अतीत के कांटे

  राधिका की आंखों से आंसू छलक पड़े, “मैंने आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया। बिना सोचे-समझे आप पर इतना घिनौना इल्जाम लगाया। मेरी अंगूठी मां जी के पास थी। आप बेकसूर थीं। मेरा गुस्सा, मेरी कड़वाहट… वह सब मेरी अपनी कमियां थीं, जिनका शिकार मैंने आपको बनाया। अगर हो सके, तो अपने इस बड़े दिल से मुझे माफ कर दीजिए और काम छोड़कर मत जाइए।”

बसंती की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने पूरे जीवन में कभी किसी अमीर कोठी की बहू को अपने जैसे गरीब के आगे हाथ जोड़ते नहीं देखा था।

 सरकारी बैंक से वरिष्ठ प्रबंधक के पद से सेवामुक्त हुईं उर्मिला जी अपने जीवन के इस पड़ाव को बेहद सादगी और गरिमा के साथ जी रही थीं। पति के असामयिक निधन के बाद उन्होंने अपने इकलौते बेटे निशांत को बड़े नाजों से पाला था। निशांत न सिर्फ एक प्रतिष्ठित आईटी फर्म में ऊंचे पद पर कार्यरत था, बल्कि संस्कारों और स्वभाव में भी अपनी मां का सच्चा अक्स था। घर में चारों तरफ फैली धूप और फूलों की क्यारियों की तरह ही उस घर में एक नया उजियारा तब फैला, जब निशांत का विवाह राधिका से हुआ।

राधिका रूप-रंग और बुद्धि दोनों में बेजोड़ थी। एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर एचआर एनालिस्ट के रूप में काम करने वाली राधिका जब ससुराल आई, तो उर्मिला जी की खुशी का ठिकाना न रहा। वह इतनी मधुरभाषी, सलीकेदार और बड़ों का मान रखने वाली थी कि पहले ही हफ्ते में उसने पूरे मोहल्ले और रिश्तेदारों का दिल जीत लिया। सास के पैरों में तेल लगाना हो या निशांत के पसंदीदा व्यंजन बनाने हों, वह हर काम मुस्कुराहट के साथ करती।

लेकिन इसी भरे-पूरे और खुशहाल घर का एक कोना ऐसा भी था, जहां कदम पड़ते ही राधिका का यह सहज और सौम्य रूप पूरी तरह बदल जाता था। वह कोना था घर में पिछले आठ वर्षों से घरेलू सहायिका के रूप में काम कर रही बसंती का वजूद।

बसंती की उम्र करीब चालीस वर्ष रही होगी। साधारण सूती साड़ी, माथे पर छोटी सी बिंदी और चेहरे पर हमेशा एक निश्चल, थकी हुई मगर ममतामयी मुस्कान। जब उर्मिला जी के पति का देहांत हुआ था, उस दौर में बसंती ही थी जिसने न सिर्फ रसोई संभाली थी, बल्कि उर्मिला जी के गिरते स्वास्थ्य में एक बेटी की तरह दवाइयों का ध्यान रखा था। घर की चाबियां, राशन का डिब्बा और तिजोरी का कमरा तक बसंती के लिए कभी बंद नहीं रहता था। उर्मिला जी और निशांत उसे केवल एक नौकरानी नहीं, बल्कि परिवार का एक अभिन्न हिस्सा मानते थे।

शादी के तीन महीने बीत चुके थे। सब कुछ बहुत सुंदर चल रहा था, सिवाय बसंती के प्रति राधिका के अजीबोगरीब व्यवहार के। राधिका बाकी सभी से बेहद नजाकत और सम्मान से पेश आती, लेकिन जैसे ही बसंती कमरे में दाखिल होती, राधिका के चेहरे की रेखाएं सख्त हो जातीं। उसकी आवाज की मिठास गायब हो जाती और लहजे में एक ऐसी बेरुखी उतर आती जो किसी को भी असहज कर दे।

