रजत की झंकार

 माँ की बातें समीर के दिल में किसी तीर की तरह चुभ गईं। उसे अचानक एहसास हुआ कि पिछले कई महीनों से नंदिनी ने उससे कोई ज़िद नहीं की, वो पहले की तरह खिलखिला कर नहीं हंसी। उसने अपनी पत्नी को एक मशीन की तरह घर का काम करते हुए तो देखा, लेकिन उसकी आत्मा की आवाज़ को अनसुना कर दिया था। उस रात समीर बहुत देर तक सो नहीं पाया। उसे नंदिनी का वो मायूस चेहरा याद आने लगा, जब उसने पहली बार उसे पायल उतारने को कहा था।

नंदिनी को बचपन से ही पायलों का बहुत शौक था। जब वह छोटी थी, तो मेलों और बाज़ारों में अन्य बच्चे जहाँ खिलौनों या मिठाइयों के लिए ज़िद करते थे, वहीं नंदिनी की नज़रें हमेशा सुनार या मनिहार की दुकान पर टंगी चमकती हुई पायलों पर टिक जाती थीं। उसके लिए वो महज़ एक आभूषण नहीं थीं, बल्कि एक संगीत था जो उसके हर कदम के साथ बजता था। चाँदी की भारी पायलें, जिनमें ढेर सारे घुंघरू लगे होते थे, उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थीं। माँ अक्सर डांटती थीं कि पूरे घर में छम-छम करती भागती रहती है, सिर में दर्द कर देती है, लेकिन पिता मुस्कुरा कर कहते, “अरे, घर में बेटी की पायल ना गूंजे तो घर, घर कहाँ लगता है, वो तो आंगन की रौनक है।”

समय के साथ नंदिनी बड़ी हुई, लेकिन उसका पायलों के प्रति प्रेम कम होने के बजाय और गहरा होता गया। उसकी सहेलियां जहाँ ट्रेंडी कपड़े और मेकअप का शौक रखती थीं, वहीं नंदिनी के पास पायलों का एक बेहतरीन कलेक्शन था। मीनाकारी वाली पायलें, कुंदन जड़ी पायलें, घुंघरुओं के गुच्छे वाली भारी पायलें—उसके पास हर तरह का संग्रह था। जब उसकी शादी तय हुई, तो उसने अपने सूटकेस में कपड़ों और गहनों से ज़्यादा अहमियत अपने उस मखमली डिब्बे को दी, जिसमें उसकी सहेजी हुई दर्जनों पायलें रखी थीं। उसकी माँ ने भी अपनी लाडली के इस शौक को संवारने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी और विदाई में उसे चाँदी की एक बेहद खूबसूरत, वज़नी पायल भेंट की थी।

नंदिनी की शादी समीर से हुई। समीर एक मल्टीनेशनल कंपनी में सॉफ्टवेयर आर्किटेक्ट था। वह स्वभाव से बेहद शांत, गंभीर और अपने काम के प्रति पूरी तरह से समर्पित इंसान था। शादी के बाद जब नंदिनी अपनी छम-छम करती पायलों के साथ अपनी ससुराल पहुँची, तो घर में एक नई ऊर्जा का संचार हो गया। उसकी सास, कौशल्या जी, एक बेहद सुलझी हुई और प्रेम करने वाली महिला थीं। उन्होंने नंदिनी का गृहप्रवेश बहुत धूम-धाम से करवाया। शुरुआत के कुछ दिन बहुत अच्छे बीते। नंदिनी की पायल की आवाज़ पूरे घर में गूंजती रहती, जिससे कौशल्या जी को बहुत सुकून मिलता। उन्हें लगता कि घर में साक्षात लक्ष्मी आ गई है।

लेकिन समीर की जीवनशैली नंदिनी से बिल्कुल अलग थी। कोरोना महामारी के बाद से समीर ज़्यादातर ‘वर्क फ्रॉम होम’ (घर से काम) ही करता था। उसका काम ऐसा था जिसमें बहुत अधिक एकाग्रता और शांति की आवश्यकता होती थी। कोडिंग करते समय या विदेशी क्लाइंट्स के साथ मीटिंग के दौरान उसे पिन-ड्रॉप साइलेंस (पूर्ण शांति) चाहिए होता था।

