स्वाति ने आगे बढ़कर अंजलि का हाथ पकड़ लिया, “भाभी, मुझे माफ कर दो। सुबह जब भैया का मैसेज आया कि भाभी ने बिना ना-नुकर किए सुबह का सारा खाना बनाया, तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैंने माँ की ममता का गलत फायदा उठाया। ससुराल में जब सबने कहा कि बाहर से खिचड़ी मंगा लेते हैं, तो मैंने ही नखरे दिखाए कि मुझे बाहर का नहीं खाना और माँ को फोन लगा दिया। मुझे नहीं पता था कि मेरी एक कॉल से आपका पूरा दिन रसोई की भट्टी में झोंक दिया जाएगा।”
अंजलि ने जब रसोई की चौखट पर कदम रखा, तो देखा कि गैस के चारों चूल्हे जल रहे हैं। एक तरफ बड़ी सी कढ़ाई में छोले उबल रहे थे, दूसरी तरफ कुकर सीटी मारने को बेताब था और तीसरी तरफ मनोरमा जी पसीने-पसीने होकर कद्दूकस से पनीर घिस रही थीं।
“मम्मी जी! आप इतनी सुबह-सुबह रसोई में? और वो भी इतने बड़े बर्तनों के साथ? बात क्या है, आज कोई खास पूजा या अनुष्ठान है क्या?” अंजलि ने चौंकते हुए पूछा।
मनोरमा जी ने माथे का पसीना पल्लू से पोंछते हुए कहा, “अरे बहू, आ गई तू! अच्छा हुआ जल्दी आ गई। बातें मत बना, जरा जल्दी से हाथ बंटा। कम से कम दस-बारह लोगों का खाना तैयार करना है। दो घंटे में सब पैक होना चाहिए। जा, जल्दी से आटा गूंथ और पूरियों की तैयारी कर।”
अंजलि ने हैरान होकर चारों तरफ देखा। उसने कहा, “पर मम्मी जी, हमारा और पापा जी का नाश्ता तो मैं पहले ही बना चुकी थी और दोपहर के लिए भी दाल भिगो दी थी। अब अचानक इतना सारा खाना? घर में तो कोई मेहमान दिख नहीं रहा, न ही कुणाल ने बताया कि उसके कोई दफ्तर के साथी आ रहे हैं।”
“अरे मैंने कहा ना कि सवाल-जवाब करने का समय नहीं है!” मनोरमा जी की आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट और हड़बड़ी थी। “ड्राइवर कभी भी आता ही होगा। तू बस हाथ चला, बाकी सब मुझ पर छोड़ दे।”
अंजलि कुछ पल के लिए ठिठकी, पर उसने चुपचाप एप्रन बांधा और काम में जुट गई। पूरियां तलते-तलते उसके हाथ लाल हो गए, गरम तेल के छींटे भी पड़े, लेकिन उसने शिकायत का एक शब्द नहीं निकाला। मनोरमा जी ने दो बड़े-बड़े चार मंजिला टिफिन निकाले। गरमा-गरम शाही पनीर, पिंडी छोले, जीरा राइस, बूंदी का रायता और पचास से ज्यादा पूरियां करीने से पैक की गईं। साथ में ताजे कटे सलाद और गुलाब जामुन का डिब्बा भी रखा गया।
जैसे ही बाहर कार के हॉर्न की आवाज़ आई, मनोरमा जी खुद झपटकर दरवाजे की तरफ भागीं। बाहर खड़ी सफेद रंग की सेडान और उसके ड्राइवर को देखकर अंजलि की नजरें वहीं ठहर गईं। यह कार किसी और की नहीं, बल्कि उसकी ननद स्वाति के ससुराल की थी। स्वाति की शादी इसी शहर के दूसरे कोने, अरेरा कॉलोनी में हुई थी।
मनोरमा जी ने ड्राइवर के हाथों में वे भारी-भरकम टिफिन थमाए और हिदायत देते हुए कहा, “देखो भैया, गाड़ी जरा संभाल कर चलाना, रायता छलक न जाए। और बिटिया को कहना कि खुद खड़े होकर परोसने की बिल्कुल जरूरत नहीं है, बस डाइनिंग टेबल पर रख दे और जाकर कमरे में लेट जाए।”
ड्राइवर के जाते ही मनोरमा जी ने बालकनी में खड़े होकर फोन मिलाया। उनके चेहरे पर ममता और फिक्र की अनगिनत लकीरें खिंच आईं, “हेलो, स्वाति बेटा! सुन, मैंने सब कुछ बहुत बढ़िया से बनवाकर भेज दिया है। तेरे ससुर जी के दोस्त आए हैं ना, सबको अच्छे से खिला देना। और तू बिल्कुल रसोई में मत घुसना। तेरी तबीयत ठीक नहीं है, आराम कर। यहाँ की चिंता मत कर, मैं और अंजलि मिलकर सब संभाल लेंगे।”
