रिश्तों का बाज़ार और एक बेटी का स्वाभिमान

रमाकांत जी भारी मन और झुके हुए कंधों के साथ घर लौटे। सुमित्रा ने जब उनका उतरा हुआ चेहरा देखा, तो वह तुरंत समझ गईं कि कुछ गड़बड़ है। रात के अंधेरे में दोनों पति-पत्नी अपने कमरे में बैठकर इस नई मुसीबत पर चर्चा करने लगे।

“सुमित्रा, उन्होंने इतनी बड़ी मांग रख दी है कि मैं अगर अपनी दोनों किडनियां भी बेच दूँ तो पूरी नहीं होगी,” रमाकांत जी ने रुंधे हुए गले से कहा। “गाड़ी, होटल का खर्चा, सोने के जेवर… ये सब मैं कहाँ से लाऊंगा?”

सुमित्रा की आँखों से आंसू छलक पड़े। “आप कह रहे थे न कि वे लोग बहुत पैसे वाले हैं, फिर उन्हें हमारे थोड़े से पैसों का इतना लालच क्यों है? जब हमारी मेघा खुद इतना कमाती है, तो उन्हें दहेज की क्या ज़रूरत पड़ गई?”

रमाकांत जी अपने घर के बरामदे में बैठे हुए अख़बार के पन्ने पलट रहे थे, लेकिन उनकी निगाहें शब्दों पर नहीं बल्कि अपने ख्यालों में उलझी हुई थीं। पास ही बैठी उनकी पत्नी सुमित्रा स्वेटर बुनते हुए रह-रह कर उन्हें देख रही थीं। दोनों के मन में एक ही उधेड़बुन चल रही थी, और वह थी उनकी इकलौती बेटी मेघा की शादी। मेघा कोई आम लड़की नहीं थी; वह एक मल्टीनेशनल कंपनी में सीनियर सॉफ्टवेयर इंजीनियर के पद पर कार्यरत थी।

उसकी तनख्वाह अच्छी थी, स्वभाव से वह बेहद सौम्य, संस्कारी और अपने माता-पिता की हर छोटी-बड़ी ज़रूरत का खयाल रखने वाली लड़की थी। रमाकांत जी ने अपना पूरा जीवन एक स्कूल शिक्षक के रूप में बेहद सादगी और ईमानदारी से बिताया था। उन्होंने अपनी जमा-पूंजी का एक बड़ा हिस्सा मेघा की पढ़ाई पर खर्च किया था, और मेघा ने भी उनकी उम्मीदों को कभी टूटने नहीं दिया।

पिछले हफ्ते ही मेघा के लिए एक बहुत अच्छा रिश्ता आया था। लड़के का नाम सिद्धार्थ था। वह शहर के एक बड़े बैंक में ब्रांच मैनेजर था। सिद्धार्थ के पिता, रघुनाथ सिंह, शहर के जाने-माने ठेकेदार थे और उनका समाज में अच्छा-खासा रुतबा था। उनका रहन-सहन, उनका बड़ा सा बंगला और उनकी बातें—सब कुछ उनके रईस होने की गवाही देते थे। जब रघुनाथ सिंह अपने परिवार के साथ मेघा को देखने आए, तो उन्हें मेघा पहली ही नज़र में पसंद आ गई।

मेघा की सुंदरता, उसकी बातचीत का सलीका और सबसे बड़ी बात, उसकी लाखों की नौकरी देखकर रघुनाथ सिंह को लगा कि यह लड़की उनके घर की शान बढ़ाएगी

और उनके बेटे के साथ हर कदम पर तालमेल बिठा सकेगी। सिद्धार्थ भी बहुत शांत और शर्मीले स्वभाव का था। मेघा को भी सिद्धार्थ का सीधापन अच्छा लगा। रमाकांत जी और सुमित्रा को लगा कि जैसे उनकी सालों की तपस्या सफल हो गई हो। एक अच्छा घर, एक पढ़ा-लिखा लड़का और इज्जतदार परिवार—एक बेटी के माता-पिता को और क्या चाहिए होता है?

