मेघा को तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। रातों की नींद जो पिछले कई महीनों से हराम थी, वह अब वापस लौट आई थी। रात को कियान रोता, तो सुभद्रा ही उठकर उसे संभालती। अब मेघा सुबह उठकर आराम से योग करती, अपना डाइट नाश्ता लेती और सज-धज कर ऑफिस निकल जाती। वीकेंड्स पर भी वह और सिद्धार्थ अपनी पुरानी रूटीन में लौट आए थे—लेट नाइट पार्टीज, दोस्तों के साथ ब्रंच और शॉपिंग। कियान के लिए उनके पास बस दिन के कुछ घंटे होते थे, वो भी तब जब कियान शांत और खुश होता। जरा सा रोने या जिद करने पर उसे तुरंत वापस सुभद्रा की गोद में थमा दिया जाता। सोसाइटी के लोग और मेघा की सहेलियां हैरान थीं कि माँ बनने के बाद भी मेघा ने अपनी फिटनेस और लाइफस्टाइल को कैसे इतनी जल्दी मेंटेन कर लिया है। मेघा गर्व से कहती कि यह सब ‘स्मार्ट टाइम मैनेजमेंट’ का नतीजा है।
बेंगलुरु की तेज रफ्तार जिंदगी में रची-बसी मेघा और सिद्धार्थ की जोड़ी को हर कोई एक आदर्श जोड़ी मानता था। मेघा एक मल्टीनेशनल कंपनी में मार्केटिंग हेड थी और सिद्धार्थ का अपना एक उभरता हुआ आईटी स्टार्टअप था। शादी के बाद दोनों ने अपनी सहूलियत और करियर की महत्वाकांक्षाओं के हिसाब से शहर के एक बहुत ही महंगे और पॉश इलाके में अपना आशियाना बना लिया था। परिवार वालों की रोजमर्रा की दखलअंदाजी से दूर, वे अपनी शर्तों पर जिंदगी जी रहे थे। जीवन बिल्कुल वैसा ही चल रहा था जैसा उन्होंने प्लान किया था, एक परफेक्ट रूटीन जिसमें काम, वीकेंड पार्टीज और विदेश यात्राएं शामिल थीं। लेकिन फिर मेघा के जीवन में एक ऐसा मोड़ आया जिसने उसकी इस सधी हुई दिनचर्या को पूरी तरह से उलट-पुलट कर दिया। वह माँ बनने वाली थी।
कियान के जन्म के बाद शुरुआती कुछ दिन तो किसी उत्सव जैसे लगे। अस्पताल का वीआईपी सुइट, फूलों के गुलदस्ते, और सोशल मीडिया पर बधाई संदेशों का तांता। लेकिन जल्द ही असलियत ने उनके घर के दरवाजे पर दस्तक दे दी। बच्चे का रात-बेरात रोना, नींद पूरी न होना, और हर वक्त डायपर बदलने से लेकर दूध पिलाने की थकान ने मेघा को अंदर से तोड़ना शुरू कर दिया। उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो गया। सिद्धार्थ अपने स्टार्टअप की उलझनों और इन्वेस्टर्स की मीटिंग्स में इतना फंसा हुआ था कि वह चाहकर भी मेघा की ज्यादा मदद नहीं कर पाता था। रात को जब कियान रोता, तो सिद्धार्थ अक्सर तकिया लेकर दूसरे कमरे में जाकर सो जाता क्योंकि सुबह उसे ऑफिस में एक फ्रेश दिमाग के साथ खड़ा होना होता था।
मेघा की माँ अपनी नाती को देखने और मेघा की मदद करने के लिए दूसरे शहर से आईं, लेकिन वह मुश्किल से चार-पांच दिन ही रुक पाईं। उनके अपने घर की जिम्मेदारियां, उनके पति की दवाइयां और उनकी खुद की ढलती उम्र उन्हें ज्यादा दिन रुकने की इजाजत नहीं देती थी। वह जाते-जाते कियान के लिए ढेरों महंगे कपड़े, विदेशी खिलौने और अपना ढेर सारा आशीर्वाद दे गईं। लेकिन मेघा को आशीर्वाद और खिलौनों से ज्यादा एक ऐसे हाथ की जरूरत थी जो उसकी रातों की नींद लौटा सके। उसे अपना आराम, अपना सुख और अपनी पुरानी बेफिक्र जिंदगी याद आने लगी थी। बच्चे की जिम्मेदारी उसे एक बोझ लगने लगी थी जिससे वह किसी भी तरह आज़ाद होना चाहती थी। मातृत्व का वह त्याग, जिसकी कसमें उसने बच्चे के जन्म से पहले खाई थीं, अब उसे खोखला लगने लगा था। उसे लगने लगा था कि अगर वह घर पर ही बैठी रही, तो उसका करियर तबाह हो जाएगा।
