परंपराओं की दोहरी कसौटी: एक नई बहू की अनकही कहानी

 सिद्धार्थ, जो अब तक इस पूरे मामले से अनजान था, तुरंत सारी स्थिति समझ गया। उसने अपनी भाभी का साथ देते हुए कहा, “बड़ी अम्मा, भाभी बिल्कुल सही कह रही हैं। सम्मान दिल में होता है, दिखावे में नहीं। तान्या ने हमारे घर और हमारे रीति-रिवाजों को पूरे दिल से अपनाया है।

अगर मेरे ‘ताई जी’ कहने से और घुटने छूने से मेरा सम्मान कम नहीं होता, तो तान्या के पैर छूने के तरीके से उसका सम्मान या उसके परिवार के संस्कार कैसे गलत हो सकते हैं? हमें उसे प्यार से इस घर का हिस्सा बनाना चाहिए, न कि हर कदम पर उसका इम्तिहान लेना चाहिए।”

लखनऊ के पुराने और प्रतिष्ठित तिवारी परिवार की हवेली आज रंग-बिरंगी रोशनी और गेंदे के फूलों से सजी हुई थी। घर के आंगन में शहनाई की धुन गूंज रही थी और मेहमानों की चहल-पहल से पूरा माहौल उत्सवी हो उठा था। अवसर था घर के छोटे बेटे, सिद्धार्थ और उसकी नवविवाहिता पत्नी, तान्या के गृह प्रवेश और उसके बाद होने वाली मुंह दिखाई की रस्म का।

सिद्धार्थ और तान्या दोनों ही बेंगलुरु की एक बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे पदों पर कार्यरत थे। दोनों की मुलाकात ऑफिस में हुई, प्यार हुआ और फिर दोनों परिवारों की रजामंदी से यह प्रेम विवाह संपन्न हुआ।

शादी हालांकि एक फाइव-स्टार रिसॉर्ट में हुई थी, लेकिन तिवारी परिवार की जिद पर सारे रीति-रिवाज बिल्कुल ठेठ पारंपरिक तरीके से निभाए गए थे।

तान्या के परिवार वालों ने, जो कि काफी आधुनिक और खुले विचारों वाले थे, खुशी-खुशी लड़के वालों की हर छोटी-बड़ी मांग और रस्म को पूरा किया था। उनका मानना था कि खुशियां दोनों तरफ की होनी चाहिए, इसलिए उन्होंने अपनी बेटी की शादी में कोई कसर नहीं छोड़ी।

आज मुंह दिखाई की रस्म थी। तान्या सुबह पांच बजे से उठकर तैयार हो रही थी। भारी बनारसी साड़ी, माथे पर बड़ा सा सिंदूर, हाथों में चूड़ा और गहनों से लदी तान्या किसी अप्सरा से कम नहीं लग रही थी।

वह भले ही आधुनिक ख्यालों वाली और स्वतंत्र विचारों की लड़की थी, लेकिन बड़ों का सम्मान करना और परिवार को साथ लेकर चलना उसने अपने माता-पिता से बखूबी सीखा था। वह पूरे मन से तिवारी परिवार के रंग में ढलने की कोशिश कर रही थी।

हवेली के बड़े से दालान में गांव और शहर के तमाम रिश्तेदार जमा थे। घर की बड़ी बहु, नीरजा, जो कि सिद्धार्थ की भाभी थी, दूर खड़ी सब कुछ बड़े गौर से देख रही थी। नीरजा भी दस साल पहले इसी तरह इस घर में ब्याह कर आई थी और उसने भी इन सब तानों और रीति-रिवाजों के दोहरे मापदंडों को झेला था।

एक तरफ रस्में चल रही थीं और दूसरी तरफ दालान के एक कोने में बैठी घर की बुजुर्ग महिलाओं, खासकर सिद्धार्थ की बड़ी ताई जी, फुआ (बुआ) और दूर के गांव से आई चाचियों की पंचायत बैठी थी। उनकी आंखें तान्या के हर एक कदम, उसके उठने-बैठने के तरीके और उसके पहनावे का बारीकी से स्कैन कर रही थीं।

“अरी ओ सुमित्रा,” बड़ी ताई जी ने अपना पान चबाते हुए फुआ से कहा, “ये आजकल की लड़कियां चाहे कितना भी बन-ठन लें, वो बात कहां जो हमारे जमाने की बहुओं में होती थी। साड़ी तो पहन ली है, पर पल्लू देखो, सिर पर से बार-बार खिसक रहा है। और यह साड़ी का ब्लाउज, कुछ ज्यादा ही छोटा नहीं है?”

