चेहरे का सच

“अलका, क्या तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है? तुम इस मामूली सी कामवाली की झूठी बातों में आकर अपने ही पति पर ऐसा घिनौना आरोप लगा रही हो? हमारे बारह साल के दांपत्य जीवन की क्या यही कीमत रह गई है? तुम खुद सोचो, मैं एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर हूं, मेरी समाज में एक इज्जत है, क्या मेरे पास ऐसी गिरी हुई हरकत करने का कोई कारण हो सकता है? तुम किसी बात में इससे कम हो क्या जो मैं ऐसी ओछी नजर रखूंगा?”

विकास अपनी आवाज में जबरन एक रोब और बनावटी गुस्सा भरकर बोल रहा था। उसके चेहरे पर पसीने की बारीक बूंदें उभर आई थीं जिन्हें वह बार-बार अपनी कलाई से पोंछने की कोशिश कर रहा था। उसकी आँखें लगातार कमरे की दीवारों, फर्श और दरवाजों पर भटक रही थीं, लेकिन एक बार भी वह सीधे अलका की आँखों में आँखें डालकर बात नहीं कर पा रहा था।

सामने खड़ी अलका एकटक उसे देख रही थी। उसके चेहरे पर न चीख-पुकार थी, न ही कोई उतावलापन। अलका पेशे से एक फ्रीलांस कंटेंट राइटर और अनुवादक थी, जो घर संभालते हुए अपने पैरों पर खड़ी थी। बचपन में रीढ़ की हड्डी में लगी एक पुरानी चोट के कारण उसे लंबे समय तक खड़े रहने या भारी काम करने में पीठ में असहनीय दर्द होता था। इसी वजह से पिछले चार सालों से शांति उसके घर में काम कर रही थी।

रसोई के दरवाजे की ओट में शांति सहमी हुई खड़ी थी। उसकी आँखें भीगी हुई थीं, दुपट्टा कसकर सीने से लिपटा हुआ था और उसके दोनों हाथ डर के मारे कांप रहे थे। बत्तीस साल की शांति के चेहरे पर उम्र से पहले ही जिंदगी के थपेड़ों ने झुर्रियां उकेर दी थीं। उसके पति को लकवा मार गया था और घर के चूल्हे की आग से लेकर दो छोटे बच्चों की स्कूल की फीस तक का पूरा दारोमदार केवल और केवल शांति के इन्हीं कमजोर कंधों पर था। वह अलका के घर के अलावा दो अन्य छोटे फ्लैटों में झाड़ू-पोछा और बर्तन का काम करके बमुश्किल अपना घर चलाती थी।

अलका ने शांति को केवल एक कामवाली की तरह कभी नहीं देखा था। शांति की मेहनत, उसकी समय की पाबंदी और ईमानदारी ने धीरे-धीरे अलका के दिल में उसके प्रति एक गहरा आदर पैदा कर दिया था। दोनों लगभग हमउम्र थीं। जब कभी शांति काम खत्म करके बैठती, तो अलका उसे चाय का कप थमा देती और दोनों अपने-अपने सुख-दुख साझा करतीं। अलका शांति को हमेशा एक छोटी बहन जैसा स्नेह देती थी और शांति के लिए भी अलका किसी देवी से कम नहीं थी।

विकास का काम ऐसा था कि कभी-कभी उसे हफ्तों तक वर्क फ्रॉम होम करना पड़ता, तो कभी महीनों वह प्रोजेक्ट्स के सिलसिले में शहर से बाहर रहता। घर में दोनों के दो बच्चे थे, जो उस वक्त स्कूल गए हुए थे। आज विकास घर पर ही था। अलका अपने स्टडी रूम में एक क्लाइंट की असाइनमेंट पूरी करने में मग्न थी। अचानक रसोई से एक स्टील का जग फर्श पर गिरने की तीव्र आवाज आई और उसके तुरंत बाद शांति की रोती हुई, थरथराती चीख अलका के कानों में पड़ी—”साहब! यह आप क्या कर रहे हैं? पीछे हटिए… दीदी! जरा इधर आइए!”

