समीर ने अपने चमचमाते जूतों के फीते बांधते हुए झल्लाहट भरी आवाज में कहा, “मीरा, मेरा नीला रूमाल कहां है? तुम दिन भर घर में रहकर एक काम ढंग से नहीं कर सकती? नाश्ते में नमक कम है और मेरी फाइल भी टेबल पर नहीं है।” मीरा, जो पसीने से लथपथ रसोई में बच्चों का टिफिन पैक कर रही थी, चुपचाप आई, अलमारी से रूमाल निकालकर समीर के हाथ में दिया और बिना कुछ कहे वापस अपने काम में लग गई। समीर अपनी गाड़ी की चाबी घुमाते हुए बड़बड़ाता हुआ निकल गया कि उसे ऑफिस में कितनी मेहनत करनी पड़ती है और इस घर के लोगों को उसकी कोई कद्र नहीं है। दरवाजा बंद होने की आवाज़ के साथ ही मीरा ने एक गहरी सांस ली। उसकी आँखों के कोर हल्के से भीग गए थे, लेकिन रोने का भी समय कहाँ था? अभी उसे बच्चों को स्कूल भेजना था, सास कौशल्या जी की दवाइयां देनी थीं, और फिर पूरे घर की सफाई करनी थी।
मीरा एक बेहद सुलझी हुई, शांत और समझदार महिला थी। शादी से पहले उसने भी कुछ सपने देखे थे, लेकिन शादी के बाद ‘एक अच्छी बहू’ और ‘आदर्श पत्नी’ बनने की होड़ में उसने अपने अस्तित्व को ही कहीं पीछे छोड़ दिया था। उसका दिन सुबह पांच बजे शुरू होता और रात के ग्यारह बजे तक एक मशीन की तरह चलता रहता। कपड़े धोना, तीन समय का ताज़ा खाना बनाना, घर को चमका कर रखना, बच्चों की पढ़ाई देखना और सास के हर ताने को सिर झुकाकर सुनना—यही उसकी दिनचर्या थी। लेकिन इन सबके बावजूद समीर की नजरों में वह सिर्फ एक ‘आश्रित’ थी। समीर अक्सर झगड़े के वक्त उसे ताना मारता था, “मैं कमाता हूँ, मेरे पैसों से यह घर चलता है। तुम तो बस मेरी कमाई पर पल रही हो। अगर मैं न होऊं तो तुम्हारा क्या होगा?”
मीरा ये सब सुनकर घूंट पीकर रह जाती। वह जानती थी कि अगर वह पलटकर जवाब देगी तो बात बढ़ेगी। मायके जाने का ख्याल भी आता, तो समाज और रिश्तेदारों का डर आड़े आ जाता। “लड़कियों का असली घर पति का ही होता है,” बचपन से यही तो सिखाया गया था उसे। अगर वह दो दिन भी मायके जाकर रुकती, तो लोग तरह-तरह की बातें बनाने लगते। माता-पिता के सम्मान की खातिर उसने अपने स्वाभिमान का गला घोंट दिया था। उसे लगता था कि शायद उसकी किस्मत में यही लिखा है और एक दिन समीर को उसकी मेहनत का अहसास जरूर होगा।
वक्त अपनी रफ्तार से बीत रहा था। सर्दियों की शुरुआत हो चुकी थी। एक सुबह मीरा उठी तो उसे अपने शरीर में भारीपन महसूस हुआ। सिर दर्द से फटा जा रहा था और हल्का बुखार भी था। लेकिन रसोई में काम उसका इंतजार कर रहा था। उसने एक पेनकिलर खाई और चाय बनाने लगी। समीर तैयार होकर आया और हमेशा की तरह अपनी चीजों के लिए मीरा पर चिल्लाने लगा। मीरा ने हिम्मत करके कहा, “समीर, आज मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है, बुखार सा है।” समीर ने अपना कोट पहनते हुए बिना उसकी तरफ देखे कहा, “तो कोई गोली खा लो। दिन भर घर में ही तो रहना है, कौन सा तुम्हें पत्थर तोड़ने जाना है। आराम कर लेना।” और वह चला गया।
उस दिन मीरा ने जैसे-तैसे काम निपटाया। शाम तक उसका बुखार और तेज हो गया। शरीर तप रहा था। उसने सास से कहा कि वह आज रात का खाना नहीं बना पाएगी। कौशल्या जी ने मुंह बनाते हुए कहा, “आजकल की बहुओं को तो कामचोरी का बहाना चाहिए। हम भी अपने जमाने में बीमार होते थे, पर कभी चूल्हा ठंडा नहीं पड़ने दिया। खैर, मैं बना लूंगी कुछ।” सास ने खिचड़ी बना तो दी, लेकिन साथ में चार बातें भी सुना दीं कि कैसे उनके बेटे को एक बीमार और कमजोर पत्नी मिल गई है।
