अमिता की शादी को अभी दो माह ही व्यतीत हुए थे । अमिता को अभी से अपनी जिंदगी पहाड़ सी लगने लगी । उसके ससुराल में सास ससुर, ननद, देवर देवरानी अच्छा खासा परिवार मिला उसको कोई कमी नहीं । देवर अपनी पसन्द से पहले ही विवाह कर दुल्हन घर ले आया था । देवरानी और देवर एक ही ऑफिस मे काम करते। देवरानी तेजतर्रार मुंहफट स्वभाव, दोनों पति-पत्नी सुबह ही निकल जाते तो देर शाम तक ही लौटते ऑफिस से । अमिता के पति अमित का शहर के प्रतिष्ठित माॅल में रेडिमेड कपड़ों का व्यवसाय ससुर भी अपने रिटायरमेंट के बाद उसी में संलग्न थे। अमित पर माता पिता का काफी जोर वो उन्हीं के कहेनुसार हर काम करता।
अमिता जब से इस घर में विवाह कर आई उसको तो कभी एक पल ऐसा नहीं लगा उसकी कोई अपनी भी दुनिया हो। वो एक साधारण से परिवार से पढ़ी लिखी विवाह से पहले वो एक प्राइवेट स्कूल में शिक्षिका और साथ ही डाक्ट्रेट की भी तैयारी कर रही । उसके पिता सरकारी क्लर्क बीमारी की वजह से नौकरी छोड़ चुके थे । वो दो बहनें एक का विवाह हो चुका और उसके ही माध्यम से जब उसके लिए अमित का रिश्ता आया, अपने ही शहर से, अच्छे रईस परिवार का लड़का तो घर वालों ने खुशी खुशी स्वीकार कर लिया।
एक साधारण परिवार को इतने अच्छे बड़े घर का रिश्ता मिल जाए तो कौन माता-पिता भला खुशी से तैयार नहीं होंगे? बड़ी बहन के दूर के रिश्तेदार लगते उसके ससुराल वाले । जब उसका रिश्ता चला तो सास ससुर ने कह दिया हमें बहु की पढ़ाई लिखाई नौकरी से कोई एतराज़ नहीं है। हम बहु बेटियों में कोई फर्क नहीं रखते । लेकिन जैसे ही विवाह हुआ कुछ दिन बाद अमिता ने नौकरी पर जाने की इजाजत मांगी तो सास ससुर ने कहा अरे.. अभी क्या जल्दी है नौकरी की ? तुम्हारा स्कूल भी यहां से बहुत दूर है आने जाने में ही इतना समय व्यर्थ होगा। तुम अभी आराम से रहो फिर जल्दी ही हम यहीं आसपास तुम्हारे लिए नई नौकरी का इंतजाम कर देंगे । वैसे भी तुम्हारी सरकारी नौकरी तो है नहीं प्राइवेट ही है। आने जाने में इतना समय लगाओगी फिर भला पढाई कैसे करोगी ?
