जीवन-मंत्र

“हमेशा खुश रहना बिटिया, और इन चूड़ियों की तरह हमेशा खनकती रहना,” उसने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था।

लेकिन मेरी किस्मत की चूड़ियां शायद बहुत कच्चे कांच की बनी थीं। मेरी शादी का सपना एक महीने के भीतर ही चकनाचूर हो गया। मेरा पति, राघव, जिसके साथ मैंने एक नई दुनिया बसाने का ख्वाब देखा था, असल में एक शराबी और हिंसक इंसान निकला। शादी के कुछ ही दिनों बाद मुझे पता चला कि उसका किसी और के साथ संबंध है और उसने यह शादी सिर्फ अपने परिवार के दबाव और दहेज के लालच में की थी।

कलाई में लाल रंग की कांच की चूड़ी पहनते हुए मेरे हाथ अचानक ठिठक गए। कांच की वह खनक, जो अक्सर त्योहारों और खुशियों का पैगाम लाती है, आज मुझे दशकों पीछे उस पुराने आंगन में ले गई, जहां बचपन की किलकारियां और मोहल्ले की औरतों की कानाफूसियां एक साथ गूंजा करती थीं। शीशे में अपना अक्स देखते हुए मुझे अपने चेहरे के पीछे एक और चेहरा मुस्कुराता हुआ नज़र आया—कस्तूरी का चेहरा। बचपन की अनगिनत यादों और चेहरों की भीड़ में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो समय की धुंध में भी अपनी चमक नहीं खोते। कस्तूरी मेरे लिए वही नाम थी।

कस्तूरी हमारे मोहल्ले में चूड़ियां बेचने आती थी। एक बड़ी सी टोकरी, जिसे वह अपने सिर पर एक कपड़े की गोल गद्दी बनाकर रखती, और उस टोकरी में दुनिया भर के रंग सिमटे होते थे। दोपहर ढलते ही जब मोहल्ले की औरतें घर के कामों से फुरसत पाकर हमारे आंगन में जमा होतीं, तब कस्तूरी की खनकती आवाज़ सुनाई देती—”चूड़ी ले लो… हरी, लाल, नीली, सुहाग वाली चूड़ी…”। उन दिनों न तो आज की तरह मोबाइल फोन थे और न ही मनोरंजन के इतने साधन। औरतों की चौपाल ही उनका एकमात्र सोशल मीडिया हुआ करती थी। कस्तूरी उस चौपाल की जान थी। वह सिर्फ चूड़ियां नहीं पहनाती थी, बल्कि बातों का ऐसा जादू बुनती थी कि मोहल्ले की औरतें और हम बच्चे उसे घेर कर बैठ जाते। वह इतनी रंगीन और दिलचस्प बातें करती कि हम बच्चों को तो लगता जैसे वह किसी जादुई दुनिया से आई हो।

मुझे उसका सांवला लेकिन बेहद तीखे नैन-नक्श वाला चेहरा बहुत पसंद था। उसके चेहरे पर हमेशा एक खिली हुई मुस्कान रहती। माथे पर एक बड़ी सी चमकीली टिकुली, कानों में चांदी की झुमकियां, गले में काले मोतियों की माला और दोनों हाथों में कुहनी तक भरी हुई रंग-बिरंगी कांच की चूड़ियां। जब वह बात करती या चूड़ियां पहनाने के लिए हाथ आगे बढ़ाती, तो उसकी चूड़ियों की छन-छन से पूरा आंगन गूंज उठता। उसे देखकर लगता ही नहीं था कि वह तपती धूप में गलियों की खाक छानती है। उसके श्रृंगार में, उसके सजने-संवरने में कभी कोई कमी नहीं होती थी।

लेकिन मोहल्ले की औरतों के लिए कस्तूरी सिर्फ एक चूड़ी वाली नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता ‘गपशप का विषय’ थी। जब कस्तूरी चूड़ियां पहनाकर और अपने हिस्से की चाय पीकर चली जाती, तो औरतों की असली पंचायत शुरू होती।

“देख रही हो इसके नखरे? आदमी ने धक्के मारकर घर से निकाल दिया है, और इसके ठाठ देखो जैसे कोई महारानी हो,” एक ताई मुंह बनाते हुए कहतीं।

“वही तो! किस बात का इतना श्रृंगार करती है? जब पति ही साथ नहीं, तो यह चूड़ियां और टिकुली किसके लिए?” दूसरी आंटी आग में घी डालतीं।

“जरूर इसी के चलन में खोट होगा। आदमी बेचारा सीधा-सादा था, तभी तो दूसरी औरत ले आया और इसे निकाल दिया। अब देखो, कैसे सजी-धजी घूमती है। शर्म-हया तो जैसे बेच खाई है,” मेरी मां, सुमित्रा भी उन बातों में हामी भरतीं।

