*रिश्तों की कीमत* – तोषिका

लड़की तो बहुत सुंदर और सुशील है, हमें हमारे बेटे ऋषि के लिए सीमा पसंद है। मुस्कुराते हुए ऋषि की मां सुलेखा ने बोला।

ऋषि और सीमा की शादी हो गई थी। पर ज्यादा बड़े घर से ना होने के चलते वो दहेज के लिए इतने गहने और सोना चांदी ये सब नहीं लाई थी। जिसके चलते सुलेखा ने शुरू में कुछ नहीं बोला लेकिन उसने बाद में ताने मारना शुरू कर दिया था।

एक दिन सुबह ऋषि बाहर जा रहा था, और साथ में सीमा भी जा रही थी कि पीछे से सुलेखा बोली “कहा जा रही है? अब घर के सारे काम भी मैं करूँ? वैसे ही अगर अपने मायके से कुछ ले आती तो खाना बनाने में भी आसानी होती।

” सीमा ने चुप चाप ऋषि को कहा कि वो अकेला चला जाए और सुलेखा को बोला “मैं अभी खाना बना देती हू माँ, आपको क्या खाना है बता दीजिए”।

ऐसे घर में रोज़ चलता था और सीमा को भी इसकी आदत हो गई थी क्योंकि उसको कही ना कही लगता था कि ये सब उसकी गलती है।

शादी को ६ महीने होने चले और अपनी मां सुलेखा का ये बर्ताव देख कर वो दिन भर दिन अचंभित हो रहा था।

एक दिन सीमा सीढ़ियों से गिर गई, जिसके चलते उसके पैर और सिर पर गंभीर चोट आई और उसको हॉस्पिटल में भर्ती करा। जब तक उसकी तबियत ठीक नहीं होती तब तक उसको डॉक्टर ने वही रहने को कहा।

सीमा ने घर जाने की ज़िद्द की लेकिन ऋषि ने बोला “नहीं सीमा जब तक तुम ठीक नहीं हो जाती, तुम यही रहोगी और घर का और बाकी काम मैं देख लूंगा। तुम बस अपना ध्यान रखो।” सीमा बोल ही रही थी कि ऋषि ने बोला “कुछ नहीं होगा, मैं हु तुम्हारे साथ।”

तभी ऋषि घर आया और उसने सारी बात सुलेखा को बताई, लेकिन उसने तब ऋषि को कुछ नहीं बोला बस उसको “ठीक है, बेटा कह कर चली गई।”

अगले ही दिन ऋषि सुबह सुबह उठा अपने लिए और अपनी मां के लिए खाना बनाया और सीमा का ध्यान रखने हॉस्पिटल चला गया।

कुछ दिन तो ऐसे ही चलता रहा फिर एक दिन ऋषि ने सुलेखा को अपनी बहन यानि की ऋषि की मासी से बात करते सुना और सुलेखा उसको बोल रही थी कि “तू जानती नहीं है, ये सब उस सीमा के आराम करने के बहाने है। कोई गहरी चोट नहीं लगी है उसको, उसको तो बस मेरे बेटे से सारे काम करवाने है और खुद कुछ नहीं करना। एक तो वो अपने मायके से कुछ लाई नहीं और दूसरा काम ना करने के बहाने ढूंढती रहती है।

उधर से तभी ऋषि अंदर घुसा और ऋषि को देखते ही उसकी मां ने बात पलटते हुए कहा, ठीक है मैं फोन रखती हू।

सुलेखा, ऋषि से कुछ बोले उससे पहले ऋषि बोला “मां, मुझे आपसे कुछ बात करनी है।”

सुलेखा बोली “हां, बेटा बोल क्या बात करनी है? सब ठीक है ना?”

ऋषि बोला “मां, मेरी और सीमा की शादी को ६ महीने हो गए है और जब आपने सीमा को मेरे लिए पसंद किया था, आपने बोला था कि कितनी सुंदर और सुशील है। तो फिर आप उसको दहेज के लिए क्यों बोलती रहती है?”

सुलेखा को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या बोले तो उसने बोला “बेटा मैं कोई दहेज नहीं मांग रही, मैं तो बस इतना कह रही हू कि वो अपने मायके से कुछ लाई नहीं और हर बहु अपने मायके से कुछ ना कुछ लाती ही है।”

ऋषि बोला मां “रिश्तों में क्या सामान आ रहा है क्या नहीं, इससे थोड़ी हमें हमारे *रिश्तों की कीमत* पता चलती है, बल्कि वो तो हमें भरोसे में, इज़्ज़त में और तारीफ करने में ही उस दिल के रिश्ते की कीमत बढ़ जाती है।”

सुलेखा बोली “अब तू ये कह रहा है कि मैं उसकी इज्जत नहीं करती?”

ऋषि बोला “मां मैं बस इतना कह रहा हू कि इस रिश्ते को सोना चांदी की कीमत से ज्यादा दिल को देखो, सीमा तो घर आना चाहती थी क्योंकि वो आपके ऊपर ऐसे सारा घर का काम नहीं डालना चाहती थी। वो तो मैने उसको मना करा क्योंकि उसकी हालत नाजुक है। उसको आपसे बस एक प्यार चाहिए और इज्जत चाहिए, और मैं तो कहता हू कि हर एक बहु उस इज्जत की हकदार है जो अपना घर छोड़ कर, एक नए घर को बढ़ाने और सवारने आती है।”

सुलेखा पर ऋषि की बातों का काफी गहरा असर हुआ और कुछ दिन सोच विचार करने के बाद वो खुद हॉस्पिटल आई और अपनी बहु का बिल्कुल एक बेटी की तरह ध्यान रखा और ऋषि को भी कहा कि वो दफ्तर का काम देखे, वो यहाँ सीमा को देख लेगी और घर भी संभाल लेगी।

कुछ हफ्तों में सीमा भी ठीक हो गई थी और अब वो हॉस्पिटल से घर भी आ गई थी।

सुलेखा ने फिर सीमा को बोला “बेटा, मुझे माफ करदो। मुझे तुम्हे वो इज़्ज़त, प्यार और भरोसा देना चाहिए था जिसकी तुम पूरी हकदार हो।”

सीमा ने कहा “नहीं मां, आप मेरे लिए पहले भी मेरी मां थी, अब भी है और आगे भी रहेंगी”।

दोनों ने एक दूसरे को गले लगा लिया और अब दोनों ऐसे रहते थे जैसे कोई मां और बेटी रह रहे हो।

लेखिका

तोषिका

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