आजादी के सही मायने और जुनून – डॉ बीना कुण्डलिया 

दूर से आती मधुर संगीत की धुन..सारे जहां से अच्छा हिन्दुस्तान हमारा हम बुलबुलें है इसकी ये गुलिस्तां हमारा। सुबह सुबह भारती के कानों में जैसे ही आवाज गूंजी वो झटपट बिस्तर से उठ बैठी सामने घड़ी सात बजे का समय दिया रही थी। अरे बाप रे बाप सात बज गये उसको तो नौ बजे पहुंचना है ।

स्कूल के प्रांगण में आज भाषण देना है उसको स्वतन्त्रता दिवस पर, उसके मायने समझाने हुए , फिर विद्यार्थियों की प्रतियोगिता होनी है विषय “आजादी के सही मायने” शहर के सभी सम्मानित अतिथि के रूप में आज  स्कूल में आने वाले हैं। बहुत ही बड़ी वाद-विवाद प्रतियोगिता रखी गई है । दूर दराज स्कूलों के बच्चे भाग लेने आयेंगे। और उसको इसी विषय में भाषण देना होगा। वो इस आज़ादी के जुनून को भी अपने अनुभव अपने शब्दों में व्यक्त करेगी आज ।

भारती जी राजकीय इन्टर कालेज की प्रधानाध्यापिका रात भर भाषण की तैयारी में लगी रही तभी तो सुबह आँख देर से खुली उनकी ।

भारती जी बड़बड़ाते हुए जल्दी जल्दी उठी..वो तो शुक्र है किसी राजनीतिक पार्टी के भवन से सुबह सुबह मधुर धुन की आवाज उसके कानों में पड़ गई उसकी नींद टूट गई वरना.. ये घड़ी भी तो अलार्म नहीं बजा रही लगता खराब हो गई इसे भी आज ही खराब होना था । बरसों का साथ था इसका और मेरा । भारती जी जाने की तैयारी कर रहीं साथ साथ बड़बड़ाते हुए सब कहती भी जा रहीं । 

तैयार होते ही भारती ने खिड़की से बाहर झांका देखा स्कूल की गाड़ी जो उसको लेने आने वाली थी बहार खड़ी है। ड्राइवर गाड़ी के बाहर खड़ा उसका इन्तज़ार कर रहा । ये ड्राइवर भी बड़ा ईमानदार इंसान हैं समय का पाबंद। सही ही है अपना काम ईमानदारी से करता है भारती बड़बड़ाते बड़बड़ाते जल्दी से सभी कागज समेट अपनी फाइल और पर्स लेकर बाहर आ गाड़ी में आकर बैठ गई । 

 वो नहीं चाहती थी आज स्कूल देर से पहुंच कार्यक्रम में विघ्न का कारण बने क्योंकि  वो चाहती थी, उसने जो अपने उसूलों की एक पक्की प्रधानाचार्य के रूप में अपनी जो पहचान बना रखी थी वो बरकरार रहनी चाहिए। गाड़ी तेज रफ्तार से स्कूल की तरफ दौड़ती जा रही और भारती गाड़ी की खिड़की में सर रख अपने ख्यालों में खो गई…..

उसके  दादाजी स्वतन्त्रता सैनानी रहे । पिता भी आर्मी आफिसर देश के लिए शहीद हुए। तब छोटी ही थी वो पढ़ रही थी। पिता का चले जाना उसको भीतर ही भीतर व्यथित करता था। एक बेटी के लिए पिता क्या होता है ? ये तो वो बेटी ही बता सकती है जिसने छोटी सी उम्र में उनको खो दिया हो ।

दो बड़े भाईयों को बार्डर पर शहीद होते देखा है उसने। फिर उसका विवाह एक आर्मी आफिसर से हुआ लेकिन ये साथ भी ज्यादा लम्बा नहीं रहा । परिवार भी नहीं बस पाया था उसका तो अभी, पति को वापस बुला लिया ऊपर वाले ने। बरसों पहले बार्डर पर निरीक्षण के दौरान दुश्मनों के द्वारा हमले में कुछ साथियों को बचाने की फिराक में शहीद हो गये थे उसके पति राघव राज। जब वो शहीद हुए भारती तो ये खबर सुनकर सन्न रह गई थी ।  हफ्तों तक होश नहीं रहा था उसको । फिर कैसे संभाला अपने आप को वो ही जानती है ? देश पर कुर्बान होना क्या होता है उससे ज्यादा भला कौन समझ सकता है ? 

पति राघव राज के अदम्य साहस पराक्रम बलिदान के रूप में मरणोपरांत वीरता पुरस्कार से राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया था। और वो पुरस्कार उसने ही लिया था जाकर। पति का नाम उनके बहादुरी का बखान सुनकर उसकी आँखों से अविरल आँसू बहनें लगे थे। कैसे हाथ पैर डगमगाने लगे थे उसके पुरस्कार लेते समय ? लेकिन उसका सर गर्व से ऊंचा रहा पति के सम्मान के लिए।

वो जानती थी उसके परिवार में देश भक्ति का कैसा जज्बा था, वो ये भी जानती थी चाहते तो उसके परिवार वाले और दूसरे नागरिकों की तरह आराम से घर में रह सकते थे। चाहते तो कोई दूसरा व्यवसाय कर कमा खा सकते थे। भला घर पर रहकर आराम कौन नहीं करना चाहता होगा  ? किसे पड़ी है फोज में भर्ती होकर जान पर खेलकर देश की रक्षा करता फिरे।

