“तुम्हारे बड़े भाई माधव ने उस धागे की तरह हमेशा तुम्हें थामे रखा,” श्रीधर जी ने आगे कहा। “जब एक्सीडेंट के बाद तुम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, तब उसी धागे ने तुम्हें गिरने नहीं दिया था। आज जब तुम अपने पैरों पर खड़े हो गए हो, तो तुम्हें लग रहा है कि माधव और परिवार तुम्हारे लिए एक बोझ बन गए हैं। तुम अलग होकर आज़ाद होना चाहते हो। लेकिन याद रखना बेटा, परिवार से कटकर इंसान का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। उस टूटी हुई पतंग की तरह, दुनिया की ठोकरें इंसान को कहीं का नहीं छोड़तीं। तुम्हारी तरक्की, तुम्हारी खुशियां, सब कुछ इस परिवार की एकता में ही सुरक्षित है।”
रमन ने अपने बैग की चेन बंद करते हुए एक गहरी सांस ली और मुड़कर अपने माता-पिता की ओर देखा। कमरे में एक अजीब सी खामोशी और भारीपन था। माँ, कौशल्या देवी, के गालों पर आँसुओं की लकीरें सूख चुकी थीं, लेकिन उनकी आँखों की नमी अभी भी उनकी पीड़ा बयां कर रही थी। पिताजी, श्रीधर जी, अपनी कुर्सी पर खामोश बैठे खिड़की के बाहर शून्य में घूर रहे थे।
“माँ, बाबूजी… आप लोग मेरी बात समझने की कोशिश क्यों नहीं करते?” रमन ने अपनी आवाज को थोड़ा नरम करते हुए कहा। “सोनिया और भाभी की सोच बिल्कुल नहीं मिलती। रोज-रोज की खटपट से तो अच्छा है कि हम अलग हो जाएं। मैंने शहर के दूसरे किनारे पर एक फ्लैट फाइनल कर लिया है। आज बिल्डर को टोकन मनी देनी है। मैं और सोनिया वहां शांति से रहेंगे। आप दोनों भी जब चाहें हमारे पास आकर रह सकते हैं।”
कौशल्या देवी से अब और चुप नहीं रहा गया। उनका दर्द शब्दों के रूप में फूट पड़ा, “रमन, क्या बकवास कर रहा है तू? परिवार में चार बर्तन होते हैं तो खटकते ही हैं। इसका मतलब यह तो नहीं कि घर को ही बीच से तोड़ दिया जाए! सोनिया को क्या परेशानी है बड़ी बहू से? रसोई के काम को लेकर या घर के खर्चों को लेकर? बेटा, तू आज जो इतनी बड़ी-बड़ी बातें कर रहा है, क्या तू अपने बड़े भाई माधव और अपनी भाभी का वो कर्ज भूल गया जो उन्होंने हम सब पर, और खासकर तुझ पर किया है?”
रमन ने नजरें चुरा लीं। वह जानता था कि माँ किस बात का जिक्र करने वाली हैं।
“याद कर वो दिन,” कौशल्या देवी का गला रुंध गया था, “जब तीन साल पहले तेरा वो भयानक एक्सीडेंट हुआ था। तू छः महीने तक बिस्तर से उठ नहीं सकता था। तेरी नौकरी चली गई थी। तेरे इलाज में लाखों का खर्च था। तब किसने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया था? माधव ने अपने व्यापार की सारी जमा-पूंजी तेरे ऑपरेशनों में लगा दी थी। उसने एक बार भी नहीं सोचा कि उसके अपने बच्चों का भविष्य क्या होगा। और तेरी भाभी… उसने अपनी रातों की नींद हराम करके एक माँ की तरह तेरी सेवा की थी। तेरा मल-मूत्र तक उठाया था उस बेचारी ने। क्या कभी उनके माथे पर एक भी शिकन आई थी?”
श्रीधर जी ने अब अपनी चुप्पी तोड़ी, “तेरे भाई ने कभी तुझसे एक पाई नहीं मांगी, रमन। उसने यही कहा कि ‘मेरा भाई मेरे लिए दुनिया की हर दौलत से बढ़कर है, जान है तो सब कुछ है।’ आज बाजार में मंदी के कारण माधव का काम थोड़ा धीमा क्या पड़ गया, सोनिया को लगने लगा कि वे लोग तेरी कमाई पर पल रहे हैं? और तू अपनी पत्नी की इन बातों में आकर उस भाई को छोड़ने जा रहा है जिसने तुझे नया जीवन दिया?”