अंजलि ने सब सुन लिया। उसका मन अंदर से बुझ सा गया। उसे स्वाति से कोई बैर नहीं था, ननद के प्रति उसके मन में हमेशा स्नेह था। लेकिन बात यह थी कि जब पिछले महीने अंजलि को तेज वायरल हुआ था और वह बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थी, तब मनोरमा जी ने सुबह कमरे में आकर कहा था, “बहू, तबीयत तो सबकी खराब होती है, पर औरत अगर बिस्तर पकड़ ले तो घर की गाड़ी रुक जाती है। थोड़ा हिम्मत कर और खिचड़ी चढ़ा दे, कुणाल भूखा ऑफिस नहीं जा सकता।”
उस दिन अंजलि ने कांपते हाथों से रसोई संभाली थी। किसी ने उसके लिए चाय तक नहीं बनाई थी। और आज स्वाति को केवल हल्का सा सिरदर्द और थकान थी, तो पूरे ससुराल का भोज मायके की रसोई में तैयार हो रहा था। अंजलि बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई। दिल में एक टीस उठी, जिसे उसने तकिए में मुंह दबाकर दबा लिया।
दोपहर बीती और शाम ढलने लगी। अंजलि रात के खाने की तैयारी के लिए फ्रिज खोलकर सब्जियां देख ही रही थी कि मनोरमा जी थकी हुई चाल से रसोई में दाखिल हुईं। उनके चेहरे पर वही लाचारी भरा भाव था।
मनोरमा जी बोलीं, “अंजलि, सोच रही थी कि रात के खाने में कुछ बढ़िया सा बना लें। थोड़ा सा ज्यादा बना लेंगे तो ड्राइवर के हाथ स्वाति के यहाँ भी भिजवा देंगे।”
अंजलि ने मुड़कर देखा, “रात को भी भिजवाना है?”
“हाँ बहू, क्या बताऊं… मेरी फूल सी बच्ची से बीमारी की हालत में काम होता नहीं है। अब तुझे तो पता ही है, उसकी सास का घुटना खराब रहता है, वो तो रसोई में खड़ी भी नहीं हो सकतीं। ससुर जी, पति और दो देवर हैं घर में। पुरुष लोग क्या खाना बनाएंगे? और उन लोगों को बाहर का खाना पचता नहीं, न ही वो घर में कोई रसोइया रखना पसंद करते हैं। अब जब हम इसी शहर में हैं, तो अपनी बच्ची को तकलीफ में कैसे देखूं? स्वाति का फोन आया था, कह रही थी माँ बदन टूट रहा है। तो मैंने सोचा मटर-मशरूम और मिस्सी रोटी बना लेते हैं। पांच लोगों का उनका हो जाएगा और चार हमारे। तू फटाफट मशरूम काट दे, बाकी मैं देख लूंगी।”
अंजलि का सब्र अब धीरे-धीरे जवाब दे रहा था, लेकिन उसने तहज़ीब का दामन नहीं छोड़ा। उसने शांत स्वर में कहा, “मम्मी जी, स्वाति के घर में पांच वयस्क लोग हैं। अगर उसकी तबीयत खराब है, तो क्या उसके पति या देवर मिलकर एक वक्त की खिचड़ी या सादा खाना भी नहीं बना सकते? अगर वो बाहर का नहीं खाते, तो क्या बीमारी में भी अपनी बहू से सेवा की उम्मीद रखते हैं?”
मनोरमा जी की त्योरियां चढ़ गईं, “अरे बहू, ससुराल ससुराल होता है! वहाँ कायदे-कानून अलग होते हैं। हर कोई तेरे जैसा भाग्यशाली नहीं होता कि ऐसी सास मिले जो खुद खड़े होकर काम करवाए। बेटियों के घर का ध्यान माँ-बाप को ही रखना पड़ता है।”
“और बहुओं के मायके वाले?” अंजलि के मुंह से अनायास ही निकल पड़ा।
रसोई में सन्नाटा पसर गया। मनोरमा जी ने अंजलि को ऐसे देखा मानो उसने कोई बहुत बड़ा अपराध कर दिया हो। अंजलि ने गहरी सांस ली और कहा, “मम्मी जी, मुझे स्वाति के लिए खाना बनाने से कोई ऐतराज नहीं है। वो मेरी बहन जैसी है। लेकिन आप जो कर रही हैं, क्या वो वाकई स्वाति की मदद है या उसके ससुराल वालों की उस सोच को बढ़ावा देना है जहाँ एक बीमार बहू की बीमारी को अनदेखा कर दिया जाता है?”
