यशोमती जी ने बड़े ही संयम और गरिमा के साथ अपने बेटों की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर अब कोई क्रोध नहीं था, केवल एक शांत वैराग्य और आत्मबल था। उन्होंने कहा, “माफ़ी की बात मत करो बच्चों। जब तुमने मुझे अपनी ज़िंदगी से निकालने का फ़ैसला कर लिया था, तब तुमने उस रिश्ते की डोर खुद ही काट दी थी। मैंने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, इस लायक बनाया कि तुम समाज में सम्मान से जी सको। मेरा कर्तव्य पूरा हुआ। अब तुम तीनों अपनी-अपनी गृहस्थी संभालने में पूरी तरह सक्षम हो।
एक अधेड़ उम्र की महिला बदहवास भागी जा रही थी। पैरों में चप्पल तक नहीं थी, नुकीले पत्थर और कांटे तलवों को छलनी कर रहे थे, लेकिन उसके सीने में उठ रहा दर्द उस जिस्मानी चोट से कहीं ज़्यादा गहरा था। उसकी आँखों से बहते आँसू बारिश के खारे पानी में घुलमिल रहे थे। अचानक घुमावदार मोड़ पर सामने से आ रही एक तेज़ रफ़्तार कार की चकाचौंध रोशनी उसकी आँखों पर पड़ी। घबराहट और लड़खड़ाहट में उसका पैर फिसला, गाड़ी के ज़ोरदार ब्रेक की चीख उभरी और वह ज़मीन पर गिरकर बेसुध हो गई।
जब उसकी चेतना लौटी, तो उसने खुद को एक बेहद शांत, सुगंधित और साफ़-सुथरे कमरे में नर्म बिस्तर पर पाया। सामने दीवार पर राधा-कृष्ण की मनमोहक तस्वीर टंगी थी और खिड़की से सुबह की मद्धिम धूप छनकर आ रही थी। माथे पर ठंडी पट्टी रखी हुई थी और हाथ पर ग्लूकोज़ की ड्रिप चढ़ रही थी। वह अपनी भारी पलकों को उठाकर अभी कमरे का मुआयना ही कर रही थी कि दरवाज़ा खुला। लगभग छब्बीस-सत्ताईस साल की एक शालीन, सौम्य चेहरे वाली युवती हाथ में नाश्ते और सूप की ट्रे लिए अंदर दाखिल हुई। उसके चेहरे पर फैली अपनत्व भरी मुस्कान किसी भी अजनबी को अपना बना लेने के लिए काफ़ी थी।
“गुड मॉर्निंग माजी! अब आपकी तबीयत कैसी है? सिर का दर्द कुछ कम हुआ?” युवती ने ट्रे को पास की मेज़ पर रखते हुए बेहद आत्मीय स्वर में पूछा।
अपरिचित चेहरे से ‘माजी’ संबोधन सुनते ही उस महिला की पथराई आँखों में विस्मय और असमंजस तैर गया। युवती उसकी नज़रों का भाव तुरंत भांप गई और मुस्कुराते हुए बोली, “आप सोच रही होंगी कि आप यहाँ कैसे आईं? मैं डॉ. तन्वी मेहरा हूँ। कल रात मैं और मेरे पति डॉ. अर्णव हमारे क्लिनिक से एक गंभीर केस देखकर घर लौट रहे थे। मौसम बहुत ख़राब था, तूफ़ान के कारण विज़िबिलिटी लगभग शून्य थी। अचानक आप गाड़ी के सामने आ गईं। अर्णव ने तुरंत इमरजेंसी ब्रेक लगाया, फिर भी आप डर और झटके से गिरकर बेहोश हो गईं। सिर पर हल्की चोट आई थी। पहले लगा कि आपको सीधे सरकारी अस्पताल ले जाएँ, लेकिन फिर एक डॉक्टर होने के साथ-साथ एक इंसान होने के नाते मुझे लगा कि ऐसी हालत में आपका किसी अपने जैसे सुरक्षित माहौल में होना ज़रूरी है। अर्णव अभी सुबह की राउंड्स के लिए अस्पताल गए हैं और मैंने आज क्लिनिक से छुट्टी ले ली ताकि आपकी देखभाल कर सकूँ। अब आप तसल्ली से थोड़ा सूप पीजिए और बताइए कि उस ख़ौफ़नाक तूफ़ानी रात में आप बिना चप्पलों के कहाँ भागी जा रही थीं? क्या बात है माजी?”
