“अनन्या, सुन रही है? कल करवा चौथ है और तू जानती है कि रिया का यह पहला व्रत है। घर में कोई कमी नहीं रहनी चाहिए। तू आज ही बाज़ार जाकर सरगी का सारा सामान, फल, मेवे और मठरियाँ ले आ। और हाँ, कल सुबह रिया को भूल से भी जल्दी मत उठाना। बेचारी का निर्जला व्रत होगा, जब तक सोएगी, उसे भूख-प्यास का अहसास नहीं होगा। सारा काम तू ही संभाल लेना।” कांति देवी रसोई के दरवाज़े पर खड़ी होकर एक ही साँस में अपनी बेटी को हिदायतें दिए जा रही थीं। बोलते समय उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, एक ऐसी चमक जो अपनी नई नवेली बहू को खुश रखने के गर्व से उपजी थी।
पर इन हिदायतों के बीच कांति देवी यह पूरी तरह से भूल चुकी थीं कि कल ही के दिन, तीन साल पहले अनन्या की शादी हुई थी। कल अनन्या की शादी की सालगिरह भी थी। वही अनन्या, जो कभी करवा चौथ के दिन भोर से उठकर अपने हाथों में गहरी मेहंदी रचाती थी, लाल जोड़े में सजती थी और जिसकी आँखों में अपने पति के लिए असीम प्रेम हुआ करता था। लेकिन इस साल उसकी ज़िंदगी में करवा चौथ का चाँद नहीं, बल्कि एक गहरा ग्रहण लगा हुआ था। महज़ दो महीने पहले ही अनन्या का अपने पति से कानूनी रूप से तलाक हुआ था। पति का शारीरिक और मानसिक दुर्व्यवहार इतना बढ़ गया था कि अनन्या को अपनी जान बचाकर मायके लौटना पड़ा।
अपनी बेटी की ज़िंदगी में आए इस बवंडर का दर्द क्या कांति देवी महसूस नहीं कर पा रही थीं? क्या एक माँ इतनी संवेदनहीन हो सकती है कि अपनी बहू के लिए करवा चौथ की थाली सजाते हुए उसे अपनी ही बेटी के सूने माथे और खाली कलाइयों का ज़रा भी खयाल न आए? यह सवाल अनन्या के मन में तब और ज़ोर से गूंज उठा, जब कांति देवी ने अपने हाथ में पकड़ी एक चटक लाल रंग की बनारसी साड़ी हवा में लहराते हुए कहा, “देख अनन्या, यह साड़ी रिया पर कितनी जंचेगी ना? एकदम गोरा रंग है उसका, लाल रंग में तो मेरी बहू अप्सरा लगेगी। पहली बार व्रत रख रही है, तो मैंने सोचा कि कुछ भारी और सबसे अलग लाऊँ।”
अनन्या ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया। वह अपनी भाभी रिया से कोई ईर्ष्या नहीं करती थी। रिया एक अच्छी लड़की थी। लेकिन अनन्या को अपनी माँ का रवैया अंदर ही अंदर छलनी कर रहा था। तभी कांति देवी ने अलमारी से एक पुरानी, फीके स्लेटी रंग की सूती साड़ी निकाली और अनन्या की तरफ बढ़ाते हुए बोलीं, “कल पूजा के समय तू यह पहन लेना। अब तेरा तो कोई सुहाग है नहीं जो तू लाल-पीला पहनकर सजेगी। और वैसे भी अब तेरे जीवन में ये रंग-रोगन और साज-श्रृंगार किस काम के? तेरा तो दुर्भाग्य ही ऐसा निकला कि अपना बसा-बसाया घर उजाड़ कर बैठ गई। अब कल के दिन तू सादे कपड़ों में ही रहना, वरना अपशकुन लगेगा।”
ये शब्द किसी खंजर की तरह अनन्या के सीने में उतर गए। उसकी अपनी माँ, जिसने उसे जन्म दिया था, आज उसे ‘अपशकुन’ और ‘दुर्भाग्यशाली’ कह रही थी। क्या एक औरत की पहचान केवल उसके पति से होती है? क्या पति का साथ छूटते ही बेटी अपनी माँ के लिए भी एक बोझ और मनहूसियत का प्रतीक बन जाती है? अनन्या का गला रुंध गया, वह कुछ कहना चाहती थी, लेकिन उसके होंठ सिल गए।
तभी कमरे में रिया चहकती हुई आई। उसके दोनों हाथों में कोहनी तक गहरी मेहंदी रची हुई थी। “मम्मी जी, देखिए ना मेरी मेहंदी! कितनी गहरी रची है। रोहन का नाम तो एकदम निखर कर आ रहा है।” रिया ने अपने हाथ कांति देवी के चेहरे के सामने करते हुए कहा।
कांति देवी तुरंत रिया की बलैयां लेने लगीं। “अरे मेरी प्यारी बहू, मेहंदी तो गहरी रचेगी ही, मेरा बेटा जो तुझसे इतना प्यार करता है। भगवान तुम्हारी जोड़ी को बुरी नज़र से बचाए।” कांति देवी ने प्यार से रिया का माथा चूम लिया।
अनन्या चुपचाप यह सब देख रही थी। उसे याद आ रहा था अपना पहला करवा चौथ, जब उसने भी ऐसी ही मेहंदी लगाई थी, लेकिन तब उसकी सास ने उसकी मेहंदी की तारीफ करने के बजाय ताना मारा था कि ‘मेहंदी तो लगा ली, अब घर का काम क्या तुम्हारे मायके वाले आकर करेंगे?’ अनन्या का मन कर रहा था कि वह ज़ोर-ज़ोर से रोए और अपनी माँ से कहे कि ‘माँ, मुझे यह सब देखकर घुटन हो रही है। मुझे कल की तैयारियों से दूर रहने दो।’