रात को समीर घर लौटा तो मीरा बिस्तर पर लेटी थी। समीर ने पूछा तक नहीं कि वह कैसी है। उसने बस इतना कहा, “खाना कहां है?” जब उसे पता चला कि मीरा ने खाना नहीं बनाया है, तो वह भड़क गया। “मैं दिन भर गधों की तरह ऑफिस में काम करके आऊं और मुझे घर पर खाना भी ना मिले? बीमार हो तो क्या हुआ, थोड़ा बहुत तो कर ही सकती थी।” समीर ने बाहर से खाना ऑर्डर किया और खाकर सो गया। मीरा रात भर बुखार में तपती रही, दर्द से कराहती रही, लेकिन समीर गहरी नींद में था। उसे अगले दिन ऑफिस जो जाना था, आखिर वही तो इस घर का इकलौता ‘कमाऊ’ सदस्य था।
अगले दो दिनों तक मीरा की हालत बिगड़ती गई। उसने डॉक्टर के पास जाने के लिए समीर से कई बार कहा, लेकिन समीर के पास ऑफिस की मीटिंग्स और क्लाइंट्स से फुर्सत ही नहीं थी। “शाम को आते हुए दवा ले आऊंगा,” वह रोज यही कहता। और शाम को वह कोई न कोई बहाना बनाकर रात के ग्यारह बजे लौटता। कौशल्या जी को अपनी बहू की बीमारी एक नाटक लग रही थी। उन्हें लगता था कि मीरा काम से बचने के लिए यह सब कर रही है। घर में अजीब सी अस्त-व्यस्तता फैलने लगी थी, लेकिन किसी का ध्यान मीरा की बिगड़ती सेहत पर नहीं था।
पाँचवें दिन की शाम मीरा के लिए बहुत भारी पड़ रही थी। उसकी सांसें उखड़ने लगी थीं। सीने में भयानक दर्द था और वह ठीक से बोल भी नहीं पा रही थी। उसने कांपते हाथों से समीर को फोन किया। “समीर… प्लीज जल्दी आ जाओ… मुझे सांस लेने में तकलीफ हो रही है… मुझे अस्पताल ले चलो।”
समीर उस वक्त अपने दोस्तों के साथ एक पार्टी में था। उसने झल्लाते हुए कहा, “मीरा, तुम हर वक्त ड्रामा क्यों करती हो? मैं अभी दोस्तों के साथ हूँ, एक घंटे में आता हूँ। तुम गरम पानी पीकर लेट जाओ।”
एक घंटा बीता, फिर दो घंटे। मीरा की आँखें अब बंद होने लगी थीं। घर में बच्चे सो चुके थे और सास अपने कमरे में भजन सुन रही थीं। मीरा ने एक आखिरी बार दरवाजे की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी शून्यता थी। उसने जिंदगी भर इस घर को अपना खून-पसीना दिया, अपनी इच्छाओं को मारा, लेकिन आज जब उसे सबसे ज्यादा जरूरत थी, तो उसके पास कोई नहीं था। उसे अचानक महसूस हुआ कि समीर सही कहता था—इस घर को उसकी जरूरत नहीं थी, क्योंकि घर को तो सिर्फ एक काम करने वाली मशीन की जरूरत थी, इंसान की नहीं। और जब मशीन खराब हो गई, तो किसी ने उसे ठीक कराने की जहमत तक नहीं उठाई। मीरा की सांसों की डोर टूट गई। वह खामोश हो गई, हमेशा के लिए।
समीर रात के एक बजे घर लौटा। उसने दरवाजा खटखटाया, कोई जवाब नहीं मिला। अपनी चाबी से दरवाजा खोलकर जब वह अंदर आया और कमरे की लाइट जलाई, तो उसने मीरा को बिस्तर पर बेसुध पड़ा देखा। “मीरा, उठो! ये क्या ड्रामा है?” उसने मीरा को झकझोरा, लेकिन मीरा का शरीर बर्फ की तरह ठंडा पड़ चुका था। समीर के हाथ-पैर सुन्न हो गए। उसने चीखते हुए मां को बुलाया। एंबुलेंस बुलाई गई, डॉक्टर आए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। डॉक्टर ने बताया कि गंभीर संक्रमण और निमोनिया के कारण उसकी मौत कई घंटे पहले ही हो चुकी है। अगर समय पर इलाज मिलता, तो वह बच सकती थी।
समीर वहीं फर्श पर धड़ाम से बैठ गया। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। उसके कानों में मीरा के वो आखिरी शब्द गूंज रहे थे—”प्लीज जल्दी आ जाओ…”