सूप का एक घूँट गले से नीचे उतरते ही उस महिला का संयम टूट गया। उसकी आँखों से आँसुओं की अविरल धारा बह निकली। उसने कांपते हाथों से आँसू पोंछते हुए कहा, “मेरा नाम यशोमती है बेटी… जब तक मेरे पति हरिप्रसाद जी जीवित थे, तब तक मेरे पाँव कभी ज़मीन पर नहीं पड़े थे। उन्होंने मुझे फूलों की तरह सहेज कर रखा था। लेकिन दो महीने पहले अचानक दिल का दौरा पड़ने से वो हमें छोड़कर चले गए। उनकी कमी तो कोई पूरी नहीं कर सकता, पर मुझे गुमान था कि मेरे पास तीन-तीन बेटे हैं। तीनों की शादियाँ हो चुकी हैं, तीनों अच्छे ओहदों पर काम कर रहे हैं। बड़ा बेटा पंकज बैंक मैनेजर है, मंझला नीरज अपना आईटी स्टार्टअप चलाता है और छोटा सूरज शहर के नामी कॉलेज में प्रोफ़ेसर है। मेरे पति रेलवे में वरिष्ठ अधिकारी थे, तो उनकी अच्छी खासी ग्रेच्युटी, बचत और विशाल पैतृक मकान है, साथ ही मुझे हर महीने उनकी अच्छी-खासी पारिवारिक पेंशन भी मिलती है। किसी चीज़ की कमी नहीं थी।”
तन्वी ने उसके हाथ को थामते हुए कोमलता से पूछा, “जब परिवार इतना संपन्न और भरा-पूरा है, बेटे इतने योग्य हैं, तो फिर आधी रात को इस तरह सड़क पर बेसहारा क्यों निकलना पड़ा?”
यशोमती जी का गला रुंध गया, उन्होंने गहरी सांस लेते हुए कहा, “क्योंकि कल रात ही मेरे भ्रम की दीवारें ढह गईं बेटी। दुनिया की हर माँ की तरह मुझे भी हमेशा इस बात का गर्व रहता था कि मैं तीन बेटों की माँ हूँ। आस-पड़ोस के लोग कहते थे कि बुढ़ापे में यशोमती को कोई कष्ट नहीं होगा, तीन बेटे सेवा के लिए खड़े हैं। कभी मुझे बेटी न होने का मलाल नहीं हुआ, बल्कि मैं तो भगवान का शुक्र मनाती थी कि अच्छा हुआ बेटी नहीं दी, विदाई का दर्द नहीं सहना पड़ा। लेकिन कल रात मुझे अपनी ज़िंदगी की सबसे बड़ी भूल का अहसास हुआ। कल रात करीब दो बजे जब मेरी आँख खुली और मैं पानी पीने रसोई की तरफ़ जा रही थी, तो बैठक से धीमी-धीमी आवाज़ें सुनाई दीं। तीनों बेटे और उनकी पत्नियाँ दरवाज़ा सटाकर कुछ गंभीर मंत्रणा कर रहे थे।”