अलका जब दौड़ती हुई रसोई में पहुंची, तो उसने देखा कि पानी का जग फर्श पर लुढ़क रहा था, पानी चारों तरफ फैला हुआ था और शांति एक कोने में दीवार से चिपकी हुई थर-थर कांप रही थी। विकास के हाथ हवा में थे और उसके चेहरे का रंग पूरी तरह उड़ चुका था।

विकास ने तुरंत बात संभालते हुए कहा था, “अरे अलका, देखो ना, मैं पानी पीने आया था, यह पीछे मुड़ी और इसका हाथ लगकर जग गिर गया। अब यह बेवजह चिल्ला रही है ताकि इसे डांट न पड़े।”

लेकिन शांति वहीं फर्श पर बैठ गई थी और हाथ जोड़कर फूट-फूट कर रोने लगी थी। उसने कहा था, “दीदी, भगवान साक्षी है, आज साहब ने मेरी मजबूरी और इस बंद घर का गलत फायदा उठाने की कोशिश की। इन्होंने पीछे से आकर मुझे गलत इरादे से पकड़ा। दीदी, मैं गरीब जरूर हूं, लेकिन अपने आत्मसम्मान को बेचकर कभी किसी के घर की रोटी नहीं खाई।”

विकास की लंबी सफाई के बीच अलका शांति के पास पहुंची। उसने शांति के कांपते कंधों पर अपना हाथ रखा।

“शांति, मेरी तरफ देखो,” अलका ने बहुत शांत लेकिन गंभीर स्वर में कहा। “तुम जो कह रही हो, क्या वह पूरी तरह सच है? चार सालों में तुमने कभी ऐसी कोई बात नहीं कही, आज अचानक ऐसा क्यों?”

शांति ने अपनी आंसुओं से भरी आँखें उठाईं। उसकी नजरों में कोई चोरी नहीं थी, न कोई संकोच, बस एक गहरी पीड़ा और लाचारी का समंदर था। उसने सीधे अलका की आँखों में देखते हुए कहा, “दीदी, साहब जब भी घर पर होते थे, पिछले दो-तीन महीनों से उनकी नजरें मुझे असहज कर देती थीं। मैं हमेशा कतरा कर निकल जाती थी। मैंने सोचा कि शायद मेरा ही वहम होगा, आप इतनी भली हैं, आपके पति ऐसे कैसे हो सकते हैं? फिर मेरी अपनी मजबूरी भी थी, यह काम छूट जाता तो बच्चों की दवा और रोटी का क्या होता? लेकिन आज जब आप अंदर कमरे में थीं, साहब ने मर्यादा की सारी सीमाएं पार कर दीं। दीदी, अगर मेरी नीयत में खोट हो तो भगवान करे मेरे दोनों बच्चे कभी फले-फूले नहीं। आप चाहे तो मुझे अभी पुलिस के हवाले कर दीजिए, लेकिन मैं झूठ नहीं बोल रही।”

शांति की कसम और उसकी आँखों की तड़प ने अलका के भीतर एक गहरा सन्नाटा पैदा कर दिया। उसने नजर घुमाकर विकास की ओर देखा। विकास अब भी उत्तेजित होकर बोल रहा था, “अलका, तुम पागल हो गई हो क्या? एक नौकरानी के चरित्र प्रमाण पत्र पर तुम अपने पति के चरित्र को तौल रही हो? कल को यह किसी पर भी लांछन लगा देगी। यह पैसे ऐंठने की चाल है। तुम इस पर यकीन करोगी या मुझ पर?”

अलका ने गहरी सांस ली। उसने विकास के चेहरे को बड़े गौर से देखा। उस चेहरे पर वही हाव-भाव थे जो किसी पकड़े गए दोषी के चेहरे पर होते हैं—घबराहट को गुस्से के पीछे छिपाने की नाकाम कोशिश, नजरें चुराना और खुद को पीड़ित साबित करने के लिए झूठे तर्कों का सहारा लेना। मनुष्य शब्द भले ही झूठे बोल ले, पर उसकी आँखें और चेहरे की मांसपेशियां कभी झूठ नहीं बोल पातीं। अलका इंसानी व्यवहार को पढ़ने की कला बखूबी जानती थी।

“विकास,” अलका ने बेहद संतुलित आवाज में कहा, “सवाल यह नहीं है कि कौन नौकरानी है और कौन बड़े ओहदे पर बैठा अफसर। सवाल इंसानियत, नीयत और सच का है। शांति पिछले चार सालों से मेरे बेडरूम से लेकर अलमारी तक की सफाई करती आई है। घर में लाखों के गहने और नकदी खुले पड़े रहते थे, पर इसने कभी एक रुपये की हेराफेरी नहीं की। जब मेरी तबीयत खराब होती थी, तो यह बिना कहे मेरे सिर पर तेल लगाती थी, बच्चों को संभालती थी। आज इसके चेहरे पर जो अपमान और दर्द है, वह कोई मंझा हुआ कलाकार भी नाटक करके नहीं ला सकता। और तुम्हारे चेहरे पर… तुम्हारे चेहरे पर सच की सादगी नहीं, बल्कि पकड़े जाने का खौफ साफ दिख रहा है।”

