“महक , मेरी बात ध्यान से सुनो…” मीरा ने एक गहरी साँस लेते हुए अपनी छोटी बहन की आँखों में देखा। “आज तुम जिस मोड़ पर खड़ी हो, सालों पहले मैं भी ठीक वहीं खड़ी थी। तुम कहती हो कि तुम्हें अपनी ज़िंदगी अपने हिसाब से जीनी है, ये समाज और इसके बनाए नियम तुम्हें सिर्फ बेड़ियां लगते हैं। मैं भी बिल्कुल तुम्हारे जैसी ही आज़ाद और बागी विचारों वाली लड़की थी। मुझे लगता था कि ये शादी, फेरे, और रस्में सब पुराने ज़माने के खोखले ढकोसले हैं।”
मीरा की आँखों में अतीत के पन्ने पलटने लगे। उसने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, “मैं उन दिनों एक बड़ी एडवरटाइजिंग एजेंसी में काम करती थी। मेरे ही डिपार्टमेंट में एक लड़का था, नीलेश। वह दिखने में बहुत ही साधारण, सांवला और बेहद शांत स्वभाव का था। लेकिन उसका दिल बहुत साफ़ था। पूरा ऑफिस जानता था कि नीलेश मुझे मन ही मन बहुत चाहता है। वह मेरी हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का खयाल रखता था। कभी मेरे डेस्क पर चुपचाप कॉफी रख जाता, तो कभी मेरे रुके हुए काम को पूरा कर देता। लेकिन मेरी नज़रों में उसकी कोई अहमियत नहीं थी। मुझे वह बहुत ‘बोरिंग’ और पिछड़े ख्यालों का लगता था। मैं उससे सीधे मुँह बात करना भी पसंद नहीं करती थी।”
मीरा ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, “मेरे सपनों का राजकुमार तो कोई और ही था—विक्रम। विक्रम हमारी एजेंसी का एक बहुत बड़ा और अमीर क्लाइंट था। उसकी शानदार पर्सनालिटी, उसका फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोलना और उसकी महंगी गाड़ियां… मैं उसकी तरफ चुंबक की तरह खिंचती चली गई। विक्रम भी मुझमें दिलचस्पी लेने लगा था। हमारी मुलाक़ातें ऑफिस के बाहर भी होने लगीं। कॉफी शॉप्स से लेकर लेट नाईट पार्टीज़ तक, मुझे लगने लगा था कि यही वो मॉडर्न लाइफ है जिसकी मुझे तलाश थी। फिर एक दिन हमने तय किया कि हम बिना शादी किए एक साथ ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ में रहेंगे। महक , उस समय लिव-इन का चलन आज की तरह आम नहीं था। समाज इसे एक बहुत बड़ा कलंक मानता था।”
महक चुपचाप अपनी बड़ी बहन की बातें सुन रही थी। मीरा ने आगे बताया, “तुम्हारी तरह मैंने भी एक दिन हिम्मत करके अपने माता-पिता को यह बात बता दी। जब मैंने घर पर विक्रम के साथ बिना शादी के रहने की बात कही, तो जैसे हमारे घर में भूचाल आ गया। दोनों ने मुझे घंटों समझाने की कोशिश की। पापा ने तो मेरे सामने हाथ जोड़ लिए थे और रोते हुए कहा था—’बेटी, अगर तू विक्रम से ही प्यार करती है और वो तेरा सच्चा साथी है, तो मैं तेरी उससे धूमधाम से शादी करवा देता हूँ। मैं समाज के हर ताने सह लूँगा, लेकिन बिना फेरों के, बिना किसी सामाजिक मान्यता और इज़्ज़त के, मैं तुझे उसके साथ रहने की इज़ाज़त नहीं दे सकता। तू मेरी पगड़ी है, इसे ऐसे मत उछाल।'”
