झूठी शान

अपनी आलीशान कांच की इमारत के सबसे ऊपरी माले पर बनी अपनी शानदार केबिन में, बाहर हो रही बारिश को देखते हुए अवनि ने अपनी ब्लैक कॉफ़ी का कप अभी होंठों से लगाया ही था कि उसके दिमाग के किसी कोने में पच्चीस साल पुरानी वो खौफनाक रात फिर से जिंदा हो उठी। वो रात जब बादलों की गरज से ज्यादा खौफनाक उसके पिता ठाकुर बलवंत सिंह की दहाड़ थी।

“तू समझती क्यों नहीं है सुमित्रा! एक गूंगी-बहरी और अपाहिज लड़की इस ठाकुर खानदान के माथे पर कलंक है। कल को जब समाज में लोग पूछेंगे कि बलवंत सिंह की बेटी बोल नहीं सकती, चल नहीं सकती, तो मेरी इज्जत का क्या होगा? इस अपशकुन को जन्म देकर तूने मेरे नाम पर जो कालिख पोती है, उसे मैं और बर्दाश्त नहीं कर सकता। इसे इस घर से, मेरी नजरों से दूर ले जाना ही होगा!”

सुमित्रा, जो अवनि की माँ थी, पिता के पैरों में गिरकर गिड़गिड़ा रही थी, रो रही थी, अपनी बच्ची की भीख मांग रही थी। लेकिन बलवंत सिंह के सिर पर झूठी शान और समाज के रुतबे का ऐसा भूत सवार था कि उसे एक माँ के आंसू और अपनी ही छह साल की मासूम बेटी का डरा हुआ चेहरा नजर नहीं आया। उस खौफनाक तूफानी रात में, बलवंत सिंह ने सुमित्रा को कमरे में बंद कर दिया और छह साल की डरी-सहमी, पैरों से लाचार और बोल पाने में असमर्थ अवनि को घसीटते हुए ले गया। शहर से दूर जाने वाली एक मालगाड़ी के अंधेरे डिब्बे में उसने उस मासूम को निर्दयता से फेंक दिया और खुद अंधेरे में गायब हो गया।

अवनि की आंखें उस खौफनाक मंजर को याद करके आज भी नम हो जाती थीं। कैसे वो उस अंधेरे डिब्बे में कई दिनों तक भूखी-प्यासी, अपनी बेजान टांगों को घसीटती हुई एक अनजान शहर के रेलवे स्टेशन पर लावारिसों की तरह पाई गई थी। अगर उस दिन स्टेशन पर समाज सेविका जानकी ताई की नजर उस पर ना पड़ी होती, तो शायद वो बचपन ही कहीं कुचल दिया गया होता। जानकी ताई ने उसे सिर्फ आश्रय ही नहीं दिया, बल्कि उसकी खामोशी को उसकी सबसे बड़ी ताकत बना दिया।

तभी अवनि की केबिन का दरवाजा खुला और उसकी सेक्रेटरी ने आकर बताया कि देश के कुछ सबसे बड़े और मशहूर मैगजीन के पत्रकार उसका इंटरव्यू लेने के लिए कॉन्फ्रेंस रूम में इंतज़ार कर रहे हैं। अवनि ने अपनी व्हीलचेयर को एक हल्की सी मुस्कान के साथ घुमाया और इंटरकॉम पर इशारा करते हुए उन्हें अंदर भेजने की अनुमति दे दी।

कॉन्फ्रेंस रूम में दाखिल होते ही कैमरों की चमक और पत्रकारों की गहमागहमी शुरू हो गई। अवनि की तरफ से उसकी एक दुभाषिया (साइन लैंग्वेज इंटरप्रेटर) भी वहां मौजूद थी जो अवनि के इशारों को शब्दों में पिरोकर दुनिया तक पहुंचाती थी।

सवालों की बौछार शुरू हुई। एक रिपोर्टर ने थोड़ा तीखे स्वर में पूछा, “अवनि जी, आपका सॉफ्टवेयर और आईटी एम्पायर आज देश के टॉप स्टार्टअप्स में से एक है। लेकिन आपने अपनी कंपनी में सिर्फ और सिर्फ दिव्यांगों (Disabled), मूक-बधिरों और समाज द्वारा ठुकराए गए लोगों को ही नौकरी देने की यह अजीब सी जिद क्यों पाल रखी है? क्या आपको नहीं लगता कि सामान्य लोगों के साथ काम करके आप और ज्यादा मुनाफा कमा सकती थीं?”

अवनि के चेहरे पर एक शांत लेकिन दृढ़ मुस्कान तैर गई। उसने अपने हाथों से इशारे करने शुरू किए और उसकी इंटरप्रेटर ने भारी और स्पष्ट आवाज़ में अनुवाद किया।

“क्या सपने देखने का, और उन सपनों को सच करने का हक सिर्फ उन लोगों को है जिनके शरीर में कोई कमी नहीं है? क्या ये समाज सिर्फ उन्हीं का है जो दौड़ सकते हैं और चीख सकते हैं? हमारी आंखों में भी तो आसमान छूने के सपने सज सकते हैं ना।”

एक दूसरे पत्रकार ने तुरंत बीच में टोकते हुए कहा, “जी बिल्कुल सज सकते हैं, पर एक शारीरिक रूप से अक्षम और मूक-बधिर इंसान का तो दायरा बहुत सीमित होता है ना। आईटी और ग्लोबल बिजनेस की दुनिया में बिना बोले और बिना दौड़े कैसे सरवाइव किया जा सकता है?”