लेकिन, खुशियों के इस महल में दरार पड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगा। रिश्ता पक्का होने के कुछ ही दिन बाद, रघुनाथ सिंह ने रमाकांत जी को अकेले में मिलने के लिए बुलाया। रमाकांत जी खुशी-खुशी गए, यह सोचकर कि शायद शादी की तारीखों और तैयारियों पर चर्चा करनी होगी। लेकिन वहाँ पहुँचकर जब रघुनाथ सिंह ने अपनी बात शुरू की, तो रमाकांत जी के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।

रघुनाथ सिंह ने बड़ी ही चालाकी और मीठी बातों में लपेट कर अपनी मांगें सामने रख दीं। उन्होंने कहा, “रमाकांत जी, आप तो जानते ही हैं कि समाज में हमारी कितनी इज्जत है। हमारे यहाँ जब भी कोई काम होता है, तो शहर के बड़े-बड़े लोग आते हैं। हम नहीं चाहते कि हमारी होने वाली बहू के मायके वालों की नाक कटे। हम तो बस इतना चाहते हैं कि शादी हमारे रुतबे के हिसाब से एक फाइव स्टार होटल में हो। सिद्धार्थ को ऑफिस आने-जाने में परेशानी होती है, इसलिए एक अच्छी सी लग्जरी गाड़ी अगर आप उसे गिफ्ट कर दें, तो उसकी सहूलियत हो जाएगी। और हाँ, रिश्तेदारों को देने के लिए जो सोने-चांदी के शगुन होते हैं, वो तो परंपरा है, उसमें कोई कमी नहीं होनी चाहिए। आखिर आपकी इकलौती बेटी है, जो भी देंगे उसी के तो काम आएगा।”

रमाकांत जी एक सीधे-सादे रिटायर्ड मास्टर थे। उन्होंने जीवन में कभी लाखों-करोड़ों का लेन-देन नहीं किया था। रघुनाथ सिंह की यह लिस्ट उनके जीवन भर की कमाई से कई गुना ज्यादा थी। उन्होंने घबराते हुए कहा, “भाई साहब, मैं तो एक मामूली पेंशनभोगी इंसान हूँ। मेघा की शादी के लिए मैंने कुछ पैसे जोड़ रखे हैं, पर आप जो कह रहे हैं, वो मेरे सामर्थ्य से बहुत बाहर है।”

इस पर रघुनाथ सिंह ने थोड़ा कठोर स्वर में कहा, “रमाकांत जी, आज के ज़माने में इतना तो करना ही पड़ता है। हमने अपने बेटे को पढ़ा-लिखा कर इतना बड़ा अफसर बनाया है, तो क्या हमारी कोई उम्मीदें नहीं होंगी? और फिर, आपकी बेटी भी तो शादी के बाद हमारी ही हो जाएगी। उसकी सारी कमाई हमारे ही घर में आएगी। आप थोड़ा हाथ-पैर मारिए, सब इंतज़ाम हो जाएगा। लोग तो बेटियों के लिए खेत, खलिहान और मकान तक बेच देते हैं, आखिर बेटी का सुख ही तो सबसे बड़ा सुख है।”

रमाकांत जी भारी मन और झुके हुए कंधों के साथ घर लौटे। सुमित्रा ने जब उनका उतरा हुआ चेहरा देखा, तो वह तुरंत समझ गईं कि कुछ गड़बड़ है। रात के अंधेरे में दोनों पति-पत्नी अपने कमरे में बैठकर इस नई मुसीबत पर चर्चा करने लगे।

“सुमित्रा, उन्होंने इतनी बड़ी मांग रख दी है कि मैं अगर अपनी दोनों किडनियां भी बेच दूँ तो पूरी नहीं होगी,” रमाकांत जी ने रुंधे हुए गले से कहा। “गाड़ी, होटल का खर्चा, सोने के जेवर… ये सब मैं कहाँ से लाऊंगा?”

सुमित्रा की आँखों से आंसू छलक पड़े। “आप कह रहे थे न कि वे लोग बहुत पैसे वाले हैं, फिर उन्हें हमारे थोड़े से पैसों का इतना लालच क्यों है? जब हमारी मेघा खुद इतना कमाती है, तो उन्हें दहेज की क्या ज़रूरत पड़ गई?”

रमाकांत जी ने एक गहरी सांस ली और बोले, “यही तो दुनिया की कड़वी सच्चाई है सुमित्रा। इंसान के पास चाहे जितना धन हो, उसकी भूख कभी शांत नहीं होती। पढ़े-लिखे और बड़े घरों में तो दहेज लेना जैसे उनका जन्मसिद्ध अधिकार हो गया है। वो लोग बेटों को इसलिए पढ़ाते हैं ताकि उसकी बोली लगा सकें। लड़का जितना बड़ा अफसर, उसका रेट उतना ही ज्यादा। अब हमें ही कुछ सोचना होगा। बेटी का रिश्ता पक्का हो चुका है, अगर अब टूटा तो समाज में क्या मुंह दिखाएंगे? लोग कहेंगे कि लड़की में ही कोई खोट होगा।”

