ट्रेन की खिड़की के बाहर भागते हुए पेड़ और बारिश की हल्की फुहारें एक अजीब सा सुकून दे रही थीं। मैं अपनी सीट पर बैठी एक पत्रिका के पन्ने पलट रही थी, जिसमें आधुनिक युग में टूटते पारिवारिक ढांचों पर एक गंभीर लेख छपा था। डब्बे में ज़्यादा भीड़ नहीं थी। मेरे ठीक सामने वाली सीट पर एक युवा लड़का आकर बैठा। उम्र यही कोई छब्बीस-सत्ताईस साल रही होगी। उसके माथे पर पसीने की बूंदें थीं, आंखें लाल थीं और उसके चेहरे के भाव ऐसे थे जैसे कोई ज्वालामुखी अंदर ही अंदर उबल रहा हो। वह लगातार अपने फोन को घूर रहा था, फिर नंबर मिलाता, और सामने से कॉल कटने पर हताश होकर फोन को सीट पर पटक देता।
उसकी बेचैनी पूरे माहौल में एक अजीब सी नकारात्मकता घोल रही थी। अचानक उसने अपने बाल नोंचे और बुदबुदाया, “आज या तो मैं उसकी जान ले लूंगा या खुद ट्रेन के आगे कूद जाऊंगा… तमाशा बना दिया है मेरी जिंदगी का!” उसकी इस बात ने मुझे अंदर तक झकझोर दिया। एक पल के लिए मुझे डर भी लगा कि कहीं यह सच में कोई हिंसक कदम ना उठा ले या कोई अनहोनी ना कर बैठे। उसकी मानसिक स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं लग रही थी। वह बार-बार अपने होंठ चबा रहा था और उसकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं।
मुझसे रहा नहीं गया। मैंने अपनी पानी की बोतल उसकी तरफ बढ़ाते हुए बहुत ही शांत और सौम्य स्वर में कहा, “बेटा, पानी पी लो। क्या बात है? तुम बहुत परेशान लग रहे हो।”
पहले तो उसने मुझे एक अजीब सी नज़र से देखा, जैसे मेरी दखलअंदाजी उसे पसंद ना आई हो। लेकिन शायद उस वक्त उसे एक ऐसे इंसान की ज़रूरत थी जो बिना उसे परखे उसकी बात सुन सके। पानी का घूंट भरते ही उसकी आंखों से आंसुओं का बांध टूट पड़ा। वह फफक-फफक कर रोने लगा। “मैडम जी, आप मेरी मां जैसी हैं… मैं क्या करूं मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा। मेरी पत्नी मुझे छोड़कर अपने मायके चली गई है। मैं दिन-रात एक करके कमाता हूं, उसकी हर ज़रूरत पूरी करता हूं, लेकिन उसे मेरी कोई कद्र ही नहीं है। कल रात हमारा झगड़ा हुआ और वो सुबह-सुबह बिना बताए अपने भाई के साथ चली गई। अब उसकी मां मुझे फोन करके पुलिस केस करने की धमकियां दे रही है। मेरा दिमाग फट रहा है। मैं आज वहां जाऊंगा और या तो उसे खत्म कर दूंगा या खुद मर जाऊंगा!”
मैं समझ गई कि यह एक ऐसे युवा की हताशा है जिसका गुस्सा उसके सोचने-समझने की शक्ति को पूरी तरह खा चुका है। मैंने उसे थोड़ा और समय दिया ताकि उसके अंदर का सारा गुबार निकल जाए। जब वह थोड़ा शांत हुआ, तो मैंने बहुत ही सहजता से पूछा, “तुम्हारी शादी को कितने साल हुए हैं और तुम्हारी पत्नी की उम्र क्या है?”
उसने अपनी आंखें पोंछते हुए कहा, “शादी को पांच साल हो गए हैं। उसकी उम्र बाईस साल है।”
मैं सन्न रह गई। मेरी गणित ने तुरंत हिसाब लगाया। सत्रह साल की उम्र में उस लड़की की शादी कर दी गई थी। “बच्चे हैं?” मैंने अगला सवाल किया।
“हां, एक तीन साल का बेटा है,” उसने जवाब दिया।
यानी अठारह-उन्नीस साल की उम्र में वह एक बच्चे की मां बन गई थी। जिस उम्र में लड़कियां कॉलेज जाने, अपने सपनों को उड़ान देने और दुनिया को समझने की कोशिश करती हैं, उस उम्र में उस बच्ची के कंधों पर एक पूरे घर और एक नवजात की ज़िम्मेदारी डाल दी गई थी।
मैंने गहरी सांस ली और पूछा, “बेटा, तुम्हारा नाम क्या है?”