एक रविवार की सुबह, राधिका बालकनी में बैठकर लैपटॉप पर काम कर रही थी। बसंती हाथ में झाड़ू-पोछा लिए वहां पहुंची। बालकनी की रेलिंग पर राधिका का एक बहुत ही खूबसूरत, हाथ से बुना हुआ कश्मीरी शॉल रखा था। बसंती ने उसे बड़ी आत्मीयता से उठाया, उस पर लगी धूल को हल्के से झाड़ा और तह बनाते हुए बड़े स्नेह से बोली, “दीदी, हवा बहुत तेज चल रही थी, आपका यह शॉल नीचे गिर जाता। इसका रंग और धागों का काम कितना प्यारा है, बिल्कुल वैसा ही जैसा हमारे गांव की मेले वाली प्रदर्शनी में दिखा था।”

बसंती का इरादा सिर्फ शॉल को गंदा होने से बचाना और उसकी तारीफ करना था। लेकिन राधिका के कानों में जैसे यह बात अंगारे की तरह चुभ गई। उसने झटके से लैपटॉप बंद किया, अपनी कुर्सी से खड़ी हुई और बसंती के हाथ से शॉल छीनते हुए लगभग चीख पड़ी, “तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मेरी चीजों को छूने की? और खबरदार जो मुझे ‘दीदी’ कहा! तुम यहां सिर्फ साफ-सफाई करने आती हो, अपनी हद में रहा करो। यह शॉल असली पश्मीना है, तुम्हारी पूरी जिंदगी की कमाई लग जाएगी इसे खरीदने में। मुझसे रिश्तेदारी गांठने की कोशिश मत करना, सीधे ‘मैडम’ बोला करो।”

बसंती सन्न रह गई। उसकी आंखें डबडबा आईं। उसने एक शब्द नहीं कहा, बस सिर झुकाकर वहां से हट गई और रसोई में जाकर चुपचाप बर्तन मांजने लगी। उर्मिला जी पूजा के कमरे से यह सब देख रही थीं। उनका मन भारी हो गया। उन्होंने रसोई में जाकर बसंती के कंधे पर हाथ रखा और धीमे से कहा, “बसंती, बुरा मत मानना। ऑफिस में बहुत काम का दबाव रहता है बच्चों पर, कभी-कभी गुस्से में बोल जाती है। मैं समझाऊंगी उसे।”

बसंती ने अपनी गीली साड़ी के पल्लू से आंसू पोंछते हुए कहा, “नहीं अम्मा जी, मैं बुरा नहीं मानती। बस दीदी की बात सीधे कलेजे पर लगती है। ऐसा लगता है जैसे मैं कोई इंसान ही नहीं हूं।”

उर्मिला जी के मन में यह सवाल लगातार कौंध रहा था कि जिस लड़की ने अपनी सास को मां का दर्जा दिया, जो राह चलते भिखारियों को भी आदर से बिस्किट और पैसे देती है, वह बसंती को देखते ही इतनी असंवेदनशील और क्रूर क्यों हो जाती है?

कुछ दिनों बाद की बात है। शाम के समय मूसलाधार बारिश हो रही थी। निशांत दफ्तर से लौट चुका था और ड्रॉइंग रूम में बैठकर चाय पी रहा था। राधिका सोफे पर बैठी फाइलों में उलझी थी। बसंती बाहर से भीगती हुई आई और उसने हॉल में कदम रखा ताकि वह गीले जूतों को एक तरफ रख सके। फर्श पर उसके पैरों के दो-चार गीले निशान पड़ गए।

राधिका ने फाइलों से नजर उठाई और तमतमाते हुए बोली, “अंधे होकर चलती हो क्या? दिख नहीं रहा कि अभी-अभी फर्श साफ हुआ था? तुम जैसी कामवालियों को तमीज नाम की चीज नहीं होती। बाहर ही खड़े होकर नहीं बोल सकती थीं?”

निशांत से अब रहा नहीं गया। उसने अपनी चाय की प्याली मेज पर रखी और गंभीर स्वर में कहा, “राधिका! यह क्या तरीका है बात करने का? बाहर भयानक बारिश हो रही है, वह भीगती हुई आई है और तुम दो बूंद पानी के लिए उस पर ऐसे चिल्ला रही हो जैसे उसने कोई गुनाह कर दिया हो? बसंती मौसी हमारे घर की सदस्य की तरह हैं, तुम हर दिन इनका अपमान क्यों करती हो?”