सुमित्रा ने घबराते हुए पूछा, “तो क्या करेंगे आप? हमारे पास तो जो कुछ था, हमने मेघा की पढ़ाई में लगा दिया। बैंक में बस कुछ ही लाख रुपये हैं।”

“मैं सोच रहा हूँ कि अपना पुश्तैनी गाँव वाला खेत बेच दूँ। सुमित्रा, अगर उससे भी बात नहीं बनी, तो शायद हमें यह घर गिरवी रखना पड़े या बेचना पड़े। आखिर बेटी की खुशी का सवाल है।” रमाकांत जी की आवाज़ में एक अजीब सी बेबसी थी।

“घर बेच देंगे तो हम बुढ़ापे में कहाँ रहेंगे? किराए के मकान में धक्के खाएंगे? और आपकी दवाइयों का खर्चा कहाँ से आएगा? मेघा के ससुराल वाले तो उसकी एक पाई भी हमें नहीं लेने देंगे,” सुमित्रा ने रोते हुए कहा।

“सब सह लेंगे सुमित्रा, पर अपनी बेटी का घर उजड़ते नहीं देख सकते। मैं कल ही प्रॉपर्टी डीलर से बात करता हूँ।”

माता-पिता की यह सारी बातचीत, उनकी सिसकियां और उनकी लाचारी, उस रात एक और शख्स सुन रहा था। वह थी मेघा। पानी पीने के बहाने कमरे से बाहर आई मेघा अपने माता-पिता के कमरे के दरवाज़े के पास खड़ी सब सुन चुकी थी। उसके पैरों तले मानो ज़मीन खिसक गई हो। जिस रिश्ते को वह अपनी जिंदगी की नई शुरुआत मान रही थी, वह असल में उसके माता-पिता की जिंदगी का अंत साबित होने वाला था। उस रात मेघा एक पल के लिए भी नहीं सो पाई। उसकी आँखों के सामने अपने पिता के वो संघर्ष तैर रहे थे, जब उन्होंने खुद फटे हुए स्वेटर पहनकर मेघा की कॉलेज की फीस भरी थी। उसे अपनी माँ की वो तपस्या याद आ रही थी, जिन्होंने अपनी कोई इच्छा पूरी नहीं की ताकि मेघा के सपनों को पंख लग सकें। और आज, उसी मेघा के लिए उसके माता-पिता बेघर होने की कगार पर खड़े थे।

अगले कुछ दिनों तक घर में एक अजीब सा तनाव फैला रहा। रमाकांत जी दिन भर बाहर रहने लगे। कभी बैंक के चक्कर काटते, तो कभी रिश्तेदारों और प्रॉपर्टी डीलरों के पास जाते। उनके चेहरे की झुर्रियां और गहरी हो गई थीं और उनका स्वास्थ्य भी गिरने लगा था। सुमित्रा दिन भर भगवान की मूर्ति के सामने रोती रहतीं। दोनों ने मेघा से यह बात पूरी तरह से छुपाने की कोशिश की, पर वे नहीं जानते थे कि मेघा सब कुछ जान चुकी है।

एक दिन जब रमाकांत जी बहुत थके-हारे घर लौटे और सोफे पर निढाल होकर बैठ गए, तो मेघा उनके पास आई। उसने उनके हाथ में पानी का गिलास दिया और फिर उनके पैरों के पास बैठ गई।

“पापा, मुझे आपसे और माँ से कुछ बात करनी है,” मेघा ने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा। सुमित्रा भी रसोई से बाहर आ गईं।

“क्या बात है बेटा? कोई नई साड़ी लेनी है क्या शादी के लिए?” रमाकांत जी ने अपनी परेशानी छुपाते हुए मुस्कुराने की कोशिश की।

“पापा, आप प्रॉपर्टी डीलर के पास क्यों जा रहे हैं? क्या आप ये घर बेचने वाले हैं?” मेघा के सीधे सवाल ने दोनों को सन्न कर दिया।

“अरे नहीं बेटा, वो तो बस एक दोस्त के काम से…” रमाकांत जी हड़बड़ा गए।

“झूठ मत बोलिए पापा। मैंने उस रात आपकी और माँ की सारी बातें सुन ली थीं। मुझे पता चल गया है कि सिद्धार्थ के परिवार ने दहेज में किन-किन चीजों की मांग की है,” मेघा की आँखों में आंसू थे लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब सी मज़बूती थी।

रमाकांत जी ने सिर झुका लिया। सुमित्रा रोने लगी। “बेटा, तू चिंता मत कर। हम तेरे माता-पिता हैं, हम सब संभाल लेंगे। हर बाप अपनी बेटी के लिए ये सब करता है। इसमें कोई नई बात नहीं है।”

