*अस्ति कुटीर * – अनु माथुर

लखनऊ के कश्मीरी मोहल्ले की वो गली जानी जाती थी अपने आमने-सामने वाले दो मकानों से।  

एक था “शांति कुटीर” – प्रोफेसर हरीश वर्मा का तीन मंज़िला, संगमरमर-वाला, बेल्जियम काँच की खिड़कियों वाला मकान। पर अंदर? सन्नाटा ऐसा कि घड़ी की टिक-टिक भी पहाड़ लगती।

72 साल के वर्मा जी। बीवी को गुज़रे 10 साल। बेटा बॉस्टन में, बेटी बैंगलोर में। नौकर रामू, बावर्ची महाराज, ड्राइवर कल्लू – सब थे। पर शाम की चाय का कप खुद उठाकर पीना पड़ता। पूछने वाला कोई नहीं – “बाबूजी, दवा ले ली?”  

ठीक सामने था अम्मा का आशियाना – एक कमरे का टीन-टप्पर। बरसात में छत टपकती, जाड़े में दीवार से सीलन आती। रज़िया बेगम, 68 साल। शौहर को अल्लाह के पास गए 15 बरस हो गए।

दो बेटे – करीम रिक्शा चलाता, सलीम दर्जी की दुकान पर काज-बटन टाँकता। कमाई इतनी कि रोटी-दाल चल जाए। पर अम्मा की आँखें दरवाज़े पर टिकी रहतीं – काश कोई आकर दो पल बैठ जाए, पूछ ले – “अम्मा, घुटने का दर्द कैसा है आज?”  

ईंटों का फ़र्क आसमान-ज़मीन का था। पर दिल का हाल? कार्बन कॉपी।  

15 जुलाई की रात। सावन का महीना। बादल ऐसे बरसे कि गोमती उफन आई।  

रात के 2 बजे “धड़ाम” की आवाज़ से वर्मा जी की नींद टूटी। बालकनी से झाँका तो कलेजा मुँह को आ गया।  

अम्मा का टीन वाला कमरा बैठ गया था। आधी दीवार ढह गई थी। अम्मा, करीम, सलीम – तीनों भीगते हुए मलबे के पास खड़े थे। सलीम अपनी सिलाई मशीन बचाने की कोशिश में आधा भीग चुका था। करीम का रिक्शा पानी में कमर तक डूबा था।  

वर्मा जी ने काँपती आवाज़ में रामू को हाँक लगाई – “अरे रामू! गेट खोल! जल्दी!”  

रामू दौड़ा आया, पर ठिठका – “मालिक… वो लोग… मुसलमान हैं। अंदर…?”  

वर्मा जी ने उसे ऐसी नज़र से देखा कि रामू की ज़ुबान तालू से जा चिपकी। “बारिश ने मज़हब पूछकर घर गिराया था क्या? कम्बल निकाल और उनको बैठक में बिठा। अभी!”  

उस रात पहली बार “शांति कुटीर” में ज़िंदगी बोली।  

अम्मा दालान के कोने में घूँघट काढ़े सिमटी बैठी थीं। साड़ी का पल्लू निचोड़ रही थीं। सलीम को ज़ुकाम हो गया था, छींक पर छींक। करीम फर्श से पानी उलीच रहा था।  

वर्मा जी खुद ट्रे में अदरक वाली चाय और बिस्कुट लेकर आए।  

“अम्मा, लीजिए। ठंड लग जाएगी।”  

अम्मा सकुचाईं – “ना बाबूजी, हम यहाँ… आप तकलीफ़ मत करिए।”  

“तकलीफ़?” वर्मा जी बैठक के सोफ़े पर उनके पास बैठ गए। “72 साल की उम्र में पहली बार लग रहा है कि ये घर जैसा लग रहा है। आप तकलीफ़ नहीं, रहमत हो मेरे लिए।”  

अम्मा ने घूँघट की ओट से पहली बार वर्मा जी को देखा। आँखें वही थीं – बेटे को देखने वाली। और वर्मा जी? उन्हें 10 साल बाद ‘माँ’ कहने का मन हुआ।  

चाय की उस पहली घूँट ने दो घरों की बुनियाद हिला दी थी।  

सुबह हुई। बारिश थमी। पर अम्मा का कमरा अब रहने लायक नहीं था।  

नाश्ते की मेज़ पर वर्मा जी ने ऐलान कर दिया – “जब तक नया कमरा नहीं बनता, अम्मा आप लोग यहीं रहेंगे। ऊपर का कमरा खाली है। रामू आज ही साफ कर देगा।”  

“नहीं बाबूजी, मोहल्ले वाले क्या कहेंगे? एक हिंदू के घर में…”  