फुआ ने हामी भरते हुए कहा, “हां जीजी, बिल्कुल सही कह रही हो। बड़े शहरों में रहने वाली इन लड़कियों को हमारे गांव-देहात के संस्कार कहां पता होते हैं। लाखों कमाती होगी अपनी जगह, पर यहां तो घर गृहस्थी चलानी है न। मुझे तो नहीं लगता कि यह लड़की कभी हमें एक कप चाय भी अपने हाथों से बनाकर पिलाएगी। इसके हाव-भाव से ही लग रहा है कि इसे इन सब रस्मों में कोई दिलचस्पी नहीं है।”

एक दूसरी चाची ने बीच में टोकते हुए कहा, “अरे छोड़ो भी, लड़की के मां-बाप कितने सीधे और सभ्य दिख रहे थे। उन्होंने तो हमारी हर बात मानी है। ऐसा नहीं है कि बेटी को कुछ सिखाया नहीं होगा।”

“अरे काहे के सभ्य!” ताई जी ने मुंह बनाते हुए कहा, “आजकल के मां-बाप बेटियों को पढ़ा-लिखा कर अफसर तो बना देते हैं, पर यह नहीं सिखाते कि ससुराल में बड़ों से कैसे पेश आना है। कल विदाई के वक्त मैंने खुद देखा था, इसने कितने लोगों के पैर छुए? बस झुक कर नमस्ते कर रही थी। हाथ जोड़ लेने से क्या संस्कार पूरे हो जाते हैं? हमारे यहां तो बहुएं घुटनों के बल बैठकर बड़ों की पिंडलियां दबाकर आशीर्वाद लेती हैं।”

नीरजा यह सब सुन रही थी। उसे तान्या के लिए बहुत बुरा लग रहा था। तान्या ने कल पूरी रात सफर किया था, सुबह से भारी साड़ी और गहनों में बिना कुछ खाए-पिए रस्में निभा रही थी। उसके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी, लेकिन फिर भी वह मुस्कुराते हुए सबसे मिल रही थी। पर इन रिश्तेदारों को उसकी थकान नहीं, सिर्फ उसकी गलतियां दिख रही थीं।

कुछ ही देर में मुंह दिखाई की रस्म शुरू हुई। तान्या को बीच में बैठाया गया और एक-एक करके सभी महिलाएं उसे नेग (उपहार) देने और उसका मुंह देखने आने लगीं।

तान्या अपनी जगह से उठकर सभी के पैर छू रही थी। जो लोग उसकी उम्र के आस-पास के थे, उन्हें वह हाथ जोड़कर नमस्ते कर रही थी या मुस्कुराकर उनका अभिवादन कर रही थी। जब ताई जी, फुआ और गांव वाली चाचियों की बारी आई, तो तान्या ने आगे बढ़कर उनके पैर छुए।

तभी ताई जी ने कड़कती हुई आवाज में कहा, “अरे बहू! यह क्या तरीका है पैर छूने का? बस उंगलियां छुआ दीं और हो गया? ये तुम्हारी फुआ सास हैं, ये मझली चाची सास हैं और मैं तुम्हारी बड़ी ताई सास। हमारे यहां ऐसे खड़े-खड़े पैर नहीं छुए जाते। बैठो, दोनों हाथों से पैरों को पकड़ो, पिंडलियां दबाओ और फिर सिर झुकाकर आशीर्वाद लो। और हां, यह पल्लू जो बार-बार कंधे पर गिर रहा है, इसे सिर पर ही रखो।”

तान्या अचानक हुए इस हमले से सकपका गई। उसने कभी किसी को इस तरह पैर छूते नहीं देखा था, लेकिन उसने बिना कोई बहस किए विनम्रता से कहा, “सॉरी ताई जी, मुझे पता नहीं था। मैं आगे से ध्यान रखूंगी।” उसने तुरंत अपने सिर का पल्लू ठीक किया और वैसे ही पैर छुए जैसा ताई जी ने कहा था।