अमिता को उस समय उनकी बात सही लगी । उसने सोचा चलो एक महिना आराम कर लेती हूँ । पर होता क्या है ? इससे उसकी प्राइवेट नौकरी छूट गई। अमिता की सासूमां उसको दिन भर काम में लगाये रखती । वो अमिता का सीधापन आसानी से भांप चुकी थी थीं। देवरानी तो नित सुबह आराम से देवर के साथ नौकरी पर निकल जाती। पति और ससुर भी माल चले जाते। ननद कालेज चली जाती। अगर घर पर भी रहती तो कोई काम में हाथ नहीं लगाती। घर के सारे कामकाज का भार अमिता पर ही आ गया था। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के चाय, दूध तक सबको पहुँचाने का काम अमिता के सर पर आ गया।
देवरानी भी बात बात पर तानें मारती कहती वो काम करती है पैसा कमाती है। दिन भर तुम्हारी तरह घर में पड़ी- पड़ी आराम नहीं फरमाती । देवरानी की कटु बातें उस पर हुकूमत अमिता के आत्मसम्मान को बहुत ठेस पहुँचाती। उसका अपमान हो रहा होता, उसका स्वाभिमान कुचलता, वो कसमसाई सी रह जाती। इतना सबके बाद भी सास ससुर देवरानी को कभी नही टोकते और न ही कुछ घर के काम के लिए कहते । हर बात पर उसको ही आवाज लगाते ।
अमिता घर की बड़ी बहु हाँ ये बात अलग देवरानी घर में उससे पहले आई, लेकिन इसका मतलब ये तो नहीं की छोटे बड़े का भेद ही भूल जाएं सब। छोटी बहु बड़ी बहु को नीचा दिखाने की कोशिश करे या बेइज्जती करे तो बड़ों का फर्ज तो बनता है उसको समझाने का । लेकिन छोटी बहु की तेजतर्रारी उसके सामने सबकी हिम्मत जवाब दे जाती।
घर के हर काम में हरको अमिता ही याद आती। अनेक बार छुट्टी के दिन उसको पुकारने पर अमिता ने कहा भी वो दूसरे काम में लगी है छोटी बहु को कह दीजिए।
सासूमां तो एक दम बोल पड़ती अरे वो बेचारी हफ्ते के छह दिन काम में लगी रहती एक दिन मिलता थोड़ा आराम करने दो उसे ।
अमिता को बहुत गुस्सा आता।उसको खुद को तो नौकरी करने नहीं दे रहे, घर के काम करवाते जैसे वो कामवाली हो । अब अमिता को सब समझ आने लगा कि उसको केबल घर के काम करने के लिए ही लाया गया है। अमिता को यह रिश्ता, बन्धन सा लगने लगा जो उसको मानसिक तनाव, अवसाद, शारीरिक नुकसान पहुंचा रहा था।
दिन भर काम करते करते अमिता कै विवाह को दो माह कैसे बीत गए उसे पता ही नहीं चला। अनेक बार पति अमित से उसने कहां वो दुबारा नौकरी और अपनी पढ़ाई चालू करना चाहती है। लेकिन अमित हर बार टाल देता । कहता तुमको घर में कमी ही क्या है ? जैसे दो माह व्यतीत हुए और माह भी व्यतीत हो जायेंगे।
अमिता ने सासूमां से कहा तो वो बोली क्या करोगी नौकरी करके घर बार सम्भालों अपना ।
क्यूं परेशान हो रही हो ? कर लेना आराम से।अब मुझे ही देखो कौन नौकरी करती हूँ । आराम से रह रही हूँ घर में मस्त खाती पीती हूँ । तुम भी ऐसे ही रहो ।
अमिता अपनी सासूमां की बात पर कभी भी जवाब तो नहीं देती…. लेकिन मन ही मन बड़बड़ाते हुए कहती -आप सारा दिन हुकुम चलाते हो क्योंकि काम करने के लिए मै मुफ्त की नौकरानी जो हूँ।
अमिता बोली सासूमां घर काम के लिए एक नौकरानी रख लीजिए मुझे भी थोड़ा आराम हो जायेगा मैं भी अपनी पढ़ाई कर लिया करूंगी।
सासूमां के मुंह से आखिर निकल ही गया नौकरानी का काम हमें पसंद नहीं। अरे नौकरानी रखनी होती तो तुझे क्यों लाते घर में? हम तो गरीब घर की लड़की सोच ले आये तुझे घर के काम धाम आराम से देख लेगी यह सोचकर ।
