Betiyan Team
असली न्याय
अदालत के उस विशाल और शांत कमरे में आज एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था। यह सन्नाटा किसी डर का नहीं, बल्कि एक स्तब्ध कर देने वाले सच का था। कटघरे में अट्ठाईस वर्षीय देविका खड़ी थी। उसके चेहरे पर न तो कोई पछतावा था, न कोई खौफ और न ही किसी तरह की घबराहट। … Read more
संस्कार के बीज
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे। पैंसठ वर्षीय सुमित्रा देवी अपनी पंसदीदा किताब के कुछ पन्ने पलट कर बस सोने की ही तैयारी कर रही थीं। उनका यह पच्चीस सौ स्क्वायर फुट का दो मंजिला घर, जिसे उन्होंने अपने पति के गुजर जाने के बाद अपनी पाई-पाई जोड़कर बनाया था, अब उनकी एकांत दुनिया … Read more
अपनों का साथ! – डाॅ संजु झा
आशा जी एक आम गृहिणी की भाॅंति अपने गाॅंव के बड़े मकान में सुकून के साथ रहतीं थीं।बच्चे,पति , परिवार,समाज ही उनकी दुनियाॅं थी। अपनों के साथ समय कैसे बीत जाता था, उन्हें पता ही नहीं चलता।कहावत है परिवर्त्तन समय का नियम है।समय के साथ बच्चे बड़े होकर शहर की राह पकड़ चुके थे। साल … Read more
“अपनों का साथ ” – उमा वर्मा
सुमित्रा चार महीने से बिस्तर पर पड़ी हुई है ।बस लेटे रहना और खाना यही दिन चर्या बन गई है।अपने से कुछ कर नहीं सकती है ।बहु और बेटी सेवा में लगी रहती है ।व्हील चेयर पर बिठा कर बाथरूम ले जाना, नहलाना,सफाई सबकुछ के लिये दूसरे पर आश्रित हो गई है।बहुत तकलीफ होती है … Read more
अपनों का साथ और प्यार – गीता वाधवानी
आकाश और आशना की आंखों में खुशी के आंसू थे। उनकी बेटी काम्या ने समाजसेविका बनकर उनका नाम रोशन किया था।आज उसके अच्छे कामों के लिए उसे अवार्ड दिया जा रहा था। पूरा हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। हर व्यक्ति की जुबान पर बस काम्या का ही नाम था। सब यही कह रहे … Read more
पवित्र रिश्ते
“मम्मी, वो जो बनारसी सिल्क की साड़ी आपने दिखाई थी, वही भिजवाना मेरे लिए। और हाँ, काजू-बादाम, पिस्ता के साथ वो इंपोर्टेड चॉकलेट्स का बड़ा वाला पैक भी रख देना। मेरी जेठानी के मायके से बहुत भारी सामान आया है इस बार दिवाली पर। उनके रिश्तेदारों के सामने मेरा इम्प्रेशन डाउन नहीं होना चाहिए। आपको … Read more
अपनों का साथ – अरुणा गर्ग
शिल्पा की शादी एक बड़े परिवार में हुई थी। दादा,दादी सास, सास ससुर,दो देवर और एक ननद जिसकी शादी चार साल पहले ही हो गई थी।जब शिल्पा के लिए वरूण का रिश्ता आया तो मम्मी-पापा को घर बार अच्छा लगा।पर उन्हें एक ही चिंता थी कि एकल परिवार में पली उनकी लाडली बेटी इतने बड़े … Read more
विश्वास – अरुणा गर्ग
मयंक शाम को अपनी दुकान बढ़ाकर घर जा रहा था। आगे मुड़कर गली में से गुजर रहा था। उसके थोड़ा आगे ही बच्चियां चल रही थीं।उनकी बातों से पता चला कि उन्हें आज कोचिंग से आने में देर हो गई और अब अंधेरा हो जाने से पहले घर पहुंच जाना चाहती थीं। तभी एक ने … Read more