राधिका ने अपनी डायरी जोर से मेज पर पटकी और कठोर आवाज में बोली, “निशांत, तुम नौकरों को सिर पर चढ़ाकर रखते हो, यह तुम्हारी गलती है। मैं इन लोगों की असलियत जानती हूं। इन्हें जितनी ढील दो, ये उतने ही सिर चढ़ते हैं। मुझे इस बारे में कोई उपदेश मत दो।” इतना कहकर वह पैर पटकती हुई बेडरूम में चली गई और दरवाजा धड़ाम से बंद कर दिया।

निशांत लाचार होकर अपनी मां की तरफ देखने लगा। उर्मिला जी ने बसंती को सूखा तौलिया और एक कप गर्म चाय दी। उस रात पूरे घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसरा रहा।

तनाव की यह चिंगारी एक हफ्ते बाद एक बड़े तूफान में बदल गई।

बुधवार की दोपहर, उर्मिला जी मंदिर से लौट रही थीं। जैसे ही उन्होंने घर के मुख्य दरवाजे पर कदम रखा, देखा कि बसंती सीढ़ियों पर बैठी फूट-फूट कर रो रही थी। उसका झोला जमीन पर पड़ा था।

“क्या हुआ बसंती? तू इस तरह सीढ़ियों पर बैठकर क्यों रो रही है?” उर्मिला जी ने घबराकर पूछा।

बसंती हिचकियों के बीच बोली, “अम्मा जी, आज मेरा हिसाब कर दीजिए। मैं आज के बाद आपके घर कदम नहीं रखूंगी। आठ साल में आपने कभी मुझ पर शक नहीं किया, मुझे अपनी औलाद जैसा माना। लेकिन आज मुझ पर चोरी का इल्जाम लगा है। अब मेरी इज्जत ही नहीं बची तो मैं यहां काम कैसे करूं?”

“चोरी? किस बात की चोरी? किसने कहा तुझसे?” उर्मिला जी ने अवाक होकर पूछा।

लेकिन बसंती इतना आत्मसम्मान से भरी थी कि बिना पैसे लिए, रोती हुई गेट खोलकर तेजी से बाहर निकल गई।

उर्मिला जी का माथा ठनका। वे तेज कदमों से सीधे राधिका के कमरे में पहुंचीं। राधिका अलमारी के दराजों को अस्त-व्यस्त करके कुछ तलाश रही थी।

“राधिका! क्या किया तुमने? बसंती रोती हुई क्यों गई? क्या कहा तुमने उससे?” उर्मिला जी की आवाज में वह सख्ती थी जो उन्होंने शादी के बाद कभी इस्तेमाल नहीं की थी।

राधिका ने बिना झिझके कहा, “मां जी, अच्छा हुआ वह भाग गई, वरना मैं पुलिस को फोन करने ही वाली थी। मेरी हीरे की वह महंगी अंगूठी, जो मेरे पापा ने मुझे पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा होने पर दी थी, वह ड्रेसिंग टेबल से गायब है। परसों जब बसंती धूल झाड़ रही थी, तब वह उस अंगूठी को बड़े लालच से देख रही थी। मैंने पूरा कमरा छान मारा, वह कहीं नहीं है। उसी ने चुराई है!”

उर्मिला जी ने एक गहरी सांस ली। उनकी आंखों में क्रोध से ज्यादा एक गहरा दुख था। वे चुपचाप अपने कमरे में गईं और कुछ ही पलों में अपने हाथ में मखमल की एक छोटी सी लाल डिब्बी लेकर लौटीं। उन्होंने वह डिब्बी राधिका के हाथ में थमा दी।

राधिका ने कांपते हाथों से डिब्बी खोली। भीतर उसकी वही हीरे की अंगूठी चमक रही थी।

उर्मिला जी ने बेहद शांत मगर चुभते हुए स्वर में कहा, “यह अंगूठी तुम रविवार को वॉशबेसिन के किनारे साबुनदानी के पास भूल आई थी। जब मैं हाथ धोने गई, तो मुझे दिखी। मैंने इसे उठाकर अपनी अलमारी में सुरक्षित रख दिया था ताकि पानी में बह न जाए। फिर मेरी तबीयत ढीली थी तो मैं तुम्हें बताना भूल गई। राधिका, क्या तुमने एक बार भी मुझसे पूछने की जहमत उठाई? तुमने सीधे उस औरत के चरित्र पर कालिख पोत दी जो आठ साल से इस घर की एक-एक पाई का हिसाब ईमानदारी से रखती आई है?”