लेकिन जिनके खून में देश भक्ति भरी होती है एक जूनून ही लेकर पैदा होते हैं वो लोग। उनको अपनी परवाह नहीं होती वो तो पैदा ही दूसरों की रक्षा करने के लिए होते हैं । भारती ने लम्बी सी सांस ली खिड़की के बाहर देखा गोंद में अपने बच्चों को लेकर स्कूल छोड़ने जाते माता-पिता पर उसकी नजर पड़ी। बोली सच कितना सुकून होता है बच्चों को गोद में लेकर फर्ज पूरा करते माता-पिता को देखकर… उसके पिता, भाई, पति को भी तो उनके माता-पिता ने कितने अरमान लाड़ प्यार से पाला-पोसा होगा कभी। लेकिन कोई नहीं बचा सभी अपने जुनून की खातिर… !!

भारती को अपने पिता की कही बाते आज भी जैसे के तैसे उसके मन मस्तिष्क में पत्थर की लकीर की तरफ घर बनायें बैठी हुई है।

भारती आज शायद ख्यालों में ही रहना चाहती थी । उसे याद है उसके पिता का कहना “ स्वतंत्रता  सही मायने में विदेशी शासन से मुक्ति पाना ही नहीं है, बल्कि देश के हर नागरिक को सामाजिक, आर्थिक और वैचारिक रूप से स्वतंत्रता और न्यायसंगत जीवन जीने देना है” । 

उसके दादाजी बताते थे 15 अगस्त 1947 को भारत ने लगभग दो सो बरसों की ब्रिटिश गुलामी की बेड़ियों को तोड़ा था। यही दिन उन अनगिनत स्वतन्त्रता सेनानियों के संघर्ष और बलिदान को नमन करता है जिन्होंने देश के लिए अपना जीवन समर्पित किया।

 उसके पति भी अक्सर. इस आज़ादी के दिन का बड़े जोश खरोश से बखान किया करते थे। उनका भी  यही कहना आज़ादी, स्वतंत्रता के सही मायने का मतलब समानता और न्याय ही है। समाज में से गरीबी , अज्ञानता भेदभाव असमानता को मिटाना आजादी का सही वास्तविक उद्देश्य है । 

तभी गाड़ी में एक जबरदस्त झटका लगा तेज हार्न की आवाज भारती चौक कर ख्यालों से जागी एक हाथ से आगे सीट को थामा और बोली क्या हुआ ड्राइवर भाई  ?

कुछ नहीं मैडम जी ड्राईवर सकुचाते हुए बोला -अपना स्कूल तो आ गया मगर सामने देखिए बीच रास्ते में गाड़ी खड़ी कर दी है । समझ तो पता नहीं आजकल कहां गई इन लोगों की रास्ते भी नहीं दिखाई देता। डिसीप्लीन नाम की कोई चीज नहीं रह गई है इन लोगों में आजकल ।

कोई नहीं तुम गाड़ी बाद में पार्क करते रहना, मैं यही गेट पर उतर जाती हूँ कहकर भारती गाड़ी से उतरकर जल्दी जल्दी विद्यालय के अन्दर प्रवेश करती है। और साथ ही साथ बड़बड़ाते हुए कहती रहती है आजादी के सही मायने और जुनून भला उससे बढ़कर और कौन समझ और समझा सकता है ? आज उसको बड़े आत्मविश्वास से बोलना होगा । वो तो चाहती है हर विधार्थी को मुक्त होकर अपने विचार व्यक्त करने का मौका मिले । आज उसको बताना होगा आत्मनिर्भरता के विषय में भी क्योंकि वो जानती है देश और समाज का हर नागरिक आत्मनिर्भर और सशक्त बनेगा तब ही तो सिद्ध होगा स्वतंत्रता, व आजादी का सही मतलब।

भारती जी स्कूल के बड़े हाॅल में पहुँचती है जहां उनका ही इन्तजार हो रहा था। थोड़ी देर में सभी प्रतिष्ठित मेहमान अपना अपना स्थान ग्रहण कर चुके थे। 

विद्यालय में प्रतियोगिता व कार्यक्रम की समाप्ति के बाद पुरस्कार वितरण होता है । प्रतिभाशाली विद्यार्थियों को ईनाम दिए जाते हैं। सभी प्रतिष्ठित अतिथि भारती जी से प्रभावित उनके विचारों का गुणगान करते नहीं थकते । एक अनाथ विधार्थी जो कि रिश्तेदारों के संरक्षण में पलते, पढ़ते बढ़ा हुआ। ऐसा होनहार आज प्रतियोगिता में भी पुरस्कृत हुआ । जिसमें देशभक्ति का जज्बा हिलौरें लेता नजर आते ही उसके विषय में जानकारी प्राप्त कर भारती जी सबके सामने उसको गोद लेने की घोषणा कर देती हैं। बच्चे के चेहरे की मासूमियत निडरता भारती जी को निहाल कर देती है। उनको उसकी हिम्मत में उसका उज्जवल भविष्य दिखाई देने लगता है। आज घर लौटते हुए भारती के चेहरे पर एक अजीब मुस्कान पहरा दे रही थी। लेकिन उनका सर गर्व से ऊँचा था। घर वापसी के समय कदम उत्साहित थे वो बहुत खुश थीं। यह सोचकर वो अपने खानदान के आजादी के जज्बे को अब और आगे भी कायम रख सकेंगी।

लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया 

   15,8,2026

 स्वतन्त्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ 

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