रघुनाथ जी के लिए अपने ही घर के एक कोने में बैठकर अपनी बहू कृतिका की शिकायतें सुनना अब दिनचर्या का हिस्सा बन चुका था। आज सुबह भी कृतिका फोन पर अपनी सहेली से बात कर रही थी और उसकी आवाज़ रसोई से होते हुए रघुनाथ जी के कमरे तक साफ़ आ रही थी। “अरे क्या बताऊँ, ससुर जी के नखरे ही खत्म नहीं होते। उन्हें तो सुबह-सुबह वही गरम-गरम पराठे चाहिए, जो मेरी सास उन्हें खिलाया करती थीं। अब मेरे पास इतना समय कहाँ है कि मैं ऑफिस भी संभालूं और इनके लिए छप्पन भोग भी बनाऊँ?” रघुनाथ जी ने एक गहरी साँस ली और अपनी आरामकुर्सी पर पीछे की तरफ सिर टिका दिया। उन्होंने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, क्योंकि वह जानते थे कि अब इस घर में उनके शब्दों का कोई मोल नहीं रह गया है।
जब से उनकी पत्नी सुमित्रा का देहांत हुआ था, रघुनाथ जी का जीवन जैसे एक ठहरा हुआ तालाब बन गया था, जिसमें कोई लहर नहीं उठती थी। सुमित्रा के बिना यह बड़ा सा घर उन्हें काटने को दौड़ता था। उनके बेटे, विहान के पास अपने कॉर्पोरेट जीवन और अपनी उलझनों से फुरसत ही नहीं थी कि वह मुड़कर अपने पिता की आँखों में झांक सके और उनके अकेलेपन को पढ़ सके। विहान बुरा बेटा नहीं था, लेकिन वह आज के उस दौड़ते-भागते समाज का हिस्सा बन चुका था जहाँ सफलता की कीमत अपनों के समय से चुकाई जाती है। रघुनाथ जी को सबसे ज़्यादा तकलीफ़ अपने भोजन को लेकर होती थी। वह उम्र भर एक अच्छे और स्वादिष्ट भोजन के शौकीन रहे थे। सुमित्रा इस बात को बहुत अच्छी तरह समझती थी।
सुमित्रा के हाथों में जैसे अन्नपूर्णा का वास था। पैंतालीस साल के वैवाहिक जीवन में सुमित्रा ने रघुनाथ जी की हर पसंद और नापसंद का ख्याल रखा था। रघुनाथ जी को आज भी याद है कि कैसे सुमित्रा उनके बिना कहे ही उनकी पसंद की सब्ज़ी, दाल में खास तरह का तड़का और एकदम गोल, फूली हुई रोटियाँ उनके सामने परोस देती थी। कई बार जब रघुनाथ जी खाने की तारीफ करते हुए कहते कि “सुमित्रा, तुम्हारे हाथों का स्वाद दुनिया के किसी बड़े होटल में नहीं,” तो सुमित्रा मुस्कुराते हुए तंज कसती थी, “रहने दीजिए, ज़्यादा मक्खन मत लगाइए। मैं जानती हूँ आपको बस मेरा खाना पसंद है। लेकिन एक बात याद रखिएगा, जिस दिन मैं आँखें मूंद लूंगी, उस दिन आप मेरे इस खाने के लिए तरस जाएंगे। मेरी तरह आपको कोई इतने लाड़ से नहीं खिलाएगा।”