राधिका के पैरों तले से जमीन खिसक गई। उसका चेहरा शर्म से सफेद पड़ गया। वह हकबका गई, लेकिन उसके भीतर का कोई अदृश्य अहंकार अब भी उसे पूरी तरह झुकने नहीं दे रहा था। उसने नजरें चुराते हुए धीमे से कहा, “मां जी… गलती हो गई, पर… पर इन जैसे लोगों का क्या भरोसा? आज नहीं तो कल मौका मिलने पर हाथ साफ कर ही देते हैं। ये गरीब होते ही ऐसे हैं।”

“बस करो राधिका!” उर्मिला जी की आवाज में एक गूंज थी जिसने राधिका को भीतर तक हिला दिया।

उसी वक्त निशांत भी ऑफिस से घर पहुंचा। माहौल की तल्खी देखकर वह वहीं ठिठक गया।

उर्मिला जी ने राधिका की आंखों में सीधे देखते हुए कहा, “तुम पढ़ी-लिखी हो, एक प्रतिष्ठित कंपनी में काम करती हो, हमारे घर के हर छोटे-बड़े रिश्ते का मान रखती हो। फिर सिर्फ एक गरीब मजदूर औरत के सामने आते ही तुम्हारी यह नफरत, यह जहर कहां से निकल आता है? क्या इंसानियत सिर्फ अमीरों के लिए आरक्षित है? आज तुम्हें बताना ही होगा कि तुम्हारे मन में बसंती के लिए इतनी कड़वाहट क्यों है?”

राधिका कुछ नहीं बोली। उसकी पलकें कांपने लगीं।

निशांत उसके पास आया और उसने बड़ी कोमलता से राधिका का कंधा छुआ, “राधिका, मां सही कह रही हैं। तुम ऐसी तो नहीं हो। तुम्हारी आंखों में गुस्सा नहीं, कोई छुपा हुआ दर्द दिखता है। हमें बताओ, क्या बात है?”

अपनों का वह अप्रत्याशित प्यार और विश्वास राधिका के अंदर बने अहंकार और डर के मजबूत बांध को एक ही झटके में तोड़ गया। राधिका अपने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गई और दोनों हाथों से अपना चेहरा ढककर बच्चों की तरह सिसक-सिसक कर रोने लगी। उसका पूरा शरीर कांप रहा था।

उर्मिला जी का दिल पसीज गया। वे नीचे बैठीं और राधिका को अपनी बाहों में समेट लिया। “रो मत बेटा, कहो जो कहना है। हम तुम्हारे अपने हैं।”

काफी देर बाद, जब राधिका के आंसुओं का वेग थोड़ा थमा, तो उसने जो सच बयां किया, उसने कमरे में मौजूद दोनों लोगों की रूह को झकझोर कर रख दिया।

राधिका ने थरथराते होंठों से कहना शुरू किया, “मां जी… आप लोग सोचते हैं कि मैं एक बहुत बड़े और संपन्न परिवार से ताल्लुक रखती हूं। लेकिन सच यह है कि जब मैं महज सात साल की थी, मेरे पिता एक सड़क हादसे में चल बसे थे। उनके जाने के बाद हमारे पास खाने तक के पैसे नहीं बचे थे। मेरी मां… मेरी मां ने मुझे जिंदा रखने और पढ़ाने के लिए जबलपुर शहर की बड़ी-बड़ी कोठियों में झाड़ू-पोछा और बर्तन मांजने का काम शुरू किया था।”

