रात के साढ़े ग्यारह बज रहे थे। शहर अब भी जाग रहा था—कहीं ट्रैफिक की आवाज़, कहीं मोबाइल की घंटियाँ, कहीं देर रात तक जलती खिड़कियाँ। मगर उस ऊँची इमारत की सोलहवीं मंज़िल पर बैठी अनाया के कमरे में एक ऐसी ख़ामोशी थी, जो किसी शोर से भी ज़्यादा भारी थी।
उसके हाथ में मोबाइल था।
स्क्रीन पर एक नाम था—“माँ”।
पिछले चार साल से यह नाम उसकी स्क्रीन पर नहीं आया था।
अनाया ने फोन खोला। पुरानी चैट ऊपर तक स्क्रॉल की। माँ के छोटे-छोटे संदेश थे—
“खाना खा लिया?”
“आज मौसम अच्छा है।”
“तुम बहुत थक जाती होगी, अपना ध्यान रखा करो।”
और उसके जवाब?
“हाँ।”
“ठीक हूँ।”
“बाद में बात करती हूँ।”
‘बाद में’ कभी नहीं आया।
अनाया एक सफल कॉरपोरेट प्रोफेशनल थी। अच्छी नौकरी, अपना फ्लैट, गाड़ी, यात्राएँ, सोशल मीडिया पर चमकती तस्वीरें—उसके जीवन को देखकर कोई नहीं कह सकता था कि उसके भीतर कोई खाली कमरा भी है।
लेकिन वह कमरा था।
बहुत पुराना।
बहुत गहरा।
और उसमें उसकी माँ रहती थी।
माँ ने उसे अकेले पाला था। पिता बहुत पहले घर छोड़कर चले गए थे। माँ ने सिलाई करके, घरों में काम करके और कभी अपनी इच्छाओं को दबाकर अनाया को पढ़ाया था।
जब अनाया को पहली बड़ी नौकरी मिली थी, माँ ने पड़ोसियों को मिठाई बाँटी थी।
“मेरी बेटी बहुत बड़ी अफसर बन गई।”
अनाया ने हँसकर कहा था, “माँ, अफसर नहीं, बस नौकरी लगी है।”
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा था।
“मेरे लिए तो तू उसी दिन बड़ी अफसर बन गई थी, जिस दिन तूने कहा था—‘माँ, अब आपको काम नहीं करना पड़ेगा।’”
अनाया ने सचमुच माँ को काम छोड़ने को कहा था।
मगर शहर की नौकरी, नए सपने और तेज़ जीवन ने उसे धीरे-धीरे बदल दिया।
माँ गाँव में ही रह गईं।
पहले अनाया हर सप्ताह फोन करती थी। फिर पंद्रह दिन में। फिर महीने में।
माँ हर बार वही कहतीं—
“बेटी, जब समय मिले तो आ जाना।”
अनाया हर बार कहती—
“ज़रूर माँ। बस थोड़ा काम कम हो जाए।”
काम कभी कम नहीं हुआ।
एक दिन माँ ने फोन किया।
अनाया एक महत्वपूर्ण मीटिंग में थी।
फोन काटते हुए उसने संदेश भेजा—
“माँ, अभी बहुत बिज़ी हूँ। प्लीज़ बाद में कॉल करना।”
माँ ने जवाब दिया—
“ठीक है बेटी। जब फुर्सत मिले तब।”
वह आख़िरी संदेश था।
उसके बाद माँ ने कभी फोन नहीं किया।
अनाया ने भी नहीं।
उसे लगा, माँ नाराज़ होंगी। दो-चार दिन बाद खुद बात कर लेंगी।
फिर दिन सप्ताह बने।
सप्ताह महीने।
और एक सुबह गाँव से फोन आया।
“बेटी… तुम्हारी माँ नहीं रहीं।”
उस दिन अनाया ने पहली बार जाना कि कुछ खबरें कानों से नहीं सुनी जातीं।
वे सीधे सीने में गिरती हैं।
वह गाँव पहुँची तो घर वैसा ही था।
दरवाज़े के पास माँ की चप्पलें थीं।
रसोई में स्टील का वही डिब्बा था, जिसमें वह उसके लिए पसंद की नमकीन रखती थीं।
कमरे में चारपाई थी।
तकिए के नीचे एक पुराना मोबाइल।
अनाया ने उसे उठाया।
फोन की बैटरी खत्म थी।
चार्ज करने पर स्क्रीन जली।
उसमें माँ की आख़िरी अधूरी रिकॉर्डिंग थी।
अनाया ने काँपते हाथों से उसे चलाया।
माँ की धीमी आवाज़ कमरे में फैल गई—
“बेटी… आज पता नहीं क्यों तुझसे बात करने का बहुत मन कर रहा है। तू व्यस्त होगी… इसलिए फोन नहीं करूँगी। बस आवाज़ सुनने का मन था।”
रिकॉर्डिंग वहीं खत्म हो गई।
अनाया ने फोन सीने से लगा लिया।
उसकी आँखों से आँसू बहते रहे।
लेकिन इस बार रोना भी जैसे कम था।
क्योंकि जिस व्यक्ति से वह कह सकती थी—“माँ, मुझे माफ़ कर दो”, वह अब सुनने के लिए मौजूद नहीं था।
माँ की अलमारी खोलते हुए उसे एक छोटा-सा डिब्बा मिला।
उसमें अनाया के बचपन की चीज़ें थीं—पहली चोटी में बाँधा गया रिबन, स्कूल का पहचान-पत्र, टूटी हुई पेंसिल, एक फीकी तस्वीर।
सबसे नीचे एक कागज़ था।
माँ की लिखावट में—
“मेरी बेटी बहुत व्यस्त रहती है। शायद इसलिए फोन नहीं कर पाती। मुझे उससे कोई शिकायत नहीं। माँ को शिकायत करने का हक़ कहाँ होता है?”
अनाया वहीं फर्श पर बैठ गई।
उसने कागज़ को माथे से लगा लिया।
और पहली बार उसे समझ आया कि माँ की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं थी कि बेटी दूर चली गई थी।
पीड़ा यह थी कि बेटी को अपनी माँ की याद आने के लिए भी फुर्सत चाहिए थी।
वह पूरी रात उसी कमरे में बैठी रही।
सुबह होने लगी।
पक्षियों की आवाज़ आई।
माँ हर सुबह इसी समय उठती थीं।
अनाया ने अनायास पुकारा—
“माँ… चाय बनाऊँ?”
कुछ पल बाद उसे अपनी ही आवाज़ लौटकर सुनाई दी।
वह मुस्कुराई।
फिर रो पड़ी।
उसने रसोई में जाकर दो कप चाय बनाई।
एक कप अपने सामने रखा।
दूसरा माँ की खाली कुर्सी के सामने।
भाप धीरे-धीरे उठती रही।
कुर्सी खाली रही।
उस सुबह अनाया ने जाना—
दर्द की इंतहा किसी अपने के चले जाने का नाम नहीं है। दर्द की इंतहा तब होती है, जब आपके पास कहने को बहुत कुछ बचा हो और सुनने वाला कोई न हो; जब हाथ में फोन हो, नंबर वही हो, आवाज़ याद हो—मगर दूसरी तरफ़ हमेशा के लिए ख़ामोशी हो।
और शायद सबसे बड़ा दर्द यह नहीं कि माँ चली गईं…
सबसे बड़ा दर्द यह था कि माँ के जीवित रहते हुए उसके पास समय नहीं था—और अब पूरी ज़िंदगी थी, मगर माँ नहीं थीं।
सुदर्शन सचदेवा