“नहीं पापा, ये कोई साधारण बात नहीं है,” मेघा ने उठते हुए कहा। “आपने मुझे पढ़ाया-लिखाया, इस काबिल बनाया कि मैं अपने पैरों पर खड़ी हो सकूँ। आपने मुझे हमेशा सिखाया कि ईमानदारी और स्वाभिमान से बढ़कर कुछ नहीं होता। और आज आप उसी स्वाभिमान को उन लालची लोगों के कदमों में गिरवी रखना चाहते हैं? वो लोग मुझे मेरी काबिलियत या मेरे संस्कारों के लिए नहीं अपना रहे हैं, वो सिर्फ आपके पैसों और मेरी तनख्वाह के लिए ये सौदा कर रहे हैं।”

“लेकिन बेटा, समाज क्या कहेगा? सगाई हो चुकी है। अगर हमने ये रिश्ता तोड़ दिया, तो लोग तरह-तरह की बातें बनाएंगे। तुम्हारी शादी कैसे होगी फिर?” रमाकांत जी ने डरते हुए कहा।

“समाज ने मेरे कॉलेज की फीस नहीं भरी थी पापा, और न ही समाज ने मेरी रातों की नींद में मेरा साथ दिया था। ये सब आपने और माँ ने किया है,” मेघा की आँखों से अंगारे बरस रहे थे। “मैं एक ऐसी शादी के लिए अपने माता-पिता को सड़क पर आते हुए नहीं देख सकती। जो सिद्धार्थ अपने लालची बाप का विरोध नहीं कर सकता, वो कल को मेरा जीवनसाथी क्या बनेगा? जो लोग आज मेरी कीमत लगा रहे हैं, वो कल को मुझे इंसान समझेंगे या सिर्फ पैसे कमाने की मशीन? मुझे ऐसा खोखला रिश्ता नहीं चाहिए पापा। आप कल ही उन्हें फोन करके इस रिश्ते के लिए मना कर दीजिए।”

“बेटा, पर…” सुमित्रा ने कुछ कहना चाहा।

“माँ, अगर आज आपने और पापा ने मेरे लिए खुद को बर्बाद कर दिया, तो मैं ज़िंदगी भर घुट-घुट कर मरूंगी। मेरी सफलता का क्या फायदा अगर वो मेरे ही माता-पिता के आंसुओं का कारण बन जाए? मैं शादी करूंगी, लेकिन उस इंसान से जो मुझे मेरी अच्छाइयों के लिए अपनाए, न कि आपके बैंक बैलेंस के लिए। और अगर ऐसा इंसान नहीं मिला, तो मैं सारी उम्र आपके पास ही रहूंगी, आपका सहारा बनकर।”

मेघा के इन शब्दों ने रमाकांत जी और सुमित्रा के अंदर बैठे उस डर को जैसे एक झटके में खत्म कर दिया। रमाकांत जी ने उठकर अपनी बेटी को गले से लगा लिया। उनकी आँखों से अब दुख के नहीं, बल्कि गर्व के आंसू बह रहे थे। उन्हें एहसास हुआ कि उन्होंने एक कमज़ोर बेटी को नहीं, बल्कि एक शेरनी को जन्म दिया है।

अगले ही दिन, रमाकांत जी ने बिना किसी डर और हिचकिचाहट के रघुनाथ सिंह को फोन किया। उन्होंने बेहद शांत लेकिन सख्त लहज़े में कहा, “रघुनाथ जी, हमने फैसला किया है कि हम यह रिश्ता नहीं कर सकते। हमारी बेटी कोई बाज़ार में बिकने वाली चीज़ नहीं है जिसकी आप बोली लगाएं। हमें ऐसा परिवार चाहिए था जो बेटी का सम्मान करे, न कि ऐसा जो उसे पैसे छापने की मशीन और हमें बैंक समझे। आपका लालच आपको मुबारक, हमें अपनी बेटी का स्वाभिमान ज्यादा प्यारा है।”

रघुनाथ सिंह फोन पर कुछ बोलते, उससे पहले ही रमाकांत जी ने फोन काट दिया। उस दिन रमाकांत जी के कंधों से जैसे कोई बहुत बड़ा पहाड़ उतर गया था। घर में फिर से वही पुरानी शांति लौट आई थी। मेघा ने साबित कर दिया था कि एक बेटी का असली श्रृंगार सोने-चांदी के जेवर नहीं, बल्कि उसका स्वाभिमान और उसके माता-पिता का सम्मान होता है।

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#रिश्तों का बाज़ार और एक बेटी का स्वाभिमान

लेखिका : निधि गुप्ता

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