लेकिन इससे पहले कि अनन्या कुछ बोल पाती, कांति देवी ने एक ऐसी बात कह दी जिसने अनन्या के सब्र का बांध हमेशा के लिए तोड़ दिया।
कांति देवी रिया के बाल सहलाते हुए अनन्या की ओर देखकर बोलीं, “जानती हो रिया, एक बात तो बहुत अच्छी हुई। अनन्या की शादी और इसके तलाक ने मेरी आँखें खोल दीं। मुझे समझ आ गया कि एक नई बहू को कैसे रखना चाहिए। अनन्या की सास इसके साथ जो ज़ुल्म करती थी, उसे देखकर मैंने कसम खा ली थी कि मैं अपनी बहू के साथ कभी वैसा व्यवहार नहीं करूंगी। मैं तो तेरे साथ इसलिए इतना अच्छा व्यवहार कर रही हूँ ताकि तुझे कोई तकलीफ न हो। मैंने अपनी बेटी की बर्बादी से यह सबक लिया है कि एक बहू अपनी सास से क्या उम्मीद रखती है। इसलिए मैं कोई गलती नहीं करूंगी, ताकि मेरी बहू भी कल को यह न कह सके कि उसकी सास…”
कांति देवी आगे कुछ और भी कह रही थीं, लेकिन अनन्या के कानों में अब जैसे पिघला हुआ सीसा डाला जा रहा था। उसका दिमाग सुन्न पड़ गया। क्या उसकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा दुख, उसकी रातों की नींदें छीनने वाला उसका दर्द, उसका घरेलू हिंसा का शिकार होना, उसके शरीर पर पड़े वो नीले निशान—क्या वह सब उसकी माँ के लिए महज़ एक ‘उदाहरण’ था? क्या उसका तलाक सिर्फ इसलिए हुआ ताकि उसकी माँ एक ‘आदर्श सास’ बनने का क्रैश कोर्स कर सके?
अनन्या अब और चुप नहीं रह सकी। उसकी आँखों से आँसू सूख चुके थे और उनकी जगह एक ठंडी सी आग ने ले ली थी।
“बस माँ… बहुत हो गया,” अनन्या की आवाज़ में एक अजीब सी खामोशी और दृढ़ता थी, जिसने कमरे में छाए खुशनुमा माहौल को एकदम से चीर दिया।
कांति देवी और रिया दोनों हैरान होकर अनन्या को देखने लगीं।
“क्या कहा तुमने माँ? कि मेरे तलाक से तुम्हें सीख मिली? मेरा उजड़ा हुआ घर, मेरे शरीर पर पड़े वो बेल्ट के निशान, मेरी वो रातें जो मैंने बाथरूम में छुपकर रोते हुए काटीं… वो सब तुम्हारे लिए महज़ एक केस स्टडी था? ताकि तुम समाज में यह साबित कर सको कि तुम एक महान सास हो?” अनन्या की आवाज़ अब थोड़ी ऊँची हो गई थी।
“यह कैसी बात कर रही है तू? मैं तो बस रिया को…” कांति देवी ने सफाई देनी चाही।
“नहीं माँ, आज आप सुनेंगी,” अनन्या ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा। “आप रिया से प्यार नहीं करतीं, आप सिर्फ अपनी उस महान छवि से प्यार करती हैं जो आप इस समाज की नज़रों में बनाना चाहती हैं। आप नहीं चाहतीं कि कल को कोई आप पर उंगली उठाए जैसी उंगली आप मेरी सास पर उठाती हैं। लेकिन इस महानता के नाटक में आप यह भूल गईं कि आप एक माँ भी हैं। एक बेटी जब अपना घर टूटता हुआ देखकर मायके आती है, तो वह एक सुरक्षित कोना खोजती है, जहाँ कोई उसे ‘बेचारी’ या ‘अपशकुन’ न कहे। जहाँ उसे हर पल यह अहसास न दिलाया जाए कि बिना आदमी के उसकी कोई औकात नहीं है।”
कमरे में सन्नाटा छा गया था। रिया भी सहमी हुई खड़ी थी। उसे आज पहली बार इस घर की और अपनी सास की एक खौफनाक सच्चाई दिख रही थी।
अनन्या ने वह स्लेटी रंग की सूती साड़ी वापस अलमारी पर फेंक दी। “मैं कल इस घर में नहीं रहूंगी माँ। मैं अपने दर्द को आपकी महानता की सीढ़ी नहीं बनने दूंगी। रिया को आप सारे गहने, सारे कपड़े पहना दीजिए, लेकिन याद रखिएगा… जो औरत अपनी ही बेटी के घावों को कुरेद कर अपनी बहू के सामने अच्छी बनने का दिखावा कर सकती है, वह अंदर से कभी किसी की सगी नहीं हो सकती।”
अनन्या मुड़ी और अपने कमरे की तरफ चल दी। उसने अपना सूटकेस निकाला और उसमें अपने कपड़े भरने लगी। उसे समझ आ गया था कि मायका अब उसके लिए वह शरणस्थली नहीं रहा जिसका उसने सपना देखा था। उसे अपनी लड़ाई अब खुद लड़नी थी। उसे किसी के सुहाग की छाया में अपना जीवन अंधकारमय नहीं करना था, बल्कि अपनी खुद की एक नई रोशनी तलाशनी थी। जब वह अपना सूटकेस लेकर घर के मुख्य दरवाज़े से बाहर निकल रही थी, तो उसने एक बार पलटकर नहीं देखा। आज करवा चौथ की पूर्व संध्या पर, उसने एक व्रत लिया था—खुद से कभी हार न मानने का व्रत, अपने आत्मसम्मान को सर्वोपरि रखने का व्रत।
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