ढीठ – संध्या त्रिपाठी 

बड़ी ढीठ हो यार तुम… एक बार मना कर दिया फिर भी मानती नहीं हो…जिद पकड़ कर बैठी हो …आखिर चाहती क्या हो तुम…?

 तुम्हारे अंदर थोड़ा भी आत्मसम्मान है या नहीं ….बिल्कुल चिल्लाने वाले अंदाज में प्रत्यूष ने कहा…

आपने मेरी ढिठाई अभी देखी कहां है प्रत्युष…?

 बचपन से ये ढीठ शब्द सुनते आई हूं ना …तो अब ये मेरा  नाम सा लगता है..!

आइए प्रत्यूष …आज मैं आपको अपने ढिठाई के कुछ किस्से सुनाती हूं…!

 जानते हैं… जब मैंने जन्म लिया था ना तभी मेरी मां की मृत्यु हो गई थी …मैं बड़ी ढीठ थी …मुझे कुछ नहीं हुआ बिन मां की भी मैं जीवित रही ….!

सब कहते , लड़की है ना इसे कुछ नहीं होगा…बुजुर्ग दादी जैसे तैसे मेरी देखभाल करती थी ।

एक दिन दादी ने पापा के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा… मेरा वास्ता देकर …जबरदस्ती पापा को शादी के लिए राजी कर लिया गया.. दादी बड़ी खुश थी कि अब उन्हें मेरी जिम्मेदारी से मुक्ति मिलेगी…

 पर पापा की दूसरी शादी के कुछ ही दिन बचे थे …तभी नई मम्मी ने यह शर्त रख दिया  कि वो शादी तभी करेंगी …जब पापा अपनी बेटी को  (मुझें) अपने साथ नहीं रखेंगे …पापा शादी के लिए मना करना चाहते थे …

पर दादी ने उनकी सामान्य दिनचर्या और निरंतरता के लिए मुझे अपने पास रखने की फिर से जिम्मेदारी ले ली ।

मैं वहीं गांव के एक स्कूल में पढ़ती थी… छोटी थी फिर भी जितना काम हो सकता था मुझसे कराया जाता था …यहां तक कि उस उम्र में बर्तन भी  मांजती और धोती …और दादी की सेवा भी करती । अब बातें बताते हुए संयुक्ता के आंखों में आंसू आ गए थे ।

दादी उम्र दराज तो थीं ही… अब अस्वस्थ भी रहने लगी.. एक दिन उन्होंने पापा से मुझे अपने साथ ले जाने को कहा …

मैंने पापा की आंखों में विवशता देखी थी ….मुझे ले जाकर वो झंझट नहीं मोल लेना चाहते थे….पर मैं तो ढीठ थी ना प्रत्यूष…. और ढीठ के साथ साथ नादान भी….!

 मुझे लगा वहां  नई मम्मी  मिलेंगी … मैं नई मम्मी इसलिए बोल रही हूं कि मैंने गांव में सबसे सुना था तेरी नई मम्मी आ रही है… वरना मेरे लिए क्या मम्मी और क्या नई मम्मी ।  वहां बर्तन भी नहीं मांजना पड़ेगा… 

शहरों के स्कूल में ड्रेस के साथ टाई लगाकर जैसे स्कूल जाते हैं ना…वैसे मैं भी टाई लगाकर स्कूल जाऊंगी..।

मैंने पापा का हाथ पकड़ कर कहा था ..प्लीज पापा… मुझे अपने साथ ले चलिए..मुझे यहां दादी के साथ नहीं रहना..!

तब कहां पता था दादी के साथ रहना , दादी का काम करना मेरी जिंदगी का स्वर्णिम समय था…उतना प्यार तो मुझे किसी ने आज तक नहीं किया ।

पापा मुझे अपने साथ ले गए.. यहां आते ही घर का माहौल बोझिल हो गया…..मेरी नई मां …मेरे लिए बिल्कुल नई थी …पहली बार मिली थी मैं उनसे… मैं तो बहुत खुश थी..! नई मां से (एक बेटी और एक बेटा) मेरे भाई बहन भी थे !