अमिता अब अच्छे से समझ चुकी थी। वो इस बन्धन से बाहर आना चाहती थी। वो जान गई थी ऐसी परिस्थिति उसको जीवन में आगे बढ़ने से रोक रही है उसके लक्ष्यों में बाधा बन रही है। उसने अपनी बड़ी बहन को फोन लगाया और सारी बातें साफ साफ बता दीं । उसने माता पिता को कहना उचित नहीं समझा सोचा, व्यर्थ में घबरा जायेंगे परेशान हो जायेंगे ।
बड़ी बहन ने दूसरे दिन अपने पति के साथ वहां आकर अमिता के ससुराल वालों को समझाने की बहुत कोशिश की, मगर वो कहते देखेंगे बाद में, ऐसा कहकर टाल देते हैं । अमित भी बड़ी बेरूखी से बात करता है। अमिता की बड़ी बहन अमिता को अपने घर आने का आमंत्रण दे जाती है। और कह जाती है अमिता उसके बच्चों के स्कूल में व और भी दूसरी जगह उसकी नौकरी के लिए बात करेगी, वो बिल्कुल चिंता न करे।
अमिता बहन के घर कुछ दिन रहने जा रही है कहते हुए अपने सभी सर्टीफिकेट प्रमाण पत्र साथ ले जाती है।
अमिता ने बहन की मदद से नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी और वो उसमे सफलता भी प्राप्त कर लेती है। एक जगह आवश्यक तुरन्त नियुक्ति जिसमें वो सफल हो जाती है । उसके पास बी एड की डिग्री और शिक्षिका का अनुभव प्रमाण इसलिए नियुक्ति आसानी से मिल जाती है। वो नौकरी ज्वाइन कर लेती है। आज छुट्टी का दिन बहन के साथ ससुराल जाकर अपनी नियुक्ति की सबको सूचना देती है।
सास ससुर व पति गुस्से से कहते हैं जब हमने मना कर दिया था तुमको तब भी तुम हमारे खिलाफ जा रही हो । नौकरी करोगी तो तुम्हारे लिए इस घर में कोई जगह नहीं रहेगी । तुमको हमारा घर छोड़ना पड़ेगा।
अमिता कहती हैं वो खुद भी इस बन्धन से आजाद हो जाना चाहती है । इस रिश्ते को तोड़ देना चाहती है।
माना की अपने घर में काम करना बुरी बात नहीं है लेकिन अगर आप सबका उद्देश्य एक मुझे घर का काम करवाना ही है तो बहु से बेहतर आप कोई काम वाली ही रख लीजिए।
और फिर अपने पति की तरफ देखते हुए कहती हैं जिसको रिश्तों की समझ ही न हो उसके साथ रिश्ता रखना बेवकूफी ही है। जब रिश्ता आत्मसम्मान को ठेस पहुंचाने लगे । आगे बढ़ने में रोकने लगे तो ऐसे बन्धनों को तोड़ देना ही बेहतर है ।
मुझे क्षमा करें…यह सब मेरे लिए बहुत जरूरी था । क्योंकि मैं जानती हूँ जब तक मैं इस घर से नहीं निकलूंगी मैं कुछ नहीं कर सकती। कहां तो मैं डाक्ट्रेट का स्वप्न देख रही थी। महाविद्यालय में प्रोफेसर बनना चाहती थी। और यहां मेरे ससुराल वालों ने मुझे एक नौकरानी बना कर रख दिया। आगे ऐसे ही चलता रहा तो उसका जीवन, उसके स्वप्न एक तरफ धरे के धरे रह जायेंगे।
पति अमित आप मेरी तरफ ध्यान नहीं देते अपना पैसा कमाने में ही लगा रहते हो । उसका रिश्ता एक तरफ का ही रह गया था। वो तो निभाने की कोशिश करतीं और आप सभी घर के लोग मेरी बिल्कुल भी कद्र नहीं करते। मेरा भरोसा और सम्मान धीरे धीरे खत्म होता जा रहा था। उसका आत्मसम्मान शान्ति खत्म होती जा रही थी उसके विकास में बाधा बन रही थी तो ऐसे रिश्ते का क्या महत्व रह जाता है ?
उसने बहुत सोच-समझकर कर ऐसा फैसला लिया है । अपने मन को बहुत समझाया तब जाकर आज बहार कदम बढ़ा रही हूँ । फिर घर से बाहर जाते जाते सबसे कहते हुए बोली- मैं सब छोड़कर जा रही हूँ हमेशा हमेशा के लिए क्योंकि जो आत्मविश्वास को ठेस पहुंचाए विकास में बाधक बनें ऐसे- “कुछ बन्धन तोड़ देना ही अच्छा होता है “!!
लेखिका डॉ बीना कुण्डलिया
(कुछ बन्धन तोड़ देना ही अच्छा होता है)