तन्वी स्तब्ध होकर सुनती रही। यशोमती ने आगे कहा, “मैं रुक गई। अंदर जो बातें हो रही थीं, वो किसी ज़हरीले खंजर की तरह मेरे कलेजे में उतर रही थीं। बड़ा बेटा पंकज कह रहा था कि पिताजी का यह बंगला शहर के सबसे प्राइम लोकेशन पर है, इसे बेचकर कम से कम तीन करोड़ रुपये मिल जाएँगे, जिससे हम तीनों अपना-अपना अलग फ्लैट ले सकते हैं। मंझले की पत्नी कह रही थी कि लेकिन माँ का क्या करेंगे? माँ तो किसी के भी मॉडर्न लाइफस्टाइल में फिट नहीं बैठतीं, उनकी पुरानी आदतें और पूजा-पाठ हमारी आज़ादी में खलल डालते हैं। इस पर छोटे बेटे सूरज ने बड़ी ही बेशर्मी से हल निकाला कि माँ को शहर से दूर किसी सस्ते वृद्धाश्रम में दाखिल करवा देते हैं। और रिश्तेदारों तथा समाज में यह अफ़वाह फैला देंगे कि पिताजी के जाने के बाद माँ का दिमागी संतुलन बिगड़ गया है और वो खुद ही घर से कहीं चली गईं, ताकि कोई हम पर ऊँगली न उठा सके। पेंशन की रकम और संपत्ति का बँटवारा तीनों आपस में बराबर कर लेंगे। जिस बेटे को मैंने अपनी छाती से लगाकर दूध पिलाया, जिसकी हर बीमारी में रात-रात भर जागकर दुआएँ मांगीं, वही मेरी मानसिक स्थिति को पागलपन का नाम देकर मुझे बेदखल करने की साज़िश रच रहे थे! उनकी यह कुटिलता सुनकर मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मुझे लगा कि जिस छत के नीचे मेरी ममता का ऐसा सौदा हो रहा हो, वहाँ मेरा एक पल भी रुकना मेरे आत्मसम्मान की हत्या है। मैं बदहवास हालत में पिछले दरवाज़े से बाहर निकल आई और भागती रही… भागती रही…”
यह कहते-कहते यशोमती जी फफक-फफक कर रो पड़ीं। डॉ. तन्वी का चेहरा गंभीर हो गया। उसने एक गिलास पानी यशोमती जी को दिया और उनके आँसू पोंछते हुए बेहद दृढ़ स्वर में बोली, “माजी! आपका दर्द बहुत बड़ा है, लेकिन घर छोड़कर इस तरह भाग आना कोई समाधान नहीं है। मैदान छोड़ देने से कायरों की हिम्मत और बढ़ जाती है। अगर आप इस तरह चुपचाप गायब हो जाएँगी, तो आपके बेटों का वह घिनौना षड्यंत्र सच साबित हो जाएगा। वो ज़माने के सामने कह देंगे कि माँ पागल होकर कहीं चली गई और आपकी इज़्ज़त तथा संपत्ति दोनों पर उनका कब्ज़ा हो जाएगा। क्या आप अपने दिवंगत पति के स्वाभिमान और अपनी ममता को इस तरह कलंकित होने देंगी?”
यशोमती जी ने बेबसी से देखा, “पर बेटी, मैं एक बूढ़ी, अकेली औरत… अपने ही बेटों के खिलाफ क्या कर सकती हूँ?”