“बाबूजी, मैं भैया का अहसान नहीं भूला हूँ,” रमन झल्लाते हुए बोला, “लेकिन आज की हकीकत अलग है। सोनिया को अपनी स्पेस चाहिए। हम रोज-रोज के तानों और घुटन में नहीं जी सकते। मैं अलग होने का फैसला कर चुका हूँ और यह पत्थर की लकीर है। चलिए, आपको मेरे साथ बिल्डर के ऑफिस चलना है, मुझे पेपर्स पर आपके दस्तखत चाहिए क्योंकि जमीन आपके नाम पर थी और उसे गिरवी रखकर ही मैं यह लोन ले रहा हूँ।”
श्रीधर जी ने एक गहरी ठंडी आह भरी। उन्होंने समझ लिया था कि इस समय रमन की आँखों पर पत्नी के मोह और एक नई आज़ादी का पर्दा पड़ा हुआ है। वह बिना कुछ कहे अपनी छड़ी उठाते हुए खड़े हो गए और रमन के साथ घर से बाहर निकल गए। कार में दोनों के बीच एक असहज सी खामोशी छाई हुई थी। रमन का ध्यान ड्राइविंग पर था, लेकिन उसका मन बहुत अशांत था।
बिल्डर का ऑफिस शहर के बाहरी इलाके में था। रास्ते में एक बड़ा सा खुला मैदान पड़ता था जहाँ आज रविवार होने के कारण बहुत से बच्चे खेल रहे थे और आसमान में रंग-बिरंगी पतंगें उड़ रही थीं। अचानक कार का टायर पंक्चर हो गया। रमन ने गाड़ी किनारे लगाई और झुंझलाते हुए बाहर निकला। “हद है, आज ही यह सब होना था!” वह बड़बड़ाते हुए डिक्की से जैक और स्पेयर टायर निकालने लगा।
श्रीधर जी भी कार से बाहर आ गए और पास ही एक पेड़ की छाँव में खड़े होकर मैदान में पतंग उड़ाते बच्चों को देखने लगे।
तभी एक लाल रंग की खूबसूरत पतंग बहुत ऊंचाई पर उड़ती हुई उनके करीब से गुजरी। वह हवा से बातें कर रही थी। उसे उड़ाने वाला बच्चा बहुत खुश था और अपनी चरखी को कसकर पकड़े हुए था। पतंग हवा के थपेड़ों को सहते हुए, डोर के सहारे और ऊपर जा रही थी।
“रमन, जरा इधर आना,” श्रीधर जी ने शांत स्वर में अपने बेटे को पुकारा।
रमन अपने हाथ पोंछते हुए पिता के पास आया। “क्या हुआ बाबूजी? बस पांच मिनट, मैं टायर बदल लूंगा।”
“टायर तो बदल जाएगा बेटा, जरा उस पतंग को देख,” श्रीधर जी ने आसमान की ओर इशारा किया। “कितनी ऊँची उड़ रही है ना? इसे देखकर लगता है जैसे यह पूरी तरह आज़ाद है।”
रमन ने अनमने ढंग से ऊपर देखा, “हाँ बाबूजी, बहुत अच्छी पतंग है। पर हमें देर हो रही है।”
तभी अचानक एक दूसरी पतंग ने आकर उस लाल पतंग का पेंच काटा और ‘कट्ट!’ की आवाज के साथ लाल पतंग की डोर टूट गई। धागे से कटते ही पतंग कुछ पल के लिए हवा में लहराई, मानो उसे अचानक पूरी आज़ादी मिल गई हो। लेकिन अगले ही पल, उसका संतुलन बिगड़ गया। हवा जो अब तक उसे ऊँचा उठा रही थी, वही हवा अब उसे धक्के मारने लगी। बिना डोर की वह लाल पतंग हिचकोले खाती हुई, गोते लगाती हुई तेजी से नीचे की ओर गिरने लगी। और अंततः, वह सड़क के किनारे एक गंदे कीचड़ भरे नाले में जा गिरी, जहाँ आते-जाते लोगों के पैरों से वह कुचली जाने लगी।
रमन यह सब चुपचाप देख रहा था।
श्रीधर जी ने रमन के कंधे पर हाथ रखा और बेहद भावुक आवाज में बोले, “देख लिया रमन? जब तक यह पतंग धागे से बंधी थी, वह आसमान की ऊंचाइयों को छू रही थी। धागा उसे हवा में गिरने से बचा रहा था, उसे दिशा दे रहा था। उस पतंग को शायद लगता होगा कि धागा उसे बांध कर रख रहा है, उसकी आज़ादी छीन रहा है। लेकिन जैसे ही धागा टूटा, उसका क्या हश्र हुआ?”