ऐसे में घर के रोजमर्रा के काम-काज के लिए रखी गई अधेड़ उम्र की महिला, सुभद्रा, मेघा के लिए किसी फरिश्ते से कम साबित नहीं हुई। सुभद्रा बहुत ही सुलझी हुई और अनुभवी महिला थी, जिसने अपने जीवन में कई बच्चे पाले थे। मेघा ने देखा कि जब भी कियान रोता, सुभद्रा उसे गोद में लेकर ऐसी लय में थपकियां देती कि बच्चा पल भर में शांत होकर सो जाता। मेघा, जो अपने कॉर्पोरेट करियर में वापस लौटने के लिए तड़प रही थी और अपनी खोई हुई आज़ादी को हर कीमत पर वापस पाना चाहती थी, उसने एक फैसला लिया। उसने सुभद्रा को बच्चे की पूरी देखभाल का प्रस्ताव दिया।
मेघा की परेशानी देखकर सुभद्रा ने घर की साफ-सफाई के साथ-साथ कियान की पूरी जिम्मेदारी अपने सिर ले ली। मेघा ने सुभद्रा की तनख्वाह बढ़ा दी और उसे 24 घंटे के लिए अपने घर पर ही रख लिया। अब सुभद्रा शाम को अपने घर नहीं जाती थी। कियान के आलीशान कमरे में ही एक तरफ सुभद्रा का बिस्तर लगा दिया गया। मेघा ने एक्सेल शीट पर एक बहुत ही कड़क टाइम-टेबल बना दिया था—किस समय दूध देना है, कब नहलाना है, कब मालिश करनी है और कब सुलाना है। लेकिन उस टाइम-टेबल को लागू करने की पूरी जिम्मेदारी केवल सुभद्रा की थी।
मेघा को तो जैसे मुंहमांगी मुराद मिल गई। रातों की नींद जो पिछले कई महीनों से हराम थी, वह अब वापस लौट आई थी। रात को कियान रोता, तो सुभद्रा ही उठकर उसे संभालती। अब मेघा सुबह उठकर आराम से योग करती, अपना डाइट नाश्ता लेती और सज-धज कर ऑफिस निकल जाती। वीकेंड्स पर भी वह और सिद्धार्थ अपनी पुरानी रूटीन में लौट आए थे—लेट नाइट पार्टीज, दोस्तों के साथ ब्रंच और शॉपिंग। कियान के लिए उनके पास बस दिन के कुछ घंटे होते थे, वो भी तब जब कियान शांत और खुश होता। जरा सा रोने या जिद करने पर उसे तुरंत वापस सुभद्रा की गोद में थमा दिया जाता। सोसाइटी के लोग और मेघा की सहेलियां हैरान थीं कि माँ बनने के बाद भी मेघा ने अपनी फिटनेस और लाइफस्टाइल को कैसे इतनी जल्दी मेंटेन कर लिया है। मेघा गर्व से कहती कि यह सब ‘स्मार्ट टाइम मैनेजमेंट’ का नतीजा है।
समय पंख लगाकर उड़ा और कियान का पहला जन्मदिन आ गया। इस मौके पर मेघा और सिद्धार्थ ने अपनी सोसाइटी के क्लब हाउस में एक बहुत ही भव्य पार्टी का आयोजन किया। थीम डेकोरेशन से लेकर महंगे रिटर्न गिफ्ट्स तक, सब कुछ परफेक्ट था। सिद्धार्थ के माता-पिता, यानी कियान के दादा-दादी, खास तौर पर अपने पोते के पहले जन्मदिन में शामिल होने के लिए बनारस से बेंगलुरु आए थे। वे कियान को देखकर बेहद खुश थे और उसके लिए सोने की चेन, चांदी के खिलौने और ढेरों आशीर्वाद लेकर आए थे। मेघा के मायके से भी काफी लोग आए थे। मेहमानों का तांता लगा हुआ था और हर कोई बच्चे के लिए महंगे से महंगे उपहार ला रहा था।