एक दिन समीर अपनी एक बहुत महत्वपूर्ण मीटिंग में बैठा था। नंदिनी रसोई से चाय लेकर उसके कमरे की तरफ जा रही थी। उसकी पायलों की भारी ‘छम-छम’ की आवाज़ से समीर का ध्यान बार-बार भंग हो रहा था। जब नंदिनी ने कमरे में कदम रखा, तो समीर ने अपना लैपटॉप म्यूट किया और थोड़ी झुंझलाहट भरे स्वर में कहा, “नंदिनी, क्या तुम ये पायलें उतार नहीं सकती? जब देखो पूरे घर में शोर होता रहता है। मैं काम कर रहा हूँ, मुझे फोकस करने में बहुत दिक्कत होती है। प्लीज़, इनकी आवाज़ मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है।”

नंदिनी वहीं ठिठक गई। चाय का कप मेज़ पर रखते हुए उसके हाथ हल्के से कांपे। उसने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप सिर हिलाया और कमरे से बाहर आ गई। अपने कमरे में जाकर उसने बिस्तर पर बैठकर अपने पैरों की तरफ देखा। वो पायलें, जो उसे जान से भी प्यारी थीं, आज किसी के लिए शोर बन गई थीं। नंदिनी कभी भी घर में क्लेश या तनाव नहीं चाहती थी। उसने सोचा, “अगर मेरे शौक से समीर को इतनी परेशानी है, तो मैं ही समझौता कर लेती हूँ।” उसने उसी वक्त अपने पैरों से वो भारी पायलें खोल दीं और उन्हें उस मखमली डिब्बे में रख दिया। पैरों में बस एक काला धागा बाँध लिया।

अगले दिन से घर में एक अजीब सी खामोशी छा गई। नंदिनी अब पूरे घर में चलती, रसोई में काम करती, सीढ़ियां उतरती, लेकिन अब कोई झंकार नहीं होती थी। समीर को यह शांति बहुत अच्छी लगी। उसका काम बिना किसी रुकावट के हो रहा था। उसने एक बार भी मुड़कर नहीं देखा कि उस शांति की कीमत नंदिनी ने अपने सबसे प्यारे शौक की बलि देकर चुकाई है। नंदिनी ने भी कभी समीर से कोई शिकायत नहीं की, लेकिन उसके भीतर की वो चुलबुली, खुशमिज़ाज लड़की कहीं उस मखमली डिब्बे के साथ ही अलमारी के एक कोने में बंद हो गई थी।

महीने बीतते गए। घर का माहौल शांत तो था, लेकिन अब उसमें वो पहले वाली जीवंतता नहीं थी। कौशल्या जी, जो उम्र के उस पड़ाव पर थीं जहाँ इंसान शब्दों से ज़्यादा खामोशियों को पढ़ लेता है, उन्होंने नंदिनी के व्यवहार में आए इस बदलाव को बहुत बारीकी से महसूस किया। उन्होंने देखा कि उनकी बहू अब पहले की तरह गुनगुनाती नहीं है। उसके पैरों का सूनापन कौशल्या जी की आँखों में चुभने लगा था। एक दिन जब समीर शाम को अपना काम खत्म करके बालकनी में चाय पी रहा था, कौशल्या जी उसके पास आकर बैठ गईं।

“समीर, एक बात पूछूं?” कौशल्या जी ने चाय का कप मेज़ पर रखते हुए कहा।

“जी माँ, पूछिए ना,” समीर ने लैपटॉप बंद करते हुए उत्तर दिया।

“बेटा, तूने कभी गौर किया है कि पिछले कुछ महीनों से घर में कितनी शांति है?”

समीर मुस्कुराया, “हाँ माँ, और ये शांति मेरे काम के लिए बहुत ज़रूरी भी है। शुरुआत में थोड़ा शोर था, लेकिन अब सब सेटल हो गया है।”

कौशल्या जी ने गहरी सांस ली और कहा, “ये शांति नहीं है समीर, ये सन्नाटा है। और घरों में सन्नाटे नहीं हुआ करते। तूने शायद ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब से नंदिनी ने पायलें पहननी छोड़ी हैं, उसकी मुस्कान भी कहीं खो गई है।”

समीर थोड़ा हैरान हुआ, “माँ, मैंने उसे पायल पहनने से मना थोड़ी किया था, बस काम के वक्त थोड़ा डिस्टर्बेंस होता था तो मैंने कहा था। अब अगर उसने खुद ही पहनना छोड़ दिया तो मैं क्या करूँ?”