“सॉरी नहीं बहू, हमारे यहां इसे क्षमा मांगना कहते हैं। और ये जो तुम मुझे बार-बार ‘ताई जी’ कह रही हो न, हमारे यहां मुझे ‘बड़ी अम्मा’ और फुआ को ‘बुआ जी’ कहा जाता है। ये तुम्हारे शहर वाला ‘आंटी’ और ‘ताई जी’ यहां नहीं चलेगा,” ताई जी ने अपना रुतबा दिखाते हुए कहा।

तान्या ने मुस्कुराकर स्थिति को संभालने की कोशिश की, “जी बड़ी अम्मा, मुझे माफ कर दीजिएगा।”

ताई जी की बातों से साफ लग रहा था कि वे तान्या को उसके आधुनिक होने का ताना मार रही हैं और अपना प्रभुत्व स्थापित करना चाहती हैं। उन्होंने फिर से कहा, “देखो बहू, बुरा मत मानना, लेकिन तुम शहर की पढ़ी-लिखी लड़की हो। तुम्हें अपने मां-बाप की इज्जत का ख्याल रखना चाहिए। अगर तुम अच्छे संस्कार नहीं दिखाओगी, तो लोग यही कहेंगे कि मायके वालों ने कुछ नहीं सिखाया।”

तान्या की आंखों में हल्की सी नमी आ गई, लेकिन उसने उसे छुपा लिया। उसे समझ नहीं आ रहा था कि एक रस्म को करने के तरीके से उसके माता-पिता के संस्कारों पर सवाल कैसे उठ सकता है। नीरजा से अब रहा नहीं जा रहा था, लेकिन वह भी परिवार की मर्यादा के कारण चुपचाप खड़ी थी।

रस्में लगभग खत्म हो चुकी थीं और अब पुरुषों के मिलने-जुलने का समय था। तभी सिद्धार्थ, जो अभी-अभी अपनी नींद पूरी करके और एक आरामदायक कुर्ता-पायजामा पहनकर कमरे से बाहर आया था, दालान में पहुंचा।

सिद्धार्थ को देखते ही उन सभी रिश्तेदारों के चेहरे खिल उठे जो अभी तक तान्या की कमियां निकाल रहे थे।

सिद्धार्थ ने आते ही सबसे पहले फुआ की तरफ देखा और दूर से ही झुककर उनके घुटनों को हाथ लगाते हुए कहा, “और बुआ, कैसी हो आप? जर्नी कैसी रही आपकी?”

फुआ गदगद हो गईं और उन्होंने सिद्धार्थ का माथा चूमते हुए कहा, “जीते रहो मेरे लाल! मैं तो बिल्कुल ठीक हूं। तू बता, थक गया होगा न बेटा? इतनी लंबी शादी और फिर सफर।”

इसके बाद सिद्धार्थ ने ताई जी के सिर्फ घुटनों को छुआ और कहा, “नमस्ते ताई जी, सब ठीक?”

ताई जी ने भी बड़े प्यार से सिद्धार्थ के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “जुग-जुग जियो बेटा। देखो फुआ, हमारा लड़का शहर जाकर और इतना बड़ा अफसर बनकर भी कितना जमीन से जुड़ा है। अपने बड़ों को नहीं भूला। इसे कहते हैं खानदानी संस्कार।”

नीरजा और तान्या दोनों हैरानी से यह सब देख रही थीं। सिद्धार्थ ने न तो पिंडलियां दबाईं, न ही ठीक से पैर छुए, न ही उसने ‘बड़ी अम्मा’ या ‘बुआ जी’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया। उसने फुआ को सिर्फ ‘बुआ’ कहा और ताई जी को ‘ताई जी’। फिर भी वह ‘जमीन से जुड़ा’ और ‘संस्कारी’ हो गया।

तभी सिद्धार्थ ने इधर-उधर देखते हुए पूछा, “अरे, तान्या के मम्मी-पापा कहां हैं? वो लोग मुझे नजर नहीं आ रहे। अंकल-आंटी को भी मेरा नमस्ते करना था, उनका भी आशीर्वाद ले लूं।”

