दूसरी ओर, रोहन भी अपने पिता के इस हस्तक्षेप से बुरी तरह चिढ़ गया था। पिता के सामने वह पलट कर जवाब तो नहीं दे सकता था, लेकिन उसका पुरुषार्थ इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उसकी पत्नी अब उससे एक कदम आगे निकल चुकी है।
पति और पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए हो सकते हैं, लेकिन जब पत्नी का पहिया बड़ा हो जाए, तो गाड़ी का संतुलन बिगड़ने का डर हमेशा पुरुष को ही क्यों सताता है, यह सवाल रोहन खुद से नहीं पूछ पा रहा था। वह मुंह फुलाकर घर से बाहर निकल गया।
शाम का वक्त था। लखनऊ के गोमती नगर वाले उस दो मंजिला मकान में रोज की तरह खामोशी और टीवी की हल्की आवाज गूंज रही थी। डाइनिंग टेबल पर चाय की प्यालियां रखी थीं और सावित्री देवी अपने बेटे रोहन के साथ बैठी किसी पारिवारिक विषय पर चर्चा कर रही थीं।
तभी दरवाजे की घंटी बजी और मीरा चेहरे पर एक अजीब सी चमक और उत्साह लिए घर में दाखिल हुई। उसने अपना बैग सोफे पर रखा और सीधे रोहन के पास आकर बोली, “रोहन, मां जी, मुंह मीठा कीजिए! आज का दिन मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन है।”
रोहन ने चाय का कप नीचे रखते हुए हैरानी से पूछा, “ऐसा क्या हो गया? कोई लॉटरी लग गई क्या?”
मीरा की आंखों में खुशी के आंसू तैर गए। उसने गहरी सांस लेते हुए कहा, “मेरी कंपनी ने मुझे जोनल हेड के पद पर प्रमोट कर दिया है! और… और मुझे इस नई पोस्टिंग के लिए बेंगलुरु जाना होगा। अगले महीने की पहली तारीख से मुझे वहां जॉइन करना है।”
कमरे में अचानक एक भारी सन्नाटा छा गया। रोहन के चेहरे की लकीरें एकदम से तन गईं और सावित्री देवी के हाथ में पकड़ी चाय की प्याली छलकते-छलकते बची।
रोहन का स्वर अचानक सख्त हो गया, “बेंगलुरु? तुमने यह कैसे सोच लिया कि मैं तुम्हारे साथ बेंगलुरु जाऊंगा? मेरी यहां एक सेटल्ड जॉब है, बैंक में मेरी अच्छी खासी पोजीशन है। मैं तुम्हारी इस नई नौकरी के लिए अपनी जिंदगी यहां से वहां नहीं उखाड़ सकता। और सबसे बड़ी बात, तुमने इतनी बड़ी बात पर हामी भरने से पहले मुझसे पूछना भी जरूरी नहीं समझा?”
मीरा थोड़ी सकपकाई, लेकिन खुद को संभालते हुए बोली, “रोहन, यह कोई छोटी बात नहीं थी। मैं पिछले पांच सालों से इस प्रमोशन के लिए दिन-रात एक कर रही थी। मैंने हामी इसलिए भरी क्योंकि मुझे लगा कि तुम मेरी इस कामयाबी पर खुश होगे। यह सिर्फ ट्रांसफर नहीं है, यह मेरे करियर की सबसे बड़ी छलांग है।”
तभी सावित्री देवी, जो अब तक चुप थीं, अपने चिर-परिचित व्यंग्यात्मक लहजे में बोलीं, “अरे बहू, औरत के लिए सबसे बड़ी छलांग उसका घर-परिवार होता है। पैसा ही सब कुछ थोड़ी होता है। और तुम वहां जाकर करोगी भी क्या? यहां तो मैं और कामवाली मिलकर घर संभाल लेते हैं। तुमसे तो सुबह की चाय भी ठीक से नहीं बनती। याद है पिछले हफ्ते तुमने गीले कपड़े बिस्तर पर ही छोड़ दिए थे? कभी तुम तौलिया सोफे पर छोड़ देती हो, कभी तुम्हारे ऑफिस के कागज डाइनिंग टेबल पर बिखरे रहते हैं। जो लड़की ढंग से अपना कमरा नहीं समेट सकती, वो जोनल हेड बनकर क्या करेगी? घर की जिम्मेदारी से भागने का यह अच्छा बहाना ढूंढ लिया है तुमने।”