हम बच्चे उस वक्त बहुत छोटे थे। औरतों की इन बातों का पूरा मतलब तो समझ नहीं आता था, लेकिन इतना समझ में आने लगा था कि कस्तूरी का पति उसके साथ नहीं रहता, उसने कस्तूरी को किसी और औरत के लिए छोड़ दिया है। फिर भी, कस्तूरी का वह हंसता-खिलखिलाता चेहरा और उसकी चूड़ियों की खनक मुझे हमेशा अपनी ओर खींचती थी।

वक्त गुजरता गया। मैं बड़ी होने लगी। हम बच्चों का बचपन पीछे छूटने लगा और साथ ही कस्तूरी के प्रति मोहल्ले की औरतों का नज़रिया मेरे भीतर भी एक अजीब सी उलझन पैदा करने लगा। जब मैं किशोरावस्था में पहुंची, तो वही कस्तूरी, जिसकी बातों पर मैं कभी तालियां बजाया करती थी, मुझे थोड़ी अजीब लगने लगी। समाज की बातें, मां की सीख और आस-पास के माहौल ने मेरी सोच को भी उसी सांचे में ढालना शुरू कर दिया था। “अगर कोई औरत पति द्वारा छोड़ दी गई है, तो उसे सती-सावित्री की तरह सादे कपड़ों में, बिना श्रृंगार के रहना चाहिए। यह इतना सजना-संवरना क्यों?” यह सवाल अब मेरे मन में भी उठने लगा था।

मेरी मां, सुमित्रा, जो अब मेरे भविष्य और समाज की नज़रों को लेकर ज्यादा सतर्क हो गई थीं, अक्सर मुझे कस्तूरी से दूर रहने की हिदायत देतीं।

“मीरा, अब तुम बड़ी हो गई हो। उस चूड़ी वाली के पास जाकर ज्यादा दांत मत निकाला करो। तुम्हारा पढ़ाई-लिखाई का समय है,” मां अक्सर टोकतीं। अगर कस्तूरी आंगन में होती, तो मां किसी न किसी बहाने मुझे अंदर कमरे में भेज देतीं। बाकी घरों की औरतें भी अपनी जवान होती बेटियों के साथ ऐसा ही सुलूक करने लगी थीं।

लेकिन कस्तूरी इन सब बातों से बेखबर, या शायद सब कुछ जानकर भी अनजान बनी रहती। उसकी चूड़ियों की खनक में कभी कोई उदासी नहीं आई। मोहल्ले की औरतों के ताने, उनके चुभते हुए सवाल और उनकी तिरछी नज़रें कस्तूरी के आत्मविश्वास को कभी डिगा नहीं पाईं। हमारी मांएं सफेद होते बालों को रंगने और उम्र को छिपाने की जद्दोजहद में लगी रहतीं, लेकिन कस्तूरी मानो समय के हर वार को अपनी मुस्कान की ढाल से रोक लेती थी।

फिर वह दिन भी आया जब मेरे घर में मेरी शादी की शहनाइयां गूंजने लगीं। घर मेहमानों से भरा था। मां को हजारों काम थे। ऐसे वक्त में कस्तूरी ने घर के कितने ही कामों में मां का हाथ बंटा लिया, इसका कोई हिसाब नहीं था। वह सिर्फ चूड़ियां पहनाने नहीं आई थी, बल्कि मेरी शादी में जैसे मेरे मायके की एक अहम सदस्य बन गई थी। मेरे विदाई के दिन कस्तूरी ने मुझे अपने पास से लाल रंग की बेहद खूबसूरत चूड़ियों का एक सेट पहनाया था। उस दिन उसकी आंखों में मैंने पहली बार नमी देखी थी।

“हमेशा खुश रहना बिटिया, और इन चूड़ियों की तरह हमेशा खनकती रहना,” उसने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए कहा था।

लेकिन मेरी किस्मत की चूड़ियां शायद बहुत कच्चे कांच की बनी थीं। मेरी शादी का सपना एक महीने के भीतर ही चकनाचूर हो गया। मेरा पति, राघव, जिसके साथ मैंने एक नई दुनिया बसाने का ख्वाब देखा था, असल में एक शराबी और हिंसक इंसान निकला। शादी के कुछ ही दिनों बाद मुझे पता चला कि उसका किसी और के साथ संबंध है और उसने यह शादी सिर्फ अपने परिवार के दबाव और दहेज के लालच में की थी। जब मैंने इस बात का विरोध किया, तो मुझे शारीरिक और मानसिक यातनाएं दी गईं। एक महीने बाद, जब मेरी बर्दाश्त की सारी हदें पार हो गईं, तो मैं अपना बचा-खुचा सामान लेकर, टूटी हुई चूड़ियों और एक टूटे हुए दिल के साथ वापस अपने मायके लौट आई।