मैं अपने भाई बहनों के साथ खेलना चाहती थी …पर वो लोग मुझे अपने साथ नहीं खेलने देते … वो कुछ भी खेलते तो मैं दूर खड़ी होकर देखते रहती…!

 वो  मुझे गेंद लाने को कहते हैं और मुझसे कुछ कुछ काम ही कराते….

तब आत्मसम्मान की समझ कहां थी प्रत्यूष … 

मुझे लगता काम कर दूंगी तो बदले में ये लोग मुझे भी अपने साथ खेलने का अवसर देंगे।

शायद बचपन में ही मुझे घर में पापा की औकात समझ में आ चुकी थी ….वो सिर्फ पैसे कमाने की मशीन बनकर रह गए थे..!

और आत्म सम्मान भी तब दिखता है प्रत्यूष …जब पेट भरा हो…एक बार खाना खाते वक्त नई मम्मी मेरे भाई बहनों के दाल में घी डाल रही थी …मैंने भी मांग लिया था …!

सबके सामने उन्होंने बिल्कुल थोड़ा सा घी मेरे दाल में डाला… मैंने खुद से  डिब्बे में से एक चम्मच  भरके घी निकाला और अपनी कटोरी में डाल ली…  कहीं ना कहीं अनजाने में उपेक्षित होते-होते में जिद्दी भी हो गई थी…बस फिर क्या था….

झन्नाटेदार थप्पड़ …संयुक्त ने अपना गाल ऐसे सहलाया जैसे अभी अभी उसे थप्पड़ पड़ा हो..।

मेरे भाई बहन मेरा गाल नोच कर भागते थे …मुझे परेशान करते थे प्रत्यूष ….मैं रोती थी …फिर भी थोड़ी देर बाद उन्हीं के पास चली जाती थी….

    ” ढीठ जो थी “

शाम को ऑफिस से घर आते ही मैंने पापा से कहा… पापा मुझे भी दाल में घी खाना है… नई मां नहीं देती हैं मारती हैं …बस फिर क्या था …

पापा पहली बार हिम्मत कर जोर से चिल्लाए थे….मेरे लिए… मेरे समर्थन में…. घी का पूरा डिब्बा लाकर मेरे सामने रख दिया था..

तब किसी ने से चुं से चा तक नहीं किया था ।

फिर तो मैं हर छोटी बड़ी बात पापा से शिकायत करती… ऐसा करने से मुझे बड़ा संतोष मिलता.. जबकि मैं जानती थी कि बाद में इसका खामियाजा मुझे  ही भुगतना पड़ेगा…

पाप भी जानते थे मेरे साथ भेदभाव होता है ..पर सोचते धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा ।

अगले दिन… पापा कहीं बाहर गए थे…पूरे दिन मुझे भूखा रखा गया …पूरे दिन प्रत्यूष….मैं छोटी बच्ची रोती रही , खाना मांगती रही… मेरे भाई बहन मेरे ऊपर हंसते रहे ….मैगी खाकर प्लेट रखा था मैं उसे चाट रही थी …..मां ने देख लिया था…

 न जाने उस समय उन्हें क्या लगा उन्होंने मुझे सूखी रोटी और आचार दे दिया था.. शायद उन्हें दया आ गई होगी…!

जानते हैं प्रत्यूष …? इन्हीं  ढीठाइयों के बीच मै बड़ी हो गई…

फिर धीरे-धीरे नई मां के व्यवहार में थोड़ा मेरे लिए नरमी आने लगी थी… बस मेरे भाई बहनों का कभी भी मेरे ऊपर दया नहीं आई और ना ही प्यार आया..। 