“रवि,” उसने धीमे स्वर में कहा।
“रवि, तुम अपनी पत्नी को कभी बाहर घूमाने ले जाते हो? कभी उसे सिनेमा दिखाने, या किसी पार्क में, या बस यूं ही आइसक्रीम खिलाने?”
मेरी इस बात पर रवि ने एक फीकी सी हंसी हंसी। “मैडम जी, मेरे पास इन सब फालतू कामों के लिए वक्त कहां है? मैं सुबह दुकान जाता हूं और रात को थक-हार कर लौटता हूं। मैं ये सब उसके और अपने बच्चे के लिए ही तो कर रहा हूं। मैं उसे कोई कमी नहीं होने देता। वो बहुत सुंदर है मैडम जी, गांव में उसके जैसी कोई नहीं। बिना सजे भी चांद सी दिखती है। लेकिन उसका दिमाग हमेशा खराब रहता है। छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाती है। जब मेरा गुस्सा बढ़ता है, तो मैं दो-चार हाथ लगा देता हूं। कई बार वो चुप रह जाती है, और कई बार वो भी मुझ पर हाथ उठा देती है। फिर रूठ कर मायके चली जाती है। पर मेरे बिना रह नहीं पाती, आठ-दस दिन में खुद ही रोती हुई वापस आ जाती है।”
रवि की बातों में प्यार भी था, अधिकार भी, और एक बहुत गहरी अज्ञानता भी। वह बार-बार पत्नी की सुंदरता की तारीफ कर रहा था, यह भी जानता था कि वो उसके बिना रह नहीं सकती, लेकिन फिर भी अपनी मर्दानगी के अहंकार में अपनी गलतियों को देखने से पूरी तरह अंधा था। उसे लगता था कि पैसा कमा कर लाना ही पति होने की इकलौती ज़िम्मेदारी है।
मैं मुस्कुराई और बहुत ही स्नेह से कहा, “रवि, तुमने मुझे मां जैसा कहा है, तो क्या एक मां की बात मानोगे?”
उसने सिर हिलाया।
“तुम्हारी सबसे बड़ी गलती यह है कि तुमने एक बच्ची को घर की मशीन समझ लिया है। सोचो रवि, जब वो खुद एक बच्ची थी, तब उसने एक बच्चे को जन्म दे दिया। रात-रात भर जागकर बच्चे को संभालना, दिन भर घर का काम करना। उस उम्र में उसके भी तो अरमान होंगे ना कि उसका पति उसे बाहर ले जाए, उसे वक्त दे, उसकी तारीफ करे। तुम उसे पैसा दे सकते हो, लेकिन समय और सम्मान नहीं दोगे तो वो घुटेगी ही।”
रवि ध्यान से मेरी बात सुन रहा था। उसका गुस्सा अब शांत हो चुका था और उसकी जगह आत्ममंथन ने ले ली थी।
“दूसरी बात,” मैंने अपनी आवाज़ थोड़ी सख्त करते हुए कहा, “तुम जो उस पर हाथ उठाते हो, यह सबसे बड़ा अपराध है। जब तुम अपनी पत्नी को मारते हो, तो तुम सिर्फ उसके शरीर पर चोट नहीं करते, बल्कि उसके आत्मसम्मान को कुचल देते हो। अगर तुम उम्मीद करते हो कि वह तुम्हारी दस बातें माने, तो तुम्हें भी उसकी दो बातें माननी होंगी। रिश्ता बराबरी का होता है, रवि, तानाशाही का नहीं। जब भी तुम्हें गुस्सा आए, अपने उस तीन साल के बेटे का चेहरा याद करना। क्या तुम चाहोगे कि तुम्हारा बेटा बड़ा होकर यह सीखे कि औरतों पर हाथ उठाना सही है? या कल को अगर तुम जेल चले गए या तुमने कुछ गलत कर लिया, तो उस अनाथ बच्चे का क्या होगा?”