वर्मा जी ने अख़बार साइड में रखा – “मोहल्ले वाले? अम्मा, मोहल्ले वाले तब बोलते हैं जब आप खुश हो। जब छत गिरती है ना, तब सबके किवाड़ बंद हो जाते हैं। आप बेफिक्र रहिए।”  

और फिर जो हुआ, उसने “शांति कुटीर” का मतलब बदल दिया।  

सुबह अम्मा फज्र की नमाज़ पढ़तीं, वर्मा जी बालकनी में गीता के श्लोक दुहराते। नाश्ते में अम्मा की शीरमाल और वर्मा जी की साउथ इंडियन फिल्टर कॉफी एक ही मेज़ पर होती।  

सलीम ने ज़िद करके वर्मा जी का नाप लिया – “बाबूजी, ये कुर्ता तो टेंट है। लाइए, आपके लिए स्लिम-फिट सिलता हूँ।”  

करीम रोज़ शाम को वर्मा जी को रिक्शे पर बिठाकर गोमती किनारे ले जाता – “डॉक्टर ने कहा है बाबूजी, खुली हवा ज़रूरी है।”  

और वर्मा जी? वो रात को सलीम को अंग्रेज़ी पढ़ाते, करीम को सवारी का हिसाब-किताब समझाते।  

रामू एक दिन बोला – “मालिक, पहले घर काटने को दौड़ता था। अब शाम को घर आने का मन करता है। पता नहीं क्या जादू हुआ है।”  

वर्मा जी हँसे – “जादू नहीं रे पगले। पहले ये ईंट-गारा था। अब घर बन गया है।”  

तीन महीने लगे। अम्मा का नया घर तैयार हुआ – दो कमरे, रसोई, छोटा सा आँगन। पक्का।  

गृहप्रवेश का दिन। मौलवी साहब आए, पंडित जी भी। मोहल्ला जमा था।  

अम्मा की आँखें भीगी थीं। वो वर्मा जी के पास आईं – “चलो बाबूजी, नया घर देख लो।”  

वर्मा जी ने अम्मा का हाथ थाम लिया – “कौन सा अम्मा? वो ईंट-सीमेंट वाला… या ये जहाँ आप हो?”  

मोहल्ले के एक बुज़ुर्ग ताना दे गए – “वर्मा साहब, ज़माना ख़राब है। लोग बात बनाएँगे।”  

वर्मा जी मुस्कुराए और गेट की तरफ उंगली उठा दी।  

रातों-रात नेमप्लेट बदल गई थी।  

अब वहाँ संगमरमर पर लिखा था – “अस्ति कुटीर”

नीचे छोटे अक्षरों में – प्रो. हरीश वर्मा & रज़िया बेगम  

वर्मा जी ने सबके सामने कहा – “बात बनाने वालों से कह देना…  

मकान ईंटों से बनते हैं जनाब। उनमें आप अकेले रहते हो।  

पर घर… घर तब बनता है जब किसी के खाँसने से आपकी नींद खुल जाए।  

जब रसोई से उठती सौंधी खुशबू ‘आपके’ लिए हो।  

जब ‘सुनिए’ कब ‘सुन’ में बदल जाए, पता ही न चले।  

मुझे माँ मिल गई। अम्मा को बेटा।  

सलीम-करीम को दादा।  

और इस कब्र जैसे मकान को… धड़कन।  

तो हमने मज़हब की दीवार गिरा दी।  

और इंसानियत की बुनियाद पर छत डाल दी।  

इस घर का दरवाज़ा… और दिल… हमेशा खुला है।”  

आज “अस्ति कुटीर” लखनऊ की पहचान है।  

ड्राइंग रूम में दो तस्वीरें साथ टंगी हैं – एक में वर्मा जी गीता पढ़ रहे हैं, दूसरी में अम्मा तस्बीह फेर रही हैं।  

नीचे हॉल में “अस्ति टेलर्स” का बोर्ड है – सलीम मास्टर। बाहर “अस्ति टूर्स” का रिक्शा खड़ा है – करीम भाई।  

और शाम को छत पर तीन पीढ़ियाँ चाय पीती हैं।  

क्योंकि अब कश्मीरी मोहल्ला जान गया है –  

मकान की कीमत गज़ से लगती है।  

पर घर की कीमत… बस अपनों की आहट से लगती है

और उस गली से गुज़रने वाला हर शख़्स नेमप्लेट पढ़कर मुस्कुराता है…  

क्योंकि “अस्ति” का मतलब ही होता है – ‘है’।

स्वरचित

कल्पनिक कहनी

अनु माथुर✍️✍️

©®

#घर ईंटों से नहीं दिलों से बनता है

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