“मैं वहां खड़ा रहा, बुत बनकर,” अमन ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा। “मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था। एक तरफ वो लोग थे जो बिना सोचे-समझे खाना फेंक रहे थे, और दूसरी तरफ वो मासूम जो उसी जूठन को अपनी ज़िंदगी मानकर खा रहे थे। ये कैसी दुनिया है नेहा? एक ही शहर में, एक ही सड़क के इस पार और उस पार ज़िंदगी का इतना बड़ा फासला कैसे हो सकता है? किसी के पास इतना ज्यादा है कि वो उसे बर्बाद कर रहा है, और किसी के पास इतना भी नहीं कि उसे एक वक्त की साफ रोटी नसीब हो सके।”
रात के करीब बारह बज चुके थे। महानगर की व्यस्त सड़कें अब कुछ शांत होने लगी थीं, लेकिन उस सन्नाटे को चीरती हुई एक कार आकर सोसाइटी के गेट पर रुकी। अमन जब अपनी गाड़ी से उतरा, तो उसके कदमों में वह रोज़ वाली फुर्ती नहीं थी। उसके कंधे झुके हुए थे और चेहरे पर एक अजीब सी उदासी छाई थी, मानो वो अपने साथ दुनिया भर का बोझ लेकर लौट रहा हो। उसने अपनी जेब से चाबी निकाली और धीरे से फ्लैट का दरवाज़ा खोला।
कमरे के अंदर हल्की पीली रोशनी फैली हुई थी। उसकी पत्नी नेहा सोफे पर बैठी किसी किताब के पन्ने पलट रही थी। अमन को देखते ही नेहा के चेहरे पर एक मीठी सी मुस्कान आ गई। वह तुरंत उठी और पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाते हुए बोली, “आ गए तुम? आज तो बहुत देर कर दी। मैं तो सोच रही थी कि शायद पार्टी में दोस्तों के साथ वक्त का पता ही नहीं चला होगा।”
अमन ने बिना कोई जवाब दिए पानी का गिलास लिया, एक घूंट पिया और गिलास वापस मेज पर रख दिया। उसकी नज़रें ज़मीन पर गड़ी थीं। वह चुपचाप जाकर सोफे के एक कोने में बैठ गया।
नेहा, जो पिछले सात सालों से अमन की हर खामोशी को पढ़ना जानती थी, तुरंत समझ गई कि कुछ तो ऐसा हुआ है जिसने उसके पति को अंदर तक हिला दिया है। वह अमन के पास जाकर बैठ गई। उसने प्यार से अमन के माथे पर हाथ रखा और महसूस किया कि वह अंदर से कितना अशांत है।
“अमन, मैं तुम्हारे लिए तुम्हारी पसंद की कैमोमाइल चाय लेकर आती हूँ, फिर आराम से बात करते हैं,” इतना कहकर नेहा रसोई की तरफ मुड़ गई। कुछ ही मिनटों में वह दो कप गर्म चाय लेकर लौटी। चाय की भीनी-भीनी महक ने कमरे की खामोशी को थोड़ा तोड़ा।
नेहा ने चाय का कप अमन के हाथों में थमाया और उसकी आँखों में झांकते हुए बहुत ही कोमल स्वर में पूछा, “अब बताओ, क्या बात है? तुम इस तरह से चुप बैठे हो, ये मुझसे देखा नहीं जा रहा। क्या ऑफिस में किसी प्रोजेक्ट को लेकर कोई तनाव है? या दोस्तों के साथ कोई बहस हो गई?”