रवि की आंखें फिर से भर आईं। लेकिन इस बार ये आंसू गुस्से के नहीं, बल्कि पछतावे के थे। “तो मैं क्या करूं मैडम जी? मेरा इगो मुझे झुकने नहीं देता। मैं उसे बुलाना चाहता हूं पर मायके वाले उसे भड़काते हैं।”
मैंने उसे समझाया, “इगो और प्यार कभी एक साथ नहीं रह सकते। हर बार वो खुद लौट कर आती है, इस बार तुम पहल करो। अभी इसी वक्त उसे कॉल करो। अपने इगो को किनारे रखो और उससे दिल से माफी मांगो। उसे बताओ कि तुम उसे कितना प्यार करते हो।”
रवि ने झिझकते हुए फोन निकाला और अपनी पत्नी, स्नेहा को कॉल किया। उसने फोन स्पीकर पर डाल दिया। उधर से एक रोती हुई आवाज़ आई।
“क्या है? क्यों फोन किया है? अब क्या जान से मारोगे आके?” स्नेहा सिसक रही थी।
रवि का गला रुंध गया। “स्नेहा… मुझे माफ कर दे। मैं बहुत बुरा हूं। मुझे नहीं पता था कि मैं अनजाने में तुझे कितनी तकलीफ दे रहा हूं। अब कभी तुझ पर हाथ नहीं उठाऊंगा, कसम खाता हूं। तू घर वापस आजा, तेरे बिना मेरा घर, घर नहीं लगता।”
रवि के इतना कहते ही फोन के उस पार से फूट-फूट कर रोने की आवाज़ आने लगी। “तुम सिर्फ पैसे को सब कुछ समझते हो! कभी मुझसे सीधे मुंह बात नहीं करते। हमेशा झिड़कते हो। बच्चे के सामने मुझे पीटते हो, मेरी कोई इज्जत है या नहीं? मैं वहां दिन भर जानवरों की तरह खटती हूं और तुम मुझे बाहर तक नहीं ले जाते।”
रवि भी रोने लगा। “मुझे समझ आ गया है स्नेहा। अब से रविवार को मैं दुकान नहीं जाऊंगा। हम तीनों बाहर घूमने जाएंगे। बस इस बार मुझे माफ कर दे।”
करीब दस मिनट तक दोनों फोन पर रोते रहे और एक-दूसरे से अपनी शिकायतें दूर करते रहे। जब कॉल कटी, तो रवि के चेहरे पर एक ऐसी चमक और सुकून था जैसे उसके सिर से सौ किलो का बोझ उतर गया हो।
मैंने उसे देखकर मुस्कुराते हुए कहा, “देखा? मामला सुलझ गया ना? अब जब तुम्हारा स्टेशन आए, तो वहां से सीधे घर मत जाना। स्नेहा के लिए एक अच्छी सी साड़ी या उसका कोई मनपसंद तोहफा खरीदना। जब तुम वो तोहफा उसे दोगे, तो देखना उसके चेहरे की खुशी। और हां, अपनी पत्नी का सम्मान करना सीखो। घर पैसों से नहीं, प्यार और समझदारी से चलता है।”
रवि ने मेरे पैर छुए। “मैडम जी, आज आपने सिर्फ मेरा घर नहीं बचाया, मेरी जिंदगी बचा ली। मैं तो आज सब कुछ खत्म करने जा रहा था। मैं समझ गया हूं कि मेरी असली गलती कहां थी।”
कुछ देर बाद रवि का स्टेशन आ गया। वह अपना बैग उठाकर ट्रेन से उतरा। खिड़की से मैंने देखा कि वह प्लेटफॉर्म पर बनी एक कपड़ों की दुकान की तरफ तेजी से जा रहा था। मेरे चेहरे पर एक गहरी संतुष्टि की मुस्कान तैर गई।
आज के इस दौर में जहां कम उम्र की शादियां और कच्ची समझ रिश्तों को पल भर में श्मशान बना देती हैं, वहां कभी-कभी बस एक सुनने वाले कान और सही दिशा दिखाने वाले एक अजनबी की ज़रूरत होती है। लोग अपनी भागदौड़ में इतने अंधे हो जाते हैं कि उन्हें यह भी याद नहीं रहता कि रिश्ता एक पौधे की तरह होता है, जिसे सिर्फ पैसों की खाद नहीं, बल्कि समय और सम्मान के पानी की भी ज़रूरत होती है। उस दिन मैंने सिर्फ एक बहस नहीं सुलझाई थी, बल्कि एक टूटते हुए परिवार को फिर से सींच दिया था।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें। आपको क्या लगता है, क्या सिर्फ पैसा देकर पति अपनी ज़िम्मेदारियों से मुक्त हो सकता है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं। अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें, धन्यवाद।
#शीशे के रिश्ते और पत्थर का गुरूर