विकास का चेहरा पीला पड़ गया। उसने अपनी आवाज थोड़ी धीमी करते हुए कहा, “अलका, तुम यह क्या कह रही हो? तुम होश में तो हो? बिना किसी सबूत के तुम मुझ पर इल्जाम लगा रही हो? अगर यह बात बाहर निकली तो हमारे परिवार का, खानदान का क्या होगा? समाज में हमारी क्या थू-थू होगी? बच्चों के भविष्य का सोचो! इस मामले को यहीं रफा-दफा करो, इसे पैसे देकर रवाना करो।”

अलका की आँखों में एक दृढ़ चमक कौंध गई। उसने शांति का हाथ थामा और उसे अपने सहारे से खड़ा किया।

“विकास, जब कोई अपराध होता है, तो समाज की बदनामी की फिक्र सबसे पहले अपराधी को होनी चाहिए, न कि उस स्त्री को जो उसका शिकार बनी है,” अलका ने स्पष्ट शब्दों में कहा। “और रही बात परिवार और बच्चों के भविष्य की, तो मैं अपने बच्चों को एक ऐसा माहौल नहीं दे सकती जहाँ एक स्त्री की बेबसी का फायदा उठाना सिखाया जाए और फिर ‘इज्जत’ के नाम पर उस पर पर्दा डाल दिया जाए। अगर आज मैंने इस जुल्म पर चुप्पी साध ली, तो मैं एक पत्नी के रूप में भले ही बच जाऊं, लेकिन एक औरत और एक माँ के रूप में हमेशा के लिए मर जाऊंगी। मैं शांति को लेकर अभी सीधे महिला थाने जा रही हूँ।”

विकास सन्न रह गया। उसे उम्मीद थी कि अलका एक भारतीय पत्नी की तरह रोएगी, चिल्लाएगी और अंततः परिवार की खातिर समझौते का रास्ता चुन लेगी। लेकिन यहाँ तो तस्वीर ही उलट थी। अलका ने अपने पर्स से गाड़ी की चाबी निकाली और शांति को पानी पिलाकर अपने साथ चलने को कहा।

शांति अवाक होकर अलका का चेहरा देख रही थी। उसकी आँखों से अब जो आंसू बह रहे थे, वे भय के नहीं, बल्कि कृतज्ञता और विस्मय के थे। उसने कांपते हुए कहा, “दीदी… आप मेरे लिए इतना बड़ा कदम मत उठाइए। साहब आपके पति हैं, आपका घर टूट जाएगा। मैं ही काम छोड़ देती हूँ, कहीं और ढूंढ लूंगी।”

अलका ने शांति के दोनों हाथों को अपने हाथों में थाम लिया और बड़ी आत्मीयता से कहा, “शांति, अगर आज तुम्हारे साथ यह गलत होकर भी तुम चुप रह गई और मैं तुम्हारा साथ छोड़ दूं, तो यह सिर्फ तुम्हारा नुकसान नहीं होगा, बल्कि हर उस मेहनतकश औरत की हार होगी जो इज्जत की दो रोटी कमाने के लिए घरों की चौखट लांघती है। गलती विकास ने की है, तो सजा और पछतावे का हकदार भी वही है, तुम नहीं। मेरा घर दीवारों और फर्निचर से नहीं, सच और आत्मसम्मान की बुनियाद पर टिकता है।”

अलका शांति को लेकर घर के बाहर आ गई। जैसे ही वह कार का दरवाजा खोलने लगी, विकास पीछे-पीछे दौड़ता हुआ बाहर आया। उसका सारा झूठा अहंकार और रोब अब पूरी तरह ढह चुका था।

“अलका, रुको! मेरी बात सुनो… मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई,” विकास ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा। उसकी आवाज में अब कोई बनावट नहीं थी, सिर्फ एक गहरा पश्चाताप था। “मैं बहक गया था। मुझे अपनी गलती का अहसास हो गया है। मुझे माफ कर दो। अगर तुम पुलिस के पास जाओगी तो मेरी नौकरी चली जाएगी, हमारा सब कुछ बर्बाद हो जाएगा। मुझे एक मौका दो, मैं अपनी गलती सुधारना चाहता हूँ।”