अमन ने एक गहरी सांस ली। उसकी आँखें लाल हो रही थीं और आवाज़ में एक हल्का सा कंपन था। “नहीं नेहा, ऐसा कुछ नहीं है। बस… आज एक ऐसा नज़ारा देख लिया जिसे देखकर मेरा इंसान होने पर से ही भरोसा उठ गया है। मन अंदर से इतना घबराया हुआ और दुखी है कि मैं तुम्हें शब्दों में शायद बयान भी न कर पाऊं।”
“कैसा नज़ारा?” नेहा ने अमन का हाथ अपने हाथों में लेते हुए पूछा।
अमन ने चाय का कप मेज पर रखा और शून्य में घूरते हुए अपनी बात शुरू की, “तुम जानती हो कि आज मैं अपने बॉस की शादी की सालगिरह की पार्टी में गया था। शहर का सबसे बड़ा और महंगा फाइव स्टार होटल बुक था। पार्टी में कोई कमी नहीं थी। दुनिया भर के पकवान वहां मौजूद थे—इटैलियन, चाइनीज़, कॉन्टिनेंटल, और न जाने क्या-क्या। हर तरफ बस चकाचौंध थी। लोग बड़े-बड़े लिबासों में आ रहे थे, महंगे तोहफे दे रहे थे, और अपनी रईसी का दिखावा कर रहे थे। लेकिन मुझे जिस चीज़ ने सबसे ज्यादा परेशान किया, वो था वहां का खाना और लोगों का रवैया।”
अमन रुका, उसने एक बार फिर गहरी सांस ली और आगे बोला, “लोग अपनी प्लेटों में इतना खाना भर रहे थे, जितना वो खा भी नहीं सकते। बस हर चीज़ का स्वाद चखना था उन्हें। आधी प्लेट खाकर वो उसे ऐसे ही डस्टबिन में डाल रहे थे। मैंने अपनी आँखों के सामने किलो के हिसाब से मिठाइयां, ताज़ा फल और बेहतरीन खाना कूड़े में जाते देखा। मुझे अंदर से एक अजीब सी घुटन होने लगी, इसलिए मैं थोड़ा जल्दी बाहर निकल आया।”
नेहा चुपचाप सुन रही थी। वह जानती थी कि अमन का दिल बहुत कोमल है, लेकिन बात सिर्फ इतनी नहीं थी। कुछ और भी था जिसने उसे इतना व्यथित किया था। “फिर क्या हुआ?” उसने हौले से पूछा।
“बाहर आकर मैं अपनी गाड़ी का इंतज़ार कर रहा था,” अमन की आवाज़ अब और भारी हो गई थी, “तभी मेरी नज़र होटल के पिछले हिस्से की तरफ गई, जहां से सारा कचरा बाहर निकाला जाता है। वहां एक बड़ा सा कूड़ेदान रखा था और उसके पास… उसके पास दो छोटे-छोटे बच्चे, शायद सात और पांच साल के होंगे, एक फटे हुए बोरे पर बैठे थे। वो दोनों उसी कूड़ेदान से निकाले गए जूठे खाने के डिब्बों में से खाना ढूंढ रहे थे।”
अमन की आँखों से अब आंसू बहने लगे थे। “नेहा, वो छोटी बच्ची एक जूठे रसगुल्ले को ऐसे खा रही थी जैसे उसे जन्नत मिल गई हो। और उसका छोटा भाई एक फेंकी हुई पूरी को कुत्तों से बचाकर अपने मुंह में ठूंस रहा था। पास ही सड़क से गुज़रते कुछ रईस लोग उन्हें देखकर नाक-भौं सिकोड़ रहे थे। कोई उन्हें भगाने की बात कर रहा था, तो कोई उनके मैले कपड़ों को देखकर दूर से ही बचकर निकल रहा था।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया। नेहा की आँखों में भी नमी आ गई थी।
“मैं वहां खड़ा रहा, बुत बनकर,” अमन ने अपने आंसू पोंछते हुए कहा। “मेरा दिमाग काम नहीं कर रहा था। एक तरफ वो लोग थे जो बिना सोचे-समझे खाना फेंक रहे थे, और दूसरी तरफ वो मासूम जो उसी जूठन को अपनी ज़िंदगी मानकर खा रहे थे। ये कैसी दुनिया है नेहा? एक ही शहर में, एक ही सड़क के इस पार और उस पार ज़िंदगी का इतना बड़ा फासला कैसे हो सकता है? किसी के पास इतना ज्यादा है कि वो उसे बर्बाद कर रहा है, और किसी के पास इतना भी नहीं कि उसे एक वक्त की साफ रोटी नसीब हो सके।”
