत्र होकर ही अपनी पूर्णता पाता है। जो प्रेम किसी के लौटने या किसी के अहसान का मोहताज हो, वो सच्चा प्रेम कैसे हो सकता है? मेरा प्रेम मुझमें जीवित है, और उसके लिए आपका मेरे कक्ष में आना आवश्यक नहीं।”
उर्मिला के ये शब्द सुजाता के दिमाग में किसी हथौड़े की तरह लगे। अचानक उसे लगा जैसे बारह सालों से उसके मन पर छाई एक धुंध छंट गई हो। उसने किताब बंद की और अपनी कुर्सी से उठ खड़ी हुई।
शशांक क्यों आ रहा है? क्या वह सुजाता से प्रेम करता है? नहीं। वह अपनी सफलता के अहंकार में डूबा हुआ है। वह यह साबित करने आ रहा है कि उसका जाना सही था। वह सुजाता को अपनी उपलब्धियों के माध्यम से ‘उपकृत’ करने आ रहा है। शशांक यह सोच रहा है कि सुजाता आज भी उसी दहलीज पर खड़ी उसकी प्रतीक्षा कर रही होगी। वह सोच रहा है कि उसकी दौलत और उसकी सफलता सुजाता के बारह सालों के आंसुओं को पोंछ देगी।
सुजाता ने आईने में खुद को देखा। उसके बालों में अब सफेदी झांकने लगी थी, उसकी आँखों के नीचे हल्के गड्ढे पड़ गए थे, लेकिन उन आँखों में जो स्वाभिमान की चमक थी, वह बारह साल पहले नहीं थी। उसने खुद को संभाला था, अपने बेटे को एक काबिल इंसान बनाया था। उसका अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व था, जो शशांक के बिना भी पूर्ण था। उसने शशांक से प्रेम किया था, लेकिन उसके प्रेम को अब शशांक की वापसी की मोहताज नहीं होना था। सुजाता का प्रेम उसकी स्मृतियों में, उसके संघर्षों में और उसके मातृत्व में जीवित था।
अगर वह आज घर पर रुककर शशांक का इंतज़ार करती है, तो इसका मतलब होगा कि वह उर्मिला नहीं, बल्कि समाज की उस दयनीय स्त्री की तरह है जो केवल किसी पुरुष के लौट आने से ही सार्थक होती है। वह शशांक को यह झूठी तसल्ली नहीं दे सकती कि उसका किया हुआ सब कुछ माफ कर दिया गया है।
सुजाता के होंठों पर एक संतोष भरी मुस्कान आ गई। उर्मिला ने लक्ष्मण को अपने कक्ष में आने की अनुमति नहीं दी थी। सुजाता को भी अब अपने जीवन के कक्ष में किसी शशांक की ज़रूरत नहीं थी।
“सुशीला!” सुजाता ने आवाज़ दी।
“जी दीदी,” सुशीला दौड़ती हुई आई।
“ज़रा मेरा टिफिन लगा देना। मुझे कॉलेज जाना है।” सुजाता ने अपनी अलमारी खोलते हुए कहा और एक सूती साड़ी निकालने लगी।
सुशीला हैरानी से सुजाता को देखने लगी। “पर दीदी… आपने तो आज छुट्टी ली हुई थी न? और आपने कहा था कि आज साहब…”
“नहीं सुशीला,” सुजाता ने पलटकर सुशीला की आँखों में देखते हुए एक बेहद शांत स्वर में कहा, “बेकार में अपने कर्तव्यों का नुकसान करके किसी ऐसी चीज़ का इंतज़ार करना जो कभी तुम्हारी थी ही नहीं… प्यार नहीं कहलाता।”
सुशीला अचंभित सी सुजाता के चेहरे का वह दृढ़ निश्चय और सुकून देख रही थी। उसे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन बिना कोई सवाल किए वह चुपचाप रसोई की तरफ चल दी, सुजाता का टिफिन बनाने।
सुजाता ने अपना बैग उठाया, दरवाज़े को बाहर से ताला लगाया और एक नई और आज़ाद सुबह की ओर अपने कदम बढ़ा दिए। शशांक आएगा, बंद दरवाज़ा देखेगा और शायद समझ जाएगा कि जो समय रेत की तरह मुट्ठी से फिसल जाता है, उसे दुनिया की कोई भी कला या कोई भी सफलता वापस नहीं ला सकती।
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मूल लेखिका : कनक हरलालका