इससे पहले कि मनोरमा जी कुछ जवाब देतीं, कुणाल ऑफिस से आ गया। उसने रसोई का तनाव भांप लिया और पूछा, “क्या बात है? इतनी गर्मागर्मी क्यों है?”
मनोरमा जी तुरंत बोल पड़ीं, “देख कुणाल, तेरी बहन वहां बीमार पड़ी है। मैंने बस इतना कहा कि रात का खाना थोड़ा ज्यादा बनाकर उसके यहाँ भिजवा देते हैं, तो तेरी पत्नी को मिर्ची लग रही है। इसे अपनी ननद का दुख देखा नहीं जाता!”
कुणाल ने अपनी माँ की तरफ देखा और फिर अंजलि की तरफ, जिसकी आंखों में आंसू थे पर आवाज में एक ठहराव था। अंजलि ने कुणाल से कहा, “कुणाल, बात खाना बनाने की नहीं है। सुबह दस लोगों का खाना मैंने और मम्मी जी ने मिलकर बनाया और भेजा। अभी रात का भी बन जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि स्वाति की बीमारी में उसका अपना परिवार उसके साथ क्यों नहीं खड़ा है? क्या शादी के बाद लड़की का ससुराल सिर्फ अधिकारों का घर होता है, जिम्मेदारियों का नहीं? अगर कल को मैं बीमार पड़ूं और मेरी माँ रोज मेरे ससुराल खाना भिजवाने लगें, तो क्या आप लोगों को अच्छा लगेगा? क्या आप यह स्वीकार करेंगे कि आप अपनी बीमार पत्नी का ख्याल रखने में असमर्थ हैं?”
अंजलि की यह बात सीधे कुणाल के दिल पर लगी। उसने कुछ देर सोचा, फिर अपनी माँ के पास गया और उनके कंधे पर हाथ रखकर बोला, “माँ, अंजलि बिल्कुल सही कह रही है।”
मनोरमा जी अवाक रह गईं, “तू भी अपनी बहन के खिलाफ हो गया?”
“नहीं माँ, मैं स्वाति के खिलाफ नहीं, उसके भले की बात कर रहा हूँ,” कुणाल ने नरमी से समझाया। “आप सुबह से यहां परेशान हैं, अंजलि थक चुकी है। आपने खाना भेजकर स्वाति के ससुराल वालों को यह संदेश दे दिया कि स्वाति बीमार हो या कुछ भी, उनकी रोटियों का इंतजाम मायके से हो जाएगा। उन्हें अहसास ही नहीं होगा कि उनके घर की एक सदस्य तकलीफ में है और उसे आराम की जरूरत है। अगर आज वो लोग बाहर से खाना मंगाते या खुद मिलकर दलिया बनाते, तो उन्हें स्वाति के काम की कीमत समझ आती। आपने तो उनकी आदत बिगाड़ दी।”
मनोरमा जी सोफे पर बैठ गईं। उनका दिल अभी भी मान नहीं रहा था। उन्होंने कहा, “पर वो मेरी बच्ची है, मैं उसका दर्द कैसे अनदेखा करूं?”
तभी दरवाजे की घंटी बजी। कुणाल ने दरवाजा खोला तो सामने स्वाति खड़ी थी। उसके चेहरे पर थकान जरूर थी, लेकिन वह बीमार इतनी भी नहीं थी कि चल न सके। उसके पीछे उसके पति अमन भी खड़े थे, जिनके हाथ में कुछ दवाइयां और फलों की टोकरी थी।
स्वाति को अचानक सामने देखकर मनोरमा जी हड़बड़ा कर उठ खड़ी हुईं, “अरे स्वाति! तू इस हालत में यहाँ क्यों आई? और अमन बेटा, आप? सब ठीक तो है ना?”
