“माँ जी, मैंने आपको कितनी बार मना किया है कि आप रसोई के किसी भी काम में हाथ मत लगाया कीजिए। ये बर्तन मैं खुद मांज लूंगी और रोटियां भी सेंक लूंगी। आप बस अपने कमरे में जाकर आराम कीजिए।” मेघा ने अपनी सास कमला देवी के हाथ से आटे की परात लेते हुए बहुत ही सख्त लहजे में कहा।
कमला देवी ने एक गहरी ठंडी सांस ली और चुपचाप बिना कुछ कहे रसोई से बाहर निकल आईं। अपने कमरे में आकर वो बिस्तर पर लेट गईं, लेकिन इतने आराम के बावजूद नींद उनकी आँखों से कोसों दूर थी। बंद पलकों के किनारों से आंसू छलक कर उनके तकिए के गिलाफ को भिगोने लगे।
पिछले कुछ हफ्तों से उनके साथ रोज़ यही हो रहा था। अचानक से मेघा का बर्ताव पूरी तरह से बदल गया था। जो मेघा पहले उनके साथ रसोई में खड़े होकर दुनिया भर की बातें करती थी, साथ मिलकर अचार डालती थी और स्वेटर बुनती थी, वही मेघा अब उन्हें घर के किसी भी काम को हाथ नहीं लगाने देती थी।
हद तो तब हो गई जब उसने कमला देवी का खाना भी उनके कमरे में ही भिजवाना शुरू कर दिया। शुरुआत में कमला देवी को लगा कि शायद मेघा उनके बुढ़ापे का ख्याल रखते हुए उन्हें आराम देना चाहती है। उन्हें अपनी बहू पर बहुत प्यार आया कि वह उनका कितना ध्यान रखती है। लेकिन जल्द ही उनके मन का यह भ्रम टूट गया और उन्हें लगने लगा कि मेघा शायद अब उन्हें घर में एक बोझ समझने लगी है।
इस भ्रम के टूटने की वजह थी वह बात, जो कमला देवी ने दो दिन पहले रात के अंधेरे में अपने बेटे रोहन और मेघा के बीच सुनी थी।
उस रात कमला देवी को बहुत प्यास लग रही थी। उनके कमरे के जग में पानी खत्म हो गया था, इसलिए वह पानी लेने के लिए रसोई की तरफ जा रही थीं। घर में चारों तरफ सन्नाटा था। जैसे ही वह रोहन और मेघा के कमरे के पास से गुज़रीं, अंदर से मेघा की रुंधे गले वाली आवाज़ उनके कानों में पड़ी।
“पता नहीं माँ जी की यह बीमारी कब जाएगी… मुझे बिल्कुल अच्छा नहीं लगता उन्हें इस तरह एक ही कमरे में पड़े हुए देखना। मैं थक गई हूँ इस रोज़-रोज़ की घुटन और डर से। ऐसे कब तक चलेगा रोहन?”
यह शब्द कमला देवी के कानों में किसी पिघले हुए सीसे की तरह उतरे थे। उनके कदम वहीं रुक गए। उन्हें लगा जैसे किसी ने उनके दिल पर एक बहुत भारी पत्थर रख दिया हो। अच्छा तो यह बात थी! मेघा उनकी सेवा नहीं कर रही थी, बल्कि वह उन्हें इस घर में एक छूत की बीमारी की तरह समझ रही थी जिसे बाकी सब से अलग-थलग एक कमरे में कैद कर दिया गया था।
कमला देवी बिना पानी पिए अपने कमरे में वापस लौट आईं। उस रात वह पूरी रात रोती रहीं। उन्होंने सोच लिया कि शायद उन्हें कोई ऐसी भयंकर और छुआछूत की बीमारी हो गई है जिसके बारे में बच्चों ने उन्हें बताया नहीं है। मेघा उनसे इसी बीमारी के कारण घिन खाने लगी है और उनके काम करने से उसे परेशानी होती है। कमला देवी का स्वाभिमान अंदर ही अंदर घुटने लगा। उन्होंने अकेले ही अपने पति के गुज़रने के बाद रोहन को पाला था और मेघा को एक बहू नहीं बल्कि बेटी की तरह रखा था। लेकिन आज उम्र के इस आखिरी पड़ाव पर उन्हें एक अछूत और बोझ की तरह महसूस कराया जा रहा था।
अगली सुबह सूरज की किरणें निकलने के साथ ही कमला देवी ने अपना फैसला कर लिया। एक माँ कभी अपने बच्चों पर बोझ नहीं बन सकती। उन्होंने एक पुराने थैले में अपनी दो-चार साड़ियाँ और अपने स्वर्गीय पति की एक तस्वीर रखी। घर में सब सो रहे थे। वह दबे पाँव मुख्य दरवाज़े की तरफ बढ़ने लगीं। उनका इरादा शहर के किनारे बने एक वृद्धाश्रम में चले जाने का था, ताकि मेघा और रोहन को उनकी इस ‘बीमारी’ से छुटकारा मिल सके।