आज सुमित्रा की वह बात सोलह आने सच साबित हो रही थी। आज नाश्ते में जब कृतिका उन्हें सूखी ब्रेड और ओट्स का बाउल पकड़ा जाती, तो सुमित्रा के हाथों के बने उन कुरकुरे पराठों की महक रघुनाथ जी की स्मृतियों में ताज़ा हो जाती। लेकिन वे चुपचाप वही बेस्वाद खाना निगल लेते, क्योंकि अब उनके पास कोई और विकल्प नहीं था।
रघुनाथ जी अक्सर अतीत के झरोखों में खो जाते। सुमित्रा और उनका रिश्ता महज़ पति-पत्नी का नहीं, बल्कि दो पक्के दोस्तों का था। उन्होंने कभी सुमित्रा पर अपनी कोई बात नहीं थोपी और सुमित्रा ने कभी रघुनाथ जी के फैसलों पर सवाल नहीं उठाया। दोनों ने मिलकर बड़ी समझदारी और सामंजस्य से अपने छोटे से घर को एक खुशहाल आशियाना बनाया था। सुमित्रा सिर्फ एक अच्छी पत्नी ही नहीं, बल्कि एक बेहद कुशल गृहिणी थी। रघुनाथ जी की जो भी सीमित आय थी, उसी में सुमित्रा ने पूरे घर का संचालन इतनी खूबी से किया कि कभी किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं होने दी। घर में आने वाले मेहमानों का स्वागत वह हमेशा चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान के साथ करती थी। अतिथि सत्कार में सुमित्रा कभी कोई कसर नहीं छोड़ती थी, और यह बात रघुनाथ जी को बहुत गर्व से भर देती थी।
उन्हें वह दौर भी याद था जब रघुनाथ जी के बूढ़े माता-पिता उनके साथ आकर रहने लगे थे। सुमित्रा ने कभी भी अपनी सास (रघुनाथ जी की माता जी) के प्रति कोई कड़वाहट या बोझिल भाव नहीं दिखाया। आज की कृतिका की तरह उसने कभी मायके या सहेलियों से सास-ससुर की बुराई नहीं की। बल्कि, सुमित्रा ने अपनी सास की इतनी मन से सेवा की थी कि अंतिम समय में उनकी माता जी ने सुमित्रा का हाथ पकड़कर उसे दुनिया भर की दुआएं दी थीं। सुमित्रा के उसी समर्पण और निस्वार्थ प्रेम ने रघुनाथ जी के दिल में उसके लिए एक ऐसा मंदिर बना दिया था, जिसकी जगह कोई और नहीं ले सकता था।
लेकिन आज का समय कितना बदल गया है, यह सोचकर रघुनाथ जी अक्सर हैरान रह जाते। उन्होंने महसूस किया कि आज की पीढ़ी में रिश्तों से ज़्यादा दिखावे की अहमियत हो गई है। लोग बाहर वालों के सामने अपनी छवि चमकाने में इतने व्यस्त हैं कि अपने ही घर के बुजुर्गों के लिए उनके पास एक मीठा शब्द नहीं है। सप्ताहांत में विहान और कृतिका घर पर बड़ी-बड़ी पार्टियां रखते। बाहर से तरह-तरह का महंगा खाना आता, लोग हंसते-बोलते, तस्वीरें खींचकर सोशल मीडिया पर डालते। उन तस्वीरों में एक ‘हैप्पी फैमिली’ का टैग होता, लेकिन उस भीड़ में रघुनाथ जी अपने ही कमरे में अकेले बैठकर अपनी दवाइयों का समय गिन रहे होते। कोई उनसे यह पूछने भी नहीं आता कि “बाबूजी, आपने खाना खाया या नहीं?”