“फिर माँ ने भी रोते हुए मेरे सिर पर हाथ फेरा और कहा था—’मीरा, जो मर्द आज पूरी दुनिया के सामने तुम्हारा हाथ पकड़ने से कतरा रहा है, वो कल ज़िम्मेदारी उठाने से भी भागेगा। ये आज़ादी नहीं है मेरी बच्ची, ये सिर्फ ज़िम्मेदारियों से भागने का एक बहाना है। एक कच्ची डोर पर अपनी पूरी ज़िंदगी मत लटका।’ लेकिन महक , मेरे सिर पर तो विक्रम के प्यार और आधुनिकता का ऐसा बुखार चढ़ा था कि मुझे माता-पिता के वो सच्चे आँसू भी एक दिखावा लग रहे थे।”
मीरा की आवाज़ भर्रा गई। “मैंने अपने परिवार को, उनके प्यार को ठुकरा दिया और विक्रम के साथ एक आलीशान फ्लैट में शिफ्ट हो गई। शुरुआत के कुछ महीने किसी हसीन और जादुई सपने जैसे थे। कोई रोक-टोक नहीं थी। लेकिन जैसे ही ज़िंदगी की असलियत सामने आई, विक्रम का वो नकाब उतरने लगा। वह बहुत ही स्वार्थी और आत्मकेंद्रित इंसान था। जब मेरी कंपनी में अचानक छंटनी हुई और मेरी नौकरी चली गई, तो विक्रम का बर्ताव पूरी तरह बदल गया। जो इंसान कल तक मुझ पर पैसे लुटाता था, आज उसे मेरा फ्लैट में रहना खटकने लगा। वह मुझसे चिढ़ने लगा, मुझे ताने देने लगा। जब मुझे टाइफाइड हुआ और मैं हफ़्तों बिस्तर पर पड़ी रही, तो उसने मुझे डॉक्टर के पास ले जाने तक की ज़हमत नहीं उठाई। अंततः एक दिन वह मुझे उस किराए के फ्लैट में अकेला और बीमार छोड़कर किसी और के साथ विदेश चला गया।”
महक की आँखें फटी रह गईं।
“मैं पूरी तरह टूट चुकी थी, महक । मेरे पास ना पैसे थे, ना स्वास्थ्य और ना ही घर लौटने की हिम्मत। उस भयानक अंधेरे में, जब मुझे लगा कि मेरी ज़िंदगी खत्म हो गई है, तब जानते हो कौन सामने आया? नीलेश। उसे किसी दोस्त के ज़रिए मेरी हालत का पता चल गया था। उसने मुझे उस बदहाली से निकाला, अस्पताल में भर्ती कराया और सबसे बड़ी बात… वो मेरे माता-पिता को लेकर आया। मेरे पापा ने मुझे कोई ताना नहीं दिया, बस गले लगाकर फूट-फूट कर रोए।”
मीरा ने महक के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। “महक , प्यार सिर्फ साथ घूमना या समाज की परवाह न करने के बड़े-बड़े दावे करना नहीं है। प्यार वो है जो बुरे वक्त में तुम्हारा हाथ ना छोड़े। जो इंसान तुम्हारे सम्मान के लिए, तुम्हें एक ‘नाम’ देने के लिए समाज से नहीं लड़ सकता, वो तुम्हारे हकों के लिए कभी खड़ा नहीं होगा। नीलेश के उस निस्वार्थ साथ ने मुझे सिखाया कि चमकती हुई हर चीज़ सोना नहीं होती। मैंने बाद में नीलेश के उसी सांवले रंग के पीछे छिपे एक सच्चे, ईमानदार और मज़बूत इंसान को पहचाना। आज मैं नीलेश की पत्नी हूँ और दुनिया की सबसे खुशकिस्मत औरत हूँ। आज़ादी के नाम पर ऐसे फैसले मत लो जो तुम्हें अपनों से और तुम्हारे अपने आत्मसम्मान से ही दूर कर दें।”
महक की आँखों से अब आँसू बह रहे थे। उसे समझ आ गया था कि आज़ादी और ज़िम्मेदारी के बीच का फासला क्या होता है।
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लेखिका : नमिता पंडित