अलका वहीं रुक गई। उसने पीछे मुड़कर विकास को देखा। पहली बार विकास ने अपनी नजरें झुका रखी थीं और उसके चेहरे पर अपनी गलती का वास्तविक पछतावा साफ नजर आ रहा था।

अलका ने एक पल सोचा और फिर कठोर लेकिन संयमित स्वर में कहा, “विकास, कानून अपना काम करे या न करे, लेकिन पश्चाताप की पहली सीढ़ी यह है कि तुम उस इंसान से माफी मांगो जिसके सम्मान को तुमने ठेस पहुंचाई है। अपने इस खोखले पद और दौलत के घमंड को उतारकर शांति के सामने हाथ जोड़ो।”

विकास कुछ क्षणों के लिए स्तब्ध रह गया। उसके भीतर का पुरुषार्थ और सामाजिक ओहदा तिलमिलाया, लेकिन अलका की आँखों में सच की ऐसी प्रचंड शक्ति थी कि उसका सारा अहंकार पिघल गया। विकास ने दोनों हाथ जोड़े और भारी मन से शांति की ओर देखते हुए कहा, “शांति… मुझे माफ कर दो। मैंने तुम्हारी लाचारी का गलत फायदा उठाने की कोशिश की। मुझसे बहुत बड़ा पाप हुआ है। मैं वादा करता हूँ कि आज के बाद मेरे मन में कभी किसी के लिए ऐसा मैल नहीं आएगा।”

शांति ने अपनी साड़ी के पल्लू से अपनी आँखें पोंछीं। उसने विकास की तरफ देखा और फिर अलका की ओर। शांति के मन से सारा डर गायब हो चुका था, क्योंकि उसके साथ एक ऐसी ढाल खड़ी थी जिसने रिश्तेदारी से ऊपर सत्य को रखा था।

शांति ने धीमी आवाज में कहा, “साहब, भगवान का शुक्र है कि आपको अपनी गलती समझ आई। अगर अलका दीदी जैसी देवी मेरे साथ न खड़ी होतीं, तो आज मैं मर जाती या जिंदगी भर इस अपमान का घूंट पीती रहती। मैं आपको माफ करती हूँ, सिर्फ इसलिए क्योंकि आप दीदी के पति हैं और आपके बच्चे हैं।”

अलका ने विकास से कहा, “विकास, पुलिस की कानूनी कार्रवाई से तो तुम शायद बच जाओ, लेकिन मेरे मन में तुम्हारा जो सम्मान था, वह पूरी तरह शून्य हो चुका है। उस सम्मान को दोबारा कमाने के लिए तुम्हें खुद को पूरी तरह बदलना होगा। तुम्हें यह साबित करना होगा कि तुम एक सच्चे इंसान, एक जिम्मेदार पति और पिता बनने के लायक हो।”

उस दिन के बाद से घर की हवा बदल गई। विकास ने खुद को पूरी तरह सुधारने की दिशा में कदम बढ़ाया। उसने अपने आचरण में शालीनता और विनम्रता लाई। शांति को अलका ने अपने ही पास रखा और उसकी तनख्वाह में भी सम्मानजनक बढ़ोतरी की, ताकि उसे दूसरे घरों में भटकना न पड़े। शांति के बच्चों की पढ़ाई का पूरा खर्च अलका और विकास ने मिलकर उठाने का संकल्प लिया।

सच्चाई और आत्मसम्मान की इस लड़ाई में किसी का घर नहीं टूटा, बल्कि एक इंसान के भीतर की बुराई टूटकर बिखर गई। अलका ने साबित कर दिया था कि एक जागरूक और संवेदनशील नारी अगर ठान ले, तो वह केवल रिश्तों को निभाती ही नहीं, बल्कि रिश्तों को सही मर्यादा और दिशा भी दे सकती है। जब सत्य की रोशनी जलती है, तो झूठ और कपट के अंधेरे को हर हाल में छंटना ही पड़ता है।

दोस्तों, एक स्त्री ही दूसरी स्त्री के दर्द और स्वाभिमान को सबसे बेहतर तरीके से समझ सकती है। इस कहानी में अलका ने अपने पति के पद या रिश्ते के अंधे मोह में फंसने के बजाय सच की आँखों में झांककर सही फैसला लिया। आपका इस बारे में क्या सोचना है? क्या हर परिस्थिति में सच का साथ देना ही सबसे बड़ा धर्म है? अपने विचार और राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका :चाँदनी झा

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