आज घर में बहुत भीड़ थी। मीरा की तेरहवीं का दिन था। सफेद कपड़ों में लिपटे रिश्तेदार, रोते-बिलखते बच्चे और कोने में चुपचाप बैठी सास। समीर का चेहरा पीला पड़ चुका था। उसकी आँखों से आंसू सूख गए थे। जैसे ही शांति पाठ खत्म हुआ, लोग धीरे-धीरे अपने घरों की ओर लौटने लगे। “बेचारी बहुत भली थी,” “भगवान को यही मंजूर था,” जैसी खोखली सांत्वनाएं देकर मेहमान चले गए।
शाम ढलते-ढलते घर बिल्कुल खाली हो गया। अब समीर को ऑफिस जाने की कोई जल्दी नहीं थी। उसने कई दिनों से ऑफिस से छुट्टी ले रखी थी। लेकिन असल परेशानी तो अब शुरू होने वाली थी। अगली सुबह जब समीर उठा, तो घर में एक अजीब सा सन्नाटा था। कोई चाय की प्याली लेकर उसके पास नहीं आया। अलमारी खोलने पर उसे अपने कपड़े प्रेस किए हुए नहीं मिले। उसका तौलिया बाथरूम में नहीं था, और ना ही उसके मोजे अपनी जगह पर थे।
वह झुंझला कर रसोई में गया तो देखा कि सिंक जूठे बर्तनों से भरा पड़ा है। बच्चों के स्कूल जाने का समय हो रहा था और वे भूख से रो रहे थे। कौशल्या जी की दवा खत्म हो चुकी थी और वे बिस्तर से उठ नहीं पा रही थीं। समीर ने कोशिश की कि वह नाश्ता बना ले, लेकिन उसे गैस जलाना भी एक भारी काम लग रहा था। दाल कहाँ रखी है, बच्चों के टिफिन में क्या देना है, मां को कौन सी गोली किस समय देनी है—उसे कुछ भी तो नहीं पता था।
समीर को अचानक एहसास हुआ कि जिसे वह सिर्फ ‘घर के छोटे-मोटे काम’ समझता था, वो असल में एक पूरे साम्राज्य को संभालने जैसा था। मीरा कोई नौकरी नहीं करती थी, लेकिन वह इस घर की मैनेजर, कुक, नर्स, टीचर और न जाने क्या-क्या थी। उसके बिना यह घर, घर नहीं बल्कि ईंट-पत्थरों का एक वीरान खंडर बन गया था। जिस घर के बारे में समीर को घमंड था कि वह अपने पैसों से चलाता है, वह घर मीरा के बिना एक दिन भी नहीं चल पा रहा था।
समीर मीरा की तस्वीर के सामने जाकर खड़ा हो गया। तस्वीर में मीरा मुस्कुरा रही थी, वही शांत और निस्वार्थ मुस्कान जो वह हमेशा चेहरे पर रखती थी। समीर फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे माफ कर दो मीरा… मुझे नहीं पता था कि मैं तुम्हारे बिना इतना अधूरा हूँ। मुझे नहीं पता था कि तुम इस घर की नींव हो। तुमने कभी कुछ नहीं मांगा और मैंने तुम्हें सिर्फ ताने दिए।”
समीर को आज समझ आ गया था कि पैसा सब कुछ नहीं होता। घर पैसों से नहीं, बल्कि उस इंसान के त्याग और समर्पण से चलता है जो बिना किसी छुट्टी और बिना किसी पगार के चौबीसों घंटे काम करता है। लेकिन इस सच्चाई को समझने के लिए, अपनी अहमियत साबित करने के लिए, मीरा को अपनी जान की कीमत चुकानी पड़ी थी। आज समीर के पास पैसा था, पद था, शोहरत थी, लेकिन वह इंसान नहीं थी जो इन सबको मायने देती थी। आज दुनिया की नजरों में समीर एक सफल आदमी था, लेकिन अपनी ही नजरों में वह एक ऐसा कंगाल बन चुका था जिसने अपने अहंकार में अपनी सबसे कीमती संपत्ति को खो दिया था।
अब हर रोज समीर उस खाली घर में लौटता है, जहां कोई उसका इंतजार नहीं करता। कोई उससे यह नहीं पूछता कि “आज दिन कैसा रहा?” और ना ही कोई उसके गुस्से को अपनी मुस्कान के पीछे छुपाता है। उसे अब हर पल मीरा की जरूरत महसूस होती है, लेकिन मीरा अब कभी लौटकर नहीं आएगी। उसने अपनी जान देकर साबित कर दिया था कि इस घर को उसके पैसों की नहीं, बल्कि घर को उस गृहिणी की जरूरत थी, जिसे उसने हमेशा पैरों की जूती समझा था।
क्या आपको भी लगता है कि हमारे समाज में गृहिणियों के काम को वो सम्मान नहीं मिलता जिसकी वो हकदार हैं? क्या घर का काम करना कोई काम नहीं माना जाना चाहिए? अपने विचार कमेंट में जरूर बताएं।
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