इन सब बातों से रघुनाथ जी को शुरू-शुरू में बहुत ठेस पहुँचती थी। उन्हें लगता था कि क्या उन्होंने विहान को यही संस्कार दिए थे? क्या इसी दिन के लिए उन्होंने अपनी सारी जमा-पूंजी विहान की पढ़ाई और उसके भविष्य पर खर्च कर दी थी? लेकिन फिर उन्होंने स्थिति की वास्तविकता को स्वीकार करना शुरू कर दिया। उन्होंने विहान से कोई शिकायत करना बंद कर दिया। वे जानते थे कि अगर वे कुछ कहेंगे तो घर में सिर्फ क्लेश होगा, जिससे कृतिका और विहान के वैवाहिक जीवन में तनाव आएगा, और एक पिता होने के नाते वे ऐसा कभी नहीं चाहते थे। इसलिए उन्होंने खुद को परिस्थितियों के सांचे में ढालने का फैसला किया।
एक बार उनकी बेटी, अंजलि, मायके आई हुई थी। अंजलि को जब रघुनाथ जी की उदासी और खाने-पीने की दिक्कतों का पता चला, तो उसने अपने पिता का साथ देने के बजाय उन्हें ही व्यावहारिक दुनिया का पाठ पढ़ा दिया। अंजलि ने रघुनाथ जी के पास बैठकर कहा, “पापा, आपको भी समझना चाहिए कि समय बदल गया है। कृतिका कोई माँ जैसी हाउसवाइफ नहीं है, जो पूरा दिन रसोई में खटती रहे। उसकी अपनी जॉब है, अपना करियर है। आपको भी अपने पुराने खाने-पीने की आदतों को बदलना होगा। अब माँ नहीं रहीं जो आपको हर समय आपके स्वाद का खाना बनाकर दें। हम बच्चों से आप माँ वाली उम्मीद मत रखिए। आपको थोड़ा एडजस्ट करना ही पड़ेगा।”
अंजलि की बातों ने रघुनाथ जी के हृदय पर एक गहरी चोट की, लेकिन उस चोट ने उनकी आँखें भी पूरी तरह खोल दीं। जिस बेटी को उन्होंने उँगलियाँ पकड़कर चलना सिखाया था, आज वह उन्हें समय के साथ चलने का नया सबक दे रही थी। रघुनाथ जी समझ गए कि अब उनका इस दुनिया में कोई ऐसा नहीं है जो उनकी भावनाओं की गहराई को समझ सके। सुमित्रा के जाने के बाद उनका असली घर भी जैसे उजड़ चुका था, अब तो वे केवल एक इमारत में समय काट रहे थे।
अगले दिन से रघुनाथ जी ने अपनी दिनचर्या पूरी तरह बदल ली। उन्होंने नाश्ते या खाने को लेकर कभी कोई फरमाइश नहीं की। कृतिका जो भी उनके कमरे में भिजवा देती, वे उसे ईश्वर का प्रसाद समझकर चुपचाप खा लेते। स्वाद की वह ग्रंथियां, जो कभी सुमित्रा के पकवानों के लिए मचलती थीं, उन्होंने उन पर हमेशा के लिए संयम की चादर ओढ़ा दी। अब वे अपना ज़्यादातर समय पास के एक पार्क में बिताते। वहां उनके जैसे और भी कई बुजुर्ग आते थे, जिनकी कहानियाँ कमोबेश उन्हीं के जैसी थीं। वहां वे पुरानी बातें करते, सुमित्रा को याद करते और उस सुखद समय को जीते जो अब कभी वापस नहीं आने वाला था।
रघुनाथ जी अब समझ चुके थे कि जीवन एक बहती नदी है, जिसे पत्थरों और चट्टानों के बीच से अपना रास्ता खुद बनाना पड़ता है। उन्होंने अपने अकेलेपन को अपनी ताकत बना लिया। घर के भीतर उनकी खामोशी ने एक ऐसा सामंजस्य स्थापित कर दिया था, जिससे विहान और कृतिका को कोई परेशानी नहीं होती थी, और रघुनाथ जी को किसी से कोई उम्मीद नहीं थी। वे हर दिन बस उस समय का इंतज़ार करते, जब उनका बुलावा आएगा और वे फिर से उस लोक में सुमित्रा से मिल सकेंगे, जहाँ कोई उनसे यह नहीं कहेगा कि ‘अब आपको एडजस्ट करना पड़ेगा’, बल्कि सुमित्रा फिर से मुस्कुरा कर कहेगी, ‘आइए, मैं कब से आपका ही इंतज़ार कर रही थी, देखिए आपकी पसंद की सब्ज़ी बनाई है।’
क्या आपने भी अपने आस-पास या अपने परिवार में किसी बुजुर्ग को ऐसे मौन संघर्ष और अकेलेपन से गुज़रते देखा है? क्या हमें अपनी भागदौड़ भरी ज़िंदगी में उन लोगों के लिए थोड़ा समय नहीं निकालना चाहिए जिन्होंने अपना पूरा जीवन हमें बनाने में लगा दिया?
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#यादों की पगडंडी और सूना आँगन
लेखिका : हर्षिता सिंह