कौशल्या जी ने प्यार से समीर के सिर पर हाथ फेरा और बोलीं, “बेटा, रिश्ते गणित के फॉर्मूले नहीं होते कि जहाँ जो चीज़ परेशान करे, उसे माइनस (घटा) कर दो। रिश्ते सामंजस्य और एक-दूसरे की खुशियों का सम्मान करने का नाम हैं। तूने उसे सिर्फ पायल उतारने को कहा, लेकिन वो पायलें उसकी पहचान थीं, उसकी सबसे बड़ी खुशी थीं। पत्नी पति की खुशी के लिए अपने शौक छोड़ देती है, यह उसका बड़प्पन है, लेकिन एक पति होने के नाते तेरी भी कुछ ज़िम्मेदारी है। छोटी-छोटी खुशियों को मारकर जो शांति मिलती है, वो असल में एक घुटन होती है। तूने अपने सुकून के लिए उसे खामोश कर दिया। एक बार सोच कर देख कि अगर वो तुझसे तेरा लैपटॉप या तेरा कोई ऐसा शौक छीन ले जिससे तुझे सबसे ज़्यादा प्यार हो, तो तुझे कैसा लगेगा?”

माँ की बातें समीर के दिल में किसी तीर की तरह चुभ गईं। उसे अचानक एहसास हुआ कि पिछले कई महीनों से नंदिनी ने उससे कोई ज़िद नहीं की, वो पहले की तरह खिलखिला कर नहीं हंसी। उसने अपनी पत्नी को एक मशीन की तरह घर का काम करते हुए तो देखा, लेकिन उसकी आत्मा की आवाज़ को अनसुना कर दिया था। उस रात समीर बहुत देर तक सो नहीं पाया। उसे नंदिनी का वो मायूस चेहरा याद आने लगा, जब उसने पहली बार उसे पायल उतारने को कहा था।

कुछ दिनों बाद उनकी शादी की पहली सालगिरह का दिन आ गया। नंदिनी सुबह से ही घर के कामों और पूजा की तैयारियों में लगी हुई थी। शाम को जब वह तैयार होकर आई, तो उसने एक खूबसूरत नीले रंग की साड़ी पहनी थी, लेकिन उसके पैर अभी भी सूने थे। समीर ने उसे देखा और मुस्कुराते हुए उसे अपने कमरे में ले गया।

उसने नंदिनी को बिस्तर पर बिठाया और अपनी जेब से एक बहुत ही सुंदर, लाल रंग की डिब्बी निकाली। नंदिनी ने हैरानी से समीर की तरफ देखा। समीर ने डिब्बी खोली, तो उसमें चाँदी की एक बेहद नायाब, कारीगरी से भरपूर पायल रखी थी। ये वो भारी पायल नहीं थी जो चुभने वाला शोर करे, बल्कि इसमें छोटे-छोटे, बहुत ही मधुर आवाज़ वाले घुंघरू लगे थे, जिनकी झंकार किसी मीठे संगीत जैसी थी।

“ये क्या है समीर?” नंदिनी की आँखें भर आईं।

समीर घुटनों के बल नीचे बैठ गया और उसने नंदिनी के पैरों से वो काला धागा खोल दिया। पायल को उसके पैरों में पहनाते हुए समीर ने ऊपर देखा, उसकी आँखों में भी नमी थी। “ये मेरी तरफ से एक माफ़ी है नंदिनी। मुझे माफ़ कर दो। मैंने अपने काम के अहंकार में तुम्हारी सबसे प्यारी खुशी तुमसे छीन ली थी। माँ ने मुझे समझाया कि घर तभी घर बनता है, जब उसमें तुम्हारी पायल की झंकार गूंजे। तुम जब चाहो, जैसे चाहो पायल पहन सकती हो। मुझे अब इस आवाज़ से कोई परेशानी नहीं होगी, बल्कि अब ये झंकार मुझे बताएगी कि मेरी नंदिनी खुश है।”

नंदिनी के आंसुओं का बांध टूट गया। उसने समीर को गले से लगा लिया। उस शाम पूरे घर में फिर से एक मीठी सी ‘छम-छम’ गूंजने लगी। और सबसे ज़्यादा खुशी बालकनी में खड़ी कौशल्या जी को हो रही थी, क्योंकि उनके घर की लक्ष्मी के पैरों की झंकार और उसके चेहरे की रौनक, दोनों वापस लौट आई थीं। रिश्तों में किया गया थोड़ा सा एडजेस्टमेंट (समन्वय) और एक-दूसरे की भावनाओं का सम्मान, कैसे एक घर को स्वर्ग बना देता है, यह समीर और नंदिनी दोनों बहुत अच्छी तरह समझ चुके थे।

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