अवनि की आंखों में एक गजब की चमक आ गई। उसके हाथों के इशारे अब और भी तेज और आत्मविश्वास से भरे हुए थे।

“आप मुझे बताइए कि किस किताब में लिखा है कि एक मूक-बधिर और लाचार इंसान सिर्फ दया का पात्र बनकर ही अपना पेट पाल सकता है? या सड़क किनारे बैठकर सिर्फ भीख ही मांग सकता है? आज मेरी कंपनी ‘साइलेंट विंग्स’ में काम करने वाला हर वो इंसान जिसे कभी उसके परिवार ने या समाज ने नकारा था, सम्मान के साथ अपनी जिंदगी जी रहा है। हम सिर्फ कोड्स और सॉफ्टवेयर ही नहीं बना रहे हैं, बल्कि हम ऐसे गैजेट्स और तकनीक का निर्माण कर रहे हैं जो उन लोगों की आवाज बन रही है, जिन्हें दुनिया ने कभी सुना ही नहीं। मेरे ऑफिस में काम करने वाला हर कर्मचारी अपने परिवार का पेट पाल रहा है, टैक्स भर रहा है और देश की इकॉनमी में अपना योगदान दे रहा है। जो लोग इलाज से ठीक हो सकते हैं, हमारी कंपनी उनका पूरा खर्च उठाती है, और जो मेरी तरह हैं, उन्हें हम उड़ने के लिए तकनीक के पंख देते हैं।”

पत्रकारों का समूह कुछ पल के लिए अवनि की उस ऊर्जा और आत्मविश्वास को देखकर स्तब्ध रह गया। पूरे कमरे में एक अजीब सी शांति छा गई थी। फिर एक अनुभवी महिला पत्रकार ने बहुत ही नरमी और भावुक स्वर में पूछा,

“पर अवनि जी, आपको यहां तक आने में, इस मुकाम तक पहुंचने में मुश्किलें तो बहुत आई होंगी ना? वो भी तब, जब आपको अपनों ने ही सबसे ज्यादा दर्द दिया हो।”

अवनि ने गहरी सांस ली। उसने खिड़की के बाहर हो रही बारिश को एक पल के लिए देखा। उसे वो मालगाड़ी का डिब्बा, वो भूख, वो ठंड, स्कूल में बच्चों द्वारा उड़ाया गया मज़ाक और हर कदम पर मिलने वाला तिरस्कार याद आ गया। फिर उसने मुस्कुराते हुए इशारों में जवाब दिया,

“हाँ, यह तो सच है कि मुश्किलें बहुत थीं। आप जानते हैं, उन तूफानी लहरों और समाज की इस रूढ़िवादी सोच की जिद थी कि मेरे सपनों का महल ताश के पत्तों की तरह बिखर जाए। उन्हें लगा था कि बिना नींव के, बिना सहारे के मैं टूट कर खत्म हो जाऊंगी। मेरे अपनों ने ही मुझे उस दलदल में धकेल दिया था जहां से वापसी नामुमकिन थी। पर मैं भी उस तूफान से ज्यादा जिद्दी निकली। मैंने उन तूफानी लहरों को अपना रास्ता नहीं बदलने दिया, बल्कि मैंने उन्हीं लहरों के ऊपर कदम रखकर, अपने हौसले से अपनी हथेली पर ही अपने सपनों का एक ऐसा मजबूत महल खड़ा कर लिया, जिसे दुनिया की कोई भी नकारात्मक सोच हिला नहीं सकती। मैंने अपनी खामोशी को अपनी ढाल बनाया और अपनी व्हीलचेयर को अपना सिंहासन।”

इंटरव्यू खत्म हुआ। हॉल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। वो पत्रकार जो अवनि से तीखे सवाल करने आए थे, आज उसके सामने नतमस्तक थे।

अगले दिन अवनि का यह इंटरव्यू हर बड़े न्यूज चैनल और अखबार के मुख्य पृष्ठ पर था। सैकड़ों मील दूर, अपने जर्जर हो चुके पुश्तैनी हवेलियों के खंडहर में बैठा बूढ़ा बलवंत सिंह अखबार में छपी उस तस्वीर को फटी-फटी आंखों से देख रहा था। उसके हाथों में कांपता हुआ वो अखबार उसकी हार का सबसे बड़ा सबूत था। जिस झूठी शान और रुतबे के लिए उसने अपनी बेटी को फेंक दिया था, आज वो रुतबा चुनाव हारने और मुकदमों में फंसने के बाद मिट्टी में मिल चुका था। और जिस बेटी को उसने कलंक माना था, आज देश के बड़े-बड़े मंत्री और उद्योगपति उसके सामने सिर झुकाते थे। सुमित्रा, जो इतने सालों से एक जिंदा लाश बन कर रह रही थी, आज अखबार में अपनी बेटी की सफलता देखकर फूट-फूट कर रो रही थी। लेकिन आज ये आंसू दुख के नहीं, बल्कि एक माँ के गर्व के आंसू थे। अवनि ने साबित कर दिया था कि इंसान अपने शरीर से नहीं, अपनी सोच और अपने अदम्य साहस से महान बनता है।

क्या आपको भी लगता है कि समाज में आज भी शारीरिक कमियों को लेकर बेटियों को बोझ समझा जाता है? अपने विचार कमेंट में जरूर साझा करें।

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