निशांत और उर्मिला जी स्तब्ध रह गए।

राधिका की आवाज अब अतीत के आंसुओं में भीग चुकी थी, “स्कूल की छुट्टियों में मां अक्सर मुझे अपने साथ उन घरों में ले जाती थी, क्योंकि घर पर मुझे अकेला छोड़ने का डर था। मैंने अपनी आंखों से देखा है कि उन बड़ी कोठियों की मालकिनें मेरी मां के साथ कैसा सुलूक करती थीं। बासी रोटी अखबार के टुकड़े पर रखकर दूर से ऐसे फेंकी जाती थी जैसे किसी जानवर के आगे डाली जा रही हो। एक कप चाय के लिए मां को घंटों इंतजार कराया जाता था और वह भी एक टूटे हुए कप में दी जाती थी। जरा सा कांच का गिलास चटक जाता, तो मां की पूरी महीने की पगार काट ली जाती और गालियां दी जाती थीं। मां हाथ जोड़कर रोती रहती थी, और मैं एक कोने में खड़ी होकर सिर्फ अपनी मां की लाचारी और बेबसी देखती थी।”

राधिका ने अपनी भीगी आंखें उठाईं, जिनमें बरसों पुराना दर्द सुलग रहा था, “मां ने अपनी हड्डियों का पानी करके, हर अपमान का घूंट पीकर मुझे पढ़ाया। जब मेरी पहली नौकरी लगी, तो मैंने मां से कहा कि हम वह शहर हमेशा के लिए छोड़ देंगे। हमने भोपाल में आकर नई जिंदगी शुरू की। किसी को नहीं पता था कि मैं एक दाई, एक कामवाली की बेटी हूं। मुझे हमेशा यह डर सताता था कि अगर किसी को यह पता चल गया, तो कोई मुझसे प्यार नहीं करेगा, समाज मुझे ठुकरा देगा, कोई संभ्रांत परिवार अपनी बहू नहीं बनाएगा। इसलिए मैंने आप लोगों से भी यह सच छुपाया।”

उसने अपना सिर उर्मिला जी की गोद में रख दिया, “मां जी, जब मैं बसंती को देखती थी, तो मुझे उसके अंदर अपनी वही लाचार मां नजर आती थी। और जाने-अनजाने, मेरा अवचेतन मन उस पुराने अपमान का बदला लेने लगता था। मैं बचपन में उन मालकिनों के सामने कभी बोल नहीं पाई थी, अपनी मां को बचा नहीं पाई थी। बसंती पर चिल्लाकर, उसे नीचा दिखाकर, मुझे ऐसा लगता था कि अब मैं ताकतवर हूं, अब कोई मेरी मां को या मुझे कमजोर नहीं समझ सकता। मैं बसंती से नहीं, अपनी उस गरीबी और उस बेबसी से नफरत कर रही थी… मुझे माफ कर दीजिए, मैं बहुत गलत थी।”

हॉल में गहरा सन्नाटा छा गया। हवा में केवल राधिका की सिसकियों की आवाज गूंज रही थी।

उर्मिला जी की आंखों से भी आंसू बह निकले। उन्होंने राधिका का चेहरा अपने दोनों हाथों में थामा और उसके माथे को चूम लिया।

“पगली लड़की…” उर्मिला जी ने भरे गले से कहा, “तेरी मां ने मेहनत की, अपना पसीना बहाकर तुझे इस काबिल बनाया, इसमें शर्मिंदगी कैसी? उनकी मेहनत तो तेरी ताकत होनी चाहिए थी, गर्व होना चाहिए था। लेकिन तूने उस घाव को नासूर बना लिया। बेटा, जो दर्द तुझे मिला, उसका इलाज यह नहीं था कि तू वही दर्द किसी और बेकसूर को देने लगे। अगर तू भी उसी तरह का व्यवहार करेगी जैसा उन कोठियों की मालकिनों ने तेरी मां के साथ किया था, तो फिर तुझमें और उन जालिमों में क्या फर्क रह गया?”