पार्टी में हर कोई कियान की मासूमियत की तारीफ कर रहा था, लेकिन एक बात जो सिद्धार्थ के माता-पिता की पारखी नजरों से नहीं छुप पाई, वह थी बच्चे का शारीरिक विकास। एक साल का होने के बावजूद कियान न तो ठीक से खड़ा हो पा रहा था और न ही उसने घुटनों के बल चलना सीखा था। जब भी कोई उसे जमीन पर छोड़ता, वह डर कर रोने लगता और तुरंत सुभद्रा की तरफ हाथ बढ़ा देता। सुभद्रा भी ओवर-प्रोटेक्टिव होकर उसे तुरंत गोद में उठा लेती। असल में सुभद्रा को लगता था कि अगर बच्चा जमीन पर गिरेगा या उसे चोट लगेगी तो मेघा मैडम गुस्सा करेंगी, इसलिए वह पूरे दिन कियान को गोद में या प्राम (Pram) में ही रखती थी। उसे जमीन पर खेलने या खुद को संतुलित करने का कोई अभ्यास ही नहीं कराया गया था।
सिद्धार्थ की माँ, रमा जी, से जब रहा नहीं गया, तो उन्होंने कियान को सोफे का सहारा देकर खड़ा करने की कोशिश की। लेकिन कियान के पैरों में कोई जान ही नहीं थी, वह घबरा कर थप से जमीन पर गिर पड़ा और जोर-जोर से रोने लगा। सुभद्रा दौड़ कर आई और उसे सीने से लगा लिया।
रमा जी का चेहरा चिंता और निराशा से भर गया। उन्होंने आसपास खड़े लोगों की परवाह किए बिना सिद्धार्थ और मेघा की तरफ देखते हुए कहा, “यह क्या हाल बना रखा है बच्चे का? एक साल का हो गया और पैर नहीं टिका पा रहा। तुम लोगों की इसकी परवरिश पर कोई ध्यान ही नहीं है। सारा दिन नौकरानी की गोद में पड़ा रहता है, न जमीन पर घिसटता है, न खेलता है। हड्डियां कैसे मजबूत होंगी इसकी? बच्चे महंगे खिलौनों से नहीं, माँ-बाप के समय और सही देखभाल से पलते हैं। इसकी परवरिश बिल्कुल भी ठीक नहीं हो रही है।”
रमा जी की यह बात मेघा को किसी नुकीले तीर की तरह चुभी। उसके अंदर अपनी मातृत्व की कमियों को लेकर जो एक अनकहा सा अपराधबोध (गिल्ट) था, वह अब सबके सामने उजागर हो गया था। और इंसान जब अपनी गलती पर शर्मिंदा होने के बजाय डिफेन्सिव होता है, तो उसका गुस्सा फूटता है। भरे हॉल में मेहमानों के सामने अपनी इस तरह की बेइज्जती मेघा से बर्दाश्त नहीं हुई।
उसका गुस्सा ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। वह रमा जी की तरफ पलटकर तल्ख और तेज स्वर में बोली, “अगर आपको मेरी परवरिश में इतनी ही खोट नजर आ रही है, और आपको लगता है कि मैं अपने बच्चे को ठीक से नहीं पाल रही, तो आप लोग बनारस वापस क्यों जा रहे हैं? रहिए ना यहीं! अपना बोरिया-बिस्तर यहीं ले आइए और कीजिए इसकी परवरिश अपने पुराने और सही तरीकों से! मैं अपना करियर और अपनी जिंदगी छोड़कर चौबीस घंटे इसके पीछे नहीं भाग सकती!”
पार्टी के उस खुशनुमा माहौल में अचानक एक बर्फीला सन्नाटा छा गया। सिद्धार्थ सन्न खड़ा था, रमा जी की आँखों में आंसू आ गए थे, और सुभद्रा की गोद में बैठा कियान अपनी माँ के उस उग्र रूप को देखकर सहम गया था। उस पल वहां मौजूद हर शख़्स को यह समझ में आ गया था कि आज़ादी और आधुनिकता की अंधी दौड़ में एक मासूम बच्चे का बचपन बस एक नौकरानी के हाथों किराए पर चल रहा था।
क्या आपको लगता है कि मेघा का अपनी सास पर गुस्सा करना जायज था? क्या एक सफल करियर के लिए बच्चे की परवरिश पूरी तरह से नैनी या नौकरानी पर छोड़ देना सही है? कहानी के इस अंत पर आपके क्या विचार हैं? कमेंट करके जरूर बताएं!
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