मेरे वापस लौटने पर घर में मातम सा छा गया। जो रिश्तेदार कल तक मेरी शादी में मिठाइयां खा रहे थे, आज वे मुझे एक बोझ और कलंक की तरह देखने लगे। मां की आंखों से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। लेकिन उन आंसुओं में मेरे दर्द से ज्यादा ‘लोग क्या कहेंगे’ का डर छिपा था।

“तूने थोड़ी सी समझदारी दिखाई होती मीरा, तो बात इतनी नहीं बिगड़ती। आदमी लोग तो ऐसे ही होते हैं, थोड़ा गुस्सा कर लिया तो क्या? औरत को ही घर बसाने के लिए झुकना पड़ता है,” मां ने एक दिन रोते हुए मुझसे कहा।

“मां, वह मुझे मारता है, उसका किसी और से चक्कर है। मैं वहां घुट-घुट कर मर जाऊंगी,” मैं फफक कर रो पड़ी।

“फिर भी बेटी… समाज में बिना पति के औरत की क्या इज्जत होती है? तुझे वापस जाना ही होगा। हम जाकर राघव के पैरों में गिर जाएंगे, माफी मांग लेंगे। पर तेरा घर नहीं टूटना चाहिए,” मां का वह फैसला मेरे लिए किसी फांसी की सजा से कम नहीं था।

उसी वक्त आंगन में चूड़ियों की खनक सुनाई दी। कस्तूरी किसी काम से मां से मिलने आई थी और उसने सारी बातें सुन ली थीं। वह कस्तूरी, जिसे मैंने हमेशा मुस्कुराते और अपनी धुन में मगन देखा था, आज एक चंडी का रूप ले चुकी थी।

“क्या अपनी पढ़ी-लिखी बच्ची को उस नरक में फिर से झोंक दोगी सुमित्रा बहन?” कस्तूरी की आवाज़ में एक ऐसी कड़क थी जो मैंने पहले कभी नहीं सुनी थी।

मां ने चौंक कर आंसू पोंछे और गुस्से से बोलीं, “तुम बीच में मत बोलो कस्तूरी। यह हमारे घर का मामला है। तुम क्या जानो घर बसाना क्या होता है? तुम्हारा तो खुद का घर…”

“हां! मेरा खुद का घर टूट गया। मेरे आदमी ने मुझे निकाल दिया,” कस्तूरी ने मां की बात बीच में काटते हुए एक-एक शब्द चबाते हुए कहा, “और इसीलिए मैं जानती हूं कि एक औरत की जिंदगी सिर्फ एक निकम्मे, धोखेबाज आदमी की मोहताज नहीं होती। मैंने खुद कमाकर खाया है, अपनी इज्जत से जी रही हूं। मैंने अपनी चूड़ियों को अपनी बेड़ियों में नहीं बदलने दिया। आपकी बेटी तो पढ़ी-लिखी है! क्या उसके लिए आप यही सोचती हैं कि वह रोज़ मार खाए, घुट-घुट कर जिए, बस इसलिए ताकि समाज आपको ताने न मारे? क्या बेटी की लाश पर अपनी समाज की इज्जत की इमारत खड़ी करोगी मालकिन?”

कस्तूरी के उन शब्दों ने आंगन में एक अजीब सा सन्नाटा खींच दिया। मां अवाक रह गईं। कस्तूरी की आंखें अंगारे की तरह दहक रही थीं। उस दिन मुझे समझ में आया कि कस्तूरी का वह श्रृंगार, उसकी वह हंसी, उसका वह सजना-संवरना समाज के मुंह पर एक तमाचा था। वह यह चीख-चीख कर बता रही थी कि उसका वजूद किसी आदमी के छोड़ने से खत्म नहीं हो जाता।

उस दिन कस्तूरी के उन चंद वाक्यों ने मेरी मां के अंदर के खोखले डर को तार-तार कर दिया और मुझे एक ऐसी हिम्मत दी, जो मुझे मेरे अपने परिवार से नहीं मिल पा रही थी। मैंने वापस उस नरक में जाने से साफ इंकार कर दिया। मेरे इस फैसले ने शुरू में बहुत तूफान खड़े किए, लेकिन कस्तूरी की वो बातें मेरे लिए एक जीवन-मंत्र बन गई थीं।

आज जब मैं एक सरकारी स्कूल में प्रिंसिपल के पद पर बैठी हूं, आत्मनिर्भर हूं, और अपनी शर्तों पर जिंदगी जी रही हूं, तो कस्तूरी का वह चेहरा मुझे अक्सर याद आता है। कलाई में खनकती यह लाल चूड़ी आज मेरे लिए किसी बेमेल रिश्ते की बेड़ी नहीं, बल्कि मेरे अपने आत्मसम्मान और कस्तूरी के उस हौसले की निशानी है।

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लेखिका : नीलू थापर

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