सुमित्रा जी अपने बेटे को इस कदर टूटता हुआ देख कर अंदर तक हिल गईं। उनका कलेजा फटने लगा। जिस बेटे की खुशी के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर दिया था, आज वही बेटा उनकी वजह से अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी खो रहा था। उनका अहंकार और उनकी असुरक्षा अचानक आंसुओं में बहने लगी।
सर्दियों की एक उदास सुबह थी। घर के ड्रॉइंग रूम में पसरा सन्नाटा किसी तूफान के आने से पहले की खामोशी जैसा लग रहा था। मेज पर रखे दो कागजों ने जैसे पूरे घर की सांसें रोक दी थीं। ये कोई आम कागज़ नहीं थे, बल्कि तलाक के कागज़ थे, जिन पर सरिता के हस्ताक्षर हो चुके थे। सामने सोफे पर सुमित्रा जी बुत बनी बैठी थीं और उनका बेटा सुशांत अपने दोनों हाथों में सिर थामे सुबक रहा था।
सरिता और सुशांत की शादी को महज़ दो साल ही हुए थे। सरिता एक मल्टीनेशनल कंपनी में वाइस प्रेसिडेंट थी। वह एक आजाद ख्यालों वाली, आत्मविश्वासी और आधुनिक लड़की थी। वहीं सुशांत एक बहुत ही शांत और अपनी माँ से बेहद जुड़ा हुआ बेटा था। सुमित्रा जी ने कम उम्र में ही अपने पति को खो दिया था। उन्होंने सिलाई-कढ़ाई करके, अपनी छोटी-छोटी खुशियों का गला घोंटकर सुशांत को पढ़ाया-लिखाया और इस काबिल बनाया था। सुशांत के लिए उसकी माँ ही उसकी दुनिया थी।
शादी के बाद जब सरिता इस घर में आई, तो दो अलग-अलग दुनियाओं का टकराव होना ही था। सुमित्रा जी को सरिता का रात-रात भर लैपटॉप पर काम करना, सप्ताहांत में दोस्तों के साथ बाहर जाना, और घर के कामों में दिलचस्पी न लेना बिल्कुल भी पसंद नहीं था। वो अक्सर सुशांत के सामने सरिता की शिकायतें करती थीं। “कैसी बहू ले आया है तू? ना इसे ढंग से साड़ी पहननी आती है, ना ही इसे त्योहारों का कोई ज्ञान है। बस अपने काम और अपनी दुनिया में मस्त रहती है। इसे इस घर से और हमसे कोई लेना-देना नहीं है।”
सुशांत अपनी माँ की बातों का कभी विरोध नहीं कर पाता था। वह जानता था कि उसकी माँ ने उसके लिए अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया है, लेकिन वह सरिता से भी बेइंतहा प्यार करता था। वह बस दोनों के बीच एक मूक दर्शक बनकर पिसता रहता था। धीरे-धीरे सुमित्रा जी की टोका-टाकी इतनी बढ़ गई कि घर का माहौल दमघोंटू हो गया। सरिता अगर प्यार से सुशांत के लिए कुछ लाती, तो सुमित्रा जी उसे फिजूलखर्ची कहकर ताना मार देतीं। उन्हें अंदर ही अंदर यह डर सताने लगा था कि ये पढ़ी-लिखी, आधुनिक लड़की उनके बेटे को उनसे छीन लेगी। उनका वो बेटा, जो कल तक उनकी हर बात मानता था, अब किसी और की भी परवाह करने लगा था। यह असुरक्षा उनके व्यवहार में कड़वाहट बनकर छलकने लगी थी।
कल रात बात हद से आगे बढ़ गई थी। सरिता ऑफिस की एक अहम मीटिंग के बाद रात ग्यारह बजे घर लौटी थी। सुमित्रा जी ने गुस्से में उसे बहुत खरी-खोटी सुनाई और यहाँ तक कह दिया कि ऐसी लड़कियां कभी किसी घर को अपना नहीं मान सकतीं, ये सिर्फ अपने स्वार्थ के लिए रिश्ते निभाती हैं। सुशांत उस वक्त भी चुप रहा। सरिता ने उस रात एक भी शब्द नहीं कहा। वह सीधे अपने कमरे में गई और आज सुबह उसने अपना सूटकेस बाहर ला खड़ा किया और मेज पर तलाक के कागज़ रख दिए।
सुशांत रोते हुए सरिता के पैरों के पास बैठ गया। “सरिता , मुझे छोड़कर मत जाओ। मैं जानता हूँ मेरी गलती है, मैं कभी तुम्हारे लिए स्टैंड नहीं ले पाया। पर मैं तुम्हारे बिना जी नहीं पाऊंगा।”
सुमित्रा जी अपने बेटे को इस कदर टूटता हुआ देख कर अंदर तक हिल गईं। उनका कलेजा फटने लगा। जिस बेटे की खुशी के लिए उन्होंने अपना जीवन होम कर दिया था, आज वही बेटा उनकी वजह से अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी खो रहा था। उनका अहंकार और उनकी असुरक्षा अचानक आंसुओं में बहने लगी।