तन्वी की आँखों में एक अनोखी चमक उभरी। उसने कहा, “आप अकेली कहाँ हैं माजी? आपके साथ आपका सत्य है, आपका आत्मसम्मान है। और अगर भगवान की मर्ज़ी न होती तो कल रात हमारी कार के सामने आप क्यों आतीं? उन्होंने ही मुझे और अर्णव को आपके लिए जरिया बनाया है। एक माँ अगर नौ महीने अपनी कोख में रखकर तीन औलादों को जीवन दे सकती है, अपनी खुशियाँ जलाकर उन्हें काबिल बना सकती है, तो अन्याय करने पर उसी माँ को अपने अधिकारों के लिए दुर्गा का रूप भी धारण करना चाहिए। आप रोइए मत, आप कमज़ोर नहीं हैं। आपको वापस अपने घर जाना होगा और उन्हें अहसास कराना होगा कि ममता जब तक मौन रहती है, तभी तक वो सहती है; जब वो जागती है तो अधर्म का नाश भी कर सकती है।”
तन्वी के शब्दों ने यशोमती के भीतर सोए हुए आत्मसम्मान को झकझोर कर जगा दिया। उनकी आँखों का पानी सूख गया और उनकी जगह एक चट्टानी संकल्प ने ले ली। उन्होंने अपना सिर उठाया और तन्वी का हाथ पकड़कर कहा, “तुमने मेरी आँखें खोल दीं बेटी। मैं भागूंगी नहीं, मैं सामना करूंगी।”
दोपहर के बारह बज रहे थे। हरिप्रसाद जी के विशाल बंगले के दीवानखाने में तीनों बेटे—पंकज, नीरज, सूरज और उनकी पत्नियाँ राहत की सांस लिए बैठे थे। सुबह जब यशोमती अपने कमरे में नहीं मिलीं, तो उन्होंने पहले तो थोड़ा ढोंग रचा, लेकिन अंदर ही अंदर वे सब बेहद खुश थे कि उन्हें बिना किसी झंझट के मनचाहा मौका मिल गया था। वे अब वसीयत और प्रॉपर्टी के कागज़ात ढूंढ़ने की योजना बना ही रहे थे कि अचानक मुख्य दरवाज़ा खुला।
सामने का दृश्य देखकर सबके होश उड़ गए। दरवाज़े पर यशोमती जी पूरे आत्मसम्मान के साथ, मस्तक पर लाल बिंदी लगाए, सधे हुए कदमों से अंदर आ रही थीं। उनके चेहरे पर न कोई डर था, न कोई लाचारी। उनके पीछे डॉ. तन्वी, डॉ. अर्णव और उनके साथ हाथ में कानूनी दस्तावेज़ों से भरी ब्रीफकेस लिए एक जाने-माने वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेंद्र माथुर खड़े थे।
तीनों बेटों के चेहरों का रंग उड़ गया। पंकज ने हकबकाते हुए झूठी चिंता दिखाई, “अरे माँ! तुम कहाँ चली गई थीं? हम सब सुबह से कितने परेशान थे, तुम्हें हर जगह ढूंढ रहे थे!”
यशोमती जी ने हाथ उठाकर उसे वहीं रोक दिया। उनकी आवाज़ में ऐसी गूँज थी कि पूरा हॉल थर्रा उठा, “बस कर पंकज! और कितना झूठ बोलेगा? रात के अंधेरे में जो षड्यंत्र तुमने, तुम्हारे भाइयों और बहुओं ने मेरे जीते जी मुझे पागल साबित करने और इस घर को बेचने के लिए रचा था, उसका एक-एक शब्द मैंने अपने कानों से सुना है।”
यह सुनते ही तीनों बेटों और बहुओं की गर्दनें शर्म और डर से झुक गईं। किसी के मुँह से एक शब्द नहीं फूटा।
यशोमती जी ने अधिवक्ता शैलेंद्र माथुर की ओर इशारा किया। वकील साहब ने आगे आकर कड़क आवाज़ में कहा, “मिस्टर पंकज, नीरज और सूरज… आपकी माताजी श्रीमती यशोमती देवी इस संपत्ति की एकमात्र और पूर्ण कानूनी मालिक हैं। आपके स्वर्गीय पिता श्री हरिप्रसाद जी ने अपनी संपूर्ण संपत्ति, बैंक खाते और यह पैतृक बंगला बिना किसी शर्त के अपनी धर्मपत्नी के नाम रजिस्टर्ड वसीयत द्वारा सौंपा है। आप तीनों का इस संपत्ति पर कानूनी रूप से एक पैसे का भी अधिकार नहीं है।”
