तिरस्कार का पुरस्कार – कमलेश राणा

नारी तुम केवल श्रृद्धा हो, विश्वास रजत नग पद तल में।  पीयूष स्त्रोत सी बहा करो, जीवन के सुंदर समतल में।  जयशंकर प्रसाद की कामायनी में कही गई ये पंक्तियाँ जीवन में नारी के महत्व और परिवार को सुचारु रूप से चलाने में उसकी भूमिका को दर्शाती हैं पर इसके लिए उसे परिवार का सहयोग, … Read more

संस्कार का बीजारोपण….. – कामिनी केतन उपाध्याय

दूसरे दिन जतिन ने गरमागरम चाय लिए किसनलाल जी को उठाया, किसनलाल जी ने चाय पीते हुए कहा,” बेटा, एक बात कहना चाहता हूॅं घर की लक्ष्मी से इस तरह की बातें करना अच्छा नहीं है। तुम दोनों तो इस घर के पहिए तो दोनों एक दूसरे का साथ नहीं दोगे तो कैसे चलेगा ? … Read more

नन्हा फूल – डॉ नीतू भूषण तातेड

सड़क पार करते हुए  7 वर्षीय केतू विचलित हो रहा था,” कहीं कोई गाड़ी टक्कर न मार न दे। माँ क्यों नहीं मुझे भी रिक्शा में भेजती?” हमेशा कहती है,”इतनी पास तो है तुम्हारी स्कूल,क्या जरूरत है ऑटो में जाने की?” तभी किसी ने प्यार से उसका हाथ थामा और सड़क पार करने में मदद … Read more

संघर्षों भरा – कंचन श्रीवास्तव

अम्मा ने जिस लाड़ प्यार से किशन को पाल पोश कर बड़ा किया था आज उसके जिम्मेदारियों को देखकर सोचने पर मजबूर हैं।कि ईश्वर ने पुरुष को  भेजा ही इसी काम के लिए है तो कोई क्या करे, करना ही पड़ेगा। उसे अच्छे से याद है कि इसके पिता की लापरवाही की वजह से इसे … Read more

स्वाभिमान ‘ – विभा गुप्ता

  ” आपने मेरा गिफ़्ट लौटा कर मेरी इंसल्ट की है।आपसे मुझे ऐसी उम्मीद नहीं थी।” आकाश ने गुस्से से अपनी बड़ी बहन अंजू से कहा तो अंजू भी उसी लहज़े में बोली,” हाँ, मेरा किया तो तुम्हें इंसल्ट लगेगा ही।याद करो, पाँच साल पहले मैंने तुमसे एक छोटी-सी मदद माँगी थी,पैसे नहीं माँगे थे तुमसे,थोड़ा … Read more

माँ साथ थी – देवेंद्र कुमार

सरना सेठ ध्यानचंद का विश्वासी नौकर था। हर समय उनके आस-पास रहता क्योंकि उसे मालूम था कि न जाने कब आवाज पड़ जाए। उसे एक पल का भी आराम नहीं था, पर सरना को कोई शिकायत नहीं थी। एक दिन की बात, आकाश में बादल घिरे थे। सरना हवेली की छत पर बैठा था। ध्यानचंद … Read more

बुआ जी,मेरे पिता ने मुझे दौलत नहीं संस्कार देकर विदा किया है – गीतू महाजन

भैया बहुत ही अच्छा रिश्ता है.. अच्छे खाते पीते लोग हैं और लड़के की एक ही छोटी बहन है..छोटा सा परिवार है। माता-पिता भी बहुत अच्छे स्वभाव के हैं और क्या चाहिए” सुहासिनी बुआ की आवाज़ सुन कॉलेज से वापिस आई दिशा के पांव ठिठक गए।मां से पूछने पर पता चला कि सुहासिनी बुआ उसके … Read more

“नई सोच” – कविता भड़ाना

अरे रोहन बेटा, आज भी तुम ही  सब्जी ले रहे हो? “जी आंटी, मम्मी को तीन दिन से बुखार और कमजोरी भी है बहुत, तो में ही सब्जी लेने आया हूं। पर बेटा तुम स्कूल भी नही जा रहे हो दो दिन से, पियूष (पड़ोसन का बेटा) ने बताया था मुझे…. जी दरअसल पापा कुछ … Read more

धरा जैसी बेटी – प्रियंका त्रिपाठी ‘पांडेय’

धरा और मेघा दोनो का ग्रेजुएशन का प्रथम वर्ष था , दोनो ही होनहार छात्रा थी परन्तु दोनो के आचार विचार मे जमीन आसमान का अन्तर था। धरा सभ्य सुशील सुलझी आधुनिक सोच की मर्यादा और संस्कारों मे बॅ॑धकर रहने वाली लड़की थी । धरा के पहनावे मे भी स्मार्टनेस के साथ साथ शालीनता थी,वह … Read more

नई संस्कृति- डेटिंग – कमलेश राणा

क्या बात है विनीत ,,ओये होये कहाँ जा रहा है ऐसे सज संवर के,, परफ्यूम भी बड़ा ही महक रहा है। अरे कहीं नहीं आंटी एक दोस्त से मिलने जा रहा हूँ , मुस्कुराते हुए विनीत बोला। हमें तो भई यह स्पेशल सजधज देखकर कुछ अलग सी फीलिंग आ रही है। आंटी आप तो अब … Read more

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