  नई मां अब उन लोगों को मुझे तंग न करने को कहती पर वह कहां सुनने वाले थे ।

अब कभी-कभी लगता है नई मम्मी मैं तो शुरू में ही मना कर दिया था मुझे साथ रखना… एक दिन मैंने नई मम्मी और पापा को बात करते सुना भी था… नई मम्मी कुछ आप बीती बता रही थी… वो ये शादी करना ही नहीं चाहती थीं… कुंवारी थी कोई विधुर से क्यों शादी करना चाहेगा…..पर उनके घर वाले निर्धन परिवार से थे …और पापा की नौकरी थी… इसलिए दबाव बनाकर शादी के लिए राजी किया गया ….फिर भी नई मम्मी ने शर्त रखा था … बच्ची (मै) साथ में नहीं रहेगी तभी वो शादी करेंगी…। 

उन्हें मैंने ये कहते भी सुना था..चाहते हुए भी मैं उसे अपने बच्चों की तरह प्यार नहीं दे पाती हूं ।

पापा के ऑफिस में एक अंकल थे… हमारे घर का काफी कुछ जानते थे उन्होंने ही आपके घर रिश्ता करने की सलाह दी थी ।

 क्योंकि आपकी मम्मी को एक ऐसी लड़की बहू के रूप में चाहिए थी …जो शांत , सुशील हो आपकी बदतमीज़ आदतों को बर्दाश्त कर सकती हो …फिर मुझसे ज्यादा उपयुक्त और कौन हो सकता था..

”  सौतेली मां की प्रताड़ित बेटी “

जब मेरी शादी लगी थी ना प्रत्यूष … तो मैं बड़ी खुश थी अब अपनी मर्जी की जिंदगी जी सकूंगी पर पर कहते हैं ना कुछ लोग बड़े ही बदकिस्मती होते हैं … और यही बदकिस्मती उन्हें ढीठ बना देती है…

” वो ढीठ ही पैदा होते हैं और ढीठ ही मर जाते हैं…पूरी जिंदगी ढीठाई करते हैं ।

   प्रत्यूष जो बड़े ध्यान से संयुक्त की बात सुन रहा था धीरे से पूछा पर तुम मुझे अपने साथ मायके ले जाने की जिद पर क्यों अड़ी हो…?

क्योंकि मैं वहां सबको बताना चाहती थी… दिखाना चाहती थी … विश्वास दिलाना चाहती थी…कि मैं अब बहुत खुश हूं…

समय जरूर बदलता है …और मेरी जिंदगी से  लोगों को विश्वास होगा कि आज नहीं तो कल सब का समय बदलेगा ….इसलिए किसी के साथ भी ज्याजती नहीं करनी चाहिए ।

जिसे आप  ढीठ कह रहे हैं ना प्रत्युष.. वही ढीठ पना ने मुझे जीवित रखा….हिम्मत दी…!

पर किसी  किसी का समय ना ..कभी नहीं बदलता प्रत्यूष…., कभी नहीं बदलता….

  ”  बस किरदार बदल जाते हैं ….

आज भी आत्मसम्मान को मैंने नीचे रखा और अपने ढीठ पना को ऊपर…

और तुम्हारे उपेक्षा पूर्ण व्यवहार के बाद भी तुमसे अपने साथ जाने की विनती कर रही हूं ।

अब प्रत्यूष संयुक्ता का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला…नहीं संयुक्ता समय जरूर बदलता है ,…. वो अस्थिर है …रुकता नहीं …दुख हो या सुख ,बीत ही जाता है…।

आज से तुम्हारा भी समय बदल गया संयुक्ता …तुमने तो खुद ही अपना समय बदल दिया…

 ढीठ को ..हिम्मत , हौसला , सहनशक्ति  और धैर्य के आवरण से अलंकृत कर दिया है…. 

ढीठ तो मैं था जो एक बार नहीं …ना जाने कितनी बार तुम्हें अपमान कर अपनी  ढिठाई दिखाता रहा…।

तुम्हारी इस ढिठाई ने मुझे भी बदलने और अपनी आदतें सुधारने को मजबूर किया । तुमने तो ढीठ के मायने ही बदल दिए ।

(स्वरचित मौलिक और सर्वाधिकार  सुरक्षित रचना )

✍️ संध्या त्रिपाठी 

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