निशांत ने आगे बढ़कर राधिका के आंसू पोंछे और कहा, “राधिका, मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी मां क्या काम करती थीं। मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसी बहादुर मां की बेटी का पति हूं। लेकिन मां बिल्कुल सही कह रही हैं। अतीत के उस अंधेरे को अपने वर्तमान की रोशनी मत छीनने दो। बसंती ने तुम्हारे साथ कभी कुछ गलत नहीं किया। अपनी अंतरात्मा को इस बोझ से आजाद करो।”

राधिका ने अपनी सास और पति को देखा। उसके मन से वह भारी बोझ, जो वह न जाने कितने सालों से सीने पर लादे घूम रही थी, अचानक पिघल कर बह गया था। उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “मैं अपनी गलती सुधारूंगी। मैं कल ही बसंती मौसी से माफी मांगूंगी।”

अगली सुबह, जब बसंती अपने बकाया पैसे लेने आनंद भवन पहुंची, तो उसका चेहरा उतरा हुआ था। वह दहलीज पर ही खड़ी हो गई और अंदर कदम नहीं रखा।

उर्मिला जी ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए कहा, “आओ बसंती, अंदर आओ।”

बसंती ने भारी मन से कहा, “नहीं अम्मा जी, बस मेरा जो काम का पैसा बनता है वह दे दीजिए, मैं चली जाऊंगी।”

तभी रसोई से राधिका बाहर निकली। उसके हाथ में एक स्टील की थाली थी, जिसमें गर्म-गर्म पोहा और दो कप चाय रखी थी। राधिका सीधी बसंती के पास आई। उसने थाली मेज पर रखी और बिना एक पल गंवाए, बसंती के दोनों हाथ अपने हाथों में थाम लिए।

“मुझे माफ कर दीजिए मौसी…” राधिका की आवाज भर्रा गई।

बसंती घबराकर पीछे हटने लगी, “दीदी… यह क्या कर रही हैं आप? आप मुझसे माफी क्यों मांग रही हैं?”

“नहीं मौसी, दीदी नहीं, आप मुझे अपनी बेटी समझिए।” राधिका की आंखों से आंसू छलक पड़े, “मैंने आपके साथ बहुत बुरा व्यवहार किया। बिना सोचे-समझे आप पर इतना घिनौना इल्जाम लगाया। मेरी अंगूठी मां जी के पास थी। आप बेकसूर थीं। मेरा गुस्सा, मेरी कड़वाहट… वह सब मेरी अपनी कमियां थीं, जिनका शिकार मैंने आपको बनाया। अगर हो सके, तो अपने इस बड़े दिल से मुझे माफ कर दीजिए और काम छोड़कर मत जाइए।”

बसंती की आंखें फटी की फटी रह गईं। उसने अपने पूरे जीवन में कभी किसी अमीर कोठी की बहू को अपने जैसे गरीब के आगे हाथ जोड़ते नहीं देखा था।

बसंती का ममतामयी दिल एक ही पल में पिघल गया। उसने अपने काम से खुरदुरे हो चुके हाथों से राधिका के गालों के आंसू पोंछे और नम आवाज में कहा, “अरे बिटिया, ऐसा मत कहो। तुम तो मेरी बेटी जैसी हो। मां कभी बच्चों की कड़वी बातों को दिल से लगाकर नहीं रखती। बस एक बात हमेशा याद रखना बिटिया… गरीब का पसीना भले ही सस्ता हो, लेकिन उसका आत्मसम्मान बहुत कीमती होता है। भगवान ने अगर आपको ऊंचा मुकाम दिया है, तो किसी को नीचे गिराने के लिए नहीं, बल्कि नीचे गिरे हुए को सहारा देकर उठाने के लिए दिया है।”

“मैं यह बात कभी नहीं भूलूंगी मौसी,” राधिका ने सिर झुकाकर कहा।

उस दिन आनंद भवन के डाइनिंग टेबल पर एक अभूतपूर्व दृश्य था। उर्मिला जी, निशांत, राधिका और बसंती—चारों एक साथ बैठकर चाय पी रहे थे। घर की खिड़कियों से छनकर आती सुबह की सुनहरी धूप में अतीत की सारी कड़वाहटें धुल चुकी थीं और वहां केवल प्रेम, आदर और क्षमा की सुगंध बची थी।

आपके विचार हमारे लिए अनमोल हैं: क्या बचपन में झेले गए अपमान या कड़वे अनुभव हमारे वर्तमान स्वभाव और रिश्तों को अनजाने में प्रभावित करते हैं? क्या राधिका का अपनी गलती का अहसास करके एक सहायिका के आगे सिर झुकाना उसके संस्कारों की असली जीत थी? अपनी राय नीचे कमेंट बॉक्स में जरूर साझा करें।

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मूल लेखिका : गीता वाधवानी 

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