सावित्री देवी के इन शब्दों ने मीरा के उत्साह पर जैसे बर्फ का पानी डाल दिया। वह जानती थी कि उसकी सास हमेशा से उसकी नौकरी को एक ‘शौक’ से ज्यादा कुछ नहीं मानती थीं। रोहन का भी वही हाल था। पत्नी अगर दो पैसे कमाए तो ठीक है, लेकिन अगर वह पति से ज्यादा कमाने लगे या उससे ऊंचे पद पर पहुंच जाए, तो यह बात पुरुष प्रधान समाज में पले-बढ़े रोहन के गले के नीचे नहीं उतर रही थी। उसके भीतर कहीं न कहीं एक गहरी हीन भावना ने जन्म ले लिया था।
मीरा ने रुंधे हुए गले से कहा, “मां जी, मैं अपनी जिम्मेदारियों से नहीं भाग रही हूं। और रोहन, तुम्हें मेरे साथ आने की जरूरत नहीं है। मैं वहां अकेले मैनेज कर लूंगी। तुम यहां रहो, मैं हर महीने आती रहूंगी, लेकिन मैं यह मौका नहीं छोड़ सकती।”
“तुम अकेली जाओगी?” रोहन लगभग चिल्ला पड़ा। “यह क्या मजाक है? लोग क्या कहेंगे कि रोहन की पत्नी उसे छोड़कर दूसरे शहर में नौकरी कर रही है? मैं यह सब तमाशा नहीं होने दूंगा।”
कमरे का माहौल अब पूरी तरह से गर्मा चुका था। तभी घर के मुखिया, कैलाश नाथ जी, जो अब तक अपने कमरे में बैठकर अखबार पढ़ रहे थे, बाहर आए। उन्होंने अपनी पत्नी सावित्री और बेटे रोहन की बातें सुन ली थीं। उनका शांत और गंभीर व्यक्तित्व हमेशा से घर में सम्मान का प्रतीक रहा था।
कैलाश जी ने चश्मा उतारकर मेज पर रखा और अपनी भारी लेकिन शांत आवाज में बोले, “रोहन, मीरा को जाने दो। उसे उसकी मेहनत का फल मिल रहा है, तो तुम्हें उसके रास्ते की रुकावट नहीं, बल्कि उसका सहारा बनना चाहिए।”
सावित्री देवी अपने पति की इस बात पर तिलमिला उठीं, “आप तो बीच में मत ही बोलिए! आपको तो बहू की हर गलती नजरअंदाज करने की आदत हो गई है। यह कोई समझदारी है कि घर छोड़कर परदेस में जाकर नौकरी करे? इसका काम घर संभालना है, ना कि मर्दों की बराबरी करना।”
कैलाश जी ने एक गहरी नजर अपनी पत्नी पर डाली और बोले, “सावित्री, तुम भूल रही हो कि जब हमारी अपनी बेटी स्नेहा की शादी हुई थी और उसके ससुराल वालों ने उसे नौकरी छोड़ने के लिए कहा था, तब तुमने ही सबसे ज्यादा हंगामा किया था। तुमने कहा था कि ‘मेरी बेटी पढ़ी-लिखी है, वह किसी की गुलाम नहीं बनेगी, उसे अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए’। तब तुम्हारी वह आधुनिक सोच कहां से आ गई थी? क्या स्नेहा भी अपने कपड़े और तौलिए सही जगह पर रखती थी? वह तो मीरा से भी ज्यादा लापरवाह थी। लेकिन तब तुमने उसकी हर कमी को उसका ‘भोलापन’ कहा था। आज जब मीरा अपने पैरों पर और मजबूती से खड़ी होना चाहती है, तो तुम्हें उसके गीले तौलिए याद आ रहे हैं? बेटी और बहू में यह कैसा फर्क है सावित्री?”