अमन अपने हाथों से अपना चेहरा छिपाते हुए फूट-फूट कर रोने लगा। “मुझे अपने बचपन के वो दिन याद आ गए नेहा। वो दिन जब बाबूजी के गुज़र जाने के बाद, माँ दूसरों के घरों में बर्तन मांजती थी। कई रातें ऐसी होती थीं जब घर में सिर्फ मेरे लिए ही रोटी बनती थी और माँ ये कहकर पानी पीकर सो जाती थी कि उसका व्रत है। आज जब मैंने उन बच्चों को देखा, तो मुझे उस बच्ची में अपनी माँ का संघर्ष नज़र आया। मुझे ऐसा लगा जैसे मैं फिर से वही बेबस छोटा बच्चा बन गया हूँ।”
नेहा ने अमन को अपने गले से लगा लिया। वह उसे पीठ पर थपथपाते हुए शांत करने लगी। वह समझ चुकी थी कि अमन के मन में उसके अतीत का दर्द और वर्तमान की असमानता, दोनों एक साथ टकरा रहे हैं।
“अमन,” नेहा ने बहुत ही दृढ़ता लेकिन प्यार से कहा, “ये आंसू तुम्हारे उस दर्द की गवाही दे रहे हैं जो तुम्हारे अंदर एक इंसान के ज़िंदा होने का सबूत है। लेकिन सिर्फ रोने से या इस परिस्थिति को कोसने से कुछ नहीं बदलेगा। उन बच्चों का पेट तुम्हारे इन आंसुओं से नहीं भरेगा।”
अमन ने चेहरा उठाया और नेहा की तरफ देखा, “तो मैं क्या करूँ? मैं अकेला इस दुनिया की भूख कैसे मिटा सकता हूँ? जब भी मैं ऐसी चीज़ें देखता हूँ, मेरा खुद पर से, अपनी कामयाबी पर से विश्वास उठ जाता है।”
“तुम पूरी दुनिया की भूख अकेले नहीं मिटा सकते, लेकिन तुम उस दुनिया के एक छोटे से हिस्से को ज़रूर बदल सकते हो,” नेहा ने उसकी आँखों में आँखें डालते हुए कहा। “क्या तुम्हें याद है, जब हमने ये घर खरीदा था, तब तुमने क्या कहा था? तुमने कहा था कि हम कभी भी उस दर्द को नहीं भूलेंगे जहाँ से हम आए हैं। आज शायद वो वक्त आ गया है कि हम उस वादे को असल ज़िंदगी में उतारें।”
“कैसा वादा?” अमन ने उलझन में पूछा।
“यही कि हम सिर्फ अपने लिए नहीं जिएंगे। अमन, तुम एक बहुत अच्छी कंपनी में हो, तुम्हारी एक पहचान है। क्यों न हम अपनी तरफ से एक पहल करें? हम अपने आस-पास के होटलों, शादी के बैंक्वेट हॉल वालों से बात कर सकते हैं। जो खाना एकदम साफ होता है, जो बच जाता है, उसे कूड़े में जाने से पहले हम कुछ संस्थाओं की मदद से ज़रूरतमंदों तक पहुंचा सकते हैं। और कुछ नहीं तो कम से कम हर वीकेंड हम खुद अपने हाथों से खाना बनाकर बस्ती के उन बच्चों में बांट तो सकते हैं।”
अमन गौर से नेहा की बातें सुन रहा था। उसके चेहरे पर जो थोड़ी देर पहले गहरी निराशा थी, वहां अब एक हल्की सी उम्मीद की किरण दिखाई देने लगी थी।
“तुम एक पत्नी ही नहीं, मेरी सबसे बड़ी ताकत हो नेहा,” अमन ने नेहा का हाथ चूमते हुए कहा। “तुमने सही कहा। मैं सिर्फ दुखी होकर बैठ नहीं सकता। मेरे पास आज जो कुछ भी है, वो उसी माँ के आशीर्वाद और संघर्ष का नतीजा है जिसने कभी भूख से हार नहीं मानी। मैं उन बच्चों को जूठन नहीं खाने दूंगा।”
उस रात अमन और नेहा बहुत देर तक बातें करते रहे, लेकिन ये बातें अब दर्द की नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत की थीं। उन्होंने कागज़-कलम उठाया और एक छोटी सी योजना बनाई कि वे कैसे अपने स्तर पर खाने की बर्बादी को रोकने और भूखों को खाना खिलाने का काम शुरू करेंगे। अगले ही दिन से अमन ने अपने ऑफिस के दोस्तों और कुछ स्थानीय गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) से संपर्क करना शुरू कर दिया। धीरे-धीरे ही सही, लेकिन एक ऐसी मुहिम की शुरुआत हो चुकी थी जिसने न जाने कितने ही भूखे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान ला दी।
अमन का वो दुख अब उसकी ताकत बन चुका था। और इस पूरी यात्रा में, उसकी अर्धांगिनी नेहा, हर कदम पर उसके साथ एक मजबूत ढाल बनकर खड़ी थी।
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लेखिका : पुष्पा खंडेलवाल