रमन की आँखें अब उस कीचड़ में सनी पतंग पर टिक गई थीं।
“बेटा, परिवार भी इस धागे की तरह ही होता है,” श्रीधर जी की आवाज में एक पिता का पूरा अनुभव और दर्द छलक रहा था। “जब हम परिवार से जुड़े होते हैं, तो हमें लगता है कि हम पर बंदिशें हैं, हमें हमारी मर्जी से जीने नहीं दिया जा रहा। हमें लगता है कि अगर हम इन रिश्तों से आज़ाद हो जाएं, तो हम अपनी दुनिया में और तरक्की करेंगे। लेकिन असलियत यह है कि परिवार का वह धागा हमें बांधता नहीं है, बल्कि वह दुनिया की तेज हवाओं और मुसीबतों के थपेड़ों से हमें बचाता है। वह हमें हौसला देता है उड़ने का।”
रमन के गले में एक भारी सा गोला अटक गया था।
“तुम्हारे बड़े भाई माधव ने उस धागे की तरह हमेशा तुम्हें थामे रखा,” श्रीधर जी ने आगे कहा। “जब एक्सीडेंट के बाद तुम जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, तब उसी धागे ने तुम्हें गिरने नहीं दिया था। आज जब तुम अपने पैरों पर खड़े हो गए हो, तो तुम्हें लग रहा है कि माधव और परिवार तुम्हारे लिए एक बोझ बन गए हैं। तुम अलग होकर आज़ाद होना चाहते हो। लेकिन याद रखना बेटा, परिवार से कटकर इंसान का कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। उस टूटी हुई पतंग की तरह, दुनिया की ठोकरें इंसान को कहीं का नहीं छोड़तीं। तुम्हारी तरक्की, तुम्हारी खुशियां, सब कुछ इस परिवार की एकता में ही सुरक्षित है।”
रमन की आँखों के सामने पिछले तीन सालों का पूरा मंजर किसी फिल्म की तरह घूमने लगा। उसे याद आया कि कैसे प्लास्टर से बंधे होने पर वह रात-रात भर दर्द से कराहता था और माधव भैया बिना सोए उसके पैर सहलाते रहते थे। उसे याद आया कि कैसे भाभी ने कभी उसके जूठे बर्तन उठाने में संकोच नहीं किया। और आज, एक छोटी सी कहासुनी और पत्नी की जिद के आगे वह उन देवताओं जैसे भाई-भाभी को हमेशा के लिए छोड़ने जा रहा था।
रमन के हाथ से जैक छूट कर नीचे गिर गया। उसकी आँखों से आँसू छलक पड़े। वह टूटकर अपने पिता के गले लग गया और फूट-फूट कर रोने लगा।
“मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी,” रमन सिसकते हुए बोला। “मैं अंधा हो गया था। मैं अपने ही गुरूर और स्वार्थ में उस परिवार को तोड़ने जा रहा था जिसने मुझे अपने खून-पसीने से सींचा है। सोनिया को भी मैं समझाऊंगा। अगर वह नहीं समझेगी, तो भी मैं अपने भाई-भाभी और आप लोगों को छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगा। मुझे आज़ाद नहीं होना बाबूजी, मुझे अपने परिवार की डोर से ही बंधकर रहना है।”
श्रीधर जी ने मुस्कुराते हुए अपने बेटे का माथा चूम लिया। उनकी आँखों में अब संतोष के आँसू थे। उन्हें ख़ुशी थी कि उनके बेटे ने टूटने से पहले ही परिवार की असली कीमत को पहचान लिया था।
रमन ने कार का टायर बदला, लेकिन इस बार कार का रुख बिल्डर के ऑफिस की तरफ नहीं, बल्कि वापस अपने घर की तरफ था, जहाँ उसका परिवार, उसका असली आसमान, उसका इंतजार कर रहा था।
क्या आपके आस-पास भी कोई ऐसा परिवार है जो छोटी-छोटी बातों पर बिखर गया हो? रिश्तों की अहमियत को समझना आज के समय में बहुत जरूरी है। अपने विचार कमेंट्स में जरूर बताएं।
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#रिश्तों की डोर: पतंग और आसमान