अमन ने आगे बढ़कर मनोरमा जी और पापा जी के पैर छुए और फिर शर्मिंदगी भरे स्वर में बोले, “मम्मी जी, मुझे माफ कर दीजिएगा। सुबह जब खाना घर पहुंचा, तो मुझे बहुत अजीब लगा। स्वाति को सिर्फ हल्का सा जुकाम और सिरदर्द था, लेकिन उसने अपनी आदत के मुताबिक आपको फोन करके बात का बतंगड़ बना दिया। मुझे जब पता चला कि सुबह से आप और भाभी हमारे घर के लिए रोटियां सेक रही हैं, तो मुझे अपनी गैरत पर चोट लगी।”
स्वाति ने सिर झुका लिया। अमन ने आगे कहा, “मम्मी जी, हमारे घर में अगर कोई बीमार होता है, तो हम बाहर से सादा खाना मंगा सकते हैं या मैं और मेरे भाई मिलकर कुछ बना सकते हैं। लेकिन स्वाति ने सबको यह कहकर रोक दिया कि ‘मेरी माँ सब भेज देंगी।’ दोपहर को जब मेरे दोस्तों ने खाना खाया और तारीफ की, तो मुझे खुशी नहीं, शर्म महसूस हो रही थी कि मेरी पत्नी अपने मायके को एक भोजनालय की तरह इस्तेमाल कर रही है ताकि उसे अपने ससुराल में थोड़ी सी समझदारी न दिखानी पड़े।”
मनोरमा जी की आंखें फटी की फटी रह गईं। वे जिस बात को अपनी बेटी की बेबसी समझ रही थीं, वह दरअसल स्वाति का गैर-जिम्मेदाराना रवैया और जरूरत से ज्यादा मायके पर निर्भरता थी।
स्वाति ने आगे बढ़कर अंजलि का हाथ पकड़ लिया, “भाभी, मुझे माफ कर दो। सुबह जब भैया का मैसेज आया कि भाभी ने बिना ना-नुकर किए सुबह का सारा खाना बनाया, तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ। मैंने माँ की ममता का गलत फायदा उठाया। ससुराल में जब सबने कहा कि बाहर से खिचड़ी मंगा लेते हैं, तो मैंने ही नखरे दिखाए कि मुझे बाहर का नहीं खाना और माँ को फोन लगा दिया। मुझे नहीं पता था कि मेरी एक कॉल से आपका पूरा दिन रसोई की भट्टी में झोंक दिया जाएगा।”
अंजलि ने स्वाति के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कहा, “स्वाति, ससुराल में जगह अपनी सूझबूझ और रिश्तों को संभालने से बनती है, हर छोटी बात पर मायके की तरफ भागने से नहीं। अगर तुम्हारी सास बीमार रहती हैं, तो यह तुम्हारी जिम्मेदारी है कि तुम घर को संभालो, लेकिन अगर तुम खुद बीमार हो, तो हक से अपने पति से कहो कि आज मुझे आराम चाहिए। खाना मायके से मंगाना कोई हल नहीं है।”
अमन ने मुस्कुराते हुए कहा, “बिल्कुल भाभी। और आज रात का खाना हम सब बाहर से नहीं, बल्कि मैं और कुणाल मिलकर बनाएंगे। स्वाति आराम करेगी, मम्मी जी और भाभी आप दोनों बैठिए।”
उस रात की फिजा बिल्कुल बदल चुकी थी। घर में कोई भारी-भरकम टिफिन पैक नहीं हुआ। कुणाल और अमन ने मिलकर सादी सी तहरी बनाई, सबने एक साथ बैठकर हंसी-मजाक के बीच खाना खाया।
मनोरमा जी चुपचाप अंजलि को देख रही थीं। आज उनकी आंखों से ममता की वह धुंध हट चुकी थी, जो उन्हें सिर्फ अपनी बेटी का दर्द दिखाती थी और बहू के पसीने को अनदेखा कर देती थी। उन्होंने रात को सोने से पहले अंजलि के कमरे का दरवाजा खटखटाया।
अंजलि ने देखा तो मनोरमा जी हाथ में गर्म हल्दी वाला दूध का गिलास लिए खड़ी थीं।
“मम्मी जी, आप?”
मनोरमा जी ने दूध का गिलास अंजलि के हाथ में थमाया और उसके बालों को सहलाते हुए भर्राए गले से कहा, “बहू, आज तूने मेरी आंखें खोल दीं। बेटी के मोह में मैं इतनी अंधी हो गई थी कि यह भूल ही गई कि जिस तराजू में मैं अपनी बेटी का सुख तौल रही थी, उसी के दूसरे पलड़े पर किसी और की बेटी का चैन और सुकून रखा था। मुझे माफ कर दे बेटा। तूने आज सिर्फ स्वाति का घर बिगड़ने से नहीं बचाया, बल्कि मुझे भी एक अच्छी सास बनने का रास्ता दिखा दिया।”
अंजलि की आंखों से आंसू छलक पड़े, लेकिन इस बार वे दर्द के नहीं, अपनेपन और सुकून के थे। उसने मनोरमा जी को गले से लगा लिया। घर की चौखट पर रिश्तों का नया सवेरा हो चुका था, जहाँ अब बेटी और बहू के बीच कोई फासला नहीं बचा था।
ससुराल और मायके के बीच संतुलन बनाना हर स्त्री के लिए एक चुनौती होता है, लेकिन क्या हर छोटी परेशानी पर मायके पर बोझ डालना सही है? क्या एक सास को अपनी बेटी और बहू के दर्द में फर्क करना चाहिए? आपकी इस बारे में क्या राय है, हमें अपनी प्रतिक्रिया जरूर बताएं।
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मूल लेखिका : रश्मि प्रकाश