कैलाश जी की बातों ने जैसे सावित्री देवी के होठों पर ताला जड़ दिया। वे भीतर ही भीतर सुलग रही थीं। उन्हें लग रहा था कि उनका अपना पति ही उन्हें नीचा दिखा रहा है और एक ‘बाहर की लड़की’ का पक्ष ले रहा है। उन्होंने मन ही मन सोचा कि शायद मीरा जैसी ज्यादा पढ़ी-लिखी और महत्वाकांक्षी लड़की को बहू बनाकर उन्होंने अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है।
दूसरी ओर, रोहन भी अपने पिता के इस हस्तक्षेप से बुरी तरह चिढ़ गया था। पिता के सामने वह पलट कर जवाब तो नहीं दे सकता था, लेकिन उसका पुरुषार्थ इस बात को स्वीकार नहीं कर पा रहा था कि उसकी पत्नी अब उससे एक कदम आगे निकल चुकी है। पति और पत्नी एक गाड़ी के दो पहिए हो सकते हैं, लेकिन जब पत्नी का पहिया बड़ा हो जाए, तो गाड़ी का संतुलन बिगड़ने का डर हमेशा पुरुष को ही क्यों सताता है, यह सवाल रोहन खुद से नहीं पूछ पा रहा था। वह मुंह फुलाकर घर से बाहर निकल गया।
मीरा के जाने का दिन नजदीक आ गया। घर में एक अजीब सा तनाव फैला हुआ था। मीरा अपनी पैकिंग कर रही थी, लेकिन उसका मन भारी था। रोहन ने पिछले कई दिनों से उससे ठीक से बात नहीं की थी। वह सिर्फ औपचारिकता के लिए उसके साथ एक ही कमरे में रह रहा था।
जाने से एक रात पहले, मीरा अपना सूटकेस बंद कर रही थी, तभी कैलाश जी कमरे में आए। मीरा ने उन्हें देखकर तुरंत उठकर उनके पैर छुए। कैलाश जी ने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा, “बेटी, तुम बहुत दूर जा रही हो, लेकिन याद रखना कि यह घर हमेशा तुम्हारा है। मुझे तुम पर बहुत गर्व है।”
मीरा की आंखों से आंसू छलक पड़े, “पापा जी, क्या मैं कुछ गलत कर रही हूं? रोहन मुझसे इतनी नफरत क्यों करने लगे हैं? क्या मेरा आगे बढ़ना हमारे रिश्ते के लिए बुरा है?”
कैलाश जी ने पास रखी कुर्सी पर बैठते हुए बहुत ही नरमी से कहा, “नहीं बेटा, तुम कुछ गलत नहीं कर रही हो। रोहन तुमसे नफरत नहीं करता, वह बस अपने उन संस्कारों और समाज की उस सोच से लड़ रहा है जिसमें उसे बड़ा किया गया है। उसे हमेशा से यही सिखाया गया कि घर चलाने की और पत्नी की जिम्मेदारी उठाने की जिम्मेदारी सिर्फ मर्द की होती है। जब वह देखता है कि तुम उससे ज्यादा सक्षम हो, तो उसे लगता है कि उसकी अहमियत कम हो गई है। यह उसकी असुरक्षा है, उसका घमंड नहीं। उसे थोड़ा वक्त दो मीरा। वह धीरे-धीरे इस नई सच्चाई को स्वीकार कर लेगा।”
मीरा को कैलाश जी की बातों में अपने पिता की छवि नजर आई। वह इस घर में बहू बनकर आई थी, लेकिन आज उसे लगा कि उसे सच में एक और पिता मिल गया है, जो उसकी उड़ानों को पंख दे रहा है।
अगले दिन मीरा बेंगलुरु के लिए रवाना हो गई। दरवाजे पर खड़ी सावित्री देवी बस रस्मी तौर पर मुस्कुराईं, लेकिन उनके दिल में जल रही ईर्ष्या की आग अभी बुझी नहीं थी। रोहन उसे एयरपोर्ट तक छोड़ने तो गया, लेकिन रास्ते भर दोनों के बीच खामोशी की एक मोटी दीवार खड़ी रही।
वक्त अपनी रफ्तार से बीतता गया। बेंगलुरु में मीरा ने अपनी नई जिम्मेदारियों को बहुत अच्छे से संभाल लिया। वहीं लखनऊ में रोहन को धीरे-धीरे यह अहसास होने लगा कि घर में मीरा की कमी कितनी गहरी है। कैलाश जी अक्सर रोहन को समझाते और उसे मीरा की उपलब्धियों पर गर्व करना सिखाते। वे जानते थे कि बदलाव रातों-रात नहीं आता, लेकिन एक पिता होने के नाते उन्होंने अपनी बहू के लिए जो स्टैंड लिया था, वह समाज की रूढ़िवादी सोच पर एक करारा तमाचा था। मीरा को उम्मीद थी कि एक दिन रोहन जरूर समझेगा कि प्यार में कोई किसी से बड़ा या छोटा नहीं होता, बल्कि दोनों एक-दूसरे की ताकत होते हैं।
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#उड़ान : एक अनकहा सफर