मयंक शाम को अपनी दुकान बढ़ाकर घर जा रहा था।
आगे मुड़कर गली में से गुजर रहा था। उसके थोड़ा आगे ही बच्चियां चल रही थीं।उनकी बातों से पता चला कि उन्हें आज कोचिंग से आने में देर हो गई और अब अंधेरा हो जाने से पहले घर पहुंच जाना चाहती थीं। तभी एक ने पीछे मुड़कर देखा। उसने पता नहीं दूसरी से कुछ कहा और दोनों ने चाल तेज कर दी।
मयंक समझ गया वे उससे डर रही हैं जबकि वह तो अपनी सहज चाल से ही जा रहा था।
बच्चों को क्या पता कि वह एक शरीफ़ इंसान है और उसकी एक प्यारी सी बेटी भी है।आजकल लड़कियों के साथ हो रहे अपराधों की बढ़ती घटनाओं के कारण वे किसी पर भी विश्वास नहीं कर सकतीं। मयंक उन्हें विश्वास दिलाना चाहता था कि वे आराम से घर जाएं। उन्हें डरने की जरूरत नहीं।पर जैसे ही वह कुछ कहने के लिए आगे बढ़ा वे और तेज़ चलने लगीं। आखिर उसने ही अपनी चाल धीमी कर बच्चों को निकलने दिया।
यह कैसा समय आ गया है जब कोई भी किसी पर विश्वास नहीं कर सकता। क्योंकि अपराध उम्र,रिंग और समय नहीं देखता। ऐसे में हमें अपने बच्चों को ही सतर्क करना होगा। उन्हें पढ़ाई के साथ आत्मरक्षा की शिक्षा देनी होगी।
अरुणा गर्ग