वकील साहब ने ब्रीफकेस से नए कागज़ात निकालते हुए कहा, “और आज, अपनी पूर्ण मानसिक और शारीरिक चेतना में, श्रीमती यशोमती जी ने एक नया कानूनी ट्रस्ट ‘मातृ-छाया फ़ाउंडेशन’ गठित किया है। इस वसीयत के अनुसार, इस पूरे बंगले के भूतल को बेसहारा बुजुर्गों और अनाथ बच्चों के संयुक्त आश्रय स्थल में तब्दील किया जा रहा है। स्वर्गीय हरिप्रसाद जी की पूरी जमा-पूँजी और पेंशन का पैसा इसी ट्रस्ट के संचालन में लगेगा, जिसकी मुख्य ट्रस्टी स्वयं यशोमती जी और संरक्षक डॉ. तन्वी तथा डॉ. अर्णव होंगे।”
यह सुनते ही तीनों बेटों के पैरों तले की ज़मीन खिसक गई। नीरज गिड़गिड़ाते हुए बोला, “माँ, हमसे बहुत बड़ी गलती हो गई… हमें माफ़ कर दो। हम बहक गए थे। हम तुम्हें कभी किसी वृद्धाश्रम नहीं भेजेंगे, तुम हमारे साथ रहो।”
यशोमती जी ने बड़े ही संयम और गरिमा के साथ अपने बेटों की तरफ़ देखा। उनके चेहरे पर अब कोई क्रोध नहीं था, केवल एक शांत वैराग्य और आत्मबल था। उन्होंने कहा, “माफ़ी की बात मत करो बच्चों। जब तुमने मुझे अपनी ज़िंदगी से निकालने का फ़ैसला कर लिया था, तब तुमने उस रिश्ते की डोर खुद ही काट दी थी। मैंने तुम्हें पाल-पोसकर बड़ा किया, इस लायक बनाया कि तुम समाज में सम्मान से जी सको। मेरा कर्तव्य पूरा हुआ। अब तुम तीनों अपनी-अपनी गृहस्थी संभालने में पूरी तरह सक्षम हो। यह घर अब किसी के स्वार्थ की बलि नहीं चढ़ेगा। यह घर उन बुजुर्गों का सहारा बनेगा जिन्हें उनकी औलादों ने ठुकरा दिया है, और उन बच्चों की मुस्कान बनेगा जिनके सिर पर माँ-बाप का साया नहीं है। तुम तीनों आज शाम तक इस घर से अपना सामान समेट लो और अपने-अपने साधनों से अपनी ज़िंदगी बसर करो।”
बेटों और बहुओं को समझ आ गया था कि अब उनके घड़ियाली आँसुओं का माँ पर कोई असर नहीं होने वाला। वे सिर झुकाए चुपचाप वहाँ से हट गए।
शाम की सुनहरी धूप जब आँगन में तुलसी के पौधे पर पड़ रही थी, यशोमती जी ने तुलसी के पास दीपक जलाया। उनकी आँखों में अब कोई पश्चाताप या आँसू नहीं था, बल्कि एक नई शुरुआत का संतोष और आत्मविश्वास था। उन्होंने मुड़कर डॉ. तन्वी को अपने सीने से लगा लिया और भरभराई आवाज़ में कहा, “बेटी, आज तूने मुझे न केवल एक नया जीवन दिया, बल्कि एक माँ को उसके अस्तित्व और आत्मसम्मान से भी रूबरू कराया। काश हर घर में तुम्हारे जैसी संवेदनशील सोच हो।”
तन्वी ने मुस्कुराते हुए उनके पाँव छुए और बोली, “माजी, माँ कभी कमज़ोर नहीं होती। आपने आज जो कदम उठाया है, वह न जाने कितनी माताओं को अपने हक़ के लिए सिर उठाकर जीने का हौसला देगा।” यशोमती जी के चेहरे पर खिली संतोष की मुस्कान इस बात की गवाही दे रही थी कि ममता जब स्वाभिमान का दामन थामती है, तो वह किसी पर बोझ नहीं बनती, बल्कि दूसरों के लिए एक वटवृक्ष बन जाती है।
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