जैसे ही उन्होंने दरवाज़े की कुंडी खोली, अचानक पीछे से एक आवाज़ आई।
“माँ जी! आप इतनी सुबह-सुबह यह थैला लेकर कहाँ जा रही हैं?” मेघा की आवाज़ में एक अजीब सी घबराहट और डर था। उसके हाथ में चाय का कप था जो उसके कांपते हाथों से छलक रहा था।
आवाज़ सुनकर रोहन भी हड़बड़ा कर अपने कमरे से बाहर आ गया। कमला देवी की आँखों से अब आंसुओं का बांध टूट चुका था। उन्होंने पलटकर मेघा की तरफ देखा और भर्राई हुई आवाज़ में कहा, “मुझे वृद्धाश्रम जाने दो मेघा। मैं जानती हूँ कि मेरी बीमारी की वजह से तुम दोनों कितने परेशान हो। मैं नहीं चाहती कि मेरे कारण तुम्हें कोई घुटन या डर महसूस हो। तुम मेरी वजह से रोज़-रोज़ थक जाती हो। मैंने उस रात तुम दोनों की बातें सुन ली थीं बहू… मुझे जाने दो, कम से कम तुम लोग तो चैन से जी पाओगे।”
कमला देवी की बातें सुनकर मेघा के हाथ से चाय का कप छूटकर ज़मीन पर गिर पड़ा। वह दौड़कर अपनी सास के पैरों के पास ज़मीन पर बैठ गई और उनके दोनों पैर पकड़ कर फूट-फूट कर रोने लगी।
“ये आप क्या कह रही हैं माँ जी? आपने मेरी बात का क्या मतलब निकाल लिया?” मेघा सुबकते हुए बोली।
रोहन ने आगे बढ़कर अपनी माँ को सहारा दिया और उन्हें सोफे पर बिठाया। रोहन की आँखों में भी नमी थी। उसने अपनी माँ का हाथ पकड़ कर कहा, “माँ, आपने सिर्फ आधी बात सुनी। आपको कोई छुआछूत की बीमारी नहीं है जिससे मेघा को घिन आए। याद है पंद्रह दिन पहले आप रसोई में काम करते हुए अचानक बेहोश हो गई थीं? जब हम आपको डॉक्टर के पास ले गए, तो डॉक्टर ने बताया कि आपके दिल की धड़कन बहुत कमज़ोर हो चुकी है। आपकी एक नस ब्लॉक है। डॉक्टर ने साफ कहा था कि अगर आपने थोड़ा सा भी भारी काम किया या आप थकीं, तो आपको किसी भी पल जानलेवा हार्ट अटैक आ सकता है।”
कमला देवी हैरानी से अपने बेटे का मुँह देखने लगीं। रोहन ने आगे कहा, “मेघा ने उसी दिन अस्पताल में कसम खाई थी कि जब तक आपका इलाज पूरा नहीं हो जाता और आप पूरी तरह ठीक नहीं हो जातीं, वह आपको एक तिनका भी नहीं उठाने देगी। वह आपका खाना कमरे में इसलिए लाती थी ताकि आपको सीढ़ियां ना चढ़नी पड़ें।”
मेघा ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा, “माँ जी, उस रात मैं रोहन से यही कह रही थी कि पता नहीं आपकी यह बीमारी कब जाएगी। आपको दिन भर एक कमरे में कैद देखकर मुझे बहुत रोना आता है। मैं डरती हूँ कि कहीं आपको कुछ हो न जाए। इस डर ने मुझे थका दिया है। मैं तो उस दिन का इंतज़ार कर रही हूँ जब आपकी बीमारी ठीक हो और आप वापस मेरे साथ रसोई में खड़े होकर मुझे मेरे मायके वालों के ताने दें। आपने मुझे इतना पराया समझ लिया कि मुझे अपनी सेवा करने वाली एक स्वार्थी औरत मान लिया?”
कमला देवी को अब अपनी गलती का अहसास हो रहा था। उन्होंने जो सुना था, उसका कितना गलत अर्थ निकाल लिया था। मेघा की डांट और सख्ती के पीछे कोई नफरत नहीं थी, बल्कि एक बेटी का वो खौफ था जो अपनी माँ को खोने से डरती है।
कमला देवी ने झुककर मेघा को अपने गले से लगा लिया। दोनों सास-बहू एक-दूसरे के गले लगकर ऐसे रोईं जैसे बरसों की प्यासी ज़मीन पर बारिश हो गई हो। उस दिन के बाद से कमला देवी ने कभी मेघा की नीयत पर शक नहीं किया। रिश्ते में आई वह छोटी सी दरार अब पहले से भी ज़्यादा मज़बूत विश्वास में बदल चुकी थी। सच ही कहते हैं, हर खामोशी और हर कड़े फैसले के पीछे नफरत नहीं होती, कभी-कभी उसके पीछे ऐसा अथाह प्रेम छिपा होता है जिसे समझने के लिए कानों की नहीं, दिल की ज़रूरत होती है।
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लेखिका : कविया गोयल