वे अपनी जगह से उठीं और सरिता के सामने हाथ जोड़कर खड़ी हो गईं। “मुझे माफ कर दे बहू। मैं अंधी हो गई थी अपने मोह में। मुझे डर था कि तू इतनी बड़ी अफसर है, इतनी खूबसूरत और आधुनिक है, तू मेरे सुशांत को मुझसे दूर कर देगी। मैंने उसे अकेले पाला है, मैं उसे खोने के ख्याल से ही कांप जाती थी। इसी डर ने मुझे एक बुरी सास बना दिया। मैं ये भूल गई कि तू भी किसी की बेटी है। मेरे बेटे को मत छोड़ कर जा, मैं आज ही ये घर छोड़कर अपने मायके चली जाऊंगी, पर तुम दोनों अपना घर मत उजाड़ो।”
सुमित्रा जी फूट-फूट कर रोने लगीं। सुशांत हैरान था, उसने कभी अपनी माँ को इतना मजबूर और बेबस नहीं देखा था।
सरिता , जो अब तक बिल्कुल शांत खड़ी थी, उसके चेहरे पर अचानक एक सुकून भरी मुस्कान आ गई। उसने अपना सूटकेस किनारे किया, आगे बढ़कर सुमित्रा जी के जुड़े हुए हाथों को पकड़ लिया और उन्हें कसकर अपने गले से लगा लिया।
“माँ जी…” सरिता की आवाज़ में एक अजीब सी नरमी थी। अपनी माँ के मुँह से ऐसी बातें सुनकर सुशांत भी दंग रह गया था। सरिता को मुस्कुराते हुए देखकर सुमित्रा जी ने हैरानी से पूछा, “क्या हुआ बहू? तुम मुस्कुरा क्यों रही हो? मैं सच कह रही हूँ, मैं तुम्हारे बीच से हट जाऊंगी।”
सरिता ने उनके आँसू पोंछते हुए कहा, “माँ जी, आपने बिल्कुल सही कहा। मैं आधुनिक हूँ, पढ़ी-लिखी हूँ, और अपने कॉर्पोरेट करियर में रोज़ न जाने कितने ही लोगों से मिलती हूँ। मैंने दुनिया देखी है। शुरू-शुरू में मुझे सुशांत की खामोशी और आपका कड़क व्यवहार बिल्कुल समझ नहीं आया। मुझे लगा कि आप लोग मुझे इस घर में चाहते ही नहीं हैं। पर जब मैंने कुछ दिन पहले ठंडे दिमाग से इस पूरे हालात का विश्लेषण किया, तो मुझे असली जड़ समझते देर न लगी। प्रॉब्लम आपकी नफरत नहीं, बल्कि आपका वो डर था जो एक अकेली माँ के दिल में अपने बेटे को खोने को लेकर पनपता है।”
सरिता ने गहरी सांस ली और सुशांत की तरफ प्यार से देखते हुए आगे बोली, “इसलिए मैंने ये तलाक का और घर छोड़कर जाने का नाटक रचा, ताकि ये कागज़ और ये डर आप दोनों को असलियत का सामना करा सके। आप दोनों को ये समझ आ सके कि हम तीनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। माँ जी, मैं भले ही घर में वेस्टर्न कपड़े पहनती हूँ, सुबह कभी-कभी देर से उठती हूँ, या मुझे गोल रोटियां बनानी नहीं आतीं, पर मैं आपके बेटे को बहुत प्यार करती हूँ। और चूँकि मैं उससे प्यार करती हूँ, इसलिए उससे जुड़ी हर चीज़, हर इंसान मेरे लिए बहुत अनमोल है।”
सरिता ने सुमित्रा जी का हाथ अपने गालों से लगाते हुए कहा, “मैं बहुत अच्छे से जानती हूँ कि एक बच्चे के लिए माँ क्या होती है। और फिर आप तो सुशांत की माँ और बाप दोनों ही रही हैं। आपने इसके लिए अपनी पूरी जवानी खपा दी। आपकी इसके जीवन में जो जगह है, वो दुनिया की कोई औरत नहीं ले सकती। मैं कभी आपको इससे दूर करने का सोच भी नहीं सकती। मेरा मकसद आपका सम्मान छीनना नहीं था, बल्कि इस घर की बेटी बनना था। कुछ जगह मेरी भी गलतियां थीं, मैंने कभी आपकी उलझनों को समझने की कोशिश नहीं की और हमेशा अपनी दुनिया में ही मगन रही। इसके लिए मैं भी आपसे दिल से माफी मांगती हूँ। अपनी इस मॉडर्न और नासमझ बहू को माफ कर दीजिए।”
यह सुनकर सुशांत ने भी राहत की एक बहुत लंबी सांस ली और वह उठकर दोनों के गले लग गया। तीनों की ही आँखों में आँसू थे, लेकिन ये आँसू अब दुख के नहीं, बल्कि एक-दूसरे को पूरी तरह अपना लेने के थे। उस दिन के बाद से उस घर में कोई ‘आधुनिक बहू’ या ‘पारंपरिक सास’ नहीं थी, बल्कि सिर्फ एक परिवार था, जो प्यार और समझ के धागों से हमेशा के लिए बंध चुका था।
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लेखिका : आरती देवी