सिद्धार्थ के मुंह से तान्या के माता-पिता के लिए ‘अंकल-आंटी’ सुनकर ताई जी के चेहरे पर कोई शिकन नहीं आई। बल्कि उन्होंने प्यार से कहा, “अरे वो लोग तो बाहर वाले कमरे में आराम कर रहे हैं। तू परेशान मत हो, वो खुद ही आकर मिल लेंगे। तू बैठ, तेरे लिए मैं जूस मंगवाती हूं।”

अब नीरजा के सब्र का बांध टूट गया। उसने जो देखा और सुना, वह समाज के उस दोगलेपन की चरम सीमा थी जिसे वह सालों से बर्दाश्त कर रही थी। वह धीरे से आगे आई और उसने बहुत ही शांत लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,

“बड़ी अम्मा, मुझे एक बात समझ नहीं आई। तान्या सुबह पांच बजे से उठकर, इतनी भारी साड़ी और गहने पहनकर, बिना कुछ खाए आपकी हर रस्म को पूरी श्रद्धा से निभा रही है। जब वह आपके पैर छूती है, तो आप उसके झुकने के तरीके में कमी निकालती हैं। उसके ताई जी कहने पर आप उसे शहर की बदतमीज लड़की समझती हैं और उसके मां-बाप के संस्कारों पर उंगली उठाती हैं।”

पूरे दालान में सन्नाटा छा गया। सब नीरजा की तरफ देखने लगे।

नीरजा ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा, “पर अभी जब देवर जी (सिद्धार्थ) आए… उन्होंने न तो आपके पैर ठीक से छुए, बस घुटनों को हाथ लगाया। उन्होंने भी आपको ‘बड़ी अम्मा’ नहीं बल्कि ‘ताई जी’ कहा। तान्या के माता-पिता को उन्होंने ‘अंकल-आंटी’ कहा। पर उनकी किसी भी बात पर आपको गुस्सा नहीं आया? बल्कि आप उन्हें ‘संस्कारी’ और ‘जमीन से जुड़ा’ बता रही हैं। क्या संस्कार और सम्मान का पैमाना सिर्फ घर की बहुओं के लिए ही तय किया गया है? बेटों के लिए सारे नियम अलग क्यों हैं?”

ताई जी और फुआ के पास नीरजा के इन तीखे लेकिन सत्य सवालों का कोई जवाब नहीं था। उनके चेहरे का रंग उड़ गया था।

सिद्धार्थ, जो अब तक इस पूरे मामले से अनजान था, तुरंत सारी स्थिति समझ गया। उसने अपनी भाभी का साथ देते हुए कहा, “बड़ी अम्मा, भाभी बिल्कुल सही कह रही हैं। सम्मान दिल में होता है, दिखावे में नहीं। तान्या ने हमारे घर और हमारे रीति-रिवाजों को पूरे दिल से अपनाया है। अगर मेरे ‘ताई जी’ कहने से और घुटने छूने से मेरा सम्मान कम नहीं होता, तो तान्या के पैर छूने के तरीके से उसका सम्मान या उसके परिवार के संस्कार कैसे गलत हो सकते हैं? हमें उसे प्यार से इस घर का हिस्सा बनाना चाहिए, न कि हर कदम पर उसका इम्तिहान लेना चाहिए।”

सिद्धार्थ की बातों ने ताई जी और वहां बैठे सभी रिश्तेदारों को निशब्द कर दिया। उन्हें अपनी गलती और अपनी पुरानी रूढ़िवादी सोच का अहसास हो रहा था। उन्होंने जो दीवार एक नई नवेली बहू के सामने खड़ी की थी, वह सिद्धार्थ और नीरजा के चंद सच्चे शब्दों से ढह गई थी।

तान्या की आंखों में अब आंसू थे, लेकिन यह आंसू अपमान के नहीं, बल्कि इस बात की खुशी के थे कि उसके पति और उसकी जेठानी ने उसके सम्मान के लिए आवाज उठाई थी। उसे अब यह घर सच में अपना सा लगने लगा था, क्योंकि वह जान गई थी कि यहां कुछ लोग ऐसे भी हैं जो परंपराओं के नाम पर थोपे गए दोहरे मापदंडों के बजाय, इंसानियत और सच्चे सम्मान की कद्र करते हैं